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पुष्पों का चिकित्सकीय उपयोग

पुष्प, जहां अपने दर्शन से मन को आह्लादित एवं प्रफुल्लित करते हैं वहीं वे अपनी सुगन्धि से संपूर्ण परिवेश को आप्यायित कर सुवासित भी कर देते हैं। अपने आराध्य के चरणों में प्रेमी भक्त की पुष्पांजलि प्रेमास्पदका सहसा प्राकट्य करा देती हैं। पुष्पों की अनंत महिमा है। पुष्प के सभी अवयव उपयोगी होते हैं। इनके यथाविधि उपयोग से अनेक रोगों का शमन किया जा सकता है। फूलों के रस से तैयार किया गया बाह रूप से त्वचा पर लगाने से उसके सुगन्धि ह्दय तथा नासिका तक अपना प्रभाव दिखाकर मन को आनंदित कर देती है। सबसे अच्छी बात यह है कि पुष्प-चिकित्सा के कोई दुष्प्रभाव नहीं होते। फूलों को शरीर पर धारण करने से शरीर की शोभा, कांति, सौंदर्य और श्री की वृद्धि होती है। उसकी सुगन्धि रोगनाशक भी है। फूल के सुगंधित परमाणु वातावरण में घुलकर नासिका की झिल्ली में पहुंचकर अपनी सुगन्धि का अहसास कराते हैं और मस्तिष्क के अलग-अलग हिस्सों पर अपना प्रभाव दिखाकर मधुर उत्तेजना-सा अनुभव कराते हैं। पुष्प की सुगन्धि का मस्तिष्क, ह्दय, आंख, कान तथा पाचन-क्रिया आदि पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। ये थकान को तुरंत दूर करते हैं। यहां कुछ पुष्पों के संक्षेप में औषधीय प्रयोग दिये जा रहे हैं, सम्यक जानकारी प्राप्त कर उनसे लाभ उठाया जा सकता है।

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कमल

कमल और लक्ष्मी का संबंध अविभाज्य है। कमल सृष्टि की वृद्धि का द्योतक है। इसके पराग से मधुमक्खी शहद तो बनाती है ही, इनके फूलों से तैयार किये गये गुलकंद का उपयोग प्रत्येक प्रकार के रोगों में तथा कब्ज के निवारण-हेतु किया जाता है। कमल के फूल के अंदर हरे रंग के दाने-से निकलते हैं, जिन्हें भूनकर मखाने बनाये जाते हैं, परंतु उनको कच्चा छीलकर खाने से ओज एवं बल की वृद्धि होती है। इसका गुण शीत है। इसका सबसे अधिक प्रयोग अञजनकी भांति नेत्रों में ज्योति बढ़ाने के लिए शहद में मिलाकर किया जाता है। पंखुडिय़ों को पीसकर उबटन में मिलाकर चेहरे पर मलने से चेहरे की सुंदरता बढ़ती है।

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गुलाब

गुलाब का पुष्प सौंदर्य, स्नेह एवं प्रेम का प्रतीक है। इसका गुलकंद रोचक है, जो पेट और आंतों की गर्मी शांत करके ह्दय को प्रसन्नता प्रदान करता है। गुलाब जल से आंखें धोने से आंखों की लाली तथा सूजन कम होती है। गुलाब का इत्र उत्तेजक होता है तथा इसका तेल मस्तिष्क को ठंडा रखता है। गुलाब के अर्क का भी मधुर भोज्य पदार्थों में प्रयोग किया जाता है। गर्मी में इसका प्रयोग शीतवर्धक होता है।

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सूरजमुखी

इसमें विटामिन ए तथा डी होता है। यह सूर्य का प्रकाश न मिलने के कारण होनेवाले रोगों को रोकता है। इसका तेल ह्दय रोगों में कोलेस्ट्रॉल का कम करता है।

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केवड़ा

इसकी गंध कस्तूरी-जैसी मोहक होती है। इसके पुष्प दुर्गन्धनाशक तथा उन्मादक हैं। केवड़े का तेल उत्तेजक श्वास विकार में लाभकारी है। इसका इत्र सिरदर्द और गठिया में उपयोगी है। इसकी मंजरी का उपयोग पानी में उबालकर कुष्ठ, चेचक, खुजली तथा ह्दय रोगों में स्नान करके किया जा सकता है। इसका अर्क पानी में डालकर पीने से सिरदर्द तथा थकान दूर होती है। बुखार में एक बूंद देने से पसीना बाहर आता है। इसका इत्र दो बूंद कान में डालने से कान का दर्द ठीक हो जाता है।

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चमेली

चर्म रोगों, पायरिया, दंतशूल, घाव, नेत्र रोगों और फोड़े-फुंसियों में चमेली का तेल बनाकर उपयोग किया जाता है। यह शरीर में रक्त संचार की मात्रा बढ़ाकर उसे स्फूर्ति प्रदान करता है। इसके पत्ते चबाने से मुंह के छाले तुरंत दूर हो जाते है। मानसिक प्रसन्नता देने में चमेली का अद्भूत योगदान है।

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गेंदा

मलेरिया के मच्छरों का प्रकोप दूर करने के लिये यदि गेंदे की खेती गंदे नालों और घर के आस-पास की जाये तो इसकी गंध से मच्छर दूर भाग जाते हैं। लीवर के रोगी के लीवर की सूजन, पथरी एवं चर्म रोगों में इसका प्रयोग किया जा सकता है।

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चम्पा

चम्पा के फूलों को पीसकर कुष्ठ रोग के घाव में लगाया जा सकता है। इसका अर्क रक्त कृमि को नष्ट करता है। इसके फूलों को सुखाकर बनाया गया चूर्ण खुजली में उपयोगी है। यह ज्वर हर, उत्सर्जक, नेत्र ज्योतिवर्धक तथा पुरूषों को शक्ति एवं उत्तेजना प्रदान करता है।

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रात-रानी

इसकी गंध इतनी तीव्र होती है कि यह दूर-दूर तक के स्थानों को मुग्ध कर देती है। इसका पुष्प प्राय: सायंकाल से लेकर अर्धरात्रि के कुछ पूर्व तक सुगंध अधिक देता है। परंतु इसके बाद धीरे-धीरे क्षीण होने लगता है। इसकी गंध से मच्छर नहीं आते। इसकी गंध मादक और निद्रादायक है।

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सौंफ

सौंफ अत्यंत गुणकारी है। सौंफ के पुष्षों को पानी में डालकर उबाल ले, साथ में एक बड़ी इलायची तथा कुछ पुदीना के पत्ते भी डाल दे। अच्छा यह रहे कि मिट्टी के बर्तन में उबाले पानी को ठंडा करके दांत निकलने वाले बच्चे या छोटे बच्चे जो गर्मी से पीडि़त हों, उन्हें एक-एक चम्मच कई बार दे। इससे उनके पेट की पीड़ा शांत होगी तथा दांत भी ठीक प्रकार से निकलेंगे।

साभार: कल्याण आरोग्य अंक

डॉ. श्रीकमलप्रकाशजी अग्रवाल

 

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