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मर्ज बढ़ता गया, ज्यों-ज्यों दवा की

मर्ज बढ़ता गया, ज्यों-ज्यों दवा की

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने ठीक ही कहा है कि ”पाकिस्तान के साथ वार्ताओं का समय समाप्त हो गया है’’। अब जो भी होगा मैदान-ए-जंग में होगा। जहरीले अजगर के आगे दूध का कटोरा नहीं रखा जाता, उसका सर कुचला जाता है। पिछले सात दशकों से भारत को बार-बार काट रहे इस ‘कालिया नाग’ के फुंकारते फन को कुचलने के लिए ‘जनता-जनार्दन’ द्वारा लिए गए चिर-प्रतीक्षित निर्णय का स्वागत है। पूरे विश्व के अमन चैन में नफरत की आग घोल रहा यह कालिया नाग अब योगश्वर कृष्ण के हाथों बच नहीं सकता।

सर्वविदित ही है कि 1947 में देश के विभाजन के साथ ही पैदा हुए मजहबी उन्माद की इस समस्या से निपटने के लिए भारत की सभी सरकारों ने प्राय: सभी हथियार आजमा लिए हैं। अनुच्छेद 370 के तहत ढेरों राजनीतिक/आर्थिक सुविधाएं, विषेश आर्थिक पैकेज, वार्ताओं के पचासों दौर, सैनिक कार्यवाही, आतंकियों की घर वापसी, पत्थरबाजों की आम माफी, पाकिस्तान के साथ अनेकों वार्ताएं और सीजफायर और बार-बार राष्ट्रपति शासन इत्यादि सब कुछ आजमा कर देख लिया। मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की।

दरअसल पाकिस्तान के साथ लगे इस सीमावर्ती प्रांत में जो कुछ भी हो रहा है वह साधारण कानून व्यवस्था के बिगडऩे का मामला नहीं है, ये तो कट्टरपंथी और एकतरफा मजहबी जुनून में से निकल रही एक ऐसी राष्ट्रघातक आग है जिसे वार्ताओं, समझौतों और आर्थिक पैकेज जैसे छोटे-मोटे फायर ब्रिगेड बुझा नहीं सकते। भारत के संविधान, राष्ट्रध्वज, संसद और भूगोल को अमान्य करने वाले भारत विरोधी तत्व कभी भी ऐसे समाधान को सामने नहीं आने देंगे जिससे उनके अलगाववादी उद्देश्य को नुकसान पहुंचे। पाकिस्तान की खुली मदद और कश्मीर में भारतीय संविधान के अंतर्गत सुरक्षा ले रहे अलगाववादियों की सरपरस्ती में कश्मीर के युवकों ने हाथों में संगीनें उठाकर इस्लामी जेहाद के लिए कमर कसी है।

कश्मीर की ‘मुक्कमल आजादी’ के लिए चलाए जा रहे पाकिस्तान प्रेरित खूनी जेहाद का पहला हिस्सा था कश्मीर के हिन्दुओं को निकाल बाहर करना, ये सफल रहा। अब सेना, पुलिस और सरकारी कर्मचारियों पर गुरिल्ला हमला करके दूसरे हिस्से को पूरा किया जा रहा है। सुरक्षाबलों पर हो रही पत्थरबाजी साधारण घटना न होकर बाकायदा खूनी जिहाद की सोची समझी राजनीति है। इस विस्फोटक परिस्थिति के लिए राजनीतिक घुटन और आर्थिक पिछड़ेपन को जिम्मेदार बताने वाले बुद्धिजीवी अपने तथाकथित सेकुलर मुखौटे को उतारकर यथार्थ को निहारने का प्रयास करें तो कश्मीर समस्या का वास्तविक स्वरूप नजर आ जाएगा। कश्मीर में न गरीबी है और न ही राजनीतिक पक्षपात जैसी कोई चीज है। सारा उत्पाद एकतरफा मजहबी जुनून है। वहां तो ‘इस्लाम’ और ‘निजामें-मुस्तफा’ की हुकूमत के लिए खूनी संघर्ष हो रहा है। वास्तव में कश्मीर की राजनीति प्रारम्भ से ही इसी मजहबी उन्माद से ग्रस्त रही है।

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शेख अब्दुल्ला, सादिक अली, बक्शी गुलाम मोहम्मद, गुलाम मोहम्मद शाह, सैयद मुफ्ती, फारुख अब्दुल्ला, गुलाम नबी आजाद, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती (सभी मुख्यमंत्री) जैसे नेताओं ने मजहब पर आधारित जिस राजनीति का समावेश कश्मीर में किया है, उसी का नतीजा है वर्तमान पाकिस्तान समर्थित हिंसक आतंकवाद। इस धार्मिक उदंडता को कश्मीर में सक्रिय अलगाववादी संगठन डेमोक्रेटिक फ्रीडम पार्टी के अध्यक्ष शब्बीर शाह के शब्दों (पोस्टरों में) से समझा जा सकता है..-”इस्लाम की क्रांति का सूर्य उग रहा है, आस्था की संतानों को अब आगे आना चाहिए और भारत से आजादी पाने की कोशिश करनी चाहिए। अल्लाह की इच्छा हमारी मार्गदर्शक है, कुरान हमारा संविधान है, जेहाद हमारी नीति है और शहादत हमारी आकांक्षा है’’।

संभवतया ‘कश्मीर’ देश की एकमात्र ऐसी समस्या है जिसपर अभी तक कोई भी राष्ट्रीय सहमति नहीं बन सकी। इस रास्ते की सबसे बड़ी बाधाएं हैं: वोट बैंक की राजनीति, एकरस राष्ट्र जीवन का अभाव, पाकिस्तान का सैनिक हस्तक्षेप और कट्टरपंथी मजहबी भावना। देश और कश्मीर के दुर्भाग्य से इस प्रदेश में सक्रिय संगठन नेशनल कांफ्रेंस, पीपल्ज डेमोक्रेटिक पाटी, हुर्रियत कांफ्रेंस, तहरीक-ए-हुर्रियत और सभी आतंकी संगठनों ने क्रमश: ऑटोनमी, सैल्फ रूल, ग्रेटर कश्मीर, पाकिस्तान में विलय और मुक्कमल आजादी जैसे समाधान प्रस्तुत किए हैं। ये सभी समाधान देश और प्रदेश के अमनचैन और सुरक्षा पर आधारित न होकर मजहब, जाति और क्षेत्र के धार्मिक और राजनीतिक स्वार्थों पर आधारित हैं। इसी प्रकार कश्मीर की गुत्थी को सुलझाने के लिए राष्ट्रीय स्तर के दल भी किसी एक राष्ट्रीय सहमति के आसपास भी नहीं पहुंच रहे। समयोचित जरूरत इस बात की है कि राष्ट्रीय स्तर के सभी राजनीतिक दल अपने दलगत, जातिगत एवं चुनावी स्वार्थों से ऊपर उठकर एक राष्ट्रीय सहमति बनाएं और केन्द्रीय सरकार द्वारा वर्तमान में उठाए जा रहे कदमों का एक स्वर से समर्थन करें।

कश्मीर में जेहाद के नामपर खून-खराबा कर रहे युवकों को कश्मीरियत, जम्हूरियत, इन्सानियत और राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ाकर उन्हें देश की मुख्यधारा में लाने के लिए देशभक्त और मानवतावादी मुस्लिम विद्वानों को अपनी भूमिका निभानी होगी। यह प्रसन्नता की बात है कि वर्तमान केन्द्र सरकार ने हिम्मत जुटाकर सुलग रही कश्मीर घाटी को पाकिस्तानपरस्त तत्वों की कैद से मुक्त करवाने के लिए जरूरी सैन्य कार्यवाही प्रारम्भ कर दी है। यदि अब भी राष्ट्रीय स्तर के और प्रादेशिक राजनीतिक दलों ने अपनी दलगत राजनीति को छोड़कर इस रणनीति का समर्थन न किया तो देश की सुरक्षा और अखंडता खतरे में पड़ सकती है।

नरेन्द्र सहगल

 

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