बालाकोट के बाद दिल्ली में बैठे कश्मीर के दुश्मनों को ठीक करने की आवश्यकता

बालाकोट के बाद दिल्ली में बैठे कश्मीर के दुश्मनों को ठीक करने की आवश्यकता

26 फरवरी, 2019, भारत के सैन्य इतिहास के एक सुनहरे दिन के रूप में याद किया जाएगा क्योंकि इसी दिन भारत ने भारत-पाकिस्तान रणनीतिक परिदृश्य में एक नयी मिसाल कायम की। 14 फरवरी को पुलवामा में पाकिस्तान आधारित जैश-ए-मोहम्मद के फिदायिन नेे सीआरपीएफ के जवानों को ले जा रही बसों पर आरडीएक्स से कायरतापूर्ण हमला किया, जिसमें हमारे 40 जवान शहीद हो गये, लेकिन हमले के बारह दिन के पश्चात ही वायुसेना के 12 मिराज लड़ाकू  विमानों ने पाकिस्तान के बालाकोट और खैबर पख्तुवां प्रांत में घुसकर लगभग 325 आतंकियों को मार गिराया और संभवत: इस हमले में आतंकी मसूद अजहर का ब्रदर-इन-लॉ मौलाना यूसूफ अजहर के भी मारे जाने की खबर है।

यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 1971 के बाद कभी भी भारतीय सेना ने लाईन ऑफ कंट्रोल को पार नहीं किया था। यहां तक की 1999 में कारगिल युद्ध के समय भी भारतीय सेना ने लाईन ऑफ कंट्रोल को पार नहीं किया था। लेकिन इस समय हमारी वायुसेना ने न केवल लाईन ऑफ कंट्रोल को पार किया, बल्कि पाकिस्तान के खैबर पख्तुवां प्रांत में भी घुसकर अपनी शक्ति दिखाई।

अभी तक रणनीतिकारों का यही मानना था कि एलओसी पार करना युद्ध को जन्म देने के बराबर है। जो की आगे न्यूक्लियर वार को भी जन्म दे सकता है। यह इसलिए भी क्योंकि पाकिस्तान हमेशा भारतीय सैन्य ताकत को देखते हुए न्यूक्लियर हमले की गीदड़ भभकी धमकी देता रहा है। इन न्यूक्लियर हथियारों के सहारे पाकिस्तान कश्मीर में इस्लामिक आतंकियों को आगे कर छद्म युद्ध करता रहा है। क्योंकि पाकिस्तान को ऐसा लगता है कि इसके आतंकी-सैनिक कश्मीर में नियमित सैनिको की तुलना में ज्यादा कारगर होंगे।

इस पृष्ठभूमि में भारतीय वायुसेना द्वारा पाकिस्तान के बालाकोट में आतंकियों के उपर किया गया सफल हमला पाकिस्तान की इस रणनीति को ही विध्वंस कर दिया है।  ऐसा नहीं है कि वायुसेना ने पास पहले इस प्रकार के कार्य करने की शक्ति नहीं थी। बल्कि सच्चाई तो यह है कि पहले भारत में इस प्रकार के निर्णय लेने वाला कोई ताकतवर नेतृत्व नहीं था। 26 नवंबर 2008 को मुम्बई में हुए आतंकी हमले के बाद भारतीय वायुसेना आतंकियों का खात्मा करने के लिए पाकिस्तान में घुसने की अनुमती मांगी थी। लेकिन उस समय के राजनीतिक नेतृत्व ने यह आदेश नहीं दिया। लेकिन इस समय ऐसा नहीं हुआ और इसका पूरा श्रेय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जाता है। उन्होंने पाकिस्तान की न्यूक्लियर पावर की धमकी को नजरअंदाज करते हुए आतंकवाद के खिलाफ कदम उठाने का साहस किया।

लेकिन मुझे लगता है कि अभी आधा काम ही किया गया है। प्रधानमंत्री मोदी को यह करना होगा कि कश्मीर घाटी में कट्टर विचारधारा रखने वाले लोग जो देश के अंदर और बाहर है उनको उनका एजेंडा पूरे देश में फैलने से रोकना होगा। ऐसे तथाकथित सेक्युलर विचारधारा रखने वाले लोग देश की राजधानी दिल्ली में भी है। मेरी समझ से कश्मीर की तथाकथित समस्या का सामाधान शीघ्र ही हो सकता है, यदि प्रधानमंत्री मोदी इन लोगों के खिलाफ ऐसी ही कार्रवाई करे जैसी उन्होंने पाकिस्तान में छुपे दुश्मनों के विरूद्ध की।

यदि हम देश की मुख्यधारा के मीडिया एक्सपर्ट, रिटायर्ड ब्यूरोके्रट्स, अलग-अलग गैर-सरकारी संगठनों से जुड़े हुए लोगों की बात सुनें तो यह बिल्कुल स्पष्ट होता है कि यदि देश के विभाजन के 71 से ज्यादा वर्षों वर्ष बाद भी यदि कश्मीर की समस्या है तो इसका कारण देश में राज करने वाली पहले की केन्द्र सरकारें हैं। यह हास्यास्पद है कि कल तक देश में राज करने वाली कांग्रेस भी इसी तर्क का सहारा ले रही है।

जहां तक कश्मीर की समस्या की बात है तो, पहली बात है कि कश्मीर को पाकिस्तान तब तक जलाने का प्रयास करेगा जब तक इसके मन को भाने वाला निर्णय न आ जाता हो। केवल कश्मीर ही नहीं बल्कि पाकिस्तान पूरे भारत में आतंकवाद बढ़ाने का प्रयास करता रहेगा। दूसरा, कश्मीर के अलगाववादी तब तक खुश रहेंगे, जबतक उन्हें 1947 में संविधान द्वारा मिले अनुच्छेद 370 का अधिकार मिलता रहेगा। और इन अलगाववादियों की विचारधारा को समर्थन करने वाले लोग भी चाहेंगे कि कश्मीर को संविधान द्वारा मिला अनुच्छेद 370 भी बना रहे। मेरी समझ से उपरोक्त कोई भी प्रस्ताव कश्मीर के विवाद को खत्म करने के लिए उचित नहीं है। जिस प्रकार एक डॉक्टर मरीज की समस्या को जाने बिना उसका ईलाज नहीं कर सकता। वैसे ही कश्मीर की समस्या जाने भी इसका सामाधान ढूंढना मुश्किल है।

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विभाजन का अधूरा एजेंडा: एक कमजोर तर्क

क्या पाकिस्तान का कश्मीर मुद्दे में कोई रोल है? हां, यह वे लोग कहते है  कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा के अनुसार कश्मीर मुद्दे को हल करना दोनो देशों का दायित्व बनता है।  यहां तक की भारत में भी ऐसे लोग हैं जो 2013 से 2018 तक पाकिस्तान के 12 वें राष्ट्रपति रहे ममनून हुसैन की बातों का समर्थन करते हंै कि पाकिस्तान कश्मीरियों के आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन करता रहेगा क्योंकि पाकिस्तान कश्मीर को उपमहाद्वीप के विभाजन का अधूरा एजेंडा मानता है। हालांकि सच्चाई तो यह है कि कश्मीर पर सुरक्षा परिषद का प्रस्ताव जो की 1949 में ही निरर्थक हो गया था, अब पाकिस्तान के लिए और भी समस्या खड़ी कर सकता है जो इसकी आशाओं के विपरीत होगा।

अनुच्छेद 370 की प्रासंगिकता का प्रश्न

जहां तक भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 की स्थाई विशेषता की बात है तो इसके समर्थक अभी तक यही मानते है कि दिल्ली का  कश्मीर की सुरक्षा के अलावा और कोई अधिकार नहीं होना चाहिये। वे कश्मीर के 1953 से पहले दिये गये स्टेटस को बहाल करने को भी राजनीतिक रूप से सही ठहराते है, जो यह कहता है कि विदेशी मामलों, रक्षा और संचार को छोड़कर, दिल्ली का अधिकार श्रीनगर में नहीं चलेगा और वे मानते है कि यदि ऐसा होता है तो कश्मीर की सारी समस्या ही खत्म हो जायेगी। लेकिन ऐसा करने से यही होगा कि करदाताओं के हजारों करोड़ रूपये बिना किसी हिसाब के खर्च किये जायेंगे। ऐसा नहीं है कि कश्मीर अभी जबाबदेह है, लेकिन देश के पास औपचारिक जांच करने की शक्ति है। यदि हम 1953 से पहले के कश्मीर में जाकर देखें तो एक आम क श्मीरी को भारतीय न्यायव्यवस्था का दरवाजा भी खटखटाने को नहीं मिलेगा। और इसका मतलब यह भी होगा कि चुनाव आयोग कश्मीर में स्वच्छ और पारदर्शी चुनाव नहीं करवा पायेगा, जो हाल के वर्षों में देखने को मिले हैं। चाहे कोई कुछ भी बोले लेकिन सच्चाई तो यहीं है कि अनुच्छेद 370 केवल और केवल अलगाववादियों को खुश करने का एक जरिया है, जो मेरी समझ से केवल एक पेन-किलर टैबलेट के बराबर है। यह कुछ समय के लिए दर्द तो भगा देती है, लेकिन पूरा ईलाज नहीं कर पाती। दूसरी तरफ इस खुश करने की नीति से  इन अलगाववादियों की मांग और भी बढ़ती ही जाती है।  और सबसे बुरा, यह उन लोगों की अलगाव को वैधता प्रदान करता है। जिससे उन्हें ऐसा लगता है कि वे सभी लोगों से अलग हैं। आने वाले समय में ऐसा हो जायेगा, जब ये लोग उनको खुश करने वाले लोगों से भी अपने आप को अलग करने में सफल हो जायेंगे।

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कट्टरपंथी इस्लाम का मजबूतीकरण

फिर कश्मीर की हालात को सुधारने का सही ईलाज क्या है? यह सभी को पता है, लेकिन सच्चाई तो यह है कि राजनीति और अटल सत्य दोनों कभी-कभार ही साथ-साथ जाते हैं। और खासकर कश्मीर की वर्षों से यही समस्या रहीं है। यह सच्चाई खुलकर तब सामने आ गई जब पीडीपी कि पिछली मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने राज्य के वित्तमंत्री हासिब द्राबू को मंत्री पद से हटा दिया था। आखिर द्राबू की गलती क्या थी? नई दिल्ली में 9 मार्च, 2018 को पीएचडी चेम्बर ऑफ कामर्स द्वारा आयोजित विदेशी राजनियकों की मीटिंग में उन्होंने कहा था कि कश्मीर को किसी राजनीतिक समस्या के रूप में नहीं देखा जाना चाहिये, बल्कि इसे एक सामाजिक समस्या के रूप में देखा जाना चाहिये।

हासिब द्राबू ने कहा कि ‘जम्मू और कश्मीर’ भी एक समाज है जिसके पास सामाजिक मुद्दे हैं। हम अपनी खुद की जगह तलाशने का प्रयास कर रहे हैं। और हम एक ऐसी प्रक्रिया से गुजर रहे हैं, जिससे  कई अन्य देश भी गुजर रहे हंै। ऐसा नहीं है कि केवल हम ही ऐसे हैं। उन्होंने कहा ”जहां तक मैं देखता हूं। कश्मीर एक राजनीतिक मुद्दा नहीं है। मुझे लगता है कि हम पिछले 50-70 वर्षों से इस पर गलत राजनीति करते रहे हैं जो कभी नहीं सुधरी। मुझे लगता है कि हमें इसे गंभीरता से सही करने की आवश्यकता है।’’

उदारवादियों की खतरनाक भूमिका

मेरा ऐसा मानना है कि कश्मीर में इस्लामिक उग्रवाद को आने वाले दिनों में नियंत्रित करना कठिन हो जायेगा और यह इसलिए कि हम एक लोकतांत्रिक देश हैं जहां तथाकथित लिबरल हर बात में घडिय़ाली आंसू बहाते हंै। ये तथाकथित उदारवादी भारतीय सैनिकों को आक्रामक मानते हैं, जबकि कश्मीरियों को अपने हक के लिए लडऩे की दिृष्टि से देखते हैं। जो तर्कहीन और झूठ पर आधारित है। इन उदारवादियों के प्रभाव के कारण कुछ राष्ट्रीय समाचारों ने तो  ‘टेररिस्ट’ की जगह  ‘मिलिटेन्ट’ शब्द का प्रयोग करना आरम्भ कर दिया है।

इस बात को विस्तार से बताता हू्ं। आपको याद होगा कि ये तथाकथित उदारवादी उस समय क्या सलाह दे रहे थे जब पंजाब खालिस्तान आंदोलन के समय जल रहा था। यदि उस समय के पंजाब के डायरेक्टर जनरल इन तथाकथित बुद्धीजीवियों की बात सुन लेते तो आज खालिस्तान एक सच्चाई होता। उसी प्रकार यदि हम आज के तथाकथित बुद्धीजीवियों के परामर्शों को सुने तो फिर देश के विघटन का रास्ता सुगम हो जायेगा।  इन बुद्धीजीवियों के लिए कश्मीर केवल एक पिकनिक की तरह है।

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आगे का रास्ता

सुशासन और कश्मीरियत की बहाली कश्मीर की शांति और समृद्धि की कुंजी है। यहां मैं इस्लामिस्टों के अलगाववाद की चर्चा नहीं कर रहा हूं। अलगाववादियों के साथ कड़े से कड़ा बर्ताव करना चाहिये, न की उनके स्वास्थ्य और सुरक्षा पर करोड़ों रूपये खर्च किये जायें। कश्मीर से अफ्सपा को भी पूरी तरह से नहीं हटाया जाना चाहिये। आर्मी ने कश्मीर के लिए अपने जवानों और संसाधनों दोनों को खोया है। अफ्सपा को हटाना हमारे सैनिकों के लिए किसी खतरे से कम नहीं होगा। और वो भी जब कश्मीर में उग्रवाद ने धार्मिक कट्टरता का रूप ले लिया हो। इसलिए इसे खत्म करने के लिए उठाया गया कोई भी कदम हमारे जवानों के मनोबल को कम करेगा। और उनके द्वारा कानून के अनुसार भी लिया गया निर्णय उन्हें वर्षों तक कोर्ट के चक्कर लगाने के लिए मजबूर कर देगा।

हमें अपने सशस्त्र बलों पर गर्व करना चाहिये। उन्हें प्रोत्साहन और मजबूती देना चाहिये, न की बदनाम करना चाहिये। यह इस तर्क को छोटा करने के लिए नहीं है कि कश्मीरी नौजवानों को कट्टरता से बचाने के लिए उनका आर्थिक सशक्तिकरण करना आवश्यक है। लेकिन, ऐसा करने में यह ध्यान में रखना चाहिए कि इस प्रक्रिया में लंबा समय लगेगा और जबरदस्त संसाधनों की आवश्यकता होगी। और इस प्रक्रिया के दौरान, भारतीय लोकतंत्र देश की सुरक्षा, एकता और अखंडता के लिए कुछ स्वतंत्रता को त्याग करने के लिए बाध्य होगा। हम कश्मीर को अफगानिस्तान, ईराक या सिरिया नहीं बनने दे सकते। हम कश्मीर को इस्लामिक स्टेट किस्म के धार्मिक आतिवाद के रूप में बदलता हुआ नहीं देख सकते।

हो सकता है कि आज की तारीख में कश्मीर में कुछ कट्टरपंथी सुरक्षा बलों और हिंदुओं को निशाना बना रहे हों, लेकिन वह समय दूर नहीं है जब वे शियाओं, बौद्धों और उदार महिलाओं पर भी हमला करना शुरू कर देंगे।

संक्षेप में देखें तो, न केवल कश्मीर में कट्टर विचार रखने वाले लोगों के मित्रों और उनको मार्गदर्शन करने वाले पाकिस्तान और इस्लामिक स्टेट के विरूद्ध कड़ा एक्शन लेना चाहिये, बल्कि उनके प्रति सहानूभूति रखने वाले दिल्ली में बैठे तथाकथित बुद्धजीवियों के खिलाफ भी कड़ा कदम उठाया जाना चाहिये। सच्चाई तो यह है कि कश्मीर का भारत के एकीकरण में पाकिस्तान और आईएस से बड़ा खतरा दिल्ली में बैठे ये तथाकथित बुद्धीजीवि  हैं।

(यह लेख लेखक द्वारा अंग्रेजी में लिखे मूल लेख के संपादित अंशों पर आधारित हैं)

प्रकाश नंदा

 

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