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बदतर होती स्वास्थ्य सुविधाएं

बदतर होती स्वास्थ्य सुविधाएं

अभी हाल ही में नीति आयोग ने देश के विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की स्वास्थ्य सेवाओं पर रिपोर्ट जारी की। स्वास्थ्य व्यवस्था के सुधार के मामले में यह रिपोर्ट बिहार और उत्तर प्रदेश के संदर्भ में काफी चिंताजनक है। देश के सर्वाधिक जनसंख्या वाले और राजनीतिक दृष्टिकोण से सबसे महत्वपूर्ण माने जाने वाले उत्तर प्रदेश  को 28.61 अंकों के साथ सबसे पीछे तथा केरल 74.01 अंकों के साथ सबसे आगे की ओर दिखाया गया है। यहां यह कहना महत्वपूर्ण है कि कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने केरल के दौरे में कहा था कि  केरल को स्वास्थ्य के मामले में उत्तर प्रदेश से सीखना चाहिये। यहां ऐसा लगता है कि योगी आदित्यनाथ यह कहना चाहते थे कि लोगों को असफल लोगों की असफलताओं से शिक्षा लेनी चाहिये, न कि सफल लोगों की सफलता से। फिर भी केरल ने नीति आयोग की रिपोर्ट में सबसे ऊपर की श्रेणी में आकर अपने आप को उदाहरण के रूप में पेश किया है। अभी हाल में पूरे भारत ने यह देखा कि किस प्रकार से केरल ने ‘निपा’ वायरस का सामना किया। राजनीति से उपर उठकर केरल के लोगों ने इसका डटकर सामना किया और ‘निपा’ वायरस को पूरे राज्य में फैलने से रोक दिया।

यहां यह कहना महत्वपूर्ण हैं कि भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में 1000 व्यक्तियों के ऊपर केवल 35 बेड है। वहीं शहरों में यह आकड़ा 44 है। स्वास्थ्य देखभाल के लिए आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च का सत्तर प्रतिशत बचत और बाकी उधार से पूरा किया जाता है। सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि भारतीय अपनी कुल वार्षिक आय का 48 प्रतिशत स्वास्थ्य पर खर्च कर देते हैं जो देश की 6.3 करोड़ लोगों को प्रति वर्ष अत्यंत गरीबी की ओर धकेलने पर विवश करता है। इसके अतिरिक्त ग्रामीण तथा छोटे शहरों में रहने वाले लोगों को अपने स्वास्थ्य की जांच अप्रशिक्षित डॉक्टरों से करवानी पड़ती है। सरकार जीडीपी का केवल मात्र 0.1 प्रतिशत सार्वजनिक रूप से वित्त पोषित दवाओं पर खर्च करती है। लेकिन यह भी सच है कि जेनरिक दवाईयां इन आने वाले खर्च को 75 प्रतिशत तक कम कर देती हैं। यहां यह बताना महत्वपूर्ण है कि स्वास्थ्य व्यवस्था पर आने वाले कुल खर्च का  70 प्रतिशत निजी अस्पतालों को चला जाता है, जिसका फायदा उच्च मध्यम वर्ग को ही होता है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था पर निर्भर नहीं करते। स्वास्थ्य व्यवस्था का असल मकसद तभी पूरा होगा जब इसका फायदा मध्यम तथा गरीब लोगों को भी हो। वैसे भी, जनसंख्या के एक निश्चित हिस्से तक इसे सीमित करना बुद्धिमानी नहीं है।

यहां यह कहना आवश्यक है कि केंद्र सरकार ने नेशनल न्यूबर्न एक्सन प्लान, मिशन इन्द्रधनुष, नेशनल हेल्थ मिशन, स्वच्छ भारत, नेशनल ई-हेल्थ ऑथोरिटी और आयुष्मान भारत जैसे योजनाओं को लांचकर स्वास्थ्य सुविधाओं को सुधारने का प्रयास किया है। हालांकि ऐसी योजनाएं तभी लाभकारी होंगी जब सही तरीके से जमीन पर उतारा जाये। केंद्र और राज्य की सरकारें स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़ी मात्रा में धनराशी खर्च करती हैं, लेकिन इनका सही पूर्वक क्रियान्वयन नहीं हो पाता। सरकारों की जिम्मेदारी यहीं तक सीमित नहीं की केवल इन योजनाओं पर धनराशि जारी की जाये, बल्कि इन योजनाओं के सही क्रियान्वयन की भी है।  लोगों को सरकारी योजनाओं के प्रति भी शिक्षित करना होगा। इस संदर्भ में मौजूदा अनियोजित हेल्थकेयर इन्फ्रास्टक्चर में विकास गतिविधियों की तुलना में स्मार्ट शहरों का निर्माण करना एक बेहतर सुझाव होगा। सबसे महत्वपूर्ण सवाल जो दिमाग में आता है वह है राजकोषीय व्यवहार्यता और फंडिंग गैप जिस पर विचार करने की जरूरत है।  दुनिया के जितने भी बड़े-बड़े स्मार्ट शहर है, उन्होंने भी कभी ऐसी ही समस्याओं का सामना किया। भले ही हम यह कहकर पिछा छूड़ा ले कि वे संपन्न अर्थव्यवस्थाएं हैं। लेकिन यह भी सही है कि आज के ग्लोबल वल्र्ड में इन देशों को मंदी और नकदी की मंदी का सामना भी करना पड़ता है। लेकिन वे फिर भी इस प्रकार के विजनरी कदम उठाते हैं ताकि वे गर्वपूर्वक कह सकें कि उन्होंने अपनी आने वाली पीढ़ी को एक स्वस्थ्य समाज दिया।

Deepak Kumar Rath

  दीपक कुमार रथ

(editor@udayindia.in)

 

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