‘मेक इन इंडिया’ रक्षा उत्पादन में चुनौतियां

‘मेक इन इंडिया’  रक्षा उत्पादन में चुनौतियां

भारत औपनिवेशिक काल में औद्योगिक क्रांति का हिस्सा होने से वंचित रहा, जिसके प्रभाव आज भी देखे जा सकते हैं। शत्रु पड़ोसियों को देखते हुए भारत जैसे बड़े राष्ट्र को तरक्की करने के लिए मजबूत और अच्छी तरह से सुसज्जित सैन्य शक्ति का होना महत्वपूर्ण है। एक ऐसी सैन्य शक्ति, जो कभी भी किसी भी बुरे इरादे को विफल करने के लिए तैयार हो। भारत ने औपनिवेशिक काल में जो गंवाया, उसे हासिल करने की कोशिश की और कई क्षेत्रों में सफलता भी मिली, लेकिन रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता का कोई बड़ा मौका नहीं मिला, जिसकी कई वजहें हैं।

किसी राष्ट्र की रणनीतिक स्वायत्ता में स्वदेशी रक्षा उत्पादन की भूमिका काफी महत्वपूर्ण होती है, जिससे चौबीसों घंटे रक्षा तैयारियों के जरिए राष्ट्रीय सुरक्षा में तेजी से वृद्धि होती है। रक्षा उद्योग की विशिष्ट और उच्च नियंत्रित प्रकृति की वजहों से ही दुनिया भर में सैन्य आपूर्ति की मांग अधिक है। स्वदेशीकरण बाहरी स्रोतों पर निर्भरता को कम करके किसी राष्ट्र को सुरक्षा में लचीलापन मुहैया कराता है। साथ ही, यह किसी देश को आसपास की राजनीतिक या अन्य दबावों से मुक्त भी करता है।

सरकारी रक्षा कंपनियां, ओएफ, शोध एवं विकास का जीवंत रक्षा औद्योगिक आधार पहले भी था और वह आज भी है। लेकिन इनसे मनचाहे नतीजे नहीं मिलते हैं। क्या भारत ‘मेक इन इंडिया’ के लिए प्रधानमंत्री के आह्वान और बढ़ी हुई एफडीआई तथा संयुक्त/रणनीतिक साझेदारी की नई नीतियों के सहयोग से रक्षा उत्पादन में बदलाव और आत्मनिर्भरता के युग में प्रवेश कर सकता है? क्या भारत खुद को आयात पर निर्भर होने के बजाय वैश्विक निर्यातक के रूप में खुद को बदल सकता है? इन सवालों के जवाब केवल तभी मिल सकते हैं, जब कोई समस्या के सभी पहलुओं की पड़ताल करता है। लेखक इसके लिए भरसक प्रयास करेगा, लेकिन जोर एयरोस्पेस क्षेत्र पर ही रहेगा, क्योंकि वह खुद ‘वायुसेना से’ है। मेरे झुकाव के बावजूद, यह लेख पूरे रक्षा उद्योग की हकीकत बयां करता है। रुचि एवं प्राथमिकताओं के न होने से सिर्फ सेना के तीनों अंग ही प्रभावित नहीं हो रहे, बल्कि अर्ध-सैन्य और पुलिस बलों को भी यह प्रभावित करता है।

भारत में एयरोस्पेस उद्योग

एयरो स्पेस यानी विमान निर्माण उद्योग में उत्पादन की अवधि लंबी होती है और यह तकनीकी रूप से भी जटिल है, जिससे किसी देश के कई सहायक उद्योग भी जुड़े होते हैं। भारत में हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) विमानन उद्योग में अग्रणी है। इसका लगभग 15000 करोड़ रुपये का कारोबार है, जिसमें आरएंडडी का फंड इसके मुनाफे का 10 प्रतिशत होता है। इसके पास 14 प्रकार के उत्पादन लाइसेंस और घरेलू आरएंडडी के जरिए 15 तरह के विमान बनाने का श्रेय इसके नाम है। एचएएल के पूर्व अध्यक्ष डॉ. आरके त्यागी के अनुसार, एचएएल के पास लगभग 34 हजार श्रमिकों का कार्यबल है और यह 2010 से एक ‘नवरत्न’ कंपनी है। इसके पास लगभग 2400 वेंडर और 2000 से अधिक डिजाइनर हैं। उन्होंने 2014 में ‘भारतीय विमान निर्माण उद्योग को बढ़ावा देने’ संबंधी विषय पर एक सेमिनार के दौरान यह बातें कहीं। एचएएल यह भी दावा करता है कि हालिया हल्के लड़ाकू विमान में 60 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री है। इसके उत्पादन के लिए इसने लगभग 20 शैक्षणिक संस्थानों और लगभग 150 उद्योगों के साथ हाथ मिलाया, जिनमें से लगभग 80 निजी क्षेत्र के हैं। हालांकि, इन प्रभावशाली आंकड़ों के बावजूद यह भारतीय वायुसेना के आधुनिकीकरण की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम नहीं है! ऐसे में कोई आश्चर्य नहीं कि वायु सेना और अन्य सेवाओं को मजबूरन अपनी जरूरत की खरीदारी बाहरी देशों से करनी पड़ती है!

एचएएल के पास एशिया में सबसे बड़ी एयरोस्पेस कंपनी होने का तमगा है, लेकिन देश के बाहर शायद ही कोई इसका ग्राहक है। भारतीय वायुसेना और अन्य सेवाएं ही इसकी ‘ग्राहक’ हैं। सशस्त्र बलों का एकजुट होकर आगे बढऩे के बजाय तीनों सेनाओं में लगातार बढऩे वाला विवाद का तूफान शायद ही थमने का नाम लेता है। भारतीय वायुसेना हल्के लड़ाकू विमान से पूरी तरह से संतुष्ट नहीं है। उसके पास इसे खारिज करने के सिवा कोई विकल्प नहीं था। भारतीय नौसेना भी समुद्र में गश्ती करने वाले वाले उच्च श्रेणी के हल्के हेलीकॉप्टरों को लेकर संतुष्ट नहीं है। भारतीय थलसेना भी एचएएल की ओर से होने वाली देरी या घटिया गुणवत्ता के कारण विदेशों से लाइट यूटिलिटी हेलीकॉप्टरों (एलयूएच) को खरीदना चाहती है। अपने कारोबार और आकार के बावजूद एचएएल के पास दिखाने के लिए बहुत कुछ नहीं है। हालांकि, एचएएल के पूर्व अध्यक्ष के पास इसे पेश करने के लिए अलग-अलग आंकड़े हो सकते हैं।

आज दुनिया की कोई भी एयरोस्पेस कंपनी अपनी प्रतिष्ठा के मुताबिक विमान निर्माण के सभी पहलुओं को कवर करने का प्रयास नहीं करती, जैसा कि एचएएल करती है। यह डिजाइन, विकास, निर्माण,  मरम्मत/पूरी जांच और विमानों, हेलीकाप्टरों, इंजन, सहायक उपकरण, हवाई जहाज के प्रक्षेपण, एयरोस्पेस लॉन्च वाहनों के ढांचे, उपग्रहों और औद्योगिक/समुद्री गैस टरबाइन के लिए एकीकृत प्रणाली को अपग्रेड करने के काम में लगी है। एयरोस्पेस उद्योग में तकनीक इतनी व्यापक हैं कि कोई चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो उसके लिए यह सब लगभग असंभव है। यह ऊर्जावान, निपुण और लागत प्रभावी होने के लिए महत्वपूर्ण है। फिर भी एचएएल सिर्फ इसके उलट ही करने की कोशिश करता है! ऐसी अफसोसनाक स्थिति को क्यों होने दी गई?

आजादी के बाद भारत का विकास सीएसआईआर, डीआरडीओ और इसरो जैसे संगठनों द्वारा विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में प्रमुख योगदानों से आगे बढ़ा था। उनके योगदानों के बावजूद सशस्त्र बलों को अपनी जरूरत के नए सैन्य साजो-सामान को पूरा करने की खातिर आयात पर निर्भर रहना पड़ा। भारत आज आजादी के सातवें दशक में है, फिर भी हालात में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है। भारतीय सेना के पास सियाचिन में अपने सैनिकों के लिए बुनियादी जूते और दस्ताने का अभाव है। यहां जंग में मुकाबला करने वाले जंगी राइफल जैसे हथियारों का जिक्र करना ही बेमानी है। वायुसेना राफेल की खरीद के साथ अपनी ताकत और रणनीतिक क्षमता बढ़ाना चाहती है। ये भयावह स्थितियां फंड की कमी या उत्पादन की क्षमता नहीं होने के कारण नहीं हैं, बल्कि गलत प्राथमिकताओं की वजह से देरी और पुरानी तकनीकों के कारण हैं।

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एयरोस्पेस उद्योग के सामने चुनौतियां

रक्षा उत्पादन और इससे अधिक एयरोस्पेस उद्योग में उपयोग की जाने वाली प्रौद्योगिकी बहुत अधिक जटिल और विकसित करने के लिहाज से महंगी होती हैं। आम तौर पर यह प्राथमिकताओं में सबसे आखिर में होता है और यह एक ऐसा तथ्य है, जो कई लोगों को समझ में नहीं आता है। खासतौर पर उन्हें, जिन्हें फाइलों पर अंतिम फैसला लेना होता है। प्रौद्योगिकी शब्द का उपयोग अक्सर सतही तौर से किया जाता है। बिना यह समझे कि इसमें कई हार्ड और सॉफ्ट तत्व शामिल हैं, जिन्हें एक समावेशी तस्वीर बनाने के लिए इक_ा काम करना होता है। हार्ड तत्वों में उपयोग की जाने वाली सामग्री, डिजाइन दस्तावेज़, मैन्यूफैक्टरिंग और असेंबली इन्फ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होती है। इसी तरह के अन्य चीजें भी शामिल हैं। हालांकि, ये अपने आप में ‘प्रौद्योगिकी’ को पूरा नहीं करते हैं। सॉफ्ट तत्व भी कई हैं। इनमें मानवीय कौशल, जानकारियों को समझने और प्रयोग की क्षमता, नई प्रक्रियाओं, टीम वर्क,  क्षमता और नए उपकरणों को संभालने का कौशल, नेतृत्व, नई प्रबंधन प्रक्रियाओं को लागू करना शामिल है। जब भी कोई प्रौद्योगिकी विस्तार या प्रौद्योगिकी समायोजन की बात करता है, तो प्रौद्योगिकी इन्हीं दोनों तत्वों के पैकेज का हिस्सा होता है।

तकनीकी रूप से विकसित न होना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी उद्योगों ने एयरोस्पेस क्षेत्र में भारतीय प्रयासों को बहुत प्रभावित किया है। अतीत में एयरोस्पेस उद्योग ने जो भी थोड़ा डिजाइन और निर्माण किया है, वह सिर्फ फिएट और एंबेसडर की याद दिलाता है, जिसका लंबे समय तक देश में मोटर वाहन क्षेत्र पर एकाधिकार था। पिछले 20 वर्षों में भारतीय उद्योग का तेजी से आधुनिकीकरण हुआ है, लेकिन यह एयरोस्पेस क्षेत्र में नहीं हुआ। इसके लिए अपेक्षित तेजी और उत्साह की कमी है। इसलिए घरेलू स्तर पर आधुनिकीकरण की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक बल की जरूरत है। जिस तरह डीपीएसयू-ब्यूरोक्रेटिक गठजोड़ (लोग इसका प्रयोग मिलीभगत या साठगांठ के लिए करते हैं) वर्षों से फला-फूला, लगातार मांग बढ़ती गई और नतीजतन विदेशी आपूर्ति पर निर्भरता भी जारी रही है। स्वदेशी रक्षा उपकरण उत्पादन केवल 30 प्रतिशत मांग को ही पूरा करता है!

एक तरफ वर्षों से स्वदेशीकरण की मांग मजबूत होती जा रही है, वहीं एयरोस्पेस इंडस्ट्री नौकरशाही के कारण ‘लाइसेंस उत्पादन’ के आरामदायक क्षेत्र में फंसी है, जिसके अनुबंधों में लगभग हमेशा ‘तकनीक का आदान-प्रदान’ की एक शर्त शामिल होती है। नौकरशाही को इस बात का शायद ही एहसास है कि ‘तकनीक का आदान-प्रदान’ के तहत कोई देश केवल आधुनिक उत्पादन तकनीक देता है। लेकिन वह डिजाइन और विकास में सहायता के लिए नई तकनीक प्राप्त करने में मदद नहीं करता है। आज के समय में बौद्धिक संपदा अधिकार मूल निर्माता के पास ही रहता है। अब जाकर ‘मेक इन इंडिया’ के आह्वान ने सभी संबंधित नौकरशाहों,  डीपीएसयू और निजी क्षेत्र को झकझोरा है। उन्हें आरामदायक क्षेत्र से बाहर निकाला है और अत्याधुनिक तकनीक वाली परियोजनाएं संयुक्त उद्यम के जरिए तलाशी जा रही हैं।

अपर्याप्त निजीकरण एयरोस्पेस उद्योग की मौजूदा निष्क्रियता का दूसरा महत्वपूर्ण कारण है। आयुध कारखानों और अन्य डीपीएसयू समूहों के दिग्गज मध्यम और छोटे उद्यमियों को प्रोत्साहित करने का श्रेय ले सकते है, लेकिन वे भी केवल टियर-3 और टियर-4 आपूर्तिकर्ताओं में ही शामिल हैं। शायद ही कोई है या वह भी नहीं है, जो टियर-1 या टियर-2 आपूर्तिकर्ता हो। सरकारें पहले की घोषित नीतिगत बदलावों को लागू करने में संकोच करती रही हैं। 1951 के औद्योगिक (विकास और विनियमन) कानून को बनाते समय 1948 की पहली औद्योगिक नीति के औचित्य को वैधानिक कानून का महत्व देना था और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से इसके महत्व को देखते हुए रक्षा उद्योग को सरकारी नियंत्रण में रखने का निर्णय लिया गया था, क्योंकि देश को इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने की आवश्यकता है। इसी तरह भारत सरकार ने डीपीएसयू और डीआरडीओ के विशाल साम्राज्य की स्थापना में भारी निवेश किया। इनकी क्षमता काफी अधिक है और कुछ मामलों में यहां तक कि दुनिया में सर्वश्रेष्ठ भी हैं, लेकिन उत्पादन विश्व मानकों के आसपास भी नहीं फटकता है।

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सरकारी नीतियों पर ध्यान

पड़ोसी देश से अधिक दोस्ताना संबंध न होने और देश के भीतर उग्रवाद के खतरे को देखते हुए प्रधानमंत्री इस बात को लेकर स्पष्ट हैं कि भारत को अपनी सुरक्षा तैयारियों को विकसित करने की आवश्यकता है। ‘मेक इन इंडिया’ योजना उनकी सोच के अनुरूप है और यह उनके विकास समर्थक नेता होने की पुष्टि करती है। इस बात पर सहमति है कि अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए विनिर्माण क्षेत्र को गति देने की आवश्यकता है। अध्ययनों से संकेत मिला है कि आयात में 20 प्रतिशत की कमी से ही भारत में अतिरिक्त 100,000 से अधिक उच्च कौशल वाली नौकरियां पैदा हो सकती हैं। अगर घरेलू खरीद को मौजूदा 40 प्रतिशत से बढ़ाकर 70 प्रतिशत किया जाता है, तो आने वाले वर्षों में रक्षा उद्योग का उत्पादन दोगुना हो जाएगा। एक मजबूत औद्योगिक बुनियादी ढांचा निवेश को बढ़ा सकता है, विनिर्माण को बढ़ा सकता है, सूक्ष्म-लघु और मध्यम उद्योग की मदद कर सकता है, प्रौद्योगिकी के स्तर में सुधार कर सकता है और इस तरह समग्र अर्थव्यवस्था में योगदान कर सकता है। इस क्षेत्र में सफलता के लिए कुछ जरूरी कदम उठाए जाने की जरूरत है। प्रधानमंत्री या रक्षा मंत्री के महज कोरे बयानों से इस उद्योग की कायापलट नहीं की जा सकती है।

10 नवंबर 2015 को एक घोषणा के जरिए देश में उद्योगों के 15 क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के लिए कायदे-कानून की एक नई रूपरेखा तय की गई, जिसमें रक्षा विनिर्माण भी शामिल था। इसके अलाव देश में व्यवस्था को सुधारने के लिए ईज ऑफ डूइंग को बढ़ावा देने का भी प्रयास किया गया है। इन हालिया उपायों की घोषणा करने से पहले, सरकार ने पहले ही 2014 में कुछ कदम उठाए थे। सबसे पहले, जून 2014 में औद्योगिक लाइसेंस की आवश्यकता वाली वस्तुओं की एक सूची प्रकाशित की गई थी। दूसरा, उसी महीने में लाइसेंस प्राप्त रक्षा उद्योगों के लिए एक सुरक्षा मैनुअल भी अधिसूचित किया गया था। तीसरा कदम दो महीने बाद उठाया गया था, तब एफडीआई के लिए सीमा को 26 प्रतिशत से बढ़ाकर 49 प्रतिशत कर दिया गया था। इसके साथ ही यह भी कहा गया था कि अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी उपलब्ध होने की शर्त पर ही उच्च सीमा तक एफडीआई की अनुमति दी जा सकती है। पिछली नीति में 49 प्रतिशत तक एफडीआई को शामिल करने के लिए संशोधन किया गया था, जिसमें कोई शर्त नहीं थी। हालांकि, इससे अधिक निवेश के लिए विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड की मंजूरी जरूरी है।

अधिक पैसे दांव पर होने की वजह से एक निवेशक काफी जोखिम उठाता है। इसलिए यह आम बात है कि निवेशक के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण है कि उसका नियंत्रण कितना हो सकता है। सौ फीसदी मालिकाना हक के कारण पूर्ण और स्वैच्छिक नियंत्रण से उद्यम के लिए सही माने जाने वाले फैसले लेने की क्षमता होगी। अगर 51 प्रतिशत निवेश है, तो वह दैनिक कार्यों और उद्यम की निगरानी के लिए कुछ नियंत्रण की अनुमति देगा। वहीं, संयुक्त उद्यम (जेवी) में भागीदार विशेष निर्देशों के पारित होने से रोक सकता है। यही कारण है कि मुनाफे की राशि हासिल करने के अलावा एक निवेशक के लिए 26 या 49 प्रतिशत एफडीआई के बीच का अंतर बहुत अधिक मायने नहीं रखता है।

अधिग्रहण प्रक्रिया को कारगर बनाने के लिए 2002 में रक्षा खरीद प्रक्रिया तय की गई थी। इसके बाद पिछले 13 वर्षों के दौरान इसे सात प्रमुख समीक्षाओं से गुजरना पड़ा! इससे पहले कि सभी हितधारक संशोधन समझ पाते, उसकी फिर से बदल दिया जाता था। इस प्रकार पहले से ही लंबी और थका देने वाली प्रक्रिया में देरी होती चली गई। अब एक बार फिर से इसका मूल्यांकन किया जा रहा है। श्री धीरेंद्र सिंह की अगुआई वाली एक विशेषज्ञ समिति ने सिफारिशें कीं, जिन्हें चार उप-प्रमुखों के तहत वर्गीकृत किया जा सकता है-मेक इन इंडिया मिशन के लिए वैचारिक सीढ़ी, डीपीपी 2013 में संशोधन, निजी क्षेत्र का एकीकरण और अंत में कुछ पूरक मुद्दे जो डीपीपी के दायरे से बाहर हैं।

हालांकि, इन सिफारिशों को सार्वजनिक करने का श्रेय रक्षा मंत्रालय को जाता है। उसने इन सभी सिफारिशों को स्वीकार नहीं किया, ताकि अधिग्रहण प्रक्रिया पर अपनी पकड़ खो न बैठे। जैसा कि देखा जा सकता है कि अब सीडीएस को नियुक्त किया गया है, फिर भी पूंजी अधिग्रहण के मामले में अंतिम मत रक्षा सचिव का ही होगा।

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देरी का असर

यह जरूरी नहीं कि भविष्य के टकराव बराबरी वाला हो। इसके विपरीत टकराव विषम होगा या यहां तक कि असंयमित भी होगा। हालांकि, एक संपूर्ण संघर्ष की संभावना बनी रहेगी। विरोधी या तो कोई देश या नॉन स्टेट एक्टर हो सकते हैं, लेकिन दोनों में एक सामान्य बात यह होगी कि वे उच्च तकनीक से लैसे होंगे। अन्य सेवाओं की ही तरह वायुसेना में भी विकास की काफी संभावनाएं हैं। हालांकि, अधिग्रहण प्रक्रिया में बाधा और अनिर्णय की स्थिति न केवल भारतीय वायुसेना, बल्कि अन्य सेवाओं के लिए भी महंगा साबित हो रहा है। भारतीय वायुसेना की परिचालन स्क्वाड्रन क्षमता लगातार कम हो रही है। सेना टैंक, बख्तरबंद वाहनों, हेलीकॉप्टर, जंगी राइफल और यहां तक कि छोटी, लेकिन महत्वपूर्ण वस्तुओं जैसे बुलेटप्रूफ जैकेट, दस्ताने और बैलिस्टिक हेलमेट का रोना रो रही है। उधर, नौसेना के पास समुद्री सीमाओं की रक्षा के लिए पनडुब्बियों, हेलीकाप्टरों और आयुध की कमी है।

भारत सरकार की समिति खुद सैन्य खरीद की सिफारिश करती है और अपेक्षित फंड उपलब्ध कराती है। फिर भी भारत सरकार की ओर से ही देरी और अनिर्णय की स्थिति एक अनूठी परिघटना बन गई है। भले ही इस देरी और अनिर्णय से राष्ट्रीय सुरक्षा दांव पर ही क्यों न लगा हो। एक फैसले को यदि अनिर्णय की एक नई परत रोकती है, तो उससे सारी प्रक्रिया ही ठप हो जाएगी! एक सरकार को अपने सैनिकों के लिए बुलेट-प्रूफ जैकेट खरीदने में कितना समय लगता है। एक ऐसा आइटम जो आसानी से उपलब्ध है। कुछ हफ्ते शायद, लेकिन ऐसा लगता है कि भारत के मामले में एक दशक भी कम है! इसी तरह, पहली बार जब वायुसेना ने मीडियम मल्टी रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट राफेल की मांग की, तो इसकी खरीद का मामला लगभग 10 वर्षों तक फाइलों में बंद रहा। राफेल आखिरकार इस साल के मध्य तक भारतीय आसमान में गोता लगाएगा। यही हाल नौसेना और उसकी स्कॉर्पियन पनडुब्बियों का है। यह ऐसे स्तर पर पहुंच गया है कि सेना में कुछ रेजिमेंट अधिकारियों ने बुलेटप्रूफ जैकेट और हेलमेट जैसी वस्तुओं की खरीद कल्याण कोष के जरिए करना शुरू कर दिया है।

क्या भारत यह बदल सकता है?

क्या भारतीय सशस्त्र बल अपने आधुनिकीकरण और अपनी क्षमताओं को बढ़ाने के लिए चांद-तारों की मांग कर रहे हैं या क्या उनकी मांगें जायज हैं? यदि यह सवाल किसी पेशेवर या गैर-पेशेवर से भी पूछा जाता है, तो इसका जवाब सशस्त्र बलों के पक्ष में ही होगा। सभी सेवाएं विदेशी साजो-सामान पर निर्भरता को कम करने के लिए स्वदेशी अपनाना चाहेंगी, क्योंकि विदेशी निर्यातक ऐन वक्त पर अपनी आपूर्ति रोक सकते हैं या उसमें देरी कर सकतें है। लेकिन, फिर भी स्वदेशी की दिशा में ठोस काम नहीं हो रहा है।

हाल के दिनों में घोषित नई नीतियां भारत की आत्मनिर्भरता के लिए आवश्यक जरूरतों को पूरा करने वाली हैं। नई उत्पादन नीति में स्वदेशीकरण और प्रौद्योगिकी को अपग्रेड करने की बात कही गई है। बहरहाल, तो  क्या आजादी के बाद से कभी भी इस पर ध्यान केंद्रित नहीं किया गया? अफसोस की बात है कि पहले की नीतियां भी अक्षरश: ऐसी नीतियां थीं। रक्षा उत्पादन में सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) की सिफारिश कई समितियों द्वारा की गई हैं, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।

जनता के पैसे से खर्च होने वाले प्रत्येक रुपये के लिए जवाबदेही तय करने का तरीका संसद में शोर मचाना ही नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा की जरूरतों को समग्रता में पूरा किया जाए। सभी स्वदेशी परियोजनाओं में, चाहे वे विनिर्माण क्षेत्र में हों या आरएंडडी क्षेत्र में, हर महीने समय-समय पर लागत और मांग में देरी को लेकर जवाबदेही तय होनी चाहिए। एक स्पष्ट वास्तविक योजना होनी चाहिए, जैसे कि किस संगठन को क्या करना है, मंजूरी की समयसीमा और विस्तृत परियोजना रिपोर्ट। निजी क्षेत्र को सार्वजनिक क्षेत्र और उपयोगकर्ताओं के साथ तालमेल के माध्यम से शामिल करने की आवश्यकता है। डीपीएसयू/डीआरडीओ को इसे साझेदारों के रूप में देखना चाहिए न कि प्रतिस्पर्धी के तौर पर। करों को हटाकर डीपीएसयू और ओएफ के पक्ष में जाने वाली सुरक्षात्मक नीतियों को संशोधित करने की आवश्यकता है, जो मेड इन इंडिया होने पर 41 प्रतिशत के लिहाज से अधिक हैं!

भारत को रक्षा उत्पादन में विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए, निवेशकों को सुरक्षित माहौल देने के लिए एक आकर्षक व्यवसायिक माहौल देना चाहिए। इसके लिए बाजार की गतिशीलता के अनुसार संयुक्त उद्यम करने की आजादी देने वाली नीतियों को दुरुस्त करने की आवश्यकता है। निवेशक अपनी निधियों के उपयोग पर पर्याप्त नियंत्रण रखना चाहता है। वह उत्पादन क्षमता बढ़ाने/घटाने के लिए कदम उठाने और अर्थव्यवस्थाओं के आकार के हिसाब से बाजारों तक पहुंचना चाहता है। इसके लिए भारत को अपनी रक्षा निर्यात नीति पर ध्यान देने की जरूरत है।

पिछले कुछ वर्षों में भारत का रक्षा निर्यात बहुत कम रहा है। 2010-2012 के दौरान रक्षा निर्यात सिर्फ 18.3 करोड़ डॉलर का था, जिसे पूर्व रक्षा मंत्री एके एंटनी ने खुद ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ कहा था। रक्षा उत्पादों के निर्यात के लिए एक नई नीति अब लागू हो गई है, जो एक प्रमुख बदलाव है। न केवल दूसरे देशों को सैन्य उपकरणों की बिक्री को बढ़ावा दिया जाना है, बल्कि भारत द्वारा भारतीय हथियारों की खरीद के लिए एक संरचना भी प्रस्तावित की गई है, जिसके लिए वित्तीय सहायता की आवश्यकता हो सकती है। वाणिज्यिक और सैन्य दोनों स्तर पर राजनयिक लाभ के लिए नई रणनीति को लागू करते हुए दस्तावेज एक राष्ट्रीय रक्षा निर्यात सुविधा निकाय के साथ एक नई रक्षा निर्यात संचालन समिति  की स्थापना का जिक्र करता है। हालांकि, यह देखने वाला होगा कि क्या यह नीति आर्थिक, सैन्य, और कूटनीतिक लाभ के लिए ईमानदारी से लागू की जाती है, क्योंकि संदेह की नजरों से हर सौदे पर सवाल उठाने की पुरानी मानसिकता जारी रहेगी।

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निष्कर्ष

दुनिया भर के देशों में एक व्यवस्था है, जो प्राथमिकताओं और प्रक्रियाओं का सम्मान करती है और यही जल्द फैसले लेने की जवाबदेही तय करती है। खासकर राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मामलों में। भारत ने 2015 में पेरिस में 13/11 के हमलों के बाद तेजी से फैसले लेने का एक उदाहरण देखा। क्या यह हममें यह क्षमता है या क्या भारत सबसे बेहतर यही कर सकता है कि वह नई नीतियों को बना सकता है, कुछ पुरानी चीजों को संशोधित कर सकता है और एक ऐसी व्यवस्था के साथ रह सकता है, जो फैसलों के प्रति आंखें मूंदे रहता है, जिससे सशस्त्र बलों की तैयारों की चिंताएं बढ़ती हैं?

कोई यह उम्मीद ही कर सकता है कि अब सबकुछ ठीक होगा। जो लोग सत्ता के गलियारों में रहते हैं, उन्हें विकास और आधुनिकीकरण की योजनाओं में बाधा नहीं बननी चाहिए, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा संकट में पड़ता हो। प्रक्रियाएं शुरू कर दी गई हैं और अधिक पाइपलाइन में हैं। लेकिन दवा को उचित खुराक और सही तरीके से दिया जाना चाहिए।

एफडीआई में वृद्धि, विनिर्माण और निर्यात में नई नीतियां, एक नया डीपीपी दस्तावेज, स्वदेशी रक्षा उत्पादन को प्रोत्साहित करना, सही दिशा में पहल हैं। अगर मेक इन इंडिया को महज एक नारा नहीं बनाना है, तो एक अनुकूल वातावरण का निर्माण, सोच में बदलाव, विभिन्न सरकारी संगठनों में सुस्ती को दूर करना और कुछ अन्य प्रक्रियाएं हैं, जिन्हें तेज करने की आवश्यकता है।

सरकार को जल्द जरूरत की भावना दिखाने की आवश्यकता है, क्योंकि राष्ट्र की सुरक्षा दांव पर है!

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  एयर मार्शल धीरज कुकरेजा

 

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