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पूर्वांचल भाजपा के लिए दुरूह? क्या प्रियंका ने कांग्रेस में ला दी नयी जान जो सपा-बसपा गठबंधन और भाजपा की राह रोकेगा?

पूर्वांचल भाजपा के लिए दुरूह? क्या प्रियंका ने कांग्रेस में ला दी नयी जान जो सपा-बसपा गठबंधन और भाजपा की राह रोकेगा?

चुनावी बिगुल बजते ही पूर्वांचल सहित पूरे उत्तर प्रदेश में महारथी अपना-अपना रथ लेकर निकल पड़े हैं। प्रमुख दलों ने प्रदेश को पश्चिमी और पूर्वी उत्तर प्रदेश (पूर्वांचल) में बांट कर उसे अलग-अलग महारथियों को सौंप दिया है। सूबे में असली लड़ाई सत्तारूढ़ भाजपा गठबंधन और सपा-बसपा-रालोद गठबंधन के बीच है। तीसरा खास दल कांग्रेस जो लम्बें समय से मुख्य लड़ाई से लगभग बाहर रहा है, इस बार ‘रिंग’ के अन्दर दिख रहा है। इसके पीछे राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के पक्ष में पूरे देश में बनती राजनीतिक धारणा तो एक वजह है ही, पूर्वी उत्तर प्रदेश में (पूर्वांचल में) प्रभारी के तौर पर प्रियंका गांधी के आगमन से स्थितियों में बदलाव नजर आ रहा है।

दूसरी ओर सपा-बसपा और लोकदल के बीच हुए गठबंधन और आपसी राजनीतिक समझ ने भाजपा के लिए लड़ाई कठिन कर दी है। यूं भी सपा-बसपा के बीच गठबंधन के कारण ही एक बार सत्ता में आये पिछड़े-दलित तबके ने सत्ता पर जो कब्जा किया वह आपसी समझ बिगडऩे के बावजूद लगभग दो दशकों तक बना रहा। इस गणित का जोड़-घटाव समझ में आने के बावजूद दोनों दलों का शीर्ष नेतृत्व इस समझ को व्यावहारिक रूप देकर राजनीतिक जमीन पर लाने की आपसी सहमति न बना सका। इसीलिए पिछले लोकसभा चुनाव (2014) और फिर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में सपा बुरी तरह हारी और बसपा का पूरे प्रदेश में खाता नहीं खुला जबकि विधानसभा में स्थिति बेहद दयनीय रही। उधर हिन्दी पट्टी में खासकर (राजस्थान, हरियाण, उत्तर प्रदेश और बिहार) पिछड़ों में सत्ता की ललक पैदा करने वाले चौधरी चरण सिंह के राजनीतिक, पारिवारिक उत्तराधिकारी चौधरी अजित सिंह राजनीति के यथार्थ को समझ गये। जिस बागपत से चौधरी चरण सिंह बिना क्षेत्र में गये चुनाव जीतते रहे (बाद में परिसीमन के बाद क्षेत्र का नाम बदलकर बागपत हो गया) वहीं से अजित सिंह खुद कई बार चुनाव हार गये। लिहाजा अपने राजनीतिक कौशल से प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने वाले चौधरी चरण सिंह का बेटा ‘शार्ट कट’ की राजनीति की वजह से खुद अपनी सीट के लिए तरसने लगा। फिलहाल यथार्थ की समझ विकसित हुई तो जो राजनीतिक राह बनी उस पर चलने के लिए समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव, बसपा प्रमुख मायावती के साथ चौधरी अजित सिंह भी हमराही हो गये। लिहाजा जिस उत्तर प्रदेश पर ‘मोदी कौशल’ ने एकतरफा विजय पताका फहराई थी, इस बार मोदी जी जीतने की जुगत के लिए प्रयोग पर प्रयोग कर रहे हैं। हालांकि सपा-बसपा-रालोद गठबंधन के दीर्घजीवी होने पर संदेह की गुंजाइश बताते हुए भाजपा नेताओं का कहना है कि यह चुनाव तक चलेगा, इसके बाद बिखरना ही है। लेकिन सपाई इसका जोरदार खंडन करते हैं। सपा के युवा विधायक (गाजीपुर) वीरेन्द्र यादव का कहना है- सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और बसपा प्रमुख मायावती के बीच ऐतिहासिक गठबंधन हुआ है जो स्थायी रहेगा। इसे दोनों दलों के कार्यकर्ताओं और नेताओं का पूरा विश्वास हासिल है। किसी तरह का कोई ‘कन्फ्यूजन’ नहीं है। इसलिए गठबंधन बिखरने की कोई वजह नहीं है।

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यह सच है कि सपा-बसपा गठबंधन की यूपी में जो पहली सरकार बनी ती (कांशीराम-मुलायम सिंह के बीच सहमति के फलस्वरूप) वह फिर तो सम्भव नहीं ही हुई बल्कि दलितों और पिछड़ों के बीच उपजा अविश्वास सामाजिक क्षेत्र में भी दोनों के वैमनस्य इतना बढ़ा कि उसका फायदा भाजपा ने जमकर उठाया। भारतीय समाज के जातिय समीकरण और वर्गीय विभाजन के कुशल पारखी नरेन्द्र मोदी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में इसका जमकर फायदा उठाया। लिहाजा उत्तर प्रदेश में बारी-बारी से कई बार से काबिज रहीं सपा, बसपा सरकारें ध्वस्त हुईं ही 2014 के लोकसभा चुनाव में सपा को केवल पांच सीटें मिलीं और बसपा का खाता भी न खुल सका। इसी तरह विधानसभा चुनाव में सपा ने जैस-तैसे 47 सीटें जीतीं लेकिन बसपा सिर्फ 17 पर आ गयी। लिहाजा दोनों दलों और भारतीय लोकदल ने अस्तित्व बचाने के लिए गठबंधन करना जरूरी समझा। इसलिए यह मानने में कोई हर्ज नहीं है कि तीनों के लिए अपनी राजनीतिक अस्तित्व बचाना मजबूरी भी है और जनता का दबाव भी।

राजनीतिक विश्लेषक और महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में प्रोफेसर रहे डा. सुरेन्द्र प्रताप कहते हैं- मजबूरी सही लेकिन सपा-बसपा को एक अल्प जीवी समझना भूल होगी। कारण कि दोनों दलों के नेतृत्व को इसका आभास है कि अगर समझदारी न दिखायी तो जनता तो माफ नहीं ही करेगी नयी पीढ़ी (पिछड़े और दलितों की) हमें ही खारिज कर देगी। यही मजबूरी दोनों दलों के उन टिकटार्थियों को भी चुप कराये है जो टिकट की आस में थे लेकिन उम्मीदवार न बनाये जाने से उदास हुए हैं।


 

पूर्वांचल में सपा-बसपा जीत के प्रति आश्वस्त


 

गाजीपुर जिले की जंगीपुर विधानसभा से सपा के युवा विधायक वीरेन्द्र यादव पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के बेहद करीबियों में से एक हैं। इससे पूर्व वे विधान परिषद के सदस्य रह चुके हैं। इनके पिता कैलाश नाथ यादव अखिलेश सरकार में कैबिनेट मंत्री थे। प्रस्तुत हैं इनसे किये साक्षात्कार के मुख्य अंश:-

 

15वीरेन्द्र जी, लोकसभा का जो चुनाव होने जा रहा है, उसमें पूरे देश की नजर उत्तर प्रदेश पर है। भाजपा भी हर हाल में यहां जीतना चाहेगी। दूसरी ओर सपा-बसपा-रालोद यहां की जीत के प्रति आश्वस्त लग रहे हैं। लेकिन अतीत का गठबंधन इस बार के स्थायित्व के प्रति बहुत आश्वस्त नहीं करता। क्या कहना चाहेंगे?

जनता आश्वस्त है। सपा-बसपा के लोग आश्वस्त हैं। यह ऐतिहासिक गठबंधन है। भाजपा-आरएसएस के लोग कन्फ्यूजन क्रियेट कर रहे हैं। यह उनका षड्यंत्र और साजिश है। जनता में कोई कन्फ्यूजन नहीं है। पूर्वांचल में सपा-बसपा की जीत तय है। और दोनों दलों के कार्यकर्ताओं और नेताओं के मन-मिजाज मिल चुके हैं। दोनों एक-दूसरे से लय-ताल मिलाकर चल रहे हैं। गाजीपुर में सपा के लोग बसपा उम्मीदवार अफजाल अंसाली के लिए दिन-रात एक कर दिये हैं। अफजाल की जीत के प्रति हम पूरी तरह आश्वस्त हैं।

लेकिन वहां मनोज सिन्हा की जीत को लेकर भाजपा भी कोई कसर नहीं छोडंगी?

यह उनका काम है। हमारा काम हम कर रहे। हम जीतेंगे, जरूर जीतेंगे।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए गाजीपुर प्रतिष्ठा की सीट है।

मोदी जी ने देश के साथ दगा किया है। जनता उस दगा का जवाब देने को तैयार है। बस, मतदान का दिन आने दीजिए, सपा-बसपा उम्मीदवार की जीत भाजपा और मोदी जी, दोनों को हैसियत बता देगी।


प्रदेश में लड़ाई का तीसरा कोण बना रही कांग्रेस यद्यपि मौजूदा समय में उत्तर प्रदेश से न तो लोकसभा में और न ही विधानसभा में किसी खास हैसियत में है लेकिन राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों में उसने जिस तरह दो धुरंधरों मुख्यमंत्रीयों सहित प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कौशल को धूल धूसरित कर दिया, उसकी क्षमता को कमजोर करके आंकना राजनीतिक भूल हो सकती है। कांग्रेस के नेता और महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में प्रोफेसर डा. सतीश राय कहते हैं- भाजपा की सरकार ने जो वायदे किये उनमें से किसी को पूरा नहीं किया। लोगों के बैंक खातों में रूपये डालने से लेकर बेरोजगारों को नौकरी तक की बात सिर्फ झूठ का तिलिस्म निकली। किसानों को तरह-तरह के सब्ज बाग दिखाये लेकिन उन्हें क्या मिला? कुछ नहीं। जीएसटी ने व्यापारियों-दुकानदारों को किस हैसियत में पहुंचा दिया, यह किसी से छिपा नहीं है। यूपी में कानून-व्यवस्था प्रदेश सरकार के बूते से बाहर चली गयी है। फिर किस बात के लिए जनता भाजपा को वोट देगी।

यह तो कांग्रेस के पक्षधर और विचारक की राय है। लेकिन इससे इतर यह है कि यूपी को दो हिस्सों में बाटंकर राहुल गांधी ने अपने दो महारथियों- ज्योतिरादित्य को पश्चिमी और प्रियंका गांधी को पूर्वी उत्तर प्रदेश (पूर्वांचल) का प्रभार सौंप दिया है। महासचिव और पूर्वांचल की प्रभारी के रूप में पिछले दिनों तीन दिन के दौरे पर इलाहाबाद से गंगा नदी के रास्ते बनारस पहुंची प्रियंका का जिस तरह पूरे रास्ते स्वागत हुआ, उसने लोगों को इंदिरा गांधी की याद ताजा करा दी। बार-बार आम लोगों और महिलाओं ने इस बात को प्रियंका गंधी से भी कहा। प्रियंका ने भी बड़ा शिष्ट और आत्मीय ढंग से इसे स्वीकारा और किसी को हाथ पकड़ कर, किसी से हाथ हिलाकर आत्मीयता भी प्रदर्शित की। सबसे बड़ी बात यह कि तीन दिन की यात्रा में न किसी नेता का नाम लिया, न व्यक्तिगत आरोप लगाया। प्रधानमंत्री के ऊपर वादाखिलाफी, अच्छे दिन के वायदे का वादा कर बुरे दिन दिखाने की असलियत, जीएसटी, नोटबंदी के जरिये लोगों की बदहाली की चर्चा करते हुए कहा- हमारा भाई आपकी बदहाली से उबारने की बात कर रहा है तो इनका निशाना बन रहा है।

तीन दिन की यात्रा में प्रियंका ने नदी किनारे बसे किसानों, नाविकों, केवटों, पशुपालकों, दलितों, मुस्लिम पुरूषों-महिलाओं से खूब मिलीं। उनसे खूब बातें कीं, उनकी तकलीफों को सुना-जाना। आंगनबाड़ी, आशा कार्यकर्तियों, शिक्षामित्रों से व्यक्तिगत और समूह में मिलकर कहा कि ‘मैं पूरी मदद करूंगी।’ यह आग्रह जरूर किया- आप इस झूठ पर टिकी सरकार को उखाड़ फेकें हम सरकार में आये तो आंगनबाडिय़ों, आशा कार्यकर्तायों को इतना वेतन जरूर मिलेगा कि वे बच्चे पाल सकें, घर चला सकें। शिक्षामित्रों से कहा कि आपके साथ अन्याय हुआ है, हम न्याय दिलायेंगे। इस यात्रा में प्रियंका गंगा किनारे स्थित बाल्मिकि आश्रम सीतामढ़ी (भदोही), चुनार (मिर्जापुर) और विंध्याचल में ठहरी और वहीं रात्रि विश्राम भी किया तीसरे दिन पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के रामनगर स्थित पैतृक आवास जाकर उनकी प्रतिमा पर फूल भी चढ़ाया।

इसके बाद बनारस में गंगा पूजन, दर्शन, बाबा विश्वनाथ का दर्शन, गंगा आरती स्वंय किया, यह खास बात थी। स्वयं बाबा विश्वनाथ मंदिर को गर्भगृह में बैठकर सात मिनट तक ध्यान लगाया और षोडषोपचार, पूजा किया। इसी तरह पुलवामा में शहीद हुए बहादुरपुर (चन्दौली) के और तोफापुर (वाराणसी) के शहीदों के घर जाकर उनके परिवार जनों से मिलकर प्रियंका ने एक अलग छाप छोड़ी।

इस पूरे दौरे में कांग्रेस महासचिव ने भाजपा पर कोई अप्रिय या तल्ख टिप्पणी नहीं की। वे बार-बार कहती रहीं- वे नकारात्मक राजनीति कर रहे हैं, हम सकारात्मक। वे झूठ के पक्ष में खड़े हैं, हम सच के, फैसला आपके हाथ है। इस सवाल पर कि सपा-बसपा नेतृत्व कह रहा है कि हमारा कांग्रेस कोई भी गठबंधन नहीं है और कांग्रेस अध्यक्ष उनके लिए सीटें छोड़ रहे हैं, प्रियंका ने कहा- उनसे हमारा गठबंधन नहीं है। हम भाजपा के खिलाफ लड़ रहे हैं, बस।

(वाराणसी से सियाराम यादव)

 

 

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