ब्रेकिंग न्यूज़

… मन से बड़ा न कोय

… मन से बड़ा न कोय

अनुराग जिस मल्टीनेशनल कम्पनी के लिए मार्केटिंग रिसर्च एग्जीक्यूटिव के रूप में काम करता था, वह लगातार तीन वर्षों से घाटे में जा रही थी। अंत में जब कम्पनी और अधिक घाटे को झेल नहीं पाई तो वह भारत से अपना कारोबार समेट कर वापस अपने पैरेंट देश चली गयी, और इसके साथ ही अनुराग के लिए मानो उसकी दुनिया ही बदल गयी। उसके सपनों का संसार ही बिखर कर रह गया।

उसके दो बच्चे उसी शहर के किसी प्रतिष्ठित स्कूल में पढ़ रहे थे और अपनी वाइफ के साथ उसी शहर में किराये के फ्लैट में रह रहे थे। नौकरी के छूटने के बाद अनुराग काफी उदास रहने लगा। उसका मन किसी भी काम में नहीं लगता था। उसे ना खाने की सुध रहती थी और ना ही बच्चे और पत्नी के बारे में कोई खबर। वह नयी नौकरी के लिए कोशिश भी नहीं कर रहा था। अकेले एकांत में चुप-चुप बैठकर पता नहीं वह क्या गुनता रहता था। खुद में खोया हुआ वह इस कदर खुद के द्वारा रचित निराशा के जाल में फंसता गया कि उसे कुछ पता ही नहीं लगा।

पत्नी के लाख समझाने पर भी उसकी मनोदशा में कोई परिवर्तन नहीं हुआ और उसकी दशा दिन-ब-दिन बदतर होती गयी। आखिर उसकी पत्नी जब उसे किसी मनोचिकित्सक के पास लेकर गयी तो उन्होंने कहा कि अनुराग अवसाद से ग्रसित हो चुका है और वह अगर अपनी स्थिति में परिवर्तन नहीं लाता है तो हालात और बिगड़ सकते हंै।

खुद को एक बड़ी मुसीबत में पाकर अनुराग शुरू में तो काफी घबरा गया और उसके लिए उसकी पारिवारिक दुनिया के साथ-साथ सुहाने सपनों का संसार टूटता हुआ प्रतीत हुआ किन्तु उसने विवेक से काम लिया और हिम्मत नहीं हारी। वह अपनी लाइफ स्टाइल तथा सोच के ढंग में परिवर्तन लाने की कोशिश करने लगा। जीवन, मृत्यु और इस क्षणभंगुर और मायावी संसार के प्रति अपने नजरिये में उसने बदलाव लाना प्रारंभ कर दिया। सबसे अधिक वह अपनी पत्नी और अपने बच्चों से बात करने के साथ-साथ अपनी समस्याओं को उनके साथ शेयर भी करने लगा। अगले सप्ताह में उसने अपने ही शहर के एक अन्य बहुराष्ट्रीय कम्पनी में पूरे आत्मविश्वास के साथ जॉब के लिए अप्लाई किया और संयोग से उसका सिलेक्शन भी हो गया।

किन्तु उसे इस बार सैलरी पैकेज पीछे वाली कम्पनी की तरह बहुत अच्छी नहीं थी और उसे कम पैकेज के साथ ही गुजारा और समझौता करना पड़ा। वह अब अपनी उसी सैलरी के साथ अपनी जिन्दगी को एडजस्ट करने लगा।

पहले तो उसने ऊंचे किराये वाले फ्लैट को छोड़कर सस्ते वाले फ्लैट को किराये पर ले लिया। बच्चों को तो उसी स्कूल में रहने दिया। किन्तु अपने दोनों नौकरों को हटा दिए और दो गाडिय़ों की जगह एक गाड़ी ही इस्तेमाल करने लगे। वीकेंड की पार्टियां कम कर दीं और अनावश्यक खर्चों को पूरी तरह से नियंत्रित कर लिया।

अनुराग का जीवन धीरे-धीरे पटरी पर आने लगा और अवसाद का वह दुखद दौर आश्चर्यजनक रूप से खत्म हो गया। उसके जीवन में एक नए विहान ने दस्तक दे दिया था, जिसके स्निग्ध छांह में अनुराग और उसके परिवार की छोटी-सी दुनिया में खोई खुशियां और बहारें फिर से लौट आयीं थीं।

सच पूछिये तो इस प्रकार के निराशाजनित डिप्रेशन के शिकार होने वालों में अनुराग केवल अकेला युवक नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक लेटेस्ट आंकड़े के अनुसार वर्तमान में दुनिया भर में 30 करोड़ व्यक्ति अवसाद के शिकार हैं। इतना ही नहीं अवसाद दुनिया में ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीजेज के एक मुख्य कारण में शुमार होता है। पुरुषों की अपेक्षा महिलाएं डिप्रेशन से अधिक प्रभावित होती हैं। प्रति वर्ष अमूमन 8 लाख लोगों की मृत्यु सुसाइड से होती है। इसे इस रूप में भी देख सकते हैं कि प्रत्येक 40 सेकंड में एक व्यक्ति की मौत खुदकुशी के कारण होती है। 15 से 29 आयु-वर्ग के लोगों में मृत्यु का यह प्रमुख कारण है।

मौलिक रूप से देखें तो यह समझते देर नहीं लगती है कि डिप्रेशन महज एक बड़े और जानलेवा खतरे का संकेत है जिसका अंत प्राय: खुदकुशी में होता है। हमारे आपके बीच न जाने ऐसे कितने अनुराग हैं जो अपने अवसादग्रस्त जीवन को बड़ी चतुराई से अपने परिवार से, समाज से और अपने दोस्तों से छुपा लेते हैं। अपने चेहरे पर एक छद्म चेहरा लगा कर दर्द और परेशनियों के बीच मुस्कुराने की कोशिश करने वाले अपनों की पहचान आज हमारे लिए एक अग्निपरीक्षा सरीखा कठिन और दुष्कर कार्य हो गया है। आज दरकार है डिप्रेशन सरीखे जानलेवा किन्तु साध्य समस्या के साथ दुखद जीवन गुजार रहे लोगों के दर्द में झांकने की, उनकी टीस को दिल से महसूस करने की और सबसे अधिक उन्हें गले लगाकर और पीठ पर प्यार की थपकी से उनकी मानसिक वेदना को कम करके उन्हें अमूल्य मानव जीवन की खुशियों को फिर से वापस करने की।

18

डिप्रेशन का कारण

मनोविश्लेषकों का मानना है कि मानव जीवन में डिप्रेशन जैसी ट्रेजेडी के लिए मानव की सोच, जीवन और जहान के प्रति उनका खुद का नजरिया है। तो भी एक अहम प्रश्न यह तो उठता ही है कि आखिर डिप्रेशन की समस्या का मूल कारण क्या है? कोई भी व्यक्ति इसकी चपेट में कैसे आ जाता है?

हकीकत में जब हम किसी समस्या के बारे में चिंतित होते हैं तो यह तनाव पैदा करता है और जब यही तनाव समय के साथ बढ़ता जाता है तो अपने गंभीर तथा जानलेवा स्वरुप में डिप्रेशन या अवसाद के नाम से जाना जाता है। अवसाद की समस्या तथा इसका प्रभाव उस धीमे जहर सरीखा होता है, जो कि तन – मन को रफ्ता-रफ्ता बीमार कर जाता है।

क्या आपने कभी घुन खाए लकड़ी या फिर दीमक खाए किसी शहतीर को देखा है? ये लकडिय़ां बाहर से तो खूब मजबूत दिखाई देती हैं, किन्तु सच पूछें तो ये अंदर से खोखले होते हैं तथा कमजोर होते हैं। अवसाद से ग्रसित मानव की स्थिति बिल्कुल उसी घुन या दीमक खाए लकड़ी की तरह का होता है। आधुनिक चिकित्साशास्त्रियों का यह कहना है कि अवसाद का जहरीला फल तनाव के वट – वृक्ष में फलता है। लिहाजा यह अनिवार्य है कि यदि हम अवसाद सरीखे गंभीर बीमारी से निजात पाना चाहते हैं तो सबसे पहले हमें तनाव से मुक्ति पाने की जरुरत है।

आशय यह है कि जीवन में परिस्थितियां चाहे कितनी ही प्रतिकूल एवं संकटमय क्यों ना हों, हमें उससे संघर्ष करने की आवश्यकता है, डटकर मुकाबला करने की दरकार है, तथा सबसे बढ़कर धैर्य का दामन थामे मन को विचलित न होने देने की हिम्मत जुटाने की जरुरत है। कठिन परिस्थितियों को देखकर खुद को सरेंडर कर देने से जीवन की समस्याएं खत्म तो नहीं होती बल्कि वे हमारे जीवन तथा जहान दोनों को लील जाती हैं।

समस्याओं का समाधान ढूंढें

हमारे शास्त्रों में भी कहा गया है कि चिंता एवं चिता एक समान होती हैं। अर्थात चिंता करने वाला व्यक्ति शीघ्र ही चिता पर पहुंचने की तैयारी कर चुका होता है। जीवन की ऐसी कठिन परिस्थिति में विवेकपूर्ण रास्ता यह है कि हमें धैर्य धारण कर उनका मुकाबला करते जाना चाहिए। एक बार मुसीबतों से लड़कर जब आप बाहर आयेंगे तो फिर आप खुद को पहले से अधिक मजबूत एवं धैर्यवान पाएंगे।

नवउदारवादी तथा भूमंडलीकरण की सुधारवादी अर्थव्यवस्था के उत्तरकाल में जिस प्रकार से जनसामान्य के जीवन में रंगीनियां आई हैं, एक बात तो सोलहो आने सच है कि मानव मन लेटेस्ट फैशन एवं सोफिस्टिकेटिड लाइफस्टाइल के चक्रव्यूह में अबाध रूप से घिरता जा रहा है। महत्वाकांक्षाओं के एक बड़े मकड़ जाल में हम फंसे हुए हैं जिसमें हमारा दम घुटता जा रहा है। हम भौतिक सुख एवं सुविधाओं की अंतहीन तलाश में तांगे के उस घोड़े सरीखे हो चुके हैं, जिनकी आंखों के दोनों तरफ चमड़े की पट्टियां बंधी होती हैं, और यही कारण है कि हम केवल और केवल आगे ही देख पा रहे हैं। इस आगे देखेने की अंधी हवस में यदि हमने कुछ खोया है तो वह है दिल का सुख तथा मन का सकून। इस प्रकार की अंधी चाहत में हमने यदि कुछ खोया है तो वह है आत्मिक खुशी एवं सात्विक शांति।

फिर जब इच्छाएं तथा सपने साकार नहीं हो पाते हैं तो हम हताश हो जाते हैं, निराश हो जाते हैं, दुनिया बदरंग दिखने लगती है, हम चिंताओं के चक्रव्यूह में फंस जाते हैं जो कि हमें तनावग्रस्त कर देता है। मॉडर्न जीवन के वर्तमान दौर में बढ़ती खुदकुशी की घटनाओं के सबब के रूप में दम तोड़ती महत्वाकांक्षाओं से जनित हताशा कम जिम्मेदार नहीं है। सच पूछें तो इसका अर्थ कदापि यह नहीं है कि हमें अपने जीवन में सपने ही नहीं देखना चाहिए। सपने तो अवश्य देखने चाहिए, किन्तु सपनों की उड़ान हमारे वास्तविक स्थिति को ध्यान में रखकर निर्धारित किया जाना चाहिए। जो सपने हमारे अपने जमीन से नहीं जुड़े होते हैं तथा फंतासी के शीशमहल में बैठकर देखे गए होते हैं, उनसे डर कर रहने की आवश्यकता है, क्योंकि जब इस प्रकार के सपने टूटते हैं तो इनके किरचों से मन को बड़ी चोट लगती है। आत्मविश्वास लहूलुहान हो उठता है और जीवन जीने के लिए आवश्यक साहस और उत्साह में आश्चर्यजनक रूप से काफी गिरावट आ जाती है।

तन पर चोट एवं जख्म का तो इलाज है, किन्तु मन पर लगे जख्म एवं जहर का कोई इलाज नहीं होता है। लिहाजा यह अनिवार्य है कि हमें अपने जीवन में उन्ही सपनों को देखकर उनको साकार रूप देने की कोशिश करनी चाहिए जो कि हमारे बौद्धिक क्षमता, आर्थिक अवस्था एवं पारिवारिक मर्यादाओं की परिसीमा के अंदर आते हैं।

फिर असफलता जनित चिंता भी हमारे जीवन में अवसाद का एक अहम कारण होता है। सच पूछिए तो यहां पर हमें दार्शनिक, धीर एवं गंभीर रहने की जरुरत है। असफलताओं से चिंतित होने की बजाय हमें उनके कारणों की संजीदगी से  तलाश करनी चाहिए।

लामाओं के धर्म में एक दर्शन है कि कोई भी समस्या इतनी बड़ी नहीं होती है जिसके लिए कि चिंता की जाये। उस फिलॉसफी का यह तात्पर्य यह है कि इस संसार में समस्याएं केवल दो प्रकार की होती हैं – पहले प्रकार की समस्याओं का कोई-न-कोई समाधान अवश्य होता है, और इसीलिए इन समस्यायों के बारे में चिंता करना बेकार है। दूसरी प्रकार की समस्याओं का कोई समाधान नहीं होता है, उन्हें उसी स्वरुप में केवल स्वीकार करने के साहस की जरुरत होती है और इसीलिए इन समस्यायों के बारे में भी चिंता करने का कोई अर्थ नहीं है। यदि हम अपने जीवन की समस्याओं को इस प्रकार के दर्शन के आईने में देखेंगे तो बेशक हम चिंताओं से खुद को बचा कर रख पायेंगे।

परिवार से जुड़े रहें

कभी-कभी अवसाद की समस्या जीवन साथी के असामयिक बिछुड़ जाने के कारण भी उत्पन्न होती है। पति-पत्नी की असमय मृत्यु, तलाक या विछोह के कारण जीवन में जो भी भावनात्मक निर्वात पैदा होता है, एकाकीपन की स्थिति उत्पन्न होती है, वह चिंताओं के चक्रवात का कारण होता है। ऐसी परिस्थिति में हमें चिंता करने की बजाय सामान्य जीवन जीने के लिए स्थायी समाधान के रूप में नए जीवन-साथी की तलाश करनी चाहिए जो एक सार्थक विकल्प का कार्य कर सकता है।

प्राकृतिक आपदाओं के रूप में बाढ़, भूकंप, मृत्यु , सुनामी एवं अन्य दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं से शिकार व्यक्ति भी अवसाद से पीडि़त हो जाते हैं। इस प्रकार की घटनाओं के शिकार या प्रत्यक्षदर्शी व्यक्ति को जिस प्रकार के मानसिक आघात का सामना करना होता है, उसे ही ट्रॉमा कहते हैं, जिसके तहत ऐसे लोग कभी नींद में किसी बुरे सपने देखकर घवराहट में उठ बैठते हैं, चिल्ला उठते हैं तथा कभी-कभी तो वो कुछ बोल ही नहीं पाते हैं। लिहाजा ऐसी परिस्थितियों में अधिक धैर्यवान एवं विवेकपूर्ण बनने की आवश्यकता है। ऐसे संकटमय मनोदशा में विशेषज्ञों तथा डॉक्टरों से सलाह मन को शुकून पहुंचाने में काफी मदद कर सकते हैं।

19

बीती ताहि बिसार दे

क्या आपने कभी किसी नदी पर बने पुल के नीचे बहते पानी को गौर से देखा है? इस पानी के बहाव में भी जीवन को चिंता एवं अंतत: अवसाद से दूर रखने का एक अहम दर्शन छुपा होता है। कहते हैं कि इस पुल के नीचे से जो पानी एक बार बहकर निकल जाता है तो दुबारा वह कभी अपनी जगह लौट कर नहीं आता है। पुल के नीचे से बहनेवाला पानी हर बार नया होता है। आशय यह है कि हमें अपने जीवन में घटी भूत की घटनाओं के दुखद स्मृति को पुल के नीचे बहते पानी की तरह सदा के लिए भूल जाना चाहिए।

वैसी कड़वी घटनाओं की यादें मन को चिंतित कर जाती हैं और यह हमारे लिए तनाव का बहुत बड़ा कारण बन जाता है। जरुरी है कि हमें कभी भी बीते हुए दु:ख भरे लम्हों को भूलवश भी याद नहीं करनी चाहिए। इस प्रकार की चिंता से बचने का एक बहुत अच्छा उपाय यह है कि आप कभी भी निठल्ला नहीं बैठें। अकेले में नहीं रहें। खुद को किसी न किसी कार्य में व्यस्त रखें। यकीं मानिये आप इस तरह की अवांछित परेशानियों से बचे रहेंगे।

कभी-कभी तो ऐसा भी होता है कि जब अपने बच्चे पहली बार घर से बाहर पढऩे या नौकरी करने के लिए घर छोड़कर चले जाते हैं तो माता-पिता भावनात्मक रूप से अलग-थलग एवं खाली हो जाते हैं। ऐसी परिस्थिति में अपनों के जुदा होने के कारण जीवन खाली-खाली लगने लगता है, एक अजीबोगरीब निराशा एवं हताशा उत्पन्न होने लगती है, जिसका समय रहते समाधान ना करने पर गहरे अवसाद से पीडि़त होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। जब आप इस प्रकार की विकट समस्याओं का सामना कर रहें हों तो कोशिश कीजिये कि आप अकेले में कम से कम रहें। पास-पड़ोस या फिर दोस्तों के संपर्क में रहें तथा जिस शौक तथा हॉबी को कभी आपने अपने संतान के पालन-पोषण में मसरूफियत की वजह से अपने युवावस्था के जमाने में या अपने जीवन में कभी समय नहीं दे पाए थे, उसे फिर से विकसित करने एवं पुनर्जीवित करने का प्रयत्न करें। खाली बैठकर दिमाग को गंदे एवं अनावश्यक विचारों एवं चिंताओं का डस्टबिन बनने से रोकना बहुत जरुरी है।

परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालना सीखें

एक पुरानी सूक्ति है कि जैसी बहे बयार पीठ तब वैसी कीजिये। अर्थात हमें अपने को अपनी परिथितियों के अनुरूप ढालने की आवश्यकता है। यदि आप परिस्थितियों को अपने मुताबिक ढालने की कोशिश करेंगे तो संभव है कि आप इसमें असफल हो सकते हैं, जो फिर आपके तनाव का सबब बन सकता है। महान अंग्रेजी साहित्यकर, दार्शनिक एवं नाटककार जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने अपनी पुस्तक ‘मैन एंड सुपरमैन’ में लिखा है कि विवेकशील व्यक्ति संसार के अनुकूल खुद को ढाल लेते हैं जबकि विवेकहीन व्यक्ति संसार को अपने अनुकूल ढालने की असफल कोशिश करता रहता है।

जब संसार को कोई शख्स अपने मन के अनुकूल ढालने की कोशिश करता है तो यह असफल कोशिश कई गंभीर समस्याओं को जन्म देती हैं। कभी तो खुद को अपने ही परिवार से विद्रोह करना पड़ता है तो कभी पूरा समाज आक्रमण की मुद्रा में हमें हराने के लिए तैयार बैठा होता है। इसीलिए यह अति अनिवार्य है कि हम खुद को परिस्थितियों के हिसाब से ढालने की आदत सीखें, परिस्थितियां कभी भी इंसान के इशारे पर नहीं ढलती हैं।

कामयाबियों की सीमा तय करें

अलेक्जेंडर दि ग्रेट के बारे में कहा जाता है कि जब वे विश्व विजय पर निकले थे तो उनके गुरु ने उनसे पूछा, ‘मान लो तुम इस दुनिया को जीत जाते हो तो फिर आगे क्या करोगे? क्योंकि दुनिया तो एक ही है, तो फिर जीतने के लिए दूसरी दुनिया कहां से लाओगे?’ अपने गुरु के इस प्रश्न को सुनकर सिकंदर की आंखें खुल गयीं तथा उन्हें इस दुनिया की भौतिक सुख एवं सुविधाओं से वितृष्णा हो गयी। सच पूछें तो वक्त का तकाजा भी यही है कि हमारे पास जो भी है, उसमें ही जीवन की असीमित खुशियां ढूंढने की कोशिश करें। ऐसी दशा में हम जीवन की कई अवांछित चिंताओं एवं जानलेवा तनावों से महफूज रह पाएंगे।

दु:ख बेकार नहीं जाता

प्राय: ऐसा कहा जाता है कि सुबह होने के पूर्व जो रात का अंधेरा होता है, वह सबसे गहरा एवं घना अंधेरा होता है। ऐसा भी कहा जाता है कि यदि ईश्वर एक दरवाजा बंद करते हैं तो हजार दरवाजे खोल देते हैं। कहा तो यह भी जाता है कि भगवान भूखा जगाते जरुर हैं पर किसी को भूखा सुलाते नहीं हैं।

आशय यह है कि जब आप किसी कठिन परिस्थिति में घिर जाएं तो यह मानकर चलें कि कदाचित यह उस सूर्योदय के पूर्व का वह घना अंधेरा है, जिसके पार की दुनिया में केवल और केवल सुख एवं शुकून की ही रौशनी है, सुरंग के पार का उजाला है, दु:ख एवं तकलीफ से मुक्ति का द्वार है, धैर्य की परीक्षा का अवसान है

जीवन के बारे में संजीदगी से विचार करें तो यह सत्य खुल कर सामने  आ जाता है कि जीवन जीना आसान नहीं होता है। यह एक कठिन कार्य है लेकिन इसका अर्थ कदापि यह नहीं है कि जीवन में आनंद नहीं है, जीवन में खुशियां नहीं है। मानव सभ्यता के आगाज के साथ से ही जीवन और समस्याओं का अभिन्न संबंध रहा है। समस्याओं से विहीन जीवन की कल्पना संभव नहीं है – क्योंकि समस्याएं तभी नहीं रहती है जबकि जीवन नहीं रहता है। इसीलिए जब कभी जीवन समस्याओं में घिर जाए तो इससे परेशान होने की बजाय हमें इनके समाधान ढूंढऩे चाहिए, अपनों से बातें करनी चाहिए। दर्द को खुद तक बटोर कर रखने से इसकी टीस जानलेवा होती है। इसीलिए यह आवश्यक है कि खुशियों की तरह हमें अपने गम को भी बांटना चाहिए, मुसीबतों के बारे में अपनों के बीच खुल कर बातें करनी चाहिए। ऐसा करने से जीवन ठहरता नहीं है – धीरे से ही सही पर चलता रहता है – और यही जीवन है क्योंकि जीवन चलने का ही नाम होता है।

श्रीप्रकाश शर्मा

(लेखक प्राचार्य, जवाहर नवोदय विद्यालय, मामित, मिजोरम, हैं)

Leave a Reply

Your email address will not be published.