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बर्फ में लगा पाकिस्तान

बर्फ में लगा पाकिस्तान

पाकिस्तान में 1947 के बाद की शायद सबसे बड़ी घटना हुई हैं। वो ये कि पाकिस्तान की सेना पहली बार अपना बजट घटाने पर मजबूर हुई है। देशों के रक्षा बजट में कटौती कोई बड़ी बात नहीं, पर पाकिस्तान के सन्दर्भ में ये तकरीबन भयंकर भूचाल जैसी घटना है। उसका कारण है कि जिन्ना के समय से ही पाकिस्तान ने अपने आप को एक ‘सिक्योरिटी स्टेट’ घोषित किया हुआ है। यानी एक ऐसा देश जिसका वजूद ही ‘सुरक्षा’ यानी उसकी फौज पर टिका हुआ है। इसलिए पाकिस्तान में सिर्फ सेना ही एक ऐसी संस्था है जो देश की सभी ताकत रखती है। पाकिस्तान में चाहे लोकतंत्र हो, तानाशाही या मार्शल लॉ शासन – सबको फौज के मातहत ही काम करना होता है। इस मायने में फौज के बजट में  कटौती पाकिस्तान की हैसियत और वहां होने वाले व्यापक परिवर्तन की ओर इशारा करती है।

पाकिस्तान की ऐसी हालत क्यों हुई कि अपने फौजियों  के राशन पानी में कटौती को मजबूर होना पड़ा? उसके चार मुख्य कारण है। पहला, अमेरिका से मिलने वाली मदद बंद होना। दूसरा, इस्लामी देशों का पाकिस्तान से मुंह फेर लेना। तीसरा, पाकिस्तान की एटमी हवाबाजी का पर्दाफाश और चौथा भारत का अनवरत दबाव। इस सबका ऐसा असर पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर हुआ है कि अब उसे दुनिया भर में कटोरा लेकर घूमने पर भी मदद नहीं मिल रही।

दरअसल 1979 में अफगानिस्तान में तत्कालीन सोवियत संघ के घुसने के बाद पाकिस्तान पहले तो इस्लामी जेहादी बनाने की फैक्ट्री बन गया। उसके बाद एक के बाद एक काम धंधे वहां बंद होते गए और बस यही धंधा सिर्फ पाकिस्तान का मुख्य धंधा बन गया। बाद में अमेरिका से उसी नाम पर पाकिस्तान को अरबों डॉलर मिलते रहे। धीरे-धीरे पूरे पाकिस्तान का जिहादीकरण हुआ। इसमें पाकिस्तानी समाज, उसकी शिक्षा और उसकी फौज भी शामिल है। उसके बाद तो पाकिस्तान पूरी दुनिया में कट्टर इस्लामी जिहादी आतंकवादी सोच और आदमी सप्लाई करने वाला देश बन गया।

पहले पहल तो अमेरिका ने अपनी गरज से पाकिस्तान को इस कट्टरवादी इस्लामीकरण के लिए पैसे दिए। बाद में, खासकर 9/11 के बाद पाकिस्तान ने जिहादियों को खत्म करने के नाम पर अमेरिका से पैसे लिए। फिर तो उसकी आदत में ही ये शुमार हो गया। यही कारण है कि दुनिया में तकरीबन सभी बड़ी आंतकवादी वारदातों की जड़ें कहीं न कहीं पाकिस्तान से आकर जुङती थीं। भारत, कश्मीर में इसे अर्से से झेल रहा है। इन्ही आतंकवादियों का इस्तेमाल वह आजतक जम्मू-कश्मीर में कर रहा है, लेकिन जब अमेरिका को उसकी चालबाजी समझ में आई  तो उसने पाकिस्तान का टेंटुआ कसा, इसके बाद पाकिस्तान को ये डॉलर मिलने बंद हो गए।

12पाकिस्तान को दूसरी बड़ी मदद मिलती थी अरब देशों से, मगर जब पाकिस्तान पर आतंकवादी निर्यात करने का ठप्पा लगा तो एक-एक करके अरब देशों ने भी पाकिस्तान से कन्नी काटनी शुरू कर दी। पिछले पांच साल में भारत ने अरब देशों, खासकर सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात से, अपने रिश्ते बेहतर बनाए। उन्हें भी ये समझ आया कि पाकिस्तान में पलने वाली आंतकवादी तंजीमें अरब देशों के लिए भी खतरनाक  हैं। इससे यहां भी पाकिस्तान का खेल खराब हुआ। इसी बीच सऊदी अरब और ईरान के बीच के संघर्ष में पाकिस्तान ने चालाक बिचौलिए का खेल खेलना चाहा। उसकी चालाकी यहां भी नहीं चली और वहां आलम हुआ कि ‘दुविधा में दोनों गए माया मिली न राम’। सऊदी अरब ने भी उसे भीख देना बंद कर दिया।

इस्लामी देशों को पाकिस्तान ने एक गोली पिलाई हुई थी कि वह दुनिया का एकमात्र एटमी मुस्लिम होने के कारण, जरूरत पडऩे पर उनके काम आ सकता है। ये एटमी हवाबाजी का खेल पाकिस्तान ने दुतरफा खेला। एक तो उसने भारत को ब्लैकमेल किया। भारत में आतंक फैलाना और भारत की प्रतिक्रिया पर उसे एटमी युद्ध की धमकी देना। दूसरी तरफ ईस्लामी देशों में अपनी एटमी हैसियत का रूतवा बनाना। यह भी उसकी कूटनीति का हिस्सा थे ही। लेकिन पहले सर्जिकल स्ट्राइक और फिर बालाकोट में हमला करके भारत ने पाकिस्तान से उसकी ये एटमी घौंसपट्टी की ताकत छीन ली। इस्लामी देशों को इससे ये संकेत गया कि जो देश एटमी हथियार होते हुए खुद अपनी रक्षा नहीं कर सकता वह उनके क्या काम आएगा। बालाकोट में हवाई हमला करके भारत ने एटमी ब्लैकमेल की गोल रेखा ही बदल दी।

पाकिस्तान की इस हालात का चौथा और निर्णायक कारण है, दुनिया भर में आर्थिक, कूटनीतिक, खेल और व्यापार आदि के मोर्चों पर भारत की अनवरत चौतरफा दवाब की रणनीति। पिछले कोई एक दशक से भारत की कूटनीति दुनिया को ये भरोसा दिलाने में सफल रही है कि पाकिस्तान आतंकवाद को अपनी विदेशनीति के सबसे बड़े हथियार के रूप में इस्तेमाल करता है। 2014 में मोदी सरकार के आने के बाद इस नीति में और पैनापन आया। पहले तो प्रधानमंत्री मोदी ने पाकिस्तान के साथ दोस्ती का हाथ बढ़ाया पर इसके बदले में भारत को मिला पठानकोट, उड़ी, पुलवामा आदि हमलों के रूप में धोखा। इसके बाद तो भारत ने ठान लिया कि पाकिस्तान बातों का नहीं लातों का भूत है। भारत ने पाकिस्तान से सारे रिश्ते खत्म कर दिए। इन कदमों ने उसकी आर्थिक कमर तोड़के रख दी है।

आज आलम ये है कि पाकिस्तान दिवालिया हो चुका है। चीन के अलावा दुनिया में कोई देश वहां पैसा लगाने को  तैयार नहीं हैं। चीन भी औने-पौने दाम में वहां माल बेच रहा है। चीन-पाकिस्तान इकॉनामिक कोरिडोर के नाम पर चीन ने मंहगे सूद पर पाकिस्तान को कर्ज देकर उसे अपने जाल में फांस लिया है। हालत ये है कि वहां सड़क और पुल बनाने के लिए छोटी-मोटी मशीनरी से लेकर मजदूर तक चीन से आ रहे हैं। पाकिस्तानी व्यापारी जाहि-त्राहि कर रहे हैं। लाखों की तादाद में पाकिस्तान में आए चीनी नागरिक अब वहां का कानून तक नहीं मानते।

रही सही कसर भारत ने व्यापार में पाकिस्तान का एमएफएन दर्जा खत्म करके पूरी कर दी है। इस ईद पर पाकिस्तान में  रोजमर्रा की चीजों की कीमत आसमान छू गई थीं। भारत से वहां जाने वाली सब्जियों और अन्य  चीजों की कीमत कई गुणा बढ़ चुकी है। अमरीकी डॉलर की कीमत 150 पाकिस्तानी रूपये तक पंहुच चुकी है। एफ ए टी एफ उसे काली सूची में डालने को तैयार बैठा है। इतनी मुश्किल में पाकिस्तान कभी नहीं फंसा था। जिस देश के पास जरूरी वस्तुओं के आयात के लिए तक पैसे न हों वह मरता क्या न करता? मजबूरी में उसे अपनी फौज के खर्चों में कटौती करनी पड़ी है।

इमरान खान ने प्रधानमंत्री मोदी की फिर से पत्र लिखा है कि दोनों देशों में बातचीत शुरू हो। पर भारत को अब इस झांसे में नहीं आना चाहिए, हमें अगले कुछ वर्षों में इस बात के पुख्ता और ठोस सबूत चाहिए कि पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर में गड़बड़ी नहीं करेगा, गोली के साथ बोली नहीं चल सकती, खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते। पाकिस्तान पर ये दवाब जारी रहना चाहिए। पाकिस्तान को साफ मालूम होना चाहिए कि फौज के खर्चों में कटौती नहीं बल्कि आतंकवाद के पूरे ताने-बाने को नष्ट करने के बाद ही भारत उससे बातचीत करेगा और संबंध बनांएगा।

 

उमेश उपाध्याय

 

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