ब्रेकिंग न्यूज़

पुलवामा के लहू पर सियासत

पुलवामा के लहू पर सियासत

14 फरवरी का दिन उस संत वेलेंटाइन के जन्मदिन के रूप में हाल के दिनों में विख्यात हुआ है, जिन्हें मोहब्बत का प्रतीक माना जाता है। मोहब्बत के प्रतीक के जन्मदिन पर अव्वल तो प्यार बांटा जाना चाहिए था, लेकिन भारत के मुकुट कश्मीर घाटी के पुलवामा में नापाक आतंकियों के संगठन जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों ने 40 मासूम लोगों का निर्दोष खून बहा दिया। यह लहू बहाकर सीमा पार बसे आतंकियों के आका मौलाना मसूद अजहर ने सोचा होगा कि वह भारतीयों के दिल में जल रही देशप्रेम की आग पर पानी डालकर मां भारती के सपूतों के उत्साह को ठंडा कर देगा। लेकिन देश के तमाम प्रांतों के सपूतों के खून के एक-एक कतरे ने जोश और देशप्रेम की जो नई धार बहाई है, उससे भारतीय राष्ट्र राज्य की नींव की मजबूती को ही बढ़ाने में मदद मिलेगी। इस भावना का ही असर रहा कि 26 फरवरी की भोर में जब दुनिया सो रही थी, केंद्र सरकार के निर्देश पर भारतीय वायुसेना के 12 मिराज विमानों ने पाकिस्तान में घुसकर जैश-ए-मोहम्मद के ठिकानों को बम बरसाकर ठिकाने लगा दिया। ऐसा माना जा रहा है कि इस हमले में जैश-ए-मोहम्मद के टॉप कमांडरों समेत करीब 300 आतंकी मारे गए हैं। इससे पाकिस्तान भौंचक्का रह गया। पाकिस्तानी सेना ने इस हमले को स्वीकार तो किया, लेकिन अपनी भाषा में। पाकिस्तानी सेना ने कहा कि भारतीय लड़ाकू विमान पाकिस्तानी सीमा में घुसे लेकिन पाकिस्तानी सेना की जवाबी कार्रवाई के चलते भाग खड़े हुए और भागते-भागते कुछ बम गलती से मैदानों में गिरा गए। यह बात और है कि इसके साथ ही पाकिस्तानी सेना ने कुछ फोटो भी ट्वीट किए, जिसमें साफ दिख रहा था कि भारतीय बमों ने वहां क्या गुल खिलाया है।

याद कीजिए, पुलवामा में शहीद पटना के संजय की आखिरी विदाई का दृश्य उस वक्त लाखों की उमड़ी भीड़ यह साबित करने के लिए काफी रही कि भारतीय रक्त का जब भी कतरा देश के नाम पर बहता है, उसके असर से रक्तबीज की भांति ना जाने कितने और वीरों की रगों में नया जोश भर जाता है। मां भारती के आन, बाना और शान के लिए मर-मिटने के लिए ना जाने कितनी नई प्रेरणाएं जन्म लेती हैं, जो भारतीय मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जाने के लिए नए-नए उद्यत नौजवानों की फौज खड़ी कर देती है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या इस भावना से भारतीय राजनीति प्रभावित हो पाती है? जिस तरह विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर भी कुछ दिनों की चुप्पी के बाद राजनीति शुरू कर दी है, यह साबित करने के लिए काफी है कि इस सवाल का जवाब क्या हो सकता है। दुनिया के किसी भी देश में चाहे वहां राजतंत्र हो या लोकतांत्रिक व्यवस्था हो, सीमाओं की हिफाजत के मसले पर राजनीति नहीं होती। अमेरिका फस्र्ट जब वहां का राष्ट्रपति कहता है तो पूरा देश इस बयान के साथ उठ खड़ा होता है। ब्रिटिश राजशाही गैरसैनिक और राष्ट्रीय वजहों से चाहे जितनी भी सवालों में हो, लेकिन जैसे ही ब्रिटेन की अस्मिता का सवाल उठता है, हर ब्रितानी नागरिक को अपनी राजशाही और अपना सैनिक तंत्र प्यारा और सम्मानित लगने लगता है। लेकिन सोशल मीडिया के दौर में अपने राष्ट्र और उसके राष्ट्रीय दलों को लेकर ऐसा सोच सकते हैं? राजनीतिक दलों ने पुलवामा आतंकी हमले को लेकर जिस तरह की राजनीति शुरू की है, वह बताने के लिए काफी है कि ट्विटर और फेसबुक के दौर में उभरे राष्ट्रनायकों के लिए चुनाव जीतना ही एक मात्र उद्देश्य रह गया है और इसके लिए वे अपनी परंपरा, अपनी वीरता, राष्ट्र राज्य के लिए विकसित भावनाओं की तिलांजलि दे सकते हैं। राजनीति जिस रवायती राह पर बढ़ रही है, उससे यही लगने लगा है कि राष्ट्र की कीमत पर सत्ता हासिल करने की प्रवृत्ति आगे बढ़ रही है। ध्यान रहे, ऐसी ही प्रवृत्ति के चलते हम हजारों वर्षों गुलाम रहे, हमसे कतिपय कमजोर रही जातीय अस्मिताएं हम पर सैकड़ों सालों तक शासन और अत्याचार करती रहीं और हम बिना उफ किए उनके अत्याचारों को सहने के लिए मजबूर रहे।

पुलवामा आतंकी हमले के लिए महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे के उठाए सवालों और देश की सबसे बड़ी पार्टी के प्रवक्ताओं की बातों में समानता है। दोनों देश के सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल पर सवाल उठा रहे हैं। कांग्रेस अध्यक्ष तो राहुल गांधी इस बात को तूल दे रहे हैं कि जिस समय पुलवामा में हमला हुआ, उस वक्त प्रधानमंत्री एक विदेशी चैनल के लिए उत्तराखंड में शूटिंग करते रहे और सूचना मिलने के तीन घंटे बाद तक शूटिंग करते रहे। जैसी कि प्रधानमंत्री की शैली है, वे तत्काल जवाब नहीं देते। किसी माकूल मौके पर ऐसे आरोपों का जवाब देते हैं। हो सकता है कि वे मौके की प्रतीक्षा में हों और जवाब दें। तब शायद सच्चाई खुलकर सामने आए। राहुल गांधी ने राफेल सौदे में भ्रष्टाचार के आरोप को लेकर प्रधानमंत्री को लगातार आरोपों के घेरे में रखे हुए हैं। वे खुलकर चौकीदार चोर है का नारा लगा रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने खुद को चौकीदार बताया है, लिहाजा उन्हें वे खुलकर चोर बता रहे हैं। पुलवामा आतंकी हमले के बाद अब उन्होंने प्रधानमंत्री को प्राइम टाइम मिनिस्टिर कहने लगे हैं।

लोकतंत्र में विपक्ष के पास सत्ताधारी तंत्र पर हमले का अधिकार है। विपक्षी चाबुक से सत्ता नियंत्रित रहती है। लेकिन ध्यान रखा जाना चाहिए कि ऐसे हमलों से लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख कमजोर ना हो। लेकिन विपक्षी हमलों से लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख पर ही सवाल खड़े होने की आशंका बढ़ रही है। लेकिन विपक्ष को नहीं भूलना चाहिए कि आज का वोटर आजादी के बाद के कुछ वर्षों तक का वोटर नहीं है। वह पढ़ा-लिखा है। उसके समक्ष सूचनाओं की लगातार आवाजाही हो रही है। वह देश के लिए अच्छा और बुरा क्या है, इसकी समझ रखने वाला है। इसलिए होना यह चाहिए कि विरोध की आवाज को इतना ही तुर्श बनाया जाय, जिससे वह विरोध ही रहे, तार्किक मुखालफत का जरिया रहे, लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख पर सवाल ना उठाए। क्योंकि चुनावों में आज का वोटर नए तरीके से जवाब देना जान गया है। उसकी कसौटी पर अब सत्ता पक्ष ही नहीं, विपक्ष भी है।

वैसे यह सच है कि पुलवामा हमले के बाद देश में सामान्य भावना यह है कि लगातार मासूम लहू को बहाने वालों को अब तार्किक और मुंहतोड़ जवाब दिया जाना चाहिए। ताकि सीमापार से आतंक निर्यात करने वाली दुष्टात्माओं पर लगाम लग सके।

यह तो हुई घरेलू मोर्चे की बात। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भारत द्वारा पाकिस्तान में 26 फरवरी को किए गए  दूसरे सर्जिकल स्ट्राइक से भारतीय जनता पार्टी की लोकसभा चुनाव में संभावनाएं बढ़ सकती है। जिस दौर में हम रह रहे हैं, उस दौर में किसी देश पर किसी देश का हमला कर पाना संभव नहीं रहा। लेकिन पुलवामा हमले के बाद जिस तरह प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान को चेतावनी दी और उसे जमीनी हकीकत बनाया है, उससे साफ है कि सरकार अब चुप नहीं बैठेगी। लोग सवाल उठाते रहे कि कार्रवाई कैसी होगी, लेकिन सवाल उठाने वालों को यह भी जानना चाहिए कि कोई भी जिम्मेदार सरकार अपने दुश्मन देश के खिलाफ मीडिया के सुझावों से कोई कार्रवाई नहीं करती, या फिर मीडिया को बताकर भी नहीं करती। सरकार ने कार्रवाई पहले से ही शुरू कर दी थी। जिसके तहत पाकिस्तान को मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा छीना जाना, पाकिस्तान से आने वाली वस्तुओं पर 200 प्रतिशत आयात शुल्क लगाना और पाकिस्तान जाने वाले टमाटर पर रोक लगाना शामिल रहा। आर्थिक रूप से पहले से ही पस्त पड़े पाकिस्तान की हालत इससे और खराब होने लगी है। भारत ने सिंधु जल समझौते को रद्द करने और पश्चिमी खेमे की तीन नदियों का पानी रोकने का ऐलान कर ही दिया है। जिस तरह जैश-ए-मोहम्मद के खिलाफ सुरक्षा परिषद ने एक सुर से प्रस्ताव पारित किया, उससे भी पाकिस्तान भी दबाव में हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तो यहां तक कह चुके हैं कि भारत बड़ी कार्रवाई कर सकता है और उसे आत्मरक्षा का अधिकार है। भारत की वैश्विक साख और आर्थिक एवं सैन्य ताकत से पाकिस्तान कितना घबराया हुआ है, इसे उसके पूर्व तानाशाह मुशर्रफ की चेतावनी से समझा जा सकता है। मुशर्रफ ने कहा है कि भारत के खिलाफ अगर पाकिस्तान एक बम फोड़ेगा, तो वह बीस बम बरसाकर पाकिस्तान को तहस-नहस कर सकता है। रियाज खोखर समेत पाकिस्तान के तीन पूर्व विदेश सचिवों ने वहां के प्रमुख अखबार डॉन में लेख लिखकर पाकिस्तान सरकार को चेतावनी दी है कि वह उकसावे की कार्रवाई ना करे, बल्कि तनाव कम करने की दिशा में कदम उठाए। इमरान खान लगातार भारत की तरफ समझौते का हाथ बढ़ाने का संकेत दे रहे हैं। लेकिन चालीस जवानों की शहादत से उपजी राष्ट्रीय भावना का दबाव ऐसा है कि चाहकर भी तत्काल भारत सरकार इमरान की तरफ दोस्ती का हाथ नहीं बढ़ा सकती। पाकिस्तान के खिलाफ उमड़ी जनभावना ही थी कि शुरू में विपक्षी दल सरकार के खिलाफ एक भी शब्द बोलने से परहेज करते रहे। लेकिन जब उन्हें लगने लगा कि इसका फायदा कहीं सरकार चुनावी मैदान में ना उठा ले, इसलिए सरकार पर हमले शुरू हो गए। इस मसले पर भी राजनीति होने लगी। एक कांग्रेसी नेता ने तो सोशल मीडिया पर यहां तक कह दिया कि हमें इस मसले पर भी राजनीति होनी चाहिए। पाकिस्तानी इलाके में स्थित आतंक के ठिकानों पर सैन्य कार्रवाई के लिए विपक्षी दलों ने जिस तरह प्रतिक्रियाएं दीं, उससे साफ है कि उन्होंने इस मसले पर भी राजनीति ही की। चाहे राहुल गांधी हों या फिर दूसरे विपक्षी दलों के नेता, सबने सिर्फ वायुसेना को बधाई दी। राजनीति कर्म में होते हुए भी ये नेता भूल गए कि भारत में जो संवैधानिक व्यवस्था है, उसमें सेना चाहकर भी कुछ नहीं कर सकती, जब तक कि राजनीतिक नेतृत्व उसे मंजूरी ना दे। बहरहाल सैनिक और सीमा के मामले पर राजनीति किसे भारी पड़ेगी और किसे इसका फायदा मिलेगा, देश के सबसे बड़े परिवार में शामिल सैनिकों का कुनबा किस पर मेहरबान होगा और किसे उसकी राजनीति के लिए मजा चखाएगा, यह तो चुनाव नतीजों के बाद ही पता चल पाएगा।

 

उमेश चतुर्वेदी

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.