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”बंगाल में हत्या करने वाले किसी दल से संबंधित है या गुंडे है’’

”बंगाल में हत्या करने वाले किसी दल से संबंधित है या गुंडे है’’

अभी चुनाव हो गए हैं। चुनाव में स्पर्द्धा होती ही है। प्रजातंत्र है, दल होते हैं। राजनीतिक दलों को चुनाव लडऩे पड़ते हैं। और स्पर्द्धा होने के कारण उसमें कई प्रकार की बातें चलती हैं, वातावरण में खलबली रहती है औऱ थोड़ा सा विक्षोभ भी आ जाता है। अब चुनाव में किसी को चुन कर आना है, शेष सबको पराजित होना ही है। संयोग है, इस बार पिछले चुनाव में जो दल आगे आया था, वह अपनी अधिक शक्ति के साथ आगे आया। समाज में ये जो महीना भर मंथन चला, उसमें अपना मन ऐसा दिखाया कि उन लोगों का काम शायद समाज को पसंद आया हो, इसलिए और एक अवसर दिया। पिछले पांच साल के समय में अपेक्षाएं कई थीं, कुछ पूरी हो गई, कुछ शेष हैं। कई अपेक्षाओं को समाज ने बोला था, हमने भी बोला था। और पिछले पांच साल के अनुभव से शायद समाज के सभी लोगों को ऐसा लगा कि उन अपेक्षाओं को एक अवसर और देने से ये लोग पूरा करेंगे। तो उनका संख्या बल बढ़ा, फिर से उनकी सरकार बनी। ये उनके लिये तो आनंद का विषय है, लेकिन उनको समझने की भी बात है, कि वो सारी अपेक्षाएं जल्दी पूरी हों, ये एक अधिक दायित्व उनका बन गया है। लोगों ने उस अपेक्षा से उनको फिर से भेजा है।

परंतु, यह तो चुनाव में किसका क्या हुआ, इसका विश्लेषण है। जिससे हमारा संबंध बहुत ज्यादा नहीं है। हम सब लोग यानि संघ के लोग और समाज के सब लोग, हम मतदाताओं में आते हैं, प्रत्याशियों या नेताओं में नहीं आते हैं। 100 प्रतिशत मतदान हो, ठीक प्रकार से हो, इसका प्रयास हम करते हैं। और हमको लगता है कि उस प्रयास के कारण मतदान का प्रतिशत बढ़ रहा है, अभी 100 प्रतिशत तो नहीं हुआ। लेकिन उसका कुछ न कुछ परिणाम हो रहा है।

नेताओं के बारे में जैसी ये समीक्षा चल रही है, उल्टी-सीधी सब प्रकार की, माध्यमों का जगत उससे अधिक अच्छा परिचित है। लेकिन हम अपनी भूमिका में, मतदाताओं की भूमिका में, जनता की भूमिका में, सामान्य लोगों की भूमिका में विचार करते हैं तो एक बात ध्यान में आती है कि प्रत्येक चुनाव, 1952 में चुनाव शुरू हुए, तब से एक-एक चुनाव के परिणाम, चुनाव में मतदान होने के बाद निर्णय आने तक की कालावधि में समाज की चर्चा, वो सारी बातें अगर देखेंगे तो प्रत्येक चुनाव में हमारे देश की जनता अधिक सीख रही है। और अधिक सूझबूझ के साथ स्वार्थ और भेदों से ऊपर उठकर, एक व्यवहारिक सूझबूझ रखकर, बड़ी दृढ़ता के साथ, देश की एकात्मता-अखंडता, देश का विकास और राजनीति में शासन-प्रशासन के क्रियाकलापों में पारदर्शिता की तरफ अपना मत दे रही है। प्रचार के सब हथकंडे अपनाने के बाद भी अब जनता इतनी सूझबूझ वाली हो गई है कि उनके निर्णय को प्रचार से कोई ढकोसला उनके आगे खड़ा करें, चुनाव के समय कितनी भी मीठी बात करें तो भी अब कोई भरमा नहीं सकता, जनता को ठगा नहीं जा सकता। ये हम लोगों के लिए एक आशादायक सुचिन्ह है। राजनीतिक क्षेत्र में काम करने वालों को इसको समझना पड़ेगा और अपने क्रियाकलापों को वैसा चलाना पड़ेगा।

परंतु, चुनाव हो गया, चुनाव में प्रचार होता है, एक-दूसरे का विरोध होता है, उसमें कई प्रकार के किस्से बनते हैं, कई प्रकार के मुहावरे बनते हैं, कार्टून्स बनते हैं, ये सब होता है। उसका आनंद भी हम लोग लेते हैं। लेकिन अब चुनाव समाप्त हो गए। अब देश का रथ चलाने वाली संसद, उसमें बैठने वाले लोग किसी भी दल के हों, वो सारे देश के लिए जिम्मेवार हैं और सारे देश की चिंता उनको करनी चाहिये। एक स्पर्द्धा करके नंबर पकडऩा पड़ता है, स्पर्द्धा होने के बाद स्पर्द्धा में कौन जीता, कौन हारा, इसका महत्व नहीं रहता। और आगे काम सबने मिलकर ठीक करना होगा। देश धर्म की रक्षा के हित मिलकर साथ चलें। ये केवल स्वयंसेवकों के लिये नहीं है, ये संपूर्ण प्रजा के लिये है और विशेषकर उस प्रजा के सामने अपना चित्र उपस्थित रहे, इसकी मीडिया की सहायता से चिंता करने वाले जो अपने आपको समाज के नेता कहलाते हैं, ऐसे लोगों का दायित्व है कि उनका उदाहरण इस मामले में समाज के सामने होना चाहिये। जीत हार तो हो गई। लेकिन मराठी में एक कहावत है, मराठी भाषी उसका अर्थ समझते हैं – ‘शिमगा सरला तरी कवित्व संपत नाही’। कहीं-कहीं एक रूढ़ी या कुरीति चल रही है, ऐसा कहिये कि होली के आनंद में एक दूसरे की ठिठोली करने के लिये रास्ते पर एक तरह से अभद्र व्यवहार भी होता है, वो धीरे-धीरे कम हो रहा है, हो जाएगा। लेकिन वह होली के एक दिन ही जब रंग होता है तो मर्यादित रहता है, होली जलने से लेकर रंग जिस दिन है उस शाम तक, उसके बाद लोग उसे अच्छा नहीं मानते। परंतु किसी-किसी की प्रकृति रहती है कि होली हो जाती है, लेकिन अभद्र व्यवहार करवाने वाला भूत उनमें आ जाता है, वो आगे बहुत दिन चलता है, ऐसा नहीं होना चाहिये।

30चुनाव में जो था, कोई किसी के विरोध में था, कोई किसी के पक्ष में था। देश एक है, देश सदा के लिये एक है। चुनाव में स्पर्द्धा करनी पड़ती है, इसलिए गट बनाते हैं। ये सब स्वयंसेवक एक वर्ग के अंग हैं। लेकिन आपके सामने कुछ प्रदर्शन करना था, तो उनको अपने समूह बनाने पड़े, अलग-अलग। कायक्रम हो गया, समाप्त। ऐसा होना चाहिये। जीत वाले जीत के गुमान में और हार वाले अपनी हार की भड़ास निकालने के लिए अमर्यादित व्यवहार करेंगे तो उसमें देश का नुकसान है। आज क्या चल रहा है बंगाल में, चुनाव के बाद ऐसा कहीं होता है? कहीं किसी और प्रांत में हो रहा है? नहीं होना चाहिए, और यदि किन्हीं गुंडा प्रवृत्ति वाले लोगों के कारण होता है तो शासन प्रशासन को आगे बढ़कर बंदोबस्त करना चाहिए, वो उसकी उपेक्षा नहीं कर सकते। सामान्य व्यक्ति नासमझ हो सकता है, मर्यादा तोड़कर व्यवहार कर सकता है। लेकिन राज्य का दंड, उसका यह कर्तव्य है कि समाज हित में देश की एकात्मता-अखंडता को सुरक्षित रखने वाला, कानून सुव्यवस्था की मर्यादा में चलने वाला व्यवहार वो अपनी दंड शक्ति से स्थापित करे। इस कर्तव्य से चूकने वाले राजा, उनको राजा कहना क्या उचित है? वहां पर सत्ता के उपभोग के लिए कोई नहीं जाता, सत्ता का उपभोग राजा पद्धति के जमाने की बात थी। प्रजातंत्र में तो प्रजा की इच्छा के अनुसार व्यवहार हो, इसको देखना शासन-प्रशासन का काम है। और प्रजा ने अपनी इच्छा जाहिर की है। कितनी ही ऐसी बातें आईं, गत पांच वर्षों में और विशेषकर चुनाव के प्रचार में, जिसमें अपने मतों के स्वार्थ में तोडऩा चाहा लोगों ने, अलग करना चाहा। इधर, देश में एकात्मता की बात करना, देश को कोई तोड़ रहा है, और हम उसकी रक्षा कर रहे हैं ऐसा एक रूप दिखाना और उधर, समाज के अन्यान्य वर्गों को आपस में लड़ाकर उसकी आग पर अपने स्वार्थ की रोटियां सेकना, ये उद्योग चला, लेकिन इस चुनाव में भारत की जनता ने उसको पूर्णतया नकार दिया। उस प्रवृत्ति को बढ़ावा मिले, ऐसी बातें क्यों होती हैं? जिनकी हत्याएं हो रही हैं, वे एक विशिष्ट दल के होंगे। हत्या करने वाले पता नहीं किसी दल से संबंधित हैं या ऐसे ही गुंडे हैं। लेकिन ऐसी हत्या होती है, उसका विरोध होता है तो ये कहना कि बाहर के लोग आए हैं। और बाहर के लोगों को बंगाल में रहना है कि नहीं, इस प्रकार की भाषा होती है क्या? हम एक देश के लोग हैं, हम परस्पर बंधु हैं। लेकिन यह व्यवहार होता है, ये व्यवहार नहीं होना चाहिए। ये समझ में न आने लायक अनुभवहीन व्यक्ति वहां पर नहीं है। बहुत अनुभवी है, तपस्वी भी है और न्याय के लिए संघर्ष का भी अनुभव है। तो एक कुर्सी के मोह और कुर्सी प्राप्त न होने की संभावना से लगा सदमा इतना हिला सकता है? ये नहीं होना चाहिए। इसका ध्यान रखना चाहिए। सामान्य जनता में ये चर्चा है, सामान्य जनता को ये नेताओं को बताने की बारी देश में आनी नहीं चाहिए। क्योंकि इन सब दोषों को लेकर ही संविधान सभा के अपने भाषण में डॉ. अम्बेडकर साहब ने हमको सावधान किया था, उन्होंने कहा था कि अपनी ताकत के बलबूते पर किसी विदेशी ने हमको जीता नहीं है, हमारे आपस के भेदों के चलते, हमारे झगड़ों के कारण, हम लोगों की सहायता उनको मिली, इस कारण हम परतंत्र हुए।

प्रजातंत्र में सत्ता प्राप्त करने के लिये दलों को लडऩा ही पड़ता है, ये बात सही है। लेकिन आखिर वो युद्ध कोई शत्रु देश के साथ नहीं है न। एक देश में चलने वाली स्पर्द्धा है, वह स्वस्थ होनी चाहिए। उसमें कुछ मर्यादा होनी चाहिए। अगर इस प्रकार के संकुचित स्वार्थों को उभारकर उसके बलपर राजनीति चलाने की प्रवृत्ति बढ़ी और समाज का स्वभाव ये बन गया, और हम ऐसे असावधान हो जाएं, ऐसा समय नहीं है। हमारा देश आगे बढ़ रहा है, हमारा देश बड़ा हो रहा है। परंतु, हमारा देश आगे न बढ़े और हमको वो स्थान प्राप्त न हो, जो आगे होने वाला है, इसको चाहने वाली शक्तियां हमारे चारों ओर दुनिया में हैं। तनिक भी असावधानी बहुत बड़ा घात कर सकती है।

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ग्रीक के प्रसिद्ध महाकाव्य का बड़ा उदाहरण है, इतिहास है या काव्य है पता नहीं हमको। लेकिन कहानी तो प्रचलित है कि ऐसे युद्ध जीत नहीं सकते, ये सोचकर और ट्रॉयनगर पर आक्रमण करने वाली ग्रीक लोगों की संयुक्त सेना थी, उसने नाटक किया सब जहाज चले गए वापिस, तो ट्रॉजन लोगों ने समझा कि अच्छा है, शत्रु भाग गए डरकर। वो उत्सव मनाने लगे। देखने भी गए, सागर किनारे, शत्रु का शिविर कैसा है? तो सारे जहाज तो वापिस चले गए थे, लेकिन एक जहाज को तोड़कर उसकी लकड़ी से एक बहुत बड़ा घोड़ा बनाया गया था। ट्रॉजन हॉर्स, इस नाम से यूरोपियन इतिहास में प्रसिद्ध है। और वो इतना बड़ा था कि उसके पेट में चुनिंदा दो सौ, तीन सौ वीर बैठ गए। ट्रॉयनगर के लोग आए, उन्होंने देखा कि अच्छा ये बना रहे थे क्या, हमारे लिये छोड़ दिया। चलो, इसको उत्सवपूर्वक नगर में ले जाएंगे। वे स्वयं खींचकर उसको नगर में ले गए। और उत्सव की उन रंगरलियों में मस्त हो गए। उनकी असावधानी का लाभ लेकर, उस घोड़े के पेट को खोलकर वो सारे तीन सौ वीर बाहर आए, अचानक हमला करके सारे ट्रॉय को उन्होंने उजाड़ दिया।

हम लोग आगे बढ़ रहे हैं, हम लोग आगे बढऩे वाले हैं। और भारत आगे बढ़ता है, हिन्दुस्थान आगे बढ़ता है, हमारा भारतीय समाज, हिन्दू समाज आगे बढ़ता है, इसका अर्थ यह होता है कि हम जितना आगे बढ़ेंगे, उसमें दुनिया में चलने वाली स्वार्थ की दुकान बंद होने वाली हैं। गोल-मटोल, चिकनी-चुपड़ी बातों के पीछे अपने स्वार्थ साधन करने का जो उद्योग अपने शस्त्र बल और अर्थ बल के भरोसे जो दुनिया के देश करते हैं, वह समाप्त होने वाला है। और इसलिए भारत को बड़ा न होने देना चाहने वाले बहुत हैं, नाम मैं लेता नहीं, आप समझ लीजिए। इस पूरी दुनिया में किसी का भी पूर्ण, निरपेक्ष समर्थन हमको प्राप्त नहीं है। हम बलवान हो गए, इसलिए मजबूरन दुनिया के अनेक देशों को हमारा समर्थन करना पड़ रहा है। लेकिन उनके अपने राष्ट्रीय स्वार्थ उसमें सिद्ध होते हैं, इसलिए हमको समर्थन करते हैं। अंतरराष्ट्रीय राजनीति ऐसी ही रहती है।

ऐसी अवस्था में अगर हमने ये अवसर उनको दिया, हमारी फूट का और अपने छोटे संकुचित स्वार्थों के लिए इस फूट को बढ़ावा देने का उद्योग जारी रखा तो स्वतंत्रता के सात दशकों के पश्चात हमारे पुरुषार्थ का जो नया प्रकरण शुरू हुआ है, उसका सुफल-सफल समारोप होने के पहले ही ग्रहण लगने का डर है। और इसलिए हम सबको सावधान रहने की आवश्यकता है। हम कितने भी अच्छे हों, कितने भी पुरुषार्थी हों, कितने भी पराक्रमी हों, वो पहले से रहे और सदा रहेंगे। हमारे देश के पारतंत्र्य काल में भी दुनिया में प्रतिभा के मामले में सर्वत्र भारत के लोग प्रसिद्ध थे, आज भी हैं। दुनिया के सबसे गुणवान लोग हमारे पास आज भी हैं। उनके गुणों का सर्वत्र दुनिया में डंका बज रहा है, कोई भी क्षेत्र ले लें। परंतु व्यक्ति का अपना व्यक्तिगत चारित्र्य जैसे अच्छा होना चाहिए, शुद्ध होना चाहिए, वैसे उसका राष्ट्रीय चारित्र्य भी बहुत बड़ी बात है। मनुष्य का शील उसकी रक्षा करता है, मनुष्य के शील की हानि उसके सर्वस्व की हानि करती है।

हमारा राष्ट्रीय शील क्या है? शील यानि प्रवृत्ति होती है, चरित्र यानि उस प्रवृत्ति के आधार पर हम बाहर जो व्यवहार करते हैं वो चरित्र है। लेकिन चरित्र को प्रेरणा देने वाला अन्दर प्रवृत्ति होती है, उसको शील कहते हैं। मनुष्य का शील होता है ये व्यक्ति सत्प्रवृत्त होता है, इसका मतलब वह सत्शील है। परिस्थितियां अलग-अलग रहती हैं तो व्यवहार अलग-अलग रहता है, परन्तु प्रेरणा एक प्रकार की रहती है। एक पत्निव्रत राम भी हमारे आदर्श हैं और समाज में उत्पीडऩ की शिकार न हों, इसलिए 16108 नारियों को बंदिवास से छुड़ाकर उनका पतित्व ग्रहण करने वाले श्रीकृष्ण भी हमारे लिए धर्म संस्थापक हैं। 21 बार नरसंहार करने वाले परशुराम को भी अपने समाज में मानते हैं और करुणावतार बनकर तथागत जो आए, जिन्होंने अहिंसा सिखाई वे भी हमारे समाज में उतने ही पूज्य है। क्योंकि कर्म उस देश काल परिस्थिति के अनुसार अलग हुआ, लेकिन प्रेरणा एक ही थी, सबने कहा है कि ये धर्म है, धम्म है, ऐसा ही कहा है। और इसलिए व्यक्ति की जैसी एक प्रवृत्ति होती है, उसके आधार पर उसका चरित्र होता है, वो व्यक्तिगत चारित्र्य उससे बनता है। वैसे ही राष्ट्रीय प्रवृत्ति क्या है हमारी? हमारी राष्ट्रीय प्रवृति, विविधता को एकता का ही अंग मानने की है, एकता का ही परिणाम मानने की है। बाकि दुनिया की प्रवृत्ति विविधता में भेद देखने की है, हम विविधता में छिपी एकता को बाहर लाकर कहते हैं यह विविधता में एकता नहीं है, यह एकता की विविधता है।

ऐसे हम लोग एक नहीं रहे तो क्या होगा, संविधान सभा के भाषण में डॉ. अम्बेडकर ने उसकी याद दी है बंधुभाव। स्वातंत्र्य लाने का प्रयास करते हैं तो समता टिकती नहीं और समता लाने के प्रयास में स्वतंत्रता को संकुचित करना पड़ता है। दोनों साथ में आना है तो बंधुभाव आवश्यक है। बंधुभाव ही धर्म है, बंधुभाव ही मानवता है और हम लोगों को यह देखना पड़ेगा कि अलग-अलग विचारधाराओं के अलग-अलग दलों के लोग, वह संसद में भाषण कर रहे थे अपना अलग-अलग शिविर बनाने परस्पर विरोधी यहां बैठे हैं, यह तो तंत्र की एक पद्धति है हम कर रहे हैं, परंतु हम लोगों को सारे समाज को इन सब बातों के बावजूद बंधुभाव की भावना बढ़े, इस सबका प्रयास करना होगा, नहीं तो केवल नियम-कानून-संविधान आप की रक्षा नहीं कर सकते, स्पष्ट शब्दों में उन्होंने कहा है। और उसके लिए समाज में व्यवहार क्या होना चाहिए, इसका भी निर्देशन किया है। कानून व्यवस्था से सम्मत व्यवहार ही अधिकृत होना चाहिए। अंग्रेजों के जमाने में हमने आंदोलन किए, पत्थर फैंके, सत्याग्रह किये, सब किया। लेकिन स्वतंत्र भारत में हम जिम्मेवार हैं, प्रजा का राज्य है। हमको उन बंधनों में चलना पड़ेगा, वो पुराने तरीके छोड़ देने पड़ेंगे। सारी बातें उन्होंने कही हैं और संयोग है कि 70 साल के बाद उन्हीं सब बातों को मन में सोचते हुए समाज में एक विशिष्ट दिशा दिखायी है। हम सब लोगों का काम है, उस पर चलना होगा और चलना पड़े इसके लिए उसकी आदत करनी पड़ती है। आपने यहां संचलन के प्रयोग देखे। संचलन कोई बहुत बड़ी कला नहीं है। एक पैर आगे डालना और उसके बाद दूसरा पैर आगे डालना, इतना ही करना पड़ता है। जो पैर आगे डालते हैं तो दूसरा हाथ आगे आता है, जो पैर पीछे है वो हाथ आगे रहता है, जो हाथ पीछे है वो पैर आगे आता है। यह सहज होता है, यह सीखना नहीं पड़ता। हम सब लोग ऐसा ही कर रहे हैं, चलते हैं यानि क्या करते हैं? हम चिडयि़ा पक्षियों जैसा कूदकर नहीं चलते, हम एक पैर, दूसरा पैर, सब ऐसा ही करते हैं। लेकिन सब ने एक साथ चलना है, राष्ट्रीय प्रवृत्ति दिखानी है अपने चलने में से तो अभ्यास करना पड़ता है। 25 दिन, 27 दिन यहां रगड़ाई होने के बाद भी एकाध बार ऐसा हो जाता है, कदम गलत पड़ जाता है, फिर से मिलाना पड़ता है। अपनी राष्ट्रीय प्रवृत्ति के अनुसार जो अपने संविधान की सब बातों में व्यक्त हो गई है, उसका जो मूल अपरिवर्तनीय भाग है प्रस्तावना, नागरिक कर्तव्य, नागरिक अधिकार और मार्गदर्शक तत्व, इनमें जो व्यक्त हुआ है वह राष्ट्रीय प्रवृत्ति का भाग है, अपना राष्ट्रीय शील है। उसके अनुसार व्यवहार करने की आदत करनी पड़ती है, उस आदत को लगाने का काम संघ करता है।

राष्ट्रीय शील क्या है, उसके अनुसार कैसे चलना? छोटे सरल सीधे कार्यक्रम शारीरिक-बौद्धिक, ऐसे छोटे-छोटे गीत। उनमें से भाव जगता है, मन-बुद्धि-शरीर को आदत लगती है। और अपना राष्ट्रीय चरित्र यह है, अपनत्व का भाव जगाते हैं। समाज अपना है, देश अपना है, संस्कृति अपनी है, पूर्वज अपने हैं, यह हमारा सनातन मानव धर्म, जिसको हिन्दू धर्म कहा जाता है, अपना है। यह हमारा राष्ट्रीय चारित्र्य है, उसके अनुसार हमको चलना है।

इतनी गर्म हवा में अपना पैसा, अपना समय खर्चा करके लोग आते हैं, निरंतर आ रहे हैं और कष्ट करते हैं, धन्यवाद की भी अपेक्षा नहीं होती, क्यों? क्योंकि यह अपनापन उस बात के पीछे है। यह सारा अपनापन में से हो रहा है, यह किसी के विरोध में से नहीं हो रहा है, किसी की प्रतिक्रिया में से नहीं हो रहा है, न किसी महत्वाकांक्षा में से हो रहा है। यह हो रहा है, अपने देश के प्रति इस भारत माता के प्रति शुद्ध आत्मीय भक्ति भाव, समाज के प्रत्येक बंधु के प्रति मन के अंदर समरसता का आत्मीयता का भाव और जीवन मिला है, मनुष्य जन्म मिला है तो इस समाज की, इस देश की सेवा के लिए उसका जितना अधिक विनियोग कर सकते हैं, उतना अधिक विनियोग करने में ही हमारा मोक्ष है। इस प्रकार की एक दृढ़ भावना है। इस भावना का संचार संपूर्ण देश में करना, और इस भावना के आधार पर सारे समाज को संगठित करके, गुण संपन्न बना कर अपने देश के लिये जीने मरने वाला समाज और देश की राष्ट्रीय प्रवृत्ति के अनुसार संपूर्ण विश्व का कल्याण करने वाला भारत खड़ा करने के उपकरण बनने की, साधन बनने की, बदले में कुछ ना चाहते हुए, यह पवित्र भावना लेकर संघ का काम चल रहा है। आज के इस दिन पर मैं आपको आह्वान करता हूं कि इस कार्य के केवल प्रेक्षक बने रहने से काम नहीं होगा, यह केवल संघ का काम नहीं है संपूर्ण समाज का काम है, संपूर्ण समाज को ऐसा होना पड़ेगा तब परिवर्तन आएगा और इसलिए उस परिवर्तन के अभियान में आप सब लोग सहयोगी कार्यकर्ता बनकर आएं, ऐसा एक अनुरोध आपके सामने रखता हूं और मेरे चार शब्द समाप्त करता हूं।

(यह लेख लेखक द्वारा संघ शिक्षा वर्ग-तृतीय वर्ष के नागपुर में आयोजित समापन समारोह में दिए गए अभिभाषण के  संपादित अंशों पर आधारित है)

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