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”पांच करोड़ अल्पसंख्यक छात्रों को छात्रवृति देने का निर्णय तर्कसंगत नहीं’’

”पांच करोड़ अल्पसंख्यक छात्रों को छात्रवृति देने का निर्णय तर्कसंगत नहीं’’

”सरकार द्वारा उठाया गया यह कदम अति भड़काऊ है। यह तर्कसंगत नहीं है। कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए कम-से-कम इन जैसे निर्णयों के लिए कमीशन तो बैठाती थी। सच्चर कमिटी के माध्यम से कुछ तर्क तो ढ़ूढ़ती थी। लेकिन इस सरकार ने तो ऐसी कोई जरूरत ही नहीं समझी।  आकड़ों के हिसाब से यह काफी दूर है। लेकिन यह सरकार सही अवसर के लिए जल्दी में है। चुंकि अभी ईद थी और सरकार अभी-अभी दूसरी बार सत्ता में  आई, इसलिए यह ‘सबका विश्वास’ को किसी ठोस कदम के रूप में सिद्ध करना चाहती थी। ऐसा लग रहा है कि सरकार को बड़ी-बड़ी घोषणाएं करने की जल्दबाजी है, ‘‘ यह कहना है सामाजिक कार्यकर्ता सुशील पंडित का रवि मिश्रा से हुई खास बातचित के दौरान। प्रस्तुत हैं मुख्य अंश-

 

 

अभी हाल ही में केन्द्र सरकार ने अल्पसंख्यक समुदाय के  पांच करोड़ बच्चों के लिए छात्रवृति देने का निर्णय लिया है। आप इसे कैसे देखते है?

मैं इस निर्णय से काफी हैरान और थोड़ा परेशान परेशान हूं। सरकार एक अवसर के रूप में ईद का प्रयोग करना चाहती थी। चुकि यह पूरे अल्पसंख्यक ससुदाय के लिए है और भारत में सबसे बड़ा अल्पसंख्यक मुस्लिम है। अत: यह घोषणा ईद के अवसर पर एक तोहफे के रूप में देखी जानी चाहिये। अभी दूसरी बार सरकार बने कुछ ही हफ्ते हुए है, लेकिन सरकार इतनी जल्दी में थी कि इसने लाभार्थियों का कोई मापदण्ड तक नहीं किया।  यदि आप मामूली तौर पर भी देखें तो देश में अल्पसंख्यकों की संख्या कुल 25 करोड़ भी नहीं है। अत: उनमें से पॉच करोड़ लाभार्थी पाना असंभव है। इतनी शीघ्र घोषणा करने की जल्दीबाजी में सरकार न केवल अपने आप को शर्मिंदा कर रही है, बल्कि उन लोगों को भी जिन्होंने सरकार के लिए इतनी मेहनत की और यह न सोचते हुए भी कहना पड़ रहा है कि यह सरकार भी तुष्टिकरण में लिप्त हो रही है, जो कष्टदायक है।

यह आपकी नजर में तुष्टिकरण है?

मुझे ऐसा लगता है कि सरकार द्वारा उठाया गया यह कदम अति भड़काऊ है। यह तर्कसंगत नहीं है। कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए कम से कम इन जैसे निर्णयों के लिए कमीशन तो बैठाती थी। सच्चर कमिटी के माध्यम से कुछ तर्क तो ढ़ूढती थी। लेकिन इस सरकार ने तो ऐसी कोई जरूरत ही नहीं समझी। आकड़ों के हिसाब से यह काफी दूर है। लेकिन यह सरकार सही अवसर के लिए जल्दी में है। चूंकि अभी ईद थी और सरकार अभी-अभी दूसरी बार सत्ता में आई, इसलिए यह ‘सबका विश्वास’ को किसी ठोस कदम के रूप में सिद्ध करना चाहती थी। ऐसा लग रहा है कि सरकार को बड़ी-बड़ी घोषणाएं करने की जल्दबाजी है।

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लेकिन यह भी सच्चाई है कि अल्पसंख्यक समुदाय में मुख्यत: मुस्लिम समुदाय के युवाओं में शिक्षा की कमी है, जिससे वे कट्टरता और आतंकवाद की ओर झुक सकते है। आपकों ऐसा नहीं लगता कि इससे कट्टरपंथ को रोका जा सकता है?

 

मैं ऐसा कोई अध्ययन देखना चाहूंगा जिसमें शिक्षा का अभाव होने और आतंकवाद में कोई संबन्ध हो। मैं ऐसे कई उदाहरण दे सकता हूं, जिसमें कई पढे-लिखे लोग आतंकवाद में लिप्त रहे हंै। डेनियल पर्ल का हत्यारा उमर सईद शेख यूनाईटेड किंगडम के पब्लिक स्कूल में पढ़ा और विश्वस्तरीय लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में गया और उसके बाद उसने भारत वापस आकर जर्मनी के पर्यटक की हत्या की। उसके बाद उसने पाकिस्तान जाकर डेनियल पर्ल की हत्या की। ओसामा बिल-लादेन से लेकर उसका स्थान लेने वाला अलजवाहिरी काफी पढ़े-लिखे थे। एक इंजीनियर था तो दूसरा डॉक्टर। कश्मीर में तो पीएचडी करने वाले युवा आतंकवाद में लिप्त हैं। ईस्लामिक स्टेट का चीफ बगदादी ने तो प्रसिद्ध विश्वविद्यालय से ईस्लामिक स्टडी में डाक्टोरेट किया है। इसलिए यह बकवास तर्क है। यह तर्क उतना ही बकवास है जितना कि पत्थर की जगह लैपटॉप देने की बात करना। और दूसरा सबसे विवादास्पद विचार यह है कि एक हाथ में कुरान तो दूसरे हाथ में लैपटॉप होना चाहिये। मुझे समझ नहीं आता कि ऐसे विचार आते कहां से हैं। आतंकवाद का कारण शिक्षा का अभाव या शिक्षा का अधिक होना नहीं है। बल्कि यह कुछ दूसरा ही है। और जबतक हम आतंकवाद का कारण शिक्षा का अभाव, गरीबी या बेरोजगारी को मानते रहेंगे, तबतक हम स्वयं को धोखा देते रहेंगे और यह देश और समाज के लिए क्षति है, जिसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी के लिए इस सरकार को चुना गया है।

मुस्लिम समाज में गरीबी भारी संख्या में है और शिक्षा गरीबी को खत्म करने में काफी हद तक कारगर है।

यदि गरीबी मुस्लिम समाज में है तो मैं आपको हिंदूओं में भी अत्यन्त गरीबी दिखा सकता हूं। वो भी बड़ी संख्या में दिखा सकता हूं। पश्चिम ओडिशा के केबीके  जिलो में शिक्षा की कमी, संरचना की कमी और अत्यंत गरीबी है। जो तुलनात्मक है। हम क्या बात कर रहे है? अत: मुझे ऐसा लगता है कि इन सभी तर्कों का निर्माण दूर्भावनापूर्वक लिए गये निर्णय को सही ठहराने के लिए किया गया है।

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पिछले कार्यकाल में मोदी सरकार ने पंडितों के कश्मीर में पुनर्वास के लिए अलग कॉलोनी बसाने का निर्णय लिया। हालांकि अभी यह पूरा हुआ नहीं है। फिर भी आपको उनके इस कार्यकाल से क्या आशा है?

 

मैंने किसी भी प्रकार की आशा करना छोड़ दिया है। क्योंकि अत्याधिक आशा रखना निराशा की ओर ले जाती है। मैं इस सरकार को इसके कथनी और करनी के आधार पर परखुंगा, न की कुछ मामूली कदमों पर। इस सरकार को परखने कें लिए एक उद्ेश्यपूर्ण तरीका होना चाहिये। इस सरकार ने अपने पिछले पांच वर्ष के कार्यकाल में कई सारे महत्वपूर्ण कदम उठाये है। जब यह सरकार 2014 में सत्ता में आयी तो संसद के उद्घाटन सत्र में, सरकार ने घोषणा कि कि सरकार कश्मीरी पंडितों का पुनर्वास कर रही हैं और न्याय देनी प्राथमिकता होगी। और जब तीन साल के बाद हमने आरटीआई फाईल किया यह जानने के लिए की सरकार ने अपने इस वायदे के लिए नीति या प्रस्ताव क्या है? उसके बाद हमे लिखित जवाब दिया गया कि इस सरकार के पास न तो कोई नीति है और न ही कोई प्रस्ताव लंबित है। चूंकि यह भाजपा के मेनीफेस्टो का अंश था। यहां तक कि यह डॉ. प्रणब मुखर्जी के भाषण का हिस्सा था, जिन्हांने इस सरकार के एजेंडे को रेखांकित किया था। उस समय के गृह राज्यमंत्री हंसराज अहिर ने भाजपा के सांसद अश्वनी कुमार चोपड़ा के प्रश्न का जवाब देते हुए कहा था कि धारा 370 सरकार के एजेंडे में नहीं है। और मंत्री का जबाब पूरे सरकार की ओर से होता है। यदि हम फिर भी इसे विश्वासघात न समझे, तो हमे दोबारा सोचने की आवश्यकता है। सरकार ने अपने इस पांच वर्ष के कार्यकाल में सभी संभव प्रयास किये है। अत: नये आशा की क्या आवश्यकता है। अभी हाल में सरकार बनने के तुरन्त बाद कुछ बातें  जानबुझकर लीक की गई थी। ऐसा नहीं होता तो सैकड़ों अखबार और दर्जनों टेलिवीजन इसे नहीं चलाते। लेकिन दो-तीन दिन के बाद गृहमंत्रालय का यह बयान आया कि मंत्रालय का इससे कोई लेना-देना नहीं है। मैं आपको बता दूं कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि नये गृहमंत्री का कार्यभार संभालते ही सरकार के वरिष्ठ बाबूओं, गृह सचिव, कश्मीर डेस्क के ज्वाईंट सेके्रटरी, खुफिया विभाग के प्रमुखों और कश्मीर के गवर्नर से मिले और ऐसा अनुमान लगाया जा रहा था कि इसमें एक बड़ा निर्णय लिया जा सकता है।

हाल ही में एनआईए द्वारा किये गये पूछताछ में अलगाववादी मसर्रत आलम और आसिया अंद्राबि ने यह खुलासा किया कि घाटी में तबाही मचाने के लिए सभी अलगाववादी नेताओं के पास पाकिस्तान से हवाला के माध्यम से पैसा आता है।

 

ये फंडिंग और आतंकवाद लगातार तीन दशकों से चल रहा है। सभी को पता है कि इस जिहाद को चलाने के लिए हवाला के माध्यम से पैसा बाहर से आता है। दो साल पहले एक टीवी चैनल द्वारा किये गये स्टिंग आपरेसन में हुर्रियत के नेता इसे खुलेआम स्वीकार करते पकड़े गये। मुझे नहीं लगता कि हमारी खुफिया एजेंसियां इतनी गूंगी है कि उन्हें कुछ पता नहीं होगा। यहां तक कि आम नागरिकों को भी इसके बारे में पता था। लेकिन वे इसके बारे में निश्चित नहीं थे। लेकिन जब इसका खुलासा हुआ और लोगों ने हुर्यित वालों को अपने आखों के सामने हवाला के फंडिंग को स्वीकार करते देखा और उनका सारा संदेह साफ हो गया। जैसा की हमारी खुफिया एजेंसियों को पहले से ही  इसकी जानकारी थी। अत: वे इस बार कुछ कड़ा कदम उठाने के दबाव में थे। और तो और खुफिया एजेंसियों ने तो उन्हें सुरक्षा मुहैया कराती थी। उनके होटल, एयर टिकट के बील देती थी। जब भी वे पाकिस्तान हाईकमिशन में आते थे, उन्हें एक विदेशी मेहमान की तरह सेवा दी जाती थी। अत: खुफिया एजेंसियां भी इस बार शर्मिंदा थी। लेकिन इस घटना के दो दिन बाद ही मुझे पता लगा की इनफोर्समेंट डायरेक्टोरेट को इसकी जांच की जिम्मेदारी दी गई है। मैने कहां कि ईडी तो वित्त मंत्रालय के अंदर आती है, जिसका काम टैक्स चोरों से डील करना है। लेकिन यह तो देश के खिलाफ जंग छेडऩे की बात है। फिर बाद में इसकी जांच की जिम्मेदारी एनआईए को सौप दी गई। जबकी खुफियां एजेंसियों को इसकी जिम्मेदारी वर्षों पहले दे दी जानी चाहिये थी।

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लेकिन ऐसा पहले क्यों नहीं हो रहा था?

ऐसा इसलिए कि भारत सरकार और जो लोग कश्मीर मामलें को हल करने में लगे थे, वे इन हुर्रियत्त वालों का कभी भी विरोध नहीं करना चाहते थे। इन नीति का मकसद इनका दिल जीतना था। वे कभी यह मानने को तैयार नहीं थे की यह जिहाद है। वे यह स्वीकार करने को तैयार नहीं थे कि कश्मीर के हिंदुओं के साथ जो हुआ वह नरसंहार था। उन्होंने हमें भूकंप या बाढ़ पीडि़तों की तरह व्यवहार किया, जिन्हें कुछ राहत  सामग्री की आवश्यकता थी। इसलिए हत्या, बलात्कार, नरसंहार, घरों को जलाने, मंदिरों को लूटने के सभी मामलों में, इन सभी अपराधियों को दोषी ठहराने की कोशिश भी नहीं की गई। उनमें से कम-से-कम एक को भी सजा नहीं मिला। उनको लगा कि यदि वे इनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करते है तो वे उन्हें अलग कर देंगे। इसलिए उन्हें एक स्वतंत्रता सेनानी की तरह ट्रीट किया गया। और इसलिए उनका दिल जितने के लिए उन्हें संसाधन उपलब्ध कराया गया। और इसलिए ही हत्या, बलात्कार, नरसंहार, घरों को जलाने के गुनाहों को माफ कर दिया गया। उन्हें नेल्सन मंडेला की तरह ट्रीट किया जाता है, जबकि नेल्सन मंडेला भी 25 वर्षों तक जेल में रह कर आये थे। इन लोगों ने देश-विदेश में करोड़ो की संपति बना रखी है। और बजाय उन्हें रोकने के सरकार उन्हें फंड करती है।

कांग्रेस की सरकार उन्हें फंडिंग करती थी?

नहीं, यह सरकार भी फंडिंग करती है। आरटीआई के अनुसार, इस सरकार ने यह स्वीकार किया है कि प्रत्येक वर्ष हुर्रियत के उपर सैकड़ों करोड़ खर्च किये जाते है। क्योंकि सरकार को ऐसा लगता है कि वे एक दिन इस देश को अपना मानेंगे।

यदि हम महबूबा मुफ्ती और अब्दुल्ला द्वारा दिये गये बयानों को देखे तो क्या आपको वहा कि स्थानीय नेतृत्व में कोई विश्वास दिखता है?

 

क्योंकि मुफ्ती और अब्दुल्ला भी यह समझते है कि केन्द्र की सरकार कितनी मूर्ख है। और इसलिए उन्हें पता है कि जबतक कश्मीर में विवाद रहेगा तबतक केन्द्र की सरकार उनपर निर्भर रहेगी।

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