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भाजपा के अजेय दुर्ग के चार कमान्डेन्ट

भाजपा के अजेय दुर्ग के चार कमान्डेन्ट

2019 के लोकसभा चुनाव का राजनीतिक किला यदि राजनीति के ये उक्त चार चतुर धुरंधर मिल कर तैयार करते हैं तो समूचा विपक्ष भी इकट्ठा होकर इसे भेद नहीं सकेगा। नरेन्द्र मोदी का अभूतपूर्व नेतृत्व राजनाथ सिंह की प्रमाणित कानून व्यवस्था पर पकड़ नितिन गड़करी की निर्माण कार्यों की शक्ति और अपार क्षमता के साथ ही अमित शाह की चक्रव्यूह रचना के आगे विरोधियों के जाति धर्म के उन्मादी कार्ड फेल हो जायेंगे। ले देकर विपक्ष के पास प्रधानमंत्री का एक चेहरा है राहुल गांधी जो मोदी के आगे ठहरता नहीं। विपक्ष जानता है कि उन्हें चेहरा बनानें से वोट में कोई भी इजाफा होने वाला नहीं। इसलिये मोदी विरोधी फ्रंट कोई सर्वमान्य चेहरा प्रधानमंत्री के लिये नहीं चुन सका।

भाजपा ने उत्तर प्रदेश में हुये दोनो लोक सभा के चुनाव हार गया, जहां उसके हारने की संभावना बिल्कुल नहीं थी। विधानसभा चुनाव में भारी जीत मिलने से भाजपा नेतृत्व कार्यकर्ताओं से भी अधिक लवरेज था। अति उत्साह के कारण टिकट देनें में सावधानी नहीं बरती गयी नही तो सपा और बसपा का गठबंधन भी ये चुनाव नहीं जीत पाता। इन उप चुनाव की जीत ने इस बेमेल गठबंधन की राह अग्रेसित कर दी। यही नहीं, उपचुनाव अधिकांश जो भी उत्तरी भारत में हुये भाजपा हारती गयी। राजस्थान और मध्य प्रदेश में भी हारे। पर पार्टी तब भी नहीं चेती न ही कोई बड़ी गहराई से उसका विश्लेषण किया गया। यदि इन उपचुनावों को बैठकर इन चार नेताओं ने मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्षों से मिल कर पोस्टमार्टम किया होता तो मध्य प्रदेश में तो चुनाव हारने का प्रश्न ही नहीं उठता और राजस्थान में लगभग बराबरी का सौदा होता। टिकट के वितरण में सभी नेताओं की आम राय बनती। कांग्रेस के टिकट वितरण के हिसाब से टिकट दिये जाते तो स्थिति बेहतर होती और अच्छे जिताऊ प्रत्याशी के, किसी नेता की व्यक्तिगत नाराजगी के कारण टिकट न काटे जाते। बहुत से टिकट अक्सर मुख्यमंत्री की व्यक्तिगत पसंद या नापसंद होने पर मिल जाते हैं या कट जाते हैं। इन मामलों में खुफिया तंत्र पर राज्य सरकारें भरोसा कर लेती हैं जो आज के डिजिटल युग में भी घिसा पिटा तंत्र लग रहा है।

इस तरह की गल्तियां कांग्रेस पार्टी में भी होती रही हैं। बसपा तो धनाड्य लोगों को टिकट देती है। वही सपा जाति केन्द्रित पार्टी है। ऐसी स्थिति में यदि भाजपा टिकट वितरण में सावधानी बरतती है तो उत्तरी भारत में उसे अपेक्षित सीटें मिल सकती हैं, यहां तक कि उत्तर प्रदेश में भी सपा, बसपा के गठबंधन के बाबजूद भी अपनी स्थिति लगभग बनाये रख सकती है।

प्रधानमंत्री को खुफिया तंत्र इन्टेलीजेंस एजेंसी पर भरोसा नहीं करना चाहिये और लोगों को उनकी जांच पड़ताल कभी भी राजनीतिक हो ही नहीं सकती। वे हमेशा दो और दो चार की ही तरह ही देखते हैं जबकि राजनीति में दो और दो चार की जगह पांच और तीन भी हो सकते हैं। प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने इमरजेंसी लगाने के बाद चुनाव करवाये थे। पूरी तरह इन्टेलीजेंस रिपोर्ट पर निर्भर रही उनके बंपर जीतने की रिपोर्ट भी आती रही और वे ऐतिहासिक हार का शिकार बनी। इन्टेलीजेंस रिपोर्ट सिर्फ एक जानकारी का माध्यम हो सकता है, इससे अधिक कुछ भी नहीं।

इसी तरह प्राईवेट एजेंसी से भी प्रत्याशी का चयन कराना एक सफल और सटीक कदम नहीं होगा। प्राईवेट एजेंसी चुनाव के समय तो कमियां बता सकती है तरीका बता सकती है पर प्रत्याशी नहीं बता पायेगी। लोकसभा के चुनाव में प्रत्याशी की छवि उनके कार्यकलाप, चेहरे की पहचान आदि अधिक महत्वपूर्ण है जबकि अन्य स्थानीय और विधान सभा चुनाव में इसके साथ साथ जाति समीकरण तथा क्षेत्र से जुड़ाव आदि भी महत्वपूर्ण है। इस तरह एजेंसियो से अधिक राजनीतिक बहस से विश्लेषण निकाल कर प्रत्याशी तय किये जाने पर भाजपा सब पर भारी पड़ेगी।

सबसे अधिक चिंता भाजपा को उत्तर प्रदेश की होना चाहिये जहां सबसे अधिक सीटें हैं और सबसे अधिक सीटें जीतकर पिछले लोक सभा के चुनाव में रिकार्ड भी कायम किया है। यहां के मुख्यमंत्री रह चुके पूर्व केन्द्रीय राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह को और पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी को चप्पे-चप्पे की जानकारी होगी। इसी तरह उत्तर पदेश के एक चुनाव नितिन गड़करी की राष्ट्रीय अध्यक्षता में भी हुये है अत: उन्हें भी पूरी जानकारी होगी। इनके और मुख्यमंत्री योगी तथा प्रदेश अध्यक्ष महेन्द्र नाथ पांडे के साथ बैठकर अमित शाह टिकटों का वितरण करते हैं और छवि वाले प्रत्याशी चुनते है तो वे सपा, बसपा के गठबंधन पर भारी पड़ेगें। राजनाथ सिंह की गिनती भी उत्तर प्रदेश के सर्वाधिक सफल और लोकप्रिय मुख्यमंत्रियों में होती है।

यूं तो राजनाथ सिंह और नितिन गडकरी दोनों ही भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके हैं दोनों को ही पूरे देश की राजनीति के साथ साथ अपनी पार्टी के नेताओं प्रत्याशियों और संगठन की भली भांति जानकारी है। यदि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इनपुट के साथ राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ये चौकड़ी की टीम बनाकर प्रत्याशियों का चयन करते हैं तो सत्ता बनाये रखनें में सफल हो सकती है। नरेन्द्र मोदी का कद हिन्दुस्तान के किसी भी नेता से ऊंचा है। उनका नेतृत्व विश्व में धूम मचा चुका है देश की रक्षा के लिये उठाये गये कदम चारों तरफ प्रशंसा पा रहे हैं। नितिन गडकरी द्वारा राष्ट्रीय राजमार्ग का त्वरित निर्माण बनारस से बंगाल स्टीमर चलाया जाना आदि जनता काफी सराह रही है। राजनाथ सिंह द्वारा सफल आंतरिक सुरक्षा और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में उनकी छवि का प्रभाव आज भी लोगों के जेहन में बसा है। ऐसे में यदि अमित शाह इन सबसे मिल कर हाई पावर कमेटी के रूप में कमेटी बनाकर ब्यूह की रचना करते हैं तो एनडीए को पिछले 2014 के लोकसभा चुनाव से अधिक सीटें मिल सकती हैं।

यहां इस बात से सतर्क रहना होगा कि देश की जनता बड़ी दयालु है। यदि गांधी परिवार या उनके रिश्तेदार किसी भ्रष्ट आरोप में पकड़े गये तो उन्हें उनके हाल पर छोड़ देना चाहिये, अदालत अपने आप न्याय करती रहेगी। राहुल गांधी की कोटरी पहले ही नेशनल हेरॉल्ड के मामले में जमानत पर है। 1977 में जब जनता पार्टी सत्ता में आयी थी तो शाह कमीशन बैठा कर पूर्व प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के खिलाफ जांच की गयी। इन्दिरा गांधी को जेल जाना पड़ा। इन्दिरा गांधी के जेल जाते ही कांग्रेसियों को मुद्दा मिल गया। यहीं से कांग्रेस में जान आ गयी। इन्दिरा जी को जेल में देख कर जनता विशेषकर औरते दु:खी होने लगी। उनकी इस सहानुभूति ने अगले चुनाव में इन्दिरा जी को फिर से सत्ता में ला दिया।

राफेल डील में राहुल गांधी झूंठे साबित हो चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट की क्लीन चिट  भाजपा सरकार के लिये राम बाण का काम कर गयी। केन्द्र सरकार द्वारा किये गये कार्यों की चारों तरफ सराहना हो रही है। किसान का समर्थन से मूल्य के भुगतान को और अधिक दुरूस्त करना होगा। मुफ्त गैस कनेक्शन, स्वास्थ्य योजना, आवास योजना, सफाई अभियान, शौचालय निर्माण, हाइवे आदि के कारण भाजपा सरकार की छवि अच्छी है और लोग वोट भी देना चाहते थे। राजस्थान में हजारों लोग विधानसभा के चुनाव में कह रहे थे। मोदी से जनता कोई शिकायत नहीं है पर प्रदेश में सरकार बदलना है। इस तरह भाजपा का पलड़ा हर तरह से लोकसभा चुनाव में भारी दिखाई देना लगा।

हिन्दुस्तान की राजनीति के चार महान धुरंधर मोदी, राजनाथ, गड़करी और अमित शाह के रहते भाजपा चुनाव हार ही नहीं सकती, यदि चुनावी समीकरण और सभी निर्णय मिल कर सर्व सम्मति से लेते हैं। विकास और ईमानदारी की छाप से भाजपा को लोग पूरे अंक दे रहे हैं। राजनीतिक गल्तियां न हुई तो भाजपा उसी दम खम से सत्ता में वापिस आने में कामयाब हो जायेगी।

डॉ. विजय खैरा

 

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