पुलवामा का हमला और पाकिस्तानी संदर्भ

पुलवामा का हमला और पाकिस्तानी संदर्भ

पिछले दिनों जैश-ए-मोहम्मद ने कश्मीर घाटी में पुलवामा में आत्मघाती मानव बम तरीके का इस्तेमाल करते हुए सीआरपीएफ के चालीस जवानों को शहीद कर दिया। भारतीय सेना और जम्मू-कश्मीर पुलिस जिस तरह घाटी में आतंकवादियों के सफाई अभियान में लगी हुई है और उसने बहुत से आतंकवादी मुठभेड़ में मार भी दिए हैं उससे इन समूहों और उनके नियंत्रक पाकिस्तान का हड़बड़ी में आना स्वभाविक ही था। इससे कश्मीर घाटी में आतंकवादी समूहों का मनोबल भी गिरता है। यदि इन आतंकी समूहों का मनोबल बनाए रखना है तो जरूरी था कि किसी बड़ी घटना को अंजाम दिया जाता। पाकिस्तान की सेना ने जैश के माध्यम से पुलवामा में यही सब किया। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने पुलवामा घटना के कुछ दिन बाद जो वीडियो भाषण दिया, उससे भी पाकिस्तानी सेना की इस घटना में संलिप्तता अपने आप स्पष्ट होती है।

पाकिस्तानी सेना को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष पुलवामा हमला करने की जरूरत क्यों पड़ी? पहला कारण तो स्पष्ट ही है कि कश्मीर घाटी में काम कर रहे आतंकवादियों को निराशा के गर्त से बाहर निकाला जाए। दूसरा कारण इससे गहरा है। भारत में लोकसभा के चुनाव होने वाले हैं। उन चुनावों में पाकिस्तान की यह अप्रत्यक्ष दखलन्दाजी ही नहीं है बल्कि उसमें बहस के वे मुद्दे खड़े करने की कोशिश है जो पाकिस्तान के अपने हित में हैं। पुलवामा हमले की संभावित प्रतिक्रिया क्या हो सकती थी, इस पर बहुत ही गहरा सोच विचार किया गया होगा। पहली प्रतिक्रिया तो यही कि लोगों का पाकिस्तान के प्रति बहुत ज्यादा गुस्सा भड़केगा और लोग मांग करेंगे कि पाकिस्तान पर सख्त कार्यवाही की जाए। सख्त कार्यवाही के अनेक आयाम हैं। उसका एक आयाम पाकिस्तान पर हमला करना भी है। आम जनता की नजर में यही सख्त कार्यवाही मानी जाती है। पाकिस्तानी सेना ने इस बात का आकलन तो कर ही लिया होगा कि भारत सरकार और जो भी सख्त कार्यवाही करे, वह फिलहाल पाकिस्तान पर हमला तो नहीं कर सकती। किंतु 26 फरवरी को भारतीय वायुसेना के हमले ने उनकी अवधारणा को गलत साबित कर दिया, पाकिस्तान को और भारत में उसके समर्थकों को लगता है कि पुलवामा हमले के बाद, चुनावों में नरेन्द्र मोदी के खिलाफ यह मुद्दा चलाया जा सकता है। ध्यान करना होगा कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणि शंकर अय्यर अरसा पहले पाकिस्तान जाकर यह मांग कर आए थे कि पाकिस्तान नरेन्द्र मोदी को अपदस्थ करने में हमारी सहायता करे।

दूसरा, कश्मीर घाटी में इस पुलवामा हमले की क्या प्रतिक्रिया हो सकती थी? महबूबा मुफ्ती किसी भी स्थिति में पाकिस्तान के खलिाफ नहीं बोल सकेंगी। क्योंकि उसकी पार्टी पीडीपी को दक्षिणी कश्मीर के तीन चार जिलों में जो वोट मिलते हैं, उसकी व्यवस्था मोटे तौर पर अलगाववादी समूह ही करते थे। लेकिन पीडीपी द्वारा जम्मू-कश्मीर में भाजपा के साथ मिलकर सरकार बना लेने के बाद से ये अलगाववादी महबूबा मुफ्ती से नाराज चल रहे थे। पुलवामा हमले के बाद महबूबा मुफ्ती पाकिस्तान के पक्ष में बोल कर इन अलगाववादी समूहों में फिर से अपनी पैठ बना सकेंगी। महबूबा मुफ्ती को मेनस्ट्रीम पार्टी के बुर्के में एक बार फिर से अलगाववादी खेमे के आंगन में दाखिल होना है। पुलवामा हमले का एक उद्देश्य महबूबा को इस काम के लिए गलियारा मुहैया करवाना रहा होगा। निश्चित ही ऐसा आकलन पुलवामा की योजना बनाने वालों का रहा होगा। और सचमुच उसी आकलन के हिसाब से महबूबा मुफ्ती प्रतिक्रिया कर भी रही हैं। उसका कहना है कि इस प्रकार की छोटीमोटी घटनाओं को आधार बना कर पाकिस्तान से वार्ता बन्द नहीं की जा सकती। महबूबा कश्मीरी युवाओं के बहाने आतंकवादियों का ही परोक्ष समर्थन करने में लगी हैं। लगता है महबूबा को वापिस अपने पुराने अखाड़े में जाने का गलियारा मिल गया है। वैसे तो शेख मोहम्मद अब्दुल्ला परिवार और उनकी पार्टी भी लगभग उसी तर्ज पर प्रक्रिया दे रही है। अन्तर केवल भाषा और शैली का है। उसका कारण भी स्पष्ट है। शेख परिवार की नेशनल कान्फ्रेंस मोटे तौर पर कश्मीरियों की पार्टी मानी जाती है और महबूबा मुफ्ती की पीडीपी सैयदों की पार्टी मानी जाती है। कश्मीरियों और सैयदों की भाषा शैली में जो मौलिक अन्तर है, वही इस प्रतिक्रिया में भी दिखाई देता है। यह अलग बात है कि इन दोनों ही पार्टियों ने तेजी से अपना जनाधार खोया है। पिछले दिनों प्रदेश में हुए स्थानीय निकायों के चुनावों में दोनों पार्टियों ने चुनावों का बहिष्कार कर अपनी लाज बचाई थी।

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प्रतिक्रिया की एक तीसरी संभावना पर भी झांक लेना होगा। पुलवामा हमले से पैदा हुए गुस्से का शिकार देश घर में फैले कश्मीरी भी हो सकते थे। उस गुस्से का शिकार होकर वे घाटी में जाने के लिए व्याकुल हो जाएंगे और वहां जाकर वे कल्पित अकल्पित भारत विरोध की भावनाओं को हवा देने का काम करेंगे। पाकिस्तानी रणनीति का एक बड़ा हिस्सा वे रास्ते तलाशता है जिससे आम कश्मीरी को मानसिक रूप से हिन्दुस्तान से काटा जाए और पाकिस्तान से जोड़ा जाए। 1965 की लड़ाई में, और उसके बाद कारगिल की लड़ाई में वह ऐसा प्रयास करता रहा है, लेकिन अभी तक उसे इसमें सफलता नहीं मिली। मध्य एशिया, अरब- ईरान से आए हुए कुछ लोगों की मानसिकता को छोड़ कर उसे इसमें सफलता नहीं मिली थी। लेकिन पाकिस्तान ने इसके लिए प्रयास कभी बन्द नहीं किये। पुलवामा हमले में इन प्रयासों में एक और आयाम जोड़ दिया गया। देशभर में फैले कश्मीरी छात्रों में से कुछ छात्र सोशल मीडिया पर भारत विरोधी और पाक के पक्ष में टीका टिप्पणी करेंगे। वे आतंकवादियों के समर्थक भी हो सकते हैं और सेक्युलर ब्रिगेड/अर्बन नक्साल/के सोशल मीडिया का हिस्सा भी हो सकते हैं। पुलवामा हमला प्रकरण की स्क्रिप्ट में उनको भी महत्वपूर्ण भूमिका दी गई थी। हमले के तुरन्त बाद अपनी टिप्पणियों से आम भारतीय को उत्तेजित करना ताकि वह कश्मीरियों के खिलाफ बोलें और हो सकता है उनसे दुर्व्यवहार भी करें। चाहे इस प्रकार की घटनाएं इक्का-दुक्का ही होंगी लेकिन उन्हें इसी ब्रिगेड के छद्म पत्रकारों के माध्यम से मैगनीफाई किया जा सकेगा। ऐसा ही हुआ। यथार्थ या कल्पित भय से संचालित कश्मीरी छात्र घाटी में पहुंच कर सच्चे झूठे किस्से बयान करेंगे तो वहां के घरों में भारत विरोधी कहानियां तो प्रचलित होंगी हीं। पुलवामा हमले की पटकथा लिखने वालों ने इस सारी प्रतिक्रिया/प्रक्रिया का अनुमान लगाया ही होगा। और यदि सचमुच उनके अनुमान के अनुसार ही प्रतिक्रिया होती है तो समझ लेना चाहिए कि पुलवामा हमले के सूत्रधार अपने उद्देश्य के एक हिस्से में तो कामयाब हो ही गए। आमजन को ध्यान रखना होगा कि  पुलवामा हमले के सूत्राधारों के उद्देश्य को कामयाब न होने दें। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सही कहा है कि लड़ाई आतंकवाद से है कश्मीरियों से नहीं।

और अब अंतिम बची भारत में वह टीम जिसे विवेक अग्निहोत्री ने अर्बन नक्सल का नाम दिया है। इसमें प्रशान्त भूषण से लेकर मेधा पाटेकर एवं अरुन्धती राय सभी शामिल किए जा सकते हैं। पुलवामा हमले के बाद इस पर इन अर्बन नक्सालों की प्रतिक्रिया का अन्दाजा लगाने के लिए इमरान खान और पाकिस्तानी सेना को भी माथापच्ची करने की जरुरत नहीं थी। इनकी प्रतिक्रिया वही है जिसका किसी भी भारतीय को अन्दाजा था ही। पुलवामा हमले के बाद इस टोली का कहना है कि भारत में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार हो रहाऔर कश्मीर घाटी को आजाद होने का हक है। इतना ही नहीं ये अर्बन नक्साल यह तर्क भी दे रहे हैं कि कि आत्मघाती बारूदधारी की कभी सेना ने पिटाई की थी जिसकी प्रतिक्रिया में वह जैश के घर में चला गया।

 

डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

 

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