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पाकिस्तान का सच

पाकिस्तान का सच

मोहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान के पिता कहे जाते हैं क्योंकि  वे मुस्लिम बहुल पाकिस्तान बनाना चाहते थे। मगर जिन्ना ने सांप्रदायिकता का जो बीज बोया, जब वह फला-फूला तो वह इस्लामी कट्टरतावाद और जिहादी मानसिकता का वटवृक्ष बन गया। जिन्ना के जाते, एक दशक भी नहीं गुजरा कि पाकिस्तान के धर्मपिता कहलाने वाले मौलाना मौदूदी की सोच ने पाकिस्तान का अपहरण कर लिया और वह   बन गया एकरंगी, संकीर्ण और पिछड़ी सोचवाला पाकिस्तान। आज की  स्थिति वाला पाकिस्तान। इसलिए मौलाना मौदूदी को पाकिस्तान का धर्मपिता कहा जाता है। वे पाकिस्तान को केवल मुस्लिम बहुल देश ही नहीं इस्लाम के सिद्धांतों पर आधारित कट्टरतावादी और जिहादी देश भी बनाना चाहते थे। वही आज पाकिस्तान बन भी गया है। देश का मुसलमान उनके साथ हो गया। आज का पाकिस्तान जिन्ना का पाकिस्तान नहीं मौलाना मौदूदी का पाकिस्तान है। उनकी पार्टी सातवें दशक से हर साल मीर कासिम के भारत पर हमले और सिंध विजय की याद में पाककिस्तान में जलसा मनाती है। इन जलसों में बिन कासिम को पहला पाकिस्तानी फिर पाकिस्तान के निर्माण में उसकी भूमिका की भूरि-भूरि प्रशंसा की जाती है।

लेकिन जमात ने ही नहीं कासिम को पाकिस्तान का संस्थापक होने का विचार सामने नहीं रखा, यह विचार सातवें दशक से पाकिस्तान की फिजा में घुल रहा है। देश की पाठ्य-पुस्तकों में उसे काफी स्थान दिया जाता रहा। सबसे पहले 1953 में ‘फाइव ईयर्स ऑफ पाकिस्तान’ पुस्तक में इसका काफी जिक्र हुआ। सरकार ने पाकिस्तान के पचास साल पूरे होने के उपलक्ष में  एक पुस्तक प्रकाशित की जिसमें एक लेख में एक पुरातत्वशास्त्री ने लिखा था कि कासिम के हमले के बाद सिन्ध दक्षिण एशिया का पहला इस्लामिक राज्य था। हाल ही में इस विषय पर कोलंबिया में इतिहास के प्रोफेसर मनान अहमद आसिफ ने जानकारी दी कि 1953 के बाद के कई प्रकाशनों में बिन कासिम का पहले पाकिस्तानी के रूप में जिक्र मिलता है। 1998 में फेडरल ब्यूरो ऑफ पाकिस्तान द्वारा प्रकाशित ‘फिप्टी ईयर्स ऑफ पाकिस्तान’ में मुहम्मद बिन कासिम सरकारी तौर पर पाकिस्तान का पहला नागरिक कहा गया था।

कासिम के सिंध पर हमले को दक्षिण एशिया में अलग मुस्लिम राष्ट्र की शुरूआत मानने का विचार 1953 में कुछ पाकिस्तानी पुरातत्वविदों के दिमाग में आया था। बाद में जमात जैसी धार्मिक पार्टियों के विमर्श में भी शामिल हो गया। इसके बाद स्कूली पाठ्य पुस्तकों का भी हिस्सा बन गया क्योंकि बांग्लादेश के निर्माण के बाद पाकिस्तान के सामने गंभीर पहचान का संकट पैदा हो गया था। जुल्फिकार अली भुट्टो ने इसे प्रोत्साहित किया। फिर जिया उल  हक की तानाशाही ने पाकिस्तान राष्ट्र की अवधारणा को समझाने के लिए इसे जोरदार तरीके से प्रचारित किया। मजेदार बात यह है कि इस क्षेत्र के इतिहास या अरब इतिहास में कासिम के सिंध पर हमले को बहुत महत्वपूर्ण नहीं माना जाता।

मगर कासिम का सिंध पर हमला इतनी बड़ी घटना नहीं थी इसलिए उस समय के ग्रंथों में उसका थोड़ा बहुत ही जिक्र मिलता है। उसके आक्रमण का जिक्र नौवी सदी की पुस्तक फितुहअल बुलदान में मिलता है अल बुलदान एक अरब इतिहासकार थे। यह पुस्तक आक्रमण के सौ साल बाद लिखी गई थी। कासिम के हमले के चार सौ साल बाद तेरहवी सदी में चाचनामा लिखा गया।

अब प्रोफेसर आसिफ और मुबारक अली के लेखों से एक बात स्पष्ट होती है अरबों ने 634 एडी से सिंध में दिलचस्पी दिखानी शुरू कर दी थी। पहले मुस्लिम साम्राज्य उम्मेयाद ने 644 और 710 एडी में छापे मारे थे। उम्मेय्यद के  इस क्षेत्र में घुसने की कई वजहें थी। वह तेजी से बढ़ता साम्राज्य था। वह इस क्षेत्र के समुद्री व्यापार पर कब्जा करना चाहता था। कासिम के बारे में ज्यादातर किताबों में लिखा गया है कि उम्मेयाद के बगदाद के गवर्नर ने सिंध के डकैतों द्वारा जहाज लूटे जाने और राजा दाहिर के कुछ करने से इंकार करने का बदला लेने के लिए बिन कासिम से हमला करवाया था।

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डा. अली और प्रोफेसर आसिफ ने अपनी बात को साबित करने के लिए जो सबूत दिए हैं वे बहुत कम है। मुहम्मद बिन कासिम सऊदी अरब की खिलाफत का एक जनरल था, जिसने 711 में भारतीय उपमहाद्वीप के पश्चिमी इलाकों पर हमला बोला था। उसने सिंधु नदी के रास्ते इधर कदम रखा और पंजाब-सिंध पर अपना कब्जा जमा लिया।

अल हकीम अल काबीली  कासिम के बाद सिंध का गवर्नर बना। उसे वह जगह मिली  जहां कासिम के समय इस्लाम में धर्मांतरित लोग थे जो फिर हिन्दू या बौद्ध हो गए थे। इस तरह का सिंध पाकिस्तान का जन्मदाता था। अब सवाल यह है कि यदि कासिम का हमला इतनी छोटी सी घटना थी तो उसे इतना बड़ा रूप क्यों दिया गया। हमने पहले ही यह देखा कि किस तरह यह घटना पाकिस्तान के वजूद का सवाल बन गई। कई सदियो तक  किसी को इसकी याद तक नहीं आई। भारत में पांच सौ साल के मुस्लिम शासन के बावजूद भी।

विडंबना यह है कि कासिम के बारे में दिलचस्पी अंग्रेज साम्राज्यवादियों ने ही पैदा की। जेम्स मिल की पुस्तक ‘द हिस्ट्री ऑफ ब्रिटिश इंडिया’ में कासिम के बारे में जिक्र किया गया है। कासिम वह हमलावर था जिसने क्षेत्र में एक विभाजन पैदा कर दिया। मिल ने बहुत कम सबूत दिए  हैं मगर उस कालखंड पर लिखने वाले बाकी इतिहास के लेखकों ने उसका अनुकरण किया। उन्होंने कासिम को एक ऐसे व्यक्ति के तौर पर देखा जिसने मुस्लिम हमलावरों के लिए दरवाजे खोल दिए जिसने भारतीय सभ्यता का नाश करने का प्रयास किया।

मुहम्मद बिन कासिम सऊदी अरब की खिलाफत का एक जनरल था, जिसने 711 में भारतीय उपमहाद्वीप के पश्चिमी इलाकों पर हमला बोला था। हज्जाज बिन यूसुफ उस समय इराक के राज्यपाल थे। उन्होंने कासिम की शादी अपनी बेटी जुबैदा से करवा दी और उसे मकरान तट के रास्ते से सिंध पर हमला करने के लिए भेज दिया। उस वक्त कासिम की उम्र सिर्फ 17 साल थी। सिंध पर उस वक्त हिंदू राजा दाहिर सेन की हुकूमत थी। कहा जाता है कि कासिम ने वहां पहुंचकर पुजारियों और नागरिकों का कत्लेआम किया। मंदिरों को नष्ट किया। वहां से आगे उसके अभियान ने और भी जोर पकड़ा। पूरब की ओर बढ़े कासिम के काफिले ने भारी संख्या में बंदी बनाए और जी भर के लूटपाट की। बंदियों को गुलाम बना कर खलीफा को भेजा गया। ढेर सारा खजाना भी भेजा गया। दाहिर सेन को युद्ध में परास्त करने के बाद कासिम का सिंध पर कब्जा हो गया। उसके फौरन बाद कासिम मुल्तान पर भी काबिज हो गया।

बहरहाल कहानी जो भी रही हो, मुहम्मद बिन कासिम महज 21 साल की उम्र में दुनिया छोड़ गया। उसकी कब्र कहां है, किसी को नहीं पता। पहला पाकिस्तानी होने का सम्मान जिस शख्स को हासिल है, उसका कोई स्मारक तक उपलब्ध नहीं है।

पाकिस्तान के लाहौर में पंजाब प्रांत के पहले पंजाबी शासक महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा लगाने और उन्हें ‘शेर-ए-पंजाब’ करार देने के बाद सिंध सूबे में राजा दाहिर को भी सरकारी तौर पर हीरो करार देने की मांग ने जोर पकड़ लिया है।

रणजीत सिंह की प्रतिमा की स्थापना के बाद सोशल मीडिया पर पंजाब को मुबारकबाद पेश की जा रही है कि उसने अपने असली नायक को सम्मान दिया है।

क्वेटा के पत्रकार जावेद लांगाह ने फेसबुक पर लिखा है कि आखिरकार राजा रणजीत सिंह बादशाही मस्जिद के दक्षिण पूर्व स्थित अपनी समाधि से निकलकर शाही किले के सामने घोड़े पर सवार होकर अपनी पिछली सल्तनत और राजधानी में फिर से नमूदार (हाजिर) हो गए हैं।

उन्होंने आगे लिखा है कि पंजाब दशकों तक अपने असल इतिहास को झुठलाता रहा है और एक ऐसा काल्पनिक इतिहास गढऩे की कोशिश में जुटा रहा जिसमें वो राजा पोरस और रणजीत सिंह समेत असली राष्ट्रीय नायकों और सैकड़ों किरदारों की जगह गौरी, गजनवी, सूरी और अब्दाली जैसे नए नायक बनाकर पेश करता रहा जो पंजाब समेत पूरे उपमहाद्वीप का सीना चाक करके यहां के संसाधन लूटते रहे।

दरम खान नाम के एक शख्स ने फेसबुक पर लिखा कि अब वक्त आ गया है कि पाकिस्तान में बसने वाली तमाम कौमों के बच्चों को स्कूलों में सच बताया जाए और उन्हें अरब और मुगल इतिहास के बजाय अपना इतिहास पढ़ाया जाए।

सतीश पेडणेकर

 

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