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बॉलीवुड के सितारे बने राजनीति के प्यारे

बॉलीवुड के सितारे बने राजनीति के प्यारे

बॉलीवुड और राजनीति का संबंध बहुत ही पुराना है। हर चुनाव में बॉलीवुड के सितारे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से किसी ना किसी सियासी पार्टी से जुड़े होते हैं। सुनील दत्त, जयललिता, स्मृति ईरानी, अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, राज बब्बर, गोविंदा, विनोद खन्ना, शत्रुघ्न सिन्हा, राजेश खन्ना, परेश रावल, हेमा मालिनी, बाबुल सुप्रियो आदि ऐसे दिग्गज कलाकार हैं जिन्होंने राजनीति में भी खुद को स्थापित किया। यह बात और है कि कुछ कलाकारों ने राजनीति में आने के बाद इससे दूरी बना ली तो कुछ ने अपना परचम लहराया है। स्मृति ईरानी, शत्रुघ्न सिन्हा, परेश रावल, हेमा मालिनी, बाबुल सुप्रियो, किरण खेर, जया बच्चन, रूपा गांगुली जैसे कलाकार आज भी संसद के सदस्य हैं।

सितारों को राजनीति में लाने की शुरुआत कांग्रेस ने की थी, लेकिन भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और तृणमूल कांग्रेस इसे नए स्तर पर ले गए। इस बार मिमी चक्रवर्ती (जादवपुर) और सनी देओल (गुरदासपुर) भी उन अभिनेताओं की सूची में शामिल हो गए हैं, जो लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं।

वजह क्या हैं सितारों के जमीं पे उतरने की?

जब भी देश में चुनाव आता है सितारे जमीं पर आ जाते हैं। इस लोकसभा चुनाव (2019) में भी ‘स्टारवार’ वैसा ही है जैसा हर आम चुनाव में होता आया है। देश की 543 सीटों वाली पार्लियामेंट में बहुमत के लिए 272 का जादुई आंकड़ा पार करना पड़ता है। इस बार देश भर में करीब 28 कैंडिडेट सिनेमा उद्योग से हैं यानी-बहुमत के आंकड़े का करीब 10 प्रतिशत (अगर सब जीत जाएं तो) और यही अंकों का खेल है जो सितारों को चुनाव की राजनीति में लाता है।

उर्मिला मातोंडकर (मुंबई उत्तर पश्चिम), हेमा मालिनी (मथुरा), जयाप्रदा (रामपुर), प्रकाश राज (बंगलुरु मध्य), मूनमून सेन व बाबुल सुप्रियो (आसन सोल), शत्रुघ्न सिन्हा (पटना साहिब), राम्या (कर्नाटक), राज बब्बर (फतेहपुर-सीकरी), स्मृति ईरानी (अमेठी), दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ (आजमगढ़) ये वो महत्वपूर्ण सीटें हैं जिन पर सबकी नजर है। चुनाव की राजनीति में सितारों का उतारा जाना नया नहीं हैं। कभी सुनील दत्त के नाम का दबदबा होता था। वे चुनाव जीतने के मामले में अजेय थे। अब उनकी बेटी प्रिया दत्त भी चुनाव में खड़ी हो रही हैं। कभी बिग-बी अमिताभ बच्चन ने भी चुनाव लड़ा था। वह इलाहाबाद से हेमवती नंदन बहुगुणा को जितने वोटो से हराये थे, वो एक रिकॉर्ड है। गोविन्दा भी लड़े थे और राजेश खन्ना, विनोद खन्ना भी लड़े थे और जीते थे। मुनमुन सेन कभी बहुत बड़ी स्टार नहीं थी लेकिन जब पहली बार 2014 में बांकुरा से चुनाव लड़ी तो उनके सामने थे नौ बार के विजेता सीपीएम के भारी-भरकम नेता बासुदेव अचारी। मुनमुन ने उनको पटखनी दे दी। इस बार मुनमुन का टकराव आसनसोल में गायक व केंद्रीय मंत्री बाबुल सुपिय्रो से है। दक्षिण के सितारों को तो वोटर सर आंखों पर बिठाते हैं। एन टी रामाराव, जयललिता, करूणानिधि ने सिनेमा से राजनीति में कदम रखा था। रजनीकांत और कमल हासन भले ही खुद को चुनाव से अलग रख रहे हैं, उनके ‘वोटर’ उनको मुख्यमंत्री बनाने के लिए सदैव तैयार रहते हैं।  दरअसल सितारों का इस्तेमाल राजनैतिक पार्टियां भारी-भरकम प्रत्याशी को टक्कर देने के लिए करती हैं। गोविन्दा ने रेल व जहाजरानी मंत्री (इन दिनों उत्तर प्रदेश के राज्यपाल) राम नाईक को हराया था। इस बार उसी सीट पर उर्मिला को लड़ाया जा रहा है, भारी भरकम नेता गोपाल शेट्टी से सामना कराने के लिए। भोजपुरी स्टार निरहुआ आजमगढ़ में सपा के अध्यक्ष व पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को ‘टक्कर’ देने के लिए लाए गये हैं। वैसे ही जैसे स्मृति ईरानी को राहुल गांधी के सामने लाया गया है। सितारे टकराते भी हैं और भीड़ भी जुटाते हैं तथा जीतते भी हैं। यही है उनको राजनीति में लाये जाने की वजह!

इन सीटों पर रहेगी नजर

हेमा मालिनी – मथुरा

अपने फिल्मी सफर के दौरान एक से बढ़ कर एक हिट फिल्में देने के बाद बॉलीवुड एक्ट्रेस हेमा मालिनी अब राजनीति के रथ पर सवार हैं। एक शानदार फिल्मी करियर के बाद उन्होंने समाज सेवा के इरादे से राजनीति में कदम रखा। हेमा साल 2004 में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुई और आज वो राजनीति की सफल महिलाओं में से एक हैं। उन्होंने कभी सोचा नहीं था कि वो राजनीति के मैदान पर भी उतरेंगी, लेकिन समाज सेवा के लिए उन्होंने राजनीति में भी प्रवेश किया और भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गई। बीजेपी के सहयोग से वो राज्यसभा की सदस्य बनीं। लेकिन अधिकारिक रूप से वह सन 2003 से 2009 तक भारतीय जनता पार्टी की नियुक्त उम्मीदवार थी। हेमा मालिनी मार्च 2010 में बीजेपी की जनरल सेक्रेटरी बनी और 2014 में लोकसभा की सदस्य बानीं। इस बार उन्हें उत्तर प्रदेश की मथुरा लोकसभा सीट से बीजेपी ने चुनावी रण में उतारा है और अब ये देखना दिलचस्प होगा कि मथुरावासी ड्रीम गर्ल की फिल्मी छवि से प्रभावित होकर उन्हें वोट देते हैं, या उनकी राजनीतिक छवि पर दांव लगाते हैं।

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स्मृति ईरानी – अमेठी

राजनीति में सक्रिय होने से पहले स्मृति ईरानी टीवी पर प्रसारित होने वाले सास-बहू के सीरियल्स का जाना पहचाना चेहरा थीं। वे सफल मॉडल, टीवी अभिनेत्री और निर्माता भी रही हैं। बाद में राजनीति में प्रवेश करने के  कुछेक वर्षों बाद ही वे देश की मानव संसाधन विकास मंत्री बनीं। हालांकि विवादों के चलते मंत्रिमंडल फेरबदल में उन्हें कपड़ा मंत्री बनाया गया। वे भारतीय जनता पार्टी की तेजतर्रार नेता के रूप में जानी जाती हैं। विदित हो कि वे 2003 में वे भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गईं और 2004 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने दिल्ली के चांदनी चौक से भाजपा प्रत्याशी के रूप में प्रसिद्ध कांग्रेस नेता और सुप्रीम कोर्ट के वकील कपिल सिब्बल के खिलाफ चुनाव लड़ा। हालांकि वे पार्टी का लोकप्रिय चेहरा तो रहीं, लेकिन उतनी ही मात्रा में वोट खींचने में सफल नहीं रहीं।

उस चुनाव में ईरानी को हार का सामना करना पड़ा, लेकिन इसके कुछ समय बाद ही ईरानी को भारतीय जनता पार्टी की महाराष्ट्र युवा इकाई का उपाध्यक्ष बनाया गया। 2011 में स्मृति, गुजरात से राज्यसभा के सदस्य के रूप में निर्वाचित हुईं। सितंबर 2011 से वे राज्य की कोयला और स्टील समिति की सदस्य भी रहीं।

टीम मोदी की अहम सदस्य होने के कारण उन्हें 2014 में पार्टी ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के खिलाफ खड़ा किया था। इसी चुनाव में आम आदमी पार्टी (आप) ने अपने बड़े नेता कुमार विश्वास को भी मैदान में उतारा था लेकिन अमेठी संसदीय क्षेत्र में वे गांधी परिवार की जड़ें उखाडऩे में सफल नहीं हो सकीं। इस बार फिर उनकी उम्मीदवारी ने राहुल गांधी को वायनाड, केरल, से भी चुनाव लडऩे को मजबूर कर दिया है।

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उर्मिला मातोंडकर – उत्तरी मुंबई

बॉलीवुड अभिनेत्री उर्मिला मातोंडकर की अब एक पहचान और भी है। कांग्रेस पार्टी ज्वाइन करने के साथ ही वो सक्रिय राजनेता बन गई हैं। कांग्रेस पार्टी ने उर्मिला मातोंडकर को उत्तरी मुंबई लोकसभा सीट से चुनाव लडऩे की आधिकारिक घोषणा कर दी। 29 मार्च को उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की मौजूदगी में पार्टी की सदस्यता ली थी।

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जया प्रदा – रामपुर

राजनीति का महारथी वही बनता है जो यहां अवसरों का खेल समझ सके। अवसरों की इसी तलाश में जया प्रदा अभी हाल ही में बीजेपी में शामिल हो गई। पार्टी ने उन्हें उत्तर प्रदेश की रामपुर सीट से उम्मीदवार घोषित किया।

रामपुर सीट जया प्रदा के लिए नई नहीं है, वो साल 2004 से लेकर 2014 तक रामपुर की सांसद रही हैं।  इस दौरान सीट पर उनकी दावेदारी बतौर सपा उम्मीदवार रही थी लेकिन इस बार उनकी दावेदारी सपा के उम्मीदवार आजम खान के खिलाफ है।

एक वक्त वो भी था जब आजम खान उनके लिए रामपुर की जनता से वोट मांगा करते थे, लेकिन अब वो उन्हें वोट ना देने की अपील करते हुए नजर आएंगे। बीजेपी से पहले जया प्रदा समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय लोक दल और तेलगू देशम पार्टी का हिस्सा रही थीं।

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दिनेश लाल निरहुआ – आजमगढ़

दिनेश लाल यादव निरहुआ- एक ऐसा नाम जिसके इर्द-गिर्द पिछले एक दशक से पूरी भोजपुरी सिनेमा इंडस्ट्री घूमती है। उत्तर भारत के अन्य हिस्सों में जिन्होंने निरहुआ की फिल्म नहीं देखी है, उन्हें भी उनका नाम पता है। निरहुआ के स्टारडम का आलम यह है कि अगर यूपी-बिहार में वो कहीं निकल जाते हैं तो वहां उतनी ही भीड़ जमा होती है, जितनी अजय देवगन जैसे बड़े बॉलीवुड अभिनेताओं को देखने के लिए आमतौर पर जुटा करती है।  नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विश्वास जताने वाले निरहुआ को भाजपा ने आजमगढ़ से उतारा है। अब देखना यह है कि भोजपुरी सिनेमा के फलक पर चमक रहे निरहुआ राजनीति में कहां तक पहुंचते हैं। आजमगढ़ से उनका मुकाबला यूपी के दिग्गज नेता व पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से है। अखिलेश से उनके अच्छे रिश्ते हुआ करते थे, ऐसे में ये मुकाबला देखना दिलचस्प होगा।

रवि किशन – गोरखपुर

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की खाली हुई सीट इस बार भाजपा ने भोजपुरी सुपरस्टार रवि किशन की थमाई है। रवि किशन के राजनीतिक पारी की शुरुआत 2014 के लोकसभा चुनाव के वक्त ही हो गई थी। 2014 में रवि किशन कांग्रेस के टिकट पर अपने गृह जनपद जौनपुर की लोकसभा सीट से चुनाव लड़े थे। हालांकि रवि किशन चुनाव हार गए थे। चुनाव हारने के बाद रवि किशन ने 2017 में कांग्रेस का हाथ छोड़ कर भाजपा में शामिल हो गए।

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किरण खेर

प्रसिद्ध अदाकार अनुपम खेर की पत्नी और स्वयं अदाकारा किरण खेर ने भारतीय जनता पार्टी से साल 2009 में अपना नाता जोड़ा और पार्टी के समर्थन में प्रचार करना शुरू कर दिया। किरण खेर हिंदी फिल्मों में चरित्र भूमिकाएं और कॉमेडी रोल करने के लिए मशहूर हैं। उन्हें बेहतरीन अभिनय के लिए दो बार राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुका है। 2014 में जीत के बाद वो फिर से चंडीगढ़ सीट से चुनाव लड़ रही हैं।

शत्रुघ्न सिन्हा

बॉलीवुड के बिहारी बाबू शत्रुघ्न सिन्हा सुनील दत्त की ही तरह केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में वह स्वास्थ्य और जहाजरानी मंत्रालय संभल चुके हैं। बिहारी बाबू ने 2009 में पटना साहिब संसदीय सीट से छोटे पर्दे के बड़े कलाकार शेखर सुमन को हराया। शेखर ने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा था। शत्रुघ्न सिन्हा ने 2014 में भी भाजपा से पटना साहिब का चुनाव लड़ा और कांग्रेस के कुणाल सिंह को करारी शिकस्त दी।  कुणाल सिंह को भोजपुरी सिनेमा का महानायक माना जाता है। इस बार वह पटना साहिब से ही भाजपा के खिलाफ कांग्रेस से लड़ रहे हैं।

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सनी देओल

धर्मेंद्र के राजनीति से अलग हो जाने के बाद ऐसा कहा जा रहा था कि सनी देओल की राजनीति में एन्ट्री हो सकती है। 2014 में भी उनके चुनाव लडऩे की संभावनाएं जताई जा रही थी और कुछ लोगो ने कोशिश भी की थी पर कामयाबी नहीं मिली।  2019 के लिए भाजपा उन्हें मनाने में जुट गई थी। आखिरकार इसमें भाजपा को कामयाबी मिली और उन्हें गुरदासपुर से आजमाया जा रहा है। गुरदासपुर में भाजपा की पकड़ अच्छी है और वहां से भाजपा की टिकट पर विनोद खन्ना जीतते रहे थे। पर उनके निधन के बाद भाजपा इस सीट को गंवा बैठी है।

हिंदी फिल्मों से लोकसभा या राज्यसभा में जाने वाले आधिकतर सितारे काम के न काज के, दुश्मन अनाज के वाली कहावत को ही चरितार्थ करते आए हैं।  इनमें वैजयंती माला, अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना, धर्मेंद्र, शत्रुघ्न सिन्हा, रेखा, हेमा मालिनी, जया प्रदा, गोविंदा, जावेद अख्तर, किरण खेर, मुनमुन सेन, शताब्दी राय, दीपिका चिखालिया, आरविंद त्रिवेदी, नितीश भारद्वाज जैसी कई फिल्मी हस्तियां शामिल है।

संसद में उपस्थिति हो, क्षेत्र की समस्याओं को उठाना हो, सांसद निधि का ठीक से इस्तेमाल करना हो या क्षेत्र के दौरे कर लोगों से संपर्क रखना हो, अधिकांश फिल्मी सितारे इसमें नाकाम रहते हैं। चुने जाने के बाद इनकी एक झलक देख पाना भी मतदाताओं के लिए दूभर होता है, अपनी समस्याओं को दूर कराना और अपने क्षेत्र के बुनियादी ढांचे को इनसे सुधरवाना दूर की बात है। 2004 में बीकानेर से चुने गए धर्मेंद्र और उत्तर मुंबई में बीजेपी के राम नाईक जैसे दिग्गज को परास्त करने वाले गोविंदा के तो लापता होने के पोस्टर उनके क्षेत्रवासियों ने दीवारों पर चिपका दिए थे।

अक्सर देखा गया है कि बॉलीवुड के सितारे अपनी लोकप्रियता और ग्लैमर की वजह से पैराशूट में सवार होकर सीधे संसद में पहुंच तो जाते हैं, लेकिन सामाजिक जीवन में कोई उल्लेखनीय काम दर्ज नहीं करा पाते। बॉलीवुड के सितारों का जब कैरियर ढ़लान पर आता है, वे राजनीति की गोद में लुढ़कने की कोशिश करते हैं। उन्हें न तो सामाजिक कार्यों से कोई मतलब होता है, न विचारधारा से कोई प्रयोजन। ये किसी भी राजनीतिक दल की शरण में बिना सोचे चले जाते हैं।


 

इतिहास के झरोखे से


 

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आज के दौर में सभी सितारों की मौजूदगी चुनावी सरगर्मियों में काफी पहले से दिखने लगती है लेकिन यहां यह ध्यान दिलाना होगा की सितारों का राजनीति की जमीन पर उतरने का सिलसिला कोई नया नहीं है। 80 के दशक से फिल्मी सितारों का लोकसभा चुनावों की दुनिया में कदम रखना जोर-शोर से होने लगा था। इनके चयन के पीछे इनकी जीतने की क्षमता को अहम माना गया। एक तथ्य ये भी है कि इस ग्लैमर ब्रिगेड ने लोकसभा चुनावों में फ्लॉप से ज्यादा हिट दिए हैं। लेकिन संसद में इनका कुल प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा है। कई सितारे या तो सत्र में मौजूद ही नहीं रहते और जो रहते भी हैं वो कार्यवाई के समय चुप रहते हैं।

आइये जानते हैं बॉलीवुड के सितारों का राजनितिक सफर:-

कोंगारा जगैया, कांग्रेस

यह ऐसे पहले अभिनेता थे जिन्होंने लोकसभा चुनाव में जीत हासिल की। तेलूगू अभिनेता जगैया 1967 में अंगोले से सांसद बने। उन्होंने 80 हजार वोट से जीत हासिल की थी।

अमिताभ बच्चन, कांग्रेस

अभिनेता अमिताभ बच्चन ने इलाहाबाद में 1984 में लोकदल के हेमवती नंदन बहुगुणा को 1 लाख 87 हजार वोट से हराया था। अमिताभ बच्चन राजनीति के क्षेत्र में 1984 से 1987 तक रहे। हालांकि उन्हें राजनीति खास रास नहीं आई और बीच सत्र में ही इस्तीफा दे दिया।

सुनील दत्त, कांग्रेस

1984 में उत्तर पश्चिमी बॉम्बे से सुनील दत्त ने चुनाव लड़ा और राम जेठमलानी को मात दी। उन्होंने जेठमलानी से दोगुने वोट हासिल किए थे। किसी भी अभिनेता ने इस संख्या की बराबरी नहीं की है। सुनील दत्त अपनी पत्नी नरगिस की असमय मृत्यु के बाद सक्रिय राजनीति में उतरे। उन्होंने 1984 में मुंबई उत्तर पश्चिम सीट से चुनाव जीतकर लोकसभा में प्रवेश किया था। वह इस सीट पर 2004 तक लगातार चुने गए।

वैजयंती माला, कांग्रेस

नया दौर और संगम जैसी फिल्मों में काम कर चुकीं वैजयंती माला ने 1984 में मद्रास दक्षिण से जीत हासिल की थी। वह 1989 में भी इसी सीट से चुनी गयीं थी।

बालकवि बैरागी, कांग्रेस

सुनील दत्त की फिल्म रेशमा और शेरा के गीत लिखने वाले बैरागी ने 1984 में मध्य प्रदेश के मंदसौर से जीत हासिल की। इससे पहले उन्होंने 1968 में मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में जनसंघ पार्टी के सुंदरलाल पटवा को परास्त किया था।

विनोद खन्ना, भाजपा

बॉलीवुड के जाने-माने अभिनेता विनोद खन्ना ने भी भाजपा की टिकट पर 1996 में पंजाब की गुरदासपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और अपने पहले प्रयास में ही वह संसद पहुंच गए।  इसके बाद वे इस सीट पर 1998, 1999 और 2004 में भी जीते। 2009 में हुए चुनाव में वे अपना करिश्मा बरकरार नहीं रख सके और हार गए। मोदी लहर पर सवार विनोद खन्ना गुरदासपुर सीट के रास्ते एक बार फिर से संसद पहुंचे लेकिन उनकी मृत्यु की वजह से यह सीट बाद में कांग्रेस ने झटक ली।

 राजेश खन्ना, कांग्रेस

बॉलीवुड सुपरस्टार राजेश खन्ना को कांग्रेस ने 1991 में नई दिल्ली से अपना उम्मीदवार बनाया लेकिन वह लालकृष्ण आडवाणी से हार गए, फिर उसी सीट पर 1992 में उपचुनाव हुए, इन चुनावों में उन्होंने शत्रुघ्न सिन्हा को हराकर लोकसभा की सीट हासिल की।

बॉलीवुड के ही मैन धर्मेंद्र, भाजपा

बॉलीवुड के हीमैन धर्मेंद्र ने भी राजनीति में भाग्य आजमाने के लिए भाजपा का दामन थामा और उन्होंने वर्ष 2004 में हुए लोकसभा चुनाव में राजस्थान के बीकानेर से चुनाव लड़कर जीत हासिल की। लेकिन वह संसद के किसी भी सत्र में मौजूद नहीं रहे और अपने निर्वाचन क्षेत्र से भी गायब रहे, जिसके चलते उनकी आलोचना भी हुई।

राज बब्बर, कांग्रेस

अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत समाजवादी पार्टी में शामिल होकर की और 1999 और 2004 में उत्तर प्रदेश की आगरा सीट से संसद सदस्य रहे। उन्होंने 2009 में फिरोजाबाद से कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा चुनाव जीता। 2014 में वे कांग्रेस के टिकट पर गाजियाबाद से चुनाव लड़े लेकिन हार गए। इस बार वो फिर मैदान में हैं।


इनके फैन क्लब अगर कहीं होते भी हैं, तो उनका काम सेल्फी लेने तक ही सीमित होता है।

बॉलीवुड में तो हर राष्ट्रीय मुद्दे पर खामोशी छा जाती है, चाहे वह फिल्मों से जुड़ा मामला ही क्यों न हो। किसी बोल्ड कंटेंट का मामला हो या पाकिस्तानी कलाकारों के बॉलीवुड में काम करने का, इंडस्ट्री दोफाड़ हो जाती है।  महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने तब पाकिस्तानी कलाकारों के होने के कारण ‘ऐ दिल है मुश्किल’ का विरोध किया और ‘पद्मावत’ पर करणी सेना का दबाव बना, तो बॉलीवुड को सांप सूंघ गया। इसीलिए दर्शक उन्हें एकाध चांस देकर देखते हैं और फटा पोस्टर निकला जीरो समझ कर, किसी और को आजमाते हैं।  हिंदी फिल्म सितारों की राय को राजनेता भी कितने हल्के में लेते हैं, इसका एक उदाहरण है तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे की प्रतिक्रिया, जब उन्होंने राज्यसभा पहुंची जया बच्चन द्वारा 2012 में असम से जुड़ी एक बहस के दौरान उनकी टिप्पणी पर कहा था, ”यह एक गंभीर मसला है, न कि कोई फिल्मी मुद्दा।’’

तमाम सुपरस्टार इन चुनावों में ताल ठोक रहे हैं। लेकिन अगर इनके सामाजिक-सांस्कृतिक अवदान की बात की जाए, तो शून्य बटा सन्नाटा ही नजर आएगा।  राजनीतिक दलों की दिक्कत यह है कि उन्हें हर हाल में चुनाव जीतना है।  उन्हें लगता है कि बॉलीवुड या भोजपुरी सिनेमा के सितारों की चकाचौंध से प्रभावित होकर लोग उन्हें वोट दे देंगे। इसके चक्कर में सभी पार्टियां वर्षों से अपने लिए काम करते आ रहे समर्पित कार्यकर्ताओं की उपेक्षा कर देती हैं। लेकिन हकीकत यही है कि राजनीतिक दलों की विचारधारा और मुद्दों से दूर, जनता की समस्याओं से कटे ये सितारे प्रवासी पक्षियों की तरह होते हैं, जो पांच साल में एक बार नजर आते हैं। इनके ग्लैमर के जाल में फंसकर लोग इन्हें वोट तो दे देते हैं लेकिन फिर सालों साल तक पछताते रहते हैं।

 

नीलाभ कृष्ण

 

 

 

 

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