भारतीय सैन्य उद्योग की क्षमताओं का आधार संभावनाएं और चुनौतियां

भारतीय सैन्य उद्योग की क्षमताओं का आधार संभावनाएं और चुनौतियां

नौ रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों (पीएसयू), 40 आयुध कारखानों और 52 रक्षा अनुसंधान तथा विकास प्रयोगशालाओं का भारत में एक बड़ा रक्षा विनिर्माण आधार है। भारत का आत्मनिर्भरता सूचकांक, यानी कुल रक्षा अधिग्रहण में आयात की हिस्सेदारी 30 फीसदी के स्थिर स्तर पर है। यह लेख उत्पादन, शोध एवं विकास और सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र पर उदारीकरण के प्रभाव, दोनों लिहाज से सैन्य उद्योग की क्षमताओं की पड़ताल करता है। यह एफडीआई के क्षेत्र में बड़े नीतिगत बदलाव, महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकी हासिल करने के लिए बड़े अधिग्रहण और सैन्य उद्योग की क्षमता, डिजाइन और अनुसंधान को सर्वोत्तम वैश्विक स्तर के अनुकूल आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक संरचनात्मक बदलावों के बारे में बताता है। वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने के लिहाज से भारत विशिष्ट जगह पर खड़ा है, क्या उसे वैश्विक तरीकों का अनुकरण और संरचनात्मक बदलाव करना चाहिए।

इससे पहले कि हम सरकार नियंत्रित रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों और ऑर्डिनेंस फैक्ट्री की नीतियों और मूल्य संवर्धन की पड़ताल करें, राजस्व और पूंजीगत व्यय तथा भारत के जीडीपी के साथ उसके संबंधों को समझने के लिहाज से वर्षों से चले आ रहे रक्षा व्यय पर एक नजर डालना उपयोगी होगा।

जैसा कि हम ऊपर देख सकते हैं जीडीपी का करीब 2 प्रतिशत रक्षा सेवाओं पर खर्च किया जाता है। हथियार प्रणालियों और प्लेटफॉर्म के अधिग्रहण के लिए पूंजीगत परिव्यय भारत के रक्षा बजट का 30 प्रतिशत है। अनुसंधान और विकास के लिए आवंटन रक्षा व्यय का लगभग 6 प्रतिशत है।

एक नजर कुछ अन्य देशों के सैन्य खर्च और जीडीपी में उसकी हिस्सेदारी पर-

जैसा कि ऊपर हम देख सकते हैं कि संयुक्त राज्य अमेरिका और रूस जैसी प्रमुख ताकतें अपने जीडीपी का 3 प्रतिशत से अधिक सैन्य व्यय पर खर्च करते हैं।

भारत के सार्वजनिक रक्षा उपक्रम/आयुध कारखाने

उत्पादन के लिहाज से इनका मूल्य करीब 8.3 बिलियन डॉलर है। उत्पादन मूल्य, कर के बाद लाभ और प्रत्येक इकाई के मूल्यवर्धन का विस्तृत ब्यौरा नीचे दर्शाया गया है।

ऊपर देख सकते है कि सार्वजनिक रक्षा उपक्रमों और आयुध कारखानों के वीओपी में 14 फीसदी की वृद्धि हुई है और कर के बाद लाभ लगभग 8.9 फीसदी बढ़ा है। हालांकि, यह उल्लेखनीय है कि इनका अर्जित लाभ एकाधिकार और निजी क्षेत्र से प्रतिस्पर्धा की कमी के कारण है। गौर करने वाली दूसरी बात मूल्य संवर्धन के संबंध में है। जहाज निर्माण और एयरक्राफ्ट के मामले में मूल्य संवर्धन करीब 35 फीसदी है, मिधानि और बीडीएल द्वारा उत्पादित रणनीतिक सामग्री और मिसाइलों के मामले में यह बहुत अधिक है। आयुध कारखानों (85 फीसदी) में मूल्य संवर्धन के उच्च स्तर का मुख्य कारण उनकी निम्न प्रौद्योगिकी सामग्री और समावेशन की कमी के कारण है। इसके उलट लड़ाकू विमान, फ्रिगेट और पनडुब्बियों के मामले में रक्षा क्षेत्र के सार्वजनिक उपक्रम अभी भी सब सिस्टम के एसेंबलर्स हैं, मौलिक स्तर पर उनकी महत्वपूर्ण भूमिका नहीं है।

रक्षा उत्पादन में उदारीकरण

भारत ने 1991 में अर्थव्यवस्था को लाइसेंस, कोटा और परमिट राज से मुक्त करके आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत की। इसने जीडीपी में वृद्धि, बचत, निर्यात और फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व के लिहाज से विकास को उच्च गति दी। इसने वित्तीय क्षेत्र को सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के एकाधिकार से मुक्त कर दिया और बैंकिंग सेवाओं में ताजगी लाने का काम किया। आर्थिक उदारीकरण का प्रभाव नीचे है।

सार्वजनिक रक्षा उपक्रमों और आयुध कारखानों का एकाधिकार 2001 में खत्म हो गया जब निजी क्षेत्र की 100 फीसदी भागीदारी और 26 फीसदी एफडीआई को मंजूरी दी गई। निजी क्षेत्र की भागीदारी, सार्वजनिक-निजी भागीदारी, निजी क्षेत्र के लिए समान अवसर मुहैया कराने और आरएंडडी परियोजनाओं के लिहाज से केलकर समिति (2005) ऐतिहासिक साबित हुई। कई देशों में प्रचलित ऑफसेट नीति को भी इस समिति ने चर्चा में ला दिया, जिससे बड़े अधिग्रहण में ऑरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स (ओईएम) से महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकी, एफडीआई और आउटसोर्सिंग का लाभ उठाया जा सके। इसके बाद प्रबीर सेनगुप्ता समिति (2006) ने रक्षा उत्पादन रत्न (आरयूआर) की अवधारणा को गढ़ा, जिसके तहत 12 कंपनियों को एचएएल और बीईएल जैसे नवरत्न सार्वजनिक उपक्रमों के समान दर्जा दिया गया। इसने टाटा, एलएंडटी, एमएंडएम, गोदरेज एंड बॉयस, पिपावाव शिपयार्ड जैसी रक्षा क्षेत्र में महत्वपूर्ण निवेश के साथ सक्रिय निजी कंपनियों को समान अवसर मुहैया कराया।

हालांकि इस प्रशंसनीय पहल को आगे नहीं बढ़ाया जा सका, क्योंकि ऐसी धारणा थी कि कई बड़ी आईटी कंपनियों को नजरअंदाज कर कुछ को लाभ पहुंचाया गया है। धीरेंद्र सिंह समिति (2015) द्वारा प्रस्तावित रणनीतिक साझेदारी मॉडल का प्रेरणा स्रोत भी प्रबीर सेनगुप्ता का 2006 का ‘आरयूआर’ मॉडल ही था। धीरेंद्र सिंह के मॉडल को भारतीय कंपनियों से वैसा प्रोत्साहन नहीं मिला जैसा इसे मिलना चाहिए था। एसपी को एक सेगमेंट तक सीमित रखने के प्रस्ताव के कारण ऐसा हुआ। यह टाटा और एलएंडटी जैसे प्रमुख समूहों जो कई क्षेत्रों मसलन, हवाई जहाज, युद्धपोत, कमांड कंट्रोल और संचार जैसे कई खंडों में काम कर सकते हैं को एक सेक्टर में सीमित कर देता। वीके आत्रे समिति (2016) को भी उत्साहजनक प्रतिक्रिया नहीं मिली है, क्योंकि इसमें भी निजी खिलाडिय़ों की भागीदारी केवल एक सेगमेंट तक सीमित करने का प्रस्ताव है। कई निजी कंपनियां आपस में जुड़े कई सेक्टर में काम करना चाहते हैं। कोई भी नीति जो इस तरह के अवसर को बाधित करे वह खुद-ब-खुद निष्प्रभावी हो जाएगी।

बड़े नीतिगत बदलाव

(अ) एफडीआई पॉलिसी

इसका श्रेय मौजूदा एनडीए सरकार को जाता है। उसने आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए कई क्षेत्रों के 87 नियमों को उदार बनाया है। कुछ ऐसे क्षेत्र जहां बड़े स्तर पर बदलाव किया गया है वह हैं- निर्माण, खुदरा व्यापार और खाद्य प्रसंस्करण। रक्षा क्षेत्र में एफडीआई को पूर्व के 26 फीसदी से बढ़ाकर 49 फीसदी करने की मौजूदा सरकार ने कोशिश की। हालांकि, अन्य क्षेत्रों और रक्षा क्षेत्र में एफडीआई पर करीबी नजर डालने से स्पष्ट तौर पर यह पता चलता है कि रक्षा क्षेत्र में इसे बढ़ावा देने के लिए एफडीआई नीति में आवश्यक रूप से तत्काल नीतिगत बदलाव की दरकार है। वास्तव में निवेश बेहद धीमा है और वह भी मुख्य तौर पर तीन देशों ब्रिटेन, फ्रांस और इजरायल से ही है।

याद किया जा सकता है कि भारत में दूरसंचार क्षेत्र को वास्तव में बढ़ावा 100 फीसदी एफडीआई की मंजूरी से मिला। रक्षा क्षेत्र एफडीआई की सीमा 49 फीसदी बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। रक्षा क्षेत्र में निवेश अभी तक कमजोर है और इसे 50 फीसदी से ज्यादा करने की आवश्यकता है, ताकि ओईएम और डिजाइन हाउस भारत में दीर्घकालिक निवेश करना पसंद करें और भारत निर्माण क्षेत्र के हब के तौर पर उभरे। इससे महत्वपूर्ण अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी आएंगे। बोइंग जैसे विमानों के निर्माण का हब बनकर उभरे चीन जैसे देशों के अनुभव इस बात का जीता जागता सबूत हैं कि एफडीआई सीमा 50 फीसदी से अधिक करने पर क्या कुछ हासिल करना मुमकिन है। 50 फीसदी से अधिक एफडीआई सीमा करने पर भारत की संप्रभुता प्रभावित होने की आशंका को पूंजी और मुनाफे के प्रत्यावर्तन वगैरह के क्षेत्र में उपयुक्त कानूनी उपायों से दूर किया जा सकता है।

(ब) ऑफसेट पॉलिसी

बड़े अधिग्रहण का लाभ उठाने के लिए 2005 में एक प्रमुख रक्षा नीति (ऑफसेट पॉलिसी) की घोषणा की गई थी, जो निर्यात ऑर्डर हासिल करने वाले ओईएम से महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकी और आउटसोर्सिंग पाने की अनुमति देता है। इस नीति के दायरे में बाद में महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकी के लिए गुणक, एसएमई को प्रोत्साहित करने और अर्धसैनिक तथा रक्षा क्षेत्र में दोहरे उपयोग वाले उत्पादों को ऑफसेट का लाभ देने के लिए शामिल किया गया।

हालांकि, इस तरह के नीतिगत बदलाव ओईएम द्वारा कम तकनीक वाले काम को आउटसोर्स करने के आदेशों को छोड़कर महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकी में नहीं लाए गए हैं। ऑफसेट नीति को असरदार बनाने के लिए एफडीआई नीति को उदार बनाने की आवश्यकता है ताकि ओईएम प्रमुख साझेदार बन सकें। अमेरिका से प्रौद्योगिकी हस्तांतरित कर एंबरेयअर (Embraer) एयरक्राफ्ट बनाने का ब्राजील का प्रयोग सफल रहा, क्योंकि सरकार ने देश की वैज्ञानिक बिरादरी को प्रोत्साहित करने और कर छूट के लिहाज से पूरा समर्थन दिया। प्रभाव के विस्तार के लिए ‘अप्रत्यक्ष’ऑफसेट का दायरा बढ़ाया जाना चाहिए, जिसमें केवल रक्षा क्षेत्र की बजाए शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे जैसे अन्य सामाजिक क्षेत्र भी शामिल हों। कई देश शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार के लिए अप्रत्यक्ष ऑफसेट को अनुमति देते हैं। यकीनन भारत को ऑफसेट नीति में सर्वोत्तम वैश्विक नीतियों का अनुकरण करना चाहिए, जिसे ब्राजील जैसे देशों ने ओईएम के साथ दीर्घकालिक साझेदारी को बढ़ावा देकर कर दिखाया है।

(स) संरचनात्मक बदलावों की जरूरत

फ्रांस और अमेरिका के सर्वोत्तम वैश्विक नीतियों के अनुसार रक्षा मंत्रालय की संगठनात्मक संरचना में महत्वपूर्ण बदलाव करने की आवश्यकता है।

आयुध महानिदेशक (डीजीए)

फ्रांस में 1961 में  कलैब्रटिव प्लेटफॉर्म मुहैया कराने के मकसद से इसकी स्थापना की गई, अनुसंधान, डिजाइन, निर्माण और रखरखाव क्षेत्र के विभिन्न साझेदारों की निगरानी डीजीए करता है। रक्षा प्लेटफार्मों की प्रतिस्पर्धात्मकता, गुणवत्ता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिहाज से फ्रांस की युद्धक क्षमता को बरकरार रखने के लिए यह अद्वितीय समाधान प्रदान करने में सक्षम है।

भारत में, अलग-अलग साझेदार मसलन सेवाएं, उत्पादन संगठन, डीआरडीओ और निजी क्षेत्र साइलो की तरह काम करते हैं। रक्षा मंत्रालय जिसे विभिन्न एजेंसियों को समन्वय का मंच मुहैया कराना चाहिए, वह वैसा नेतृत्व प्रदान करने में असमर्थ है, जैसा डीजीए प्रदान करता है। रक्षा मंत्रालय ऐसे लोगों द्वारा चलाया जाता है, जिनके पास रक्षा क्षेत्र में अपेक्षित विशिष्ट पेशेवर विशेषज्ञता नहीं है और वे शीर्ष स्तर पर आवश्यक रणनीतिक सोच और पेशेवर विशेषज्ञता प्रदान करने में असमर्थ हैं।

रणनीतिक साझेदारी की चुनौतियां

धीरेंद्र सिंह समिति ने रणनीतिक साझेदारी के महत्व को सही ढंग से रेखांकित किया था जिसमें ओईएम और डिजाइन हाउस के अनुरूप एयरोनॉटिक्स, जहाज निर्माण, बख्तरबंद वाहन, मिसाइल, उपकरण वगैरह के लिहाज से खास स्थिति में निजी भागीदार की पहचान उत्पादन एजेंसी के तौर पर की जाएगी। यह बिना प्रतिस्पर्धा के नामित एजेंसी होने का सार्वजनिक रक्षा उपक्रमों का एकाधिकार खत्म कर देगा। प्रबीर सेनगुप्ता समिति की रक्षा उद्योग रत्न (आरयूआर) अवधारणा भी इसी तर्ज पर थी, हालांकि आईटी क्षेत्र की प्रमुख निजी कंपनियों को किनारे कर यह निजी क्षेत्र के कुछ भागीदारों के पक्ष में झुकी है।

निजी क्षेत्र को समान अवसर मुहैया कराने के बारंबार वादों के बावजूद रक्षा मंत्रालय के रक्षा उत्पादन विभाग की वर्तमान संरचना में सार्वजनिक रक्षा उपकरणों को अत्यधिक संरक्षण हासिल है। पीएम नायर समिति ने 1980 के दशक में हमारे आयुध कारखानों के निगमीकरण का जोरदार प्रयास किया था। ट्रेड यूनियनों के विरोध के कारण सरकार ऐसा नहीं कर सकी। वर्तमान सरकार की संरचनात्मक बाधाओं और दखल को देखते हुए रक्षा निर्माण के क्षेत्र को बड़े स्तर पर बढ़ावा देने में एसपी की अवधारणा आकर्षक भले हो, लेकिन व्यवहारिक नहीं है।

बिल्ड टू प्रिंट या प्रिंट टू बिल्ड

भारत का टीओटी रूट 1969 के बाद से लाइसेंसकर्ता के हिसाब से उपक्रम करता है। अमूमन मूल्यवर्धन न्यूनतम होता है। अधिकांश डीपीएसयू अपग्रेड भी नहीं कर सकते हैं, जैसा कि एसयू 30 विमान के उत्पादन में एचएएल के व्यापक अनुभव के मामले में दिखता  है। एचएएल की डिजाइन क्षमता विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स और प्रपल्शन सब सिस्टम्स के लिहाज से डंवाडोल है। सब सिस्टम्स के लिहाज से डिजाइन क्षमता को कैसे बेहतर बनाया जाए यह महत्वपूर्ण सवाल है।

निजी भागीदारों के लिए भी रक्षा उपकरणों के डिजाइन का विकास करने में एक गंभीर नुकसान है और भरोसेमंद डिजाइन क्षमता को हासिल करने के लिए वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित डिजाइन हाउस के साथ सहयोग पर अपने बजट का महत्वपूर्ण हिस्सा खर्च करना पड़ेगा। इस बात को लेकर भी चिंता जताई जाती है कि सरकार निजी भागीदारों से अपने प्रोटोटाइप और डिजाइन डॉक्यूमेंट्स सार्वजनिक रक्षा उपक्रमों को आगे के विकास और उत्पादन के लिए सौंपने को कह सकती है। यह निश्चित तौर पर पीछे हटने जैसा होगा, क्योंकि निजी भागीदार अपने डिजाइन और प्रोटोटाइप पसंद की प्रोडक्शन एजेंसी को देना चाहेंगे। यह निजी क्षेत्र की कंपनियों मसलन, टाटा, एलएंडटी और एमएंडएम की रफ्तार पर ब्रेक लगाएगा, जिन्होंने एयरोनॉटिक्स, नेवल सिस्टम और आर्म्ड व्हीकल और आर्टिलरी सिस्टम के क्षेत्र में ओईएम के साथ अच्छा तालमेल स्थापित किया है।

रक्षा उत्पादन को गंभीर रूप से प्रभावित करने वाली नौकरशाही से भी सरकार को देश को बाहर निकालना चाहिए। ब्रिटेन ने 1980 के दशक में रॉयल ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों का निजीकरण कर ऐसा किया था। यह वास्तव में लागत, गुणवत्ता, समयबद्धता और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता के मामले में उनका प्रदर्शन बदल देगा। रक्षा निर्माण के क्षेत्र में मेक इन इंडिया को वास्तव में जीवंत करने के लिए उत्पादन में निजीकरण पर विचार करना होगा। निगरानी जहाजों से एक शुरुआत की गई है। समय बड़े सुधारों और अतीत की मानसिकता में बदलाव लाने का है। महान अर्थशास्त्री कीन्स ने कहा था कि ‘कठिनाई नए विचारों को प्रस्तुत करने में नहीं, बल्कि पुराने को बदलने में है।’ वर्तमान सरकार को अक्षमता और जवाबदेही की कमी के मकडज़ाल को निश्चित रूप से खत्म करना चाहिए ताकि सार्वजनिक रक्षा उपक्रमों और आयुध कारखानों की कमी दूर कर तथा निजी सेक्टर के उत्साह से मेक इन इंडिया को रफ्तार दी जा सके।

आत्मनिर्भरता सूचकांक

स्वदेशी उपक्रमों की अक्षमता और अंतहीन देरी की वजह से क्रय यानी ओईएम से वीपंस प्लेटफॉर्म और सिस्टम आयात करना पहली प्राथमिकता रही है। प्रौद्योगिकी हस्तांतरण (खरीदो और बनाओ) दूसरा विकल्प है, जिसके तहत आयातित उपकरणों को डीपीएसयू असेंबल करते हैं। हालांकि, इस तरीके में कीमतों में इजाफा गंभीर चिंता का विषय है, जैसा एसयू-30 विमान के मामले में स्पष्ट रूप से दिखा है। ‘नो हाउ’ रूट के तहत डिजाइन क्षमता का निर्माण भारी जोखिम भरा है। स्वदेशी (आरएंडडी) में गहराई और प्रतिबद्धता की कमी के कारण ऐसा है। 30 फीसदी से कम के आत्मनिर्भरता सूचकांक के साथ मेक इन इंडिया की पहल बुरी तरह विफल रही है। यह विशेष रूप से सब सिस्टम्स मसलन प्रपल्शन, वीपंस और सेंसर्स के क्षेत्र में आयात पर हमारी निर्भरता असामान्य तरीके से अधिक होने के कारण है।

डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम (1993) की अगुवाई वाली एक समिति ने निम्नलिखित महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकी कमियों की पहचान की थी।

उपरोक्त प्रौद्योगिकी कमियां आज भी भारत में बिना किसी प्रत्यक्ष सुधार के बनी हुई हैं।

समिति ने राष्ट्रीय स्तर पर वर्क सेंटर्स विकसित कर 2005 तक आत्मनिर्भरता का स्तर 70 फीसदी तक लाने और सार्वजनिक उपक्रमों, डीआरडीओ, इसरो, सीएसआईआर, डीएई, निजी सेक्टर तथा शिक्षाविदों को एक साथ एक मंच पर लाने की सिफारिश की थी। समिति ने सिफारिश की थी कि प्रत्येक अनुसंधान संगठन द्वारा अलग-अलग परीक्षण सुविधा स्थापित करने की बजाए पूरे देश में बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए डिजाइन और विकास के नेशनल सेंटर्स बनाए जाने चाहिए।

डीपीएम और डीपीपी की समीक्षा के लिए नई समिति

नए रक्षा मंत्री ने मेक इन इंडिया पहल को मजबूत करने के लिए महानिदेशक (अधिग्रहण) के नेतृत्व में एक समिति बनाई है। समिति से संपत्ति अधिग्रहण से जीवन चक्र की लागत तक निर्बाध प्रवाह को सुनिश्चित करने के उपायों को लेकर सुझाव मांगा गया है। इसका मकसद स्वदेशी उद्योगों की अधिक से अधिक भागीदारी को सुविधाजनक बनाना और देश में एक मजबूत रक्षा औद्योगिक आधार विकसित करना है। भारतीय स्टार्ट-अप और भारतीय उद्योग में अनुसंधान और विकास को बढ़ावा देने पर भी गौर करेगा।

लाइफ साइकल कॉस्टिंग

लाइफ साइकल कॉस्टिंग वैश्विक स्तर पर प्रचलित परिपाटी है। इसके तहत एक देश किसी हथियार प्रणाली और प्लेटफॉर्म पर कुल लागत का उसके लाइफ साइकल के आधार पर आकलन करता है। अग्रिम लागत और न्यूनतम पुर्जों के आधार पर सबसे कम बोली लगाने वाले का मूल्यांकन करने की बजाए एलसीसी पुर्जों की लागत सहित लाइफ साइकल में कुल परिचालन लागत पर गौर करता है। मरम्मत और रखरखाव में लगने वाले समय पर भी ध्यान दिया जाता है। भारत ने एमएमआरसीए परियोजना के लिए लागत की ऐसी प्रणाली का प्रयास किया, जहां व्यापक परीक्षण के बाद न्यूनतम लागत पर पहुंचने के लिए दो फर्मों का मूल्यांकन किया गया। हालांकि, यह अनुबंध मेसर्स रफाल से सीधे खरीद विकल्प के पक्ष में रद्द कर दिया गया था। कई आलोचकों का मानना है कि इस तरह के नीतिगत उलटफेर मेक इन इंडिया पहल को पीछे ढकेलने के लिए जिम्मेदार हैं। अमेरिका और और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश नियमित रूप से एलसीसी की परिपाटी पर अमल करते हैं। रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों को मेरी सलाह है कि एलसीसी के आधार पर मूल्यांकन की व्यवहारिकता से परिचित होने के लिए वे वाशिंगटन के डिफेंस ऐक्विजशिन यूनिवर्सिटी में प्रशिक्षण लें।

आगे बढऩे का रास्ता

दुनिया भर में रक्षा क्षेत्र अपने आप में अनूठा है, क्योंकि उसे दुश्मनों से निपटना और अपने देश की संप्रभुता की रक्षा करनी होती है। आखिरकार वे ऐसी रणनीतियों से संचालित होते हैं जिन्हें व्यापक स्तर पर सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। हालांकि रक्षा मंत्रालय के उत्पादन खंड में बीते कुछ वर्षों में कई देशों में काफी निजीकरण देखने को मिला है। अमेरिका में निजी क्षेत्र हथियार प्रणालियों का प्रमुख आपूर्तिकर्ता है, ब्रिटेन ने भी 1980 में रॉयल ऑर्डनेंस फैक्ट्री को निजीकरण के लिए चुना ताकि लागत और दक्षता के बीच सामंजस्य की प्रक्रिया शुरू की जा सके। विकसित देशों में आरएंडडी गतिविधि में निजी क्षेत्र की महत्वपूर्ण भागीदारी है। इसके उलट भारत अभी भी विशाल सार्वजनिक रक्षा क्षेत्र और आयुध कारखानों में उलझा हुआ है जो उम्मीद के अनुसार प्रदर्शन नहीं कर पा रहे हैं। निगरानी जहाजों के निर्माण के लिए निजी क्षेत्र को 2008-09 के दौरान अनुमति दी गई थी। अर्थव्यवस्था और समय पर वितरण के लिहाज से यह काफी उल्लेखनीय रहा है। इसे एयरोस्पेस सेक्टर में एडवांस लाइट हेलिकॉप्टरों, ट्रेनर्स और ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्टस के निर्माण के क्षेत्र में आजमाने की जरूरत है। जहाज निर्माण और एयरोस्पेस दोनों में दोहरे उपयोग की काफी संभावनाएं हैं। इसके अलावा अनुसंधान और विकास गतिविधियों को एसएंडटी विभागों (डीआरडीओ, बीएआरसी, स्पेस और डीएसटी) में सरकारी फंड के चंगुल से निकाला जाना चाहिए। निजी भागीदारों को डिजाइन क्षमताओं में सुधार के लिए पैसे की व्यवस्था करनी चाहिए। एक बाजारवादी अर्थव्यवस्था  अनिवार्य रूप से आर्थिक अनिश्चितता के दौर में निजी क्षेत्र के वित्तीय फैसलों को उजागर करता है/बतलाता है। निश्चित तौर पर भारत का रक्षा क्षेत्र इसके आर्थिक पुनरुत्थान का हिस्सा होना चाहिए। पुनरीक्षित सांगठनिक सरंचना के साथ-साथ उदार एफडीआई नीति (>50 प्रतिशत) और ऑफसेट नीति भारत को वैश्विक रक्षा विनिर्माण केंद्र बना सकती है और ‘मेक इन इंडिया’ को बढ़ावा देने में मुख्य भूमिका निभा सकती है। उम्मीद की जा सकती है कि डीपीएम और डीपीपी की समीक्षा के लिए बनी नई समिति एलसीसी के साथ तालमेल बिठाने और भारत के सैन्य उद्योग की क्षमताओं को बढ़ाने के लिहाज से पूर्व की समितियों की तुलना में व्यापक बदलाव का आधार बनेगी तथा रक्षा विनिर्माण में ‘मेक-इन-इंडिया’ को एक नया रूप देगी।

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  प्रो. (डॉ.) एस.एन. मिश्रा

(लेखक संयुक्त सचिव (एयरोस्पेस) (रिटायर्ड),रक्षा मंत्रालय, भारत सरकार, हैं)

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