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पूर्वांचल का समर भाग्य भी भाजपा के साथ

पूर्वांचल का समर  भाग्य भी भाजपा के साथ

17वीं लोकसभा के लिए जारी चुनावी जंग अपने आखिरी चरण में है। इसमें पूर्वांचल की विधानसभा की 61 सीटें हैं जिनमें 2017 के चुनाव में भाजपा ने 35 सीटें हथिया ली थीं। बसपा के हाथ तो 2014 में लोकसभा की कोई सीट लगी ही नहीं थी लेकिन प्रदेश की महत्वपूर्ण पार्टी सपा के हाथ भी पिछली लोकसभा में यहां से सिर्फ मुलायम सिंह ही जीत पाये थे। सपा-बसपा और रालोद के महत्वपूर्ण (आज की तारीख में) अजित सिंह का हाथ तो वैसे ही खाली रह गया था। सबसे मह्तवपूर्ण तथ्य यह है कि भाजपा ने पिछले लोकसभा चुनाव (2014) में जहां अभूतपूर्व उपलब्धि हासिल की थी, विधानसभा चुनाव (2017) में भी यहां की 61 सीटों में से 35 पर विजय पताका फहरायी थी। इसके साथ ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (वाराणसी), प्रदेश भाजपा अध्यक्ष महेन्द्र नाथ पाण्डेय (चन्दौली) रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा (गाजीपुर) पूर्वांचल से ही लोकसभा के लिए चुने गये थे। इसी तरह वाराणसी जिले से विधानसभा की 6 सीटें भाजपा, एवं 2 सहयोगी दलों के पास हैं। गाजीपुर से 3, सोनभद्र से 4, जौनपुर से 4, चन्दौली से 3, भदोही से 2, बलिया से 5, मऊ से 3, मिर्जापुर से 4 सीटों पर भारतीय जनता पार्टी के विधायक काबिज हैं। मिर्जापुर की संसदीय सीट पर केन्द्रीय राज्यमंत्री अनुप्रिया पटेल उम्मीदवार चुनी हैं। चुनावी गणित पर नजर रखने वालों का मानना है कि अनुप्रिया की जीत लगभग तय है। ऐसा कैसे कह सकते हैं? इसके जवाब में भाजपा के वरिष्ठ नेता और वाराणसी के पूर्व मेयर राम गोपाल मोहले कहते हैं- वहां अनुप्रिया की जीत इसलिए सुनिश्चित लगती है क्योंकि जातीय समीकरण के हिसाब से वहां कुर्मियों की बहुलता है। भाजपा का पार्टीगत समीकरण के कारण लम्बे समय से वहां भाजपा काबिज है। यह सीट भाजपा या भाजपा के सहयोगी दल जीतते रहे हैं। एक तीसरी बात है कि केन्द्रीय मंत्री के रूप में अनुप्रिया बराबर सक्रिय रहीं और क्षेत्र में प्रधानमंत्री के विश्वासपात्र के रूप में केन्द्र से कई योजनाएं जिले में ले आयीं। प्रधानमंत्री ने स्वयं जाकर कई परियोजनाओं का उद्घाटन किया। एक बहुत उपेक्षित जिले को काफी महत्व मिला तो इसके पीछे कारण अनुप्रिया पटेल ही रहीं।

पूर्वांचल की दूसरी और भाजपा की लगभग सुनिश्चित जीत वाली सीट गाजीपुर है। गाजीपुर पूर्वांचल में आज नहीं आजादी के पहले से ही अपने पिछड़ेपन, गरीबी, अशिक्षा, दो टूक विचारों, उन्मुक्त अभिव्यक्ति आदि के लिए बहुचर्चित रहा है। यहां के नौजवान पुलिस और सेना में अपनी शहादत के लिए मशहूर हैं। मुगलों का शासन रहा हो या अंग्रेजों का, देशहित में यहां के लोगों ने आगे बढ़कर कुर्बानियां दीं। अंग्रेजों के शासन में यहां के मुस्लिम नौजवानों ने भी विभिन्न आंदोलनों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। गांधी के आन्दोलन से लेकर बामपंथी आन्दोलनों, किसान आंदोलन, मजदूर आंदोलन आदि में भागीदारी निभायी। इसीलिए गाजीपुर और बलिया (पहले एक ही जिला था) को क्रांतिकारी की भूमि कहा जाता है। तो गाजीपुर से मौजूदा समय में मनोज सिन्हा भाजपा के सांसद और रेल राज्य मंत्री एवं संचार राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) हैं। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष मनोज सिन्हा अपनी व्यावहारिकता और मिलनसारिता के लिए जाने जाते हैं। तटस्थ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर जातीय गणित का जोड़-घटाव देखा जाए तो एक नजर में गठबंधन (सपा-बसपा-रालोद) का पलड़ा भारी लग सकता है। सर्वाधिक यादव, दलित, मुसलमान और कुछ पिछड़े मतदाताओं को मिलाकर गठबंधन अपना वोट बताता है। लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि मंत्री के रूप में मनोज सिन्हा ने पूर्वांचल में इतने काम किये हैं कि उनकी अनदेखी किसी के लिए भी संभव नहीं है। चाहे पिछड़ा हो या दलित मनोज सिन्हा द्वारा किये कामों के प्रति उसमें आभार का भाव दिखता है। सैदपुर से तीन किलोमीटर दूर बहदियां गांव के किसान रज्जन यादव कहते हैं- भाई, जीत-हार तो हर चुनाव में होती रहती है। इस बार भी एक ही जीतेगा। बाकी सब तो हारेंगे ही। लेकिन मनोज जी ने इतना काम कर दिया है कि उसकी चर्चा न की जाये तो बेईमानी होगी। इतनी गाड़ी गाजीपुर से चला दिये, हर स्टेशन पर लोकल ट्रेन रूकवा दिये, बम्बई, दिल्ली के लिए ट्रेन गाजीपुर में रूकने लगी। अब बनारस की जगह हम लोग गाजीपुर में ही ट्रेन पकडऩे लगे। पांच साल पहले इतना कोई सोचा भी न था।

39जमानियां के रहने वाले भोलानाथ खरवार (दलित) पहले तो कुछ बताने से इनकार करते हैं-बाबू हम तो दलित हैं, हमार का ठिकाना, कोई न कोई के देइबे करब, जेहिके खाना में दब जाई, जेकरा के तकदीर होई ओके मिल जाई।

लेकिन वोट के बारे में बताने पर कोई नुकसान नहीं होगा और हम पत्रकार हैं, हमें बताने पर उनकी कोई हानि नहीं है यह यकीन हो जाने पर बोले- साहब, मनोज एतना काम कइले बाडऩ कि उनके वोट ना देहला पर बेइमानी होई। आदमी भी अच्छा हैं, उनके यहां गइला पर भेट हो जाला।

कुल मिलाकर रेल राज्यमंत्री की छवि सामान्य जनता की नजर में अच्छी लगी। हालांकि समाजवादी पार्टी से जुड़े सरजू पटनायक (नन्दगंज के पास) का मानना है कि आज की जनता बहुत चालाक और समझदार है। उसके दिल में क्या है, इसे आप नहीं निकाल सकते। आप का चेहरा और हाव-भाव देखकर वह बात करते हैं। लेकिन बूढ़ीपुर के भुल्लन यादव दो टूक कहते हैं- हम तो भइया रेलिया वाले के (रेलमंत्री) वोट देब, चाहे कोई खुश हो या नाराज। गाड़ी का एतना सुबिधा हो गइल कि कहिये न। बाकी सब अपनी जगह पर।

भाजपा नेता राम गोपाल मोहले का मानना है कि-भाजपा के और नेताओं की बात अलग हो सकती है लेकिन मनोज सिन्हा के बारे में यह तथ्य सर्वविदित है कि वे निर्विवाद हैं। इनके बारे मे पांच वर्षों में कभी कोई कन्ट्रोवर्सी नहीं पैदा हुई। काम से काम रखा। अमीर गरीब से एक ही भाव से मिले। क्षेत्र के लोग हों या अगल-बगल के जिलों के, सबको सम्मान देते हुए मिले। इसलिए सभी लोग उनको भी सम्मान दे रहे हैं। मौजूदा चुनाव को लेकिर जब मैंने मनोज सिन्हा से बात की तो हंस कर बोले- काम बोलता है, बात नहीं। इसलिए मैं काम करता हूं, बात करने से बचता हूं। हमारे प्रधानमंत्री माननीय मोदी जी ने जो जिम्मेदारी सौंपी है, उसे पूरी निष्ठा से निभा रहा हूं, आगे भी निभाऊंगा। शायद यही वजह है कि मनोज सिन्हा के पक्ष में कुछ कहने से लोग भले ही कतरायें लेकिन विरोध में उनके विरोधी भी कुछ खास बात नहीं बोलते।

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डा. महेन्द्र नाथ पाण्डेय का संसदीय क्षेत्र है चन्दौली। कभी पंडित कमलापति त्रिपाठी का चुनाव क्षेत्र चन्दौली था। यह पहले कभी अनाथ क्षेत्र था। पानी का कोई साधन नहीं, बिजली नहीं। वाराणासी की दो तरसीलें-चन्दौली और चकिया उपेक्षित रहीं। मुगलसराय स्टेशन ही पहचान की धुरी। लेकिन पंडित जी के प्रयासों से चन्दौली और चकिया को ‘धान का कटोरा’ के रूप में पहचान मिली। गंगा से नहर निकलवायी और पहाड़ी से नहरें निकलवा कर क्षेत्र को हरी-भरी उपजाऊ भूमि का स्वरूप दिलवाया। पंडित जी के बाद उनकी पुत्रवधू श्रीमती चन्द्रा त्रिपाठी यहां से चुनाव लड़ती थीं। 2014 में यह सीट भाजपा के महेन्द्र नाथ पाण्डेय की झोली में आयी। इस बार फिर डा. पाण्डेय ही यहां से प्रत्याशी हैं।

महेन्द्र नाथ 2014 से पहले उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए चुने जाते थे और सैदपुर इनका क्षेत्र होता था। एक बार यह राज्यमंत्री भी बने थे। डा. पाण्डेय की पहचान अपने क्षेत्र में ‘काम करने वाले मंत्री’ की रही है। अपने विधानसभा क्षेत्र में काम करने से इनकी साख ऐसी बनी कि चुनाव में इनके हारने के बाद इनके प्रति सामान्य लोगों की भी सहानुभूति होती थी।

 

वाराणसी से सियाराम यादव

 

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