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भाजपा के कार्यकर्त्ता और कार्यशैली पर ध्यान देना जरूरी

भाजपा के कार्यकर्त्ता और कार्यशैली पर ध्यान देना जरूरी

पांच राज्यों के परिणामों से तो यही लगता है कि लोगों का भाजपा से थोड़ा ध्यान भटका है। क्योंकि यह अपने चुनावी वायदों को पुरा करने में असफल रही। कांग्रेस मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में, टीआरएस तेलंगाना और एमएनएफ मिजोरम में सरकार बनाने में सफल रहीं। कांग्रेस जो कुछ वर्षों से धुमिल होती जा रही थी, इन राज्यों के परिणामों ने इसमें जान फूंक दी है। लोकसभा चुनाव, 2019 के पहले कांग्रेस ने लोगों को आशा दिलाकर हिंदी-भाषी तीनों राज्यों में काफी प्रभावशाली छाप छोड़ी है। इन तीनों राज्यों में भाजपा सरकार बनाने में असफल रही। ध्यान देने योग्य बात यह है कि भाजपा के तीनों मुख्यमंत्री इन राज्यों में काफी लोकप्रिय थे और यह मध्यप्रदेश में साफ भी होता है, जहां भाजपा सरकार बनानें से केवल पांच सीट ही पीछे रह गई। राजनैतिक विश्लेषक इस परिणाम को देखकर 2019 के चुनाव को मोदी बनाम राहुल की दृष्टि से देख रहे हैं। लेकिन सच्चाई तो यह है कि यह हार मुख्यमंत्रियों के कारण नहीं हुई बल्कि इसलिए हुई कि मोदी सरकार अपने कैबिनेट में कुछ योग्य लोगों को रखने में नाकाम रही।

दूसरी तरफ, कांग्रेस के पास उत्साहित होने का हर कारण है, लेकिन उन्हें अतिप्रसन्न भी नहीं होना चाहिए। क्योंकि इन राज्यों में मिली जीत संसदीय चुनावों में सफलता की कोई गारंटी नहीं है। ग्रामीण भारत के विकास के लिए उठाये जाने वाले कदम को जारी रखने की आवश्यकता है, क्योंकि काम मतलब रखता है, वायदे नहीं। इन पांच राज्यों के चुनावों में न तो भाजपा ने ही खराब प्रदर्शन किया, न ही कांग्रेस अच्छा कर पायी, जैसी की आशा थी। एन्टी-इनकमबेंसी होने के बावजूद भी भाजपा मध्य प्रदेश में 109 और राजस्थान मे 70 सीट लाने में सफल रही। फिर भी यह जीत कांग्रेस के लिए किसी खुशी से कम नहीं है, लेकिन यह कांग्रेस के लिए अस्थाई आश्वासन है। मध्य प्रदेश में कांग्रेस और भाजपा के बीच महज आधे प्रतिशत वोट का अंतर रहा, लेकिन भाजपा को 109 सीटे मिली और कांग्रेस को 114 सीटें प्राप्त हुई। सच्चाई तो यह है कि मध्यप्रदेश भाजपा में टिकट को लेकर हुई बगावत भी कहीं न कही हार का कारण रहा। छत्तीसगढ़ में भाजपा की हार का कारण 15 साल की एंटी-इंकम्बेंसी ही रही। राजस्थान में हर बार की भांती इस बार भी पांच साल पर सरकार बदली। एक सच्चाई यह भी है कि सरकार द्वारा राम मंदिर और रोजगार जैसे मुख्य मुद्दों को ताख पर रखकर एसटी/एससी जैसे अप्रासांगिक मामलों की ओर ध्यान दिया गया।

फिर भी सबकुछ खत्म नहीं हुआ है। कई बार तो एक भाषण ने चुनाव में किस्मत बदल दी है और ख्याती बढ़ाने का कार्य किया है। राज्यों के प्रदर्शन के विश्लेषण करने की आवश्यकता है। गरीबी उन्मूलन और ग्रामीण विकास डिजिटल प्रौद्योगिकी के माध्यम से शहरी आधुनिकीकरण की तुलना में अधिक सर्वोपरि है, जो चुनाव परिणामों का सार है। यह उल्लेखनीय है कि आम आदमी के लिए मोदी आज भारत में सबसे लोकप्रिय और शक्तिशाली नेता हैं। 2014 में पद संभालने के बाद वह हर प्रकार के चुनाव जीतते आ रहे हैं। हालांकि, तथाकथित धर्मनिरपेक्ष ब्रिगेड के लिए राहुल के मोदी के खिलाफ लडऩे के  लिए एक आशा की किरण के रूप में उभरें है। यह सेक्यूलर ब्रिगेड 70 वर्षों से कांगे्रस की अगुआई करती आयी है जो हमेशा से नरेन्द्र मोदी को एक बाहरी व्यक्ति मानता है। इस पृष्ठभूमी में मैं यह कहना चाहूंगा कि नरेन्द्र मोदी को इस गलती से सीखने के लिए छोड़ देना चाहिये। मोदी अभी भी राम मन्दिर के मुद्दे में शरण ढूंढ रहे हैं। हांलाकि आम आदमी यही समझता रहा है कि राजनेता ऐसे मुद्दे का केवल प्रयोग ही करते है। इसलिए आम हिन्दूओं की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए उन्हें राम मन्दिर का शीघ्र से शीघ्र निर्माण करना चाहिये।

अन्तत: भाजपा को अपने कोर समर्थकों को ध्यान में रखना होगा जो निस्वार्थ रूप से संगठन के साथ खड़े रहते आये हैं। सरकार में कई मंत्री, पार्टी के वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ता अपने आप को पार्टी में अलग-थलग महसुस करते हैं। उन्हें अपना पद केवल नाम-मात्र ही लगता है। उनके पास निर्णय लेने का अधिकार नहीं है। एक यह भी सच्चाई है कि पार्टी और सरकार में संगठन के बाहर के लागों को अधिक प्राथमिकता दी जाती है। पार्टी को मजबूत करने और कैडरों में विश्वास पैदा करने के लिए कठिन निर्णय लेना बहुत मुश्किल होता है। हालांकि अभी कुछ भी समाप्त नहीं हुआ है, लेकिन जिस प्रकार से मोदी विरोधी ताकतें मोदी को 2019 में सत्ता से बाहर करने का प्रयास कर रही हैं, अब समय आ गया है कि आम आदमी की चिंता को समझा जाए। पार्टी कैडर पर ध्यान दिया जाएं और 2019 चुनाव को देखते हुए कड़े निर्णय लिये जाएं।

Deepak Kumar Rath

  दीपक कुमार रथ

(editor@udayindia.in)

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