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बदले-बदले से सरकार नजर आते हैँ

बदले-बदले से सरकार नजर आते हैँ

बिहार की राजधानी पटना में भाजपा की ओर से आयोजित जन जागरण सभा में  देश के रक्षामंत्री ने गरजते हुए कहा की पाकिस्तान से अब कोई भी बातचीत बिना उसके आतंकवाद खतम किये नहीं होगी और अगर पाकिस्तान ने 1965-71 की गलती दोहराई तो उसके टुकड़े होने से उसे कोई नहीं बचा सकता है। उन्होंने आगे कहा की ‘हम भी देखेंगे पाकिस्तान में कितनी कूवत है। अच्छा हुआ इमरान खान ने अपने लोगों से सीमा पर ना जाने को कहा क्यूंकि अगर कोई सीमा पर दिखा तो वह वापस नहीं जा पायेगा। जाहिर तौर पर यह वह राजनाथ सिंह नहीं दिख रहे जो गृहमंत्री के तौर पे’ कड़ी निंदा’ मंत्री कहलाये जाने लगे थे।  बदले-बदले से उनके सुर नजर  हैं। आमतौर पर राजनाथ की छवि एक सघे हुए नेता की है जो अपने बयानों में आक्रामकता की बजाए संयमता को ज्यादा महत्व देता है। गृहमंत्री के तौर पर हों या फिर पार्टी अध्यक्ष के तौर पर, राजनाथ ने अपनी आदत के मुताबिक खुद को विवादों से दूर ही रखा।

मोदी सरकार 2.0 में जब राजनाथ सिंह को गृह मंत्रालय से हटाकर रक्षा मंत्रालय की कमान सौंपी गयी तो यह कहा जाने लगा कि उनका कद अब घट गया है। अमित शाह ने गृह मंत्रालय संभालते ही अनुच्छेद 370 को हटाने का काम किया जिसके बाद यह कहा जाने लगा कि राजनाथ सिंह गृह मंत्री रहते यह इच्छाशक्ति नहीं दिखा पाए। हालांकि राजनाथ बीच-बीच में यह जरूर कहते रहे कि इसकी कवायद उनके गृहमंत्री रहते ही शुरू हो गई थी। लेकिन वरिष्ठ पत्रकार शशिधर पाठक की माने तो गृह मंत्रालय में रहते हुए खुद राजनाथ ने माना है की कश्मीर के मुद्दे पर उनके हाथ बंधे हैं। शशिधर अमर उजाला  में लिखते हैं  ‘2018 में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह से उनके आवास पर मिलना हुआ। बार-बार कश्मीर और आंतरिक सुरक्षा पर पूछे गए सवाल पर राजनाथ सिंह सीधे जवाब देने से बच रहे थे। कई सवालों के जवाब में उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर में सबकुछ वह ठीक तो एक दिन में कर देंगे, लेकिन (इशारा करते हुए) उनकी कुछ सीमाएं हैं।’ यह बात देश का गृहमंत्री कह रहा था। यह सब जानते हैं कि पिछले पांच साल तक बार-बार आतंकियों, दहशतगर्दों और पाकिस्तान की  तीव्र निंदा, कड़ी चेतावनी देकर राजनाथ सिंह ने मंत्रालय की जिम्मेदारी निभाई है। सत्ता के गलियारे में भी कई बार सुनने को मिला कि राजनाथ सिंह के हाथ बंधे हुए हैं।’ लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि अनुच्छेद 370 और जम्मू-कश्मीर पर किए गए फैसले की वजह से अमित शाह की पूरे देश में वाहवाही हो रही है। इन तमाम घटनाक्रम के बीच अब राजनाथ सिंह के तेवर बदले-बदले नजर आ रहे हैं।

आमतौर पर राजनाथ की छवि एक सधे हुए नेता की है जो अपने बयानों में आक्रामकता की बजाए संयमता को ज्यादा महत्व देता है। गृहमंत्री के तौर पर हों या फिर पार्टी अध्यक्ष के तौर पर, राजनाथ ने अपनी फितरत के मुताबिक खुद को विवादों से दूर ही रखा। उन्होंने अपने संयमता की ही बदौलत राजनीति में खूब दोस्ती कमाई है। लेकिन राजनाथ सिंह के हालिया बयानों को देखें तो वह अपने छवि के बिल्कुल ही विपरीत नजर आ रहे हैं। उन्होंने संयमता का रास्ता छोड़ आक्रमकता दिखानी शुरू कर दी है और शायद हालिया राजनीति की मांग भी यही है।

अभी हाल ही में विधानसभा चुनावों से पहले हरियाणा के कालका में भाजपा की जन आशीर्वाद रैली को संबोधित करते हुए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि पाकिस्तान के साथ बातचीत तब तक संभव नहीं है जब तक वह आतंकवाद को सहयोग देना एवं उसको बढ़ावा देना बंद नहीं करता है। राजनाथ यहीं नहीं रूके, उन्होंने आगे कहा कि अगर पाकिस्तान से बातचीत होगी तो केवल पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) पर होगी न कि किसी अन्य मुद्दे पर। इससे पहले राजनाथ सिंह ने जैसलमेर में पांचवीं अंतरराष्ट्रीय आर्मी स्काउट मास्टर्स प्रतियोगिता के समापन समारोह को संबोधित करने के बाद पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी को श्रद्धांजलि देने पोखरण पहुंचे थे जहां उन्होंने देश की परमाणु योजना पर अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि हमारी नीति रही है कि हम परमाणु हथियार को प्रयोग नहीं करेंगे। लेकिन आगे क्या होगा यह तो परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

इसी तरह रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने दक्षिण कोरिया की धरती से पाकिस्तान का नाम लिया बिना उसे सख्त चेतावनी दे डाली। राजनाथ सिंह ने वहां  कहा कि इतिहास गवाह है कि भारत कभी भी आक्रामक नहीं रहा है, लेकिन वह अपनी सुरक्षा के लिए अपनी ताकत का इस्तेमाल करने से हिचकेगा भी नहीं।

दक्षिण कोरिया की यात्रा पर पहुंचे रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने  ‘सियोल डिफेंस डायलाग’ को संबोधित करते हुए कहा, ‘भारत इतिहास में कभी भी आक्रामक नहीं रहा है और न ही कभी आक्रामक होगा। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारत अपनी रक्षा के लिए अपनी ताकत का इस्तेमाल नहीं करेगा।’

राजनाथ के यह  बयान जितने आक्रामक हैं उतनी ही आक्रामकता बयान देते वक्त उनके हाव-भाव में दिखने लगी है। राजनाथ के बदले तेवर उनकी राजनीतिक मजबूरी भी हैं। जानकार मानते हैं कि गृहमंत्री के तौर पर राजनाथ कश्मीर मुद्दे को लेकर बातचीत को ही ज्यादा महत्व देते रहे जिसकी वजह से वह कड़े फैसले नहीं ले पाए। कश्मीर पर अमित शाह के फैसले ने जहां उनके कद को बड़ा किया तो राजनाथ एकदम से हाशिए  पर चले गए। एक जननेता होने के बावजूद राजनाथ को सोशल मीडिया पर ट्रोलर्स का शिकार होना पड़ा। ऐसे में राजनाथ के ये बयान अचानक उन्हें एक बार फिर मजबूत नेता के तौर पर उभारने में मदद कर सकता है। जानकार यह भी मानते हैं कि राजनाथ यह भी बताने की कोशिश कर रहे है कि सरकार में नंबर दो की भूमिका उन्हीं की है।

एक बात और भी गौर करने वाली है। राजनाथ ने अपने बयानों में अनुच्छेद 370 और जम्मू-कश्मीर पर किए गए फैसले का श्रेय प्रधानमंत्री मोदी को तो बढ़-चढ़ कर देते हैं पर गृहमंत्री अमित शाह का नाम कम ही लेते हैं। राजनाथ के बयानों की टाइमिंग को लेकर भी राजनीतिक गलियारे में कानाफूसी तेज है। राजनाथ ने लगभग सभी बयान ऐसे समय में दिये जब अमित शाह कोई ना कोई कार्यक्रम कर रहे होते हैं। पहला बयान 16 अगस्त का है और उस दिन अमित शाह हरियाणा के जिंद में एक सभा को संबोधित कर रहे थे जबकि दूसरा बयान उस दिन का है जब शाह तीन तलाक पर एक बैठक को संबोधित कर रहे थे। राजनाथ अटल-आडवाणी युग के एक मात्र ऐसे नेता हैं जो सक्रिय राजनीति में बचे हैं। ऐसे में राजनाथ अपने इस बयानों से यह साबित करने में लगे हैं कि सरकार के सभी बड़े फैसलों में उनका अहम किरदार है और उनका महत्व कम नहीं हुआ है।

नीलाभ कृष्ण

 

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