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”मोदी सरकार अधिक सक्रिय और अधिक निर्णायक है’’

”मोदी सरकार अधिक सक्रिय और अधिक निर्णायक है’’

परमाणु हथियारों के प्रयोग करने के संबन्ध में पाकिस्तान में काफी अस्पष्टता है। जब प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा कि हम सबसे पहले न्यूक्लियर हमला नहीं करेंगे, उसके तुरंत बाद ही पाकिस्तान आर्मी का बयान आया की उनकी ऐसी कोई नीति नहीं है। इसलिए, जब हमारे पास पहले से ही ‘नो फस्र्ट यूज’ की पॉलिसी है, तो हमे इसमें कुछ लचीलापन लाना चाहिये ताकि इसका इस्तेमाल स्थिति के अनुसार किया जा सके,’’ यह कहना है भारत के पूर्व थलसेना अध्यक्ष जनरल दीपक कपूर का रवि मिश्रा के साथ खास हुई बातचीत के दौरान। प्रस्तुत है मुख्य अंश:

 

चीन और पाकिस्तान बार-बार भारत के लिए समस्या पैदा करने का प्रयास करते रहे हैं। क्या आपको लगता है कि हम इन दोनों देशों का एक साथ सामना करने के लिए तैयार हैं?

यदि दोनों एक साथ आते हंै तो यह हमारे लिए एक चुनौती अवश्य होगी। और ऐसी चुनौतियों का सामना करने के लिए हमें अपना सबसे अच्छा प्रदर्शन करना होगा। जहां हम एक देश का सामना कर सकते हैं, वहीं दोनों देशों को एक साथ जबाब देने के लिए हमें थोड़े अधिक प्रयास की आवश्यकता होगी।

बीएसएफ और आईटीबीपी जैसे अर्ध-सैनिक बल इंडियन आर्मी के अंतर्गत नहीं आती है, बल्कि ये गृह मंत्रालय के अंतर्गत आती है, जबकि इन सुरक्षा बलों के ऊपर पाकिस्तान और चीन जैसे अंतर्राष्ट्रीय सीमा की रक्षा करने की जिम्मेदारी होती है। आपको लगता है कि इसमें कुछ बदलाव करने की आवश्यकता है?

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जब भी विवादित सीमाओं पर आर्मी की आवश्यकता पड़े, तब वहां पर केवल और केवल आर्मी का ही कमांड और कंट्रोल होना चाहिये। गृह मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय एक साथ एक ही क्षेत्र पर अपने अधिकार का प्रयोग नहीं कर सकते। सेना प्रमुख रहते हुए मैंने इस मुद्दे को उठाया था। और मेरे बाद भी जो-जो सेना प्रमुख आये है, वे भी इस बात को उठाते रहे हैं। यदि लेह-लद्दाख  और अरूणाचल जैसे विवादित क्षेत्रों में आईटीबीपी तैनात है, तो वे आर्मी की कंट्रोल में होनी चाहिये। क्योंकि यहां केवल आर्मी ही है, जो घुसपैठ की घटना को रोकेगी तथा अन्य ऑपरेशन करेगी।

हाल ही में देश के सैन्य बल ने पाकिस्तान में घुसकर सर्जिकल एवं एयर स्ट्राईक किया। लेकिन ऐसा हमें पिछली सरकार के कार्यकाल में देखने को नहीं मिला। क्या हमारा सैन्य बल ऐसा करने में सक्षम नहीं था?

ऐसा कहना गलत होगा कि हम इस प्रकार की स्ट्राईक करने में सक्षम नहीं थे। सच्चाई तो यह है कि यह पिछली सरकारें थी जो इस प्रकार के ऑपरेशन करने के लिए तैयार नहीं थी। अत: अभी जो भी स्ट्राईक हुए है, उसका पूरा श्रेय वर्तामान सरकार को जाता है। सेना में स्ट्राईक करने की क्षमता हमेशा रही है। लेकिन इसके लिए आपमें राजनीतिक निर्णय लेने की क्षमता होनी चाहिए। जो पहले की सरकार में नहीं थी।

तो आप यह कह रहे है कि मोदी सरकार निर्णय लेने में सक्षम है?

यह सरकार अधिक सक्रिय और अधिक निर्णायक है।

अभी हाल में ही पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने सामूहिक रूप से यह स्वीकारा कि पाकिस्तान में 35,000 से अधिक आतंकवादी सक्रिय है। एक पड़ोसी देश होने के नाते क्या यह भारत के लिए एक चुनौती नहीं है?

यह हमेशा से एक चुनौती रहा है, इसमें कोई नई बात नहीं है। हमें यह काफी समय पूर्व से पता है कि पाकिस्तान में आतंकी है। हां यह अवश्य है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने इसे स्वीकार किया है। इससे पहले पाकिस्तान की सरकार और आर्मी ने इसे कभी भी स्वीकार नहीं किया है। मुझे तो आश्चर्य हो रहा है कि उन्होंने स्वीकार किया। 1989 से लेकर 2010 तक के हालात तो अत्यंत नाजुक थे। लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी ने इसको माना। हिजबुल-मुजाहिदीन, अल-कायदा, लश्कर-ए-तैयबा और दूसरे आतंकी संगठन हमेशा से वहां सक्रिय रहे हैं।

तो अब पूरे विश्व को पता है कि पाकिस्तान ही आतंकियों को पालता पोषता है।  

हा, बिल्कुल। लेकिन पाकिस्तान इससे किस प्रकार से उभरता है, यह अभी देखना बाकी है। क्योंकि पाकिस्तान के पास इस प्रकार की स्थिति से छुटकारा पाने के कई पैतरे हैं। उदाहरण के लिए अमेरिका भी चाहता है कि अफगानिस्तान से उसकी सेना को बाहर निकालने में पाकिस्तान सहायता करें। और इसके लिए उसे पाकिस्तान को कुछ न कुछ देना पड़ेगा। अत: पाकिस्तान पर आतंकी हॉटस्पॉट होने का दबाव कम हो जाता है। दूसरी तरफ पाकिस्तान चीन का सहयोगी भी है, जो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का सदस्य है। यहां तक कि कुछ पश्चिम एशिया की इस्लामिक देश अपने राष्ट्रहित के कारण पाकि स्तान का समर्थन करती है। यदि कल सऊदी अरब को ईरान के उपर हमला करना हो तो वह कौन करेगा। यहां यह याद रखना होगा कि सऊदी की सैन्य बल का कमांडर-इन-चीफ राहील शरीफ है, जो पाकिस्तान के पूर्व आर्मी चीफ रह चुके हैं। इसलिए पाकिस्तान भी ईरान के खिलाफ लडऩे के लिए इन देशों से कुछ न कुछ अवश्य मांगेगा। इसलिए कोई भी देश सर्वप्रथम अपने राष्ट्रहित के बारे में सोचता है। हां, यह अवश्य है कि पाकिस्तान आतंकवाद के लिए पूरे विश्व भर में प्रसिद्ध हो चुका है। लेकिन यदि सऊदी और ईरान एक-दूसरे के आमने-सामने आते हैं तो पाकिस्तान की इसमें अवश्य ही एक बड़ी भूमिका होगी।

क्या अमेरिकी सैन्य बलों के निकलने के बाद भारत को अफगानिस्तान में जाना चाहिये?

नहीं, ऐसा नहीं होना चाहिये। आप इतिहास उठाकर देख लें। आखिर कितने देश अफगानिस्तान में घुसे हैं?  रूस घुसा और असफल रहा। अमेरिका अब निकलने का प्रयास कर रहा है। अत: अमेरिका घुसा और असफल रहा। और ये दोनों सुपर पावर है। लेकिन प्रश्न यह है कि हम अफगानिस्तान में क्यों जाए? और क्या पाने के  लिए?

भारत को पाकिस्तान से पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर पर तथा चीन से चीन-अधिकृत कश्मीर पर किस प्रकार से रवैया अपनाना चाहिये?

वर्तमान में भारत जो कुछ भी कर रहा है, वह सबसे सही नीति है। अनुच्छेद 370 को हटाना और अवैध रूप से जम्मू-कश्मीर में आ रहे फंड को रोकना सरकार द्वारा उठाया गया सबसे अच्छा कदम है, जिससे न केवल पाकिस्तान की ओर से होने वाले घुसपैठ की घटनाओं में कमी आयेगी, बल्कि यह पूरी तरह से खत्म भी हो जायेगी।

हाल ही में भारत ने रूस के साथ एस-400 मिसाईल डील पर हस्ताक्षर किये और अमेरिका इस पर आपत्ति जता रहा है। दूसरी ओर अमेरिका भारत और पाकिस्तान दोनों के साथ अलग-अलग पैतरें चल रहा है। इसलिए, क्या रूस और अमेरिका दोनों के साथ संबंधों को बराबर बनाये रखना भारत के लिए एक चुनौति नहीं है?

सरकार दोनों देशों के बीच समान रूप से संबंध बनाये रखने का प्रयास कर रही है। यह अमेरिका के पैतरों में पूर्ण रूप से नहीं आ रही है। इसलिए सरकार जो कर रही है, वह अच्छा कर रही है। अमेरिका चीन से सामना करने के लिए किसी एक देश की ओर देख रहा है। वे अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के चतुर्भुज गठबंधन के बारे में बात कर रहे हैं। सभी देश अपने-अपने देशहित के बारे में सोच रहे हैं और अमेरिका भी उनमें से एक है। अमेरिका चीन के सामने खुलकर नहीं आना चाहता। लेकिन यह चाहता है कि कोई दूसरा सामने आये। इसलिए भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का अनुशरण कर रहा है। ठीक उसी प्रकार भारत भी रूस के साथ अपना संबंध बनाए हुए है। अभी हाल में भी रूस ने हमारे प्रधानमंत्री को इस्टर्न इकोनामिक फोरम के लिए मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया था। इसलिए सभी देश स्वतंत्र विदेश नीति का अनुशरण कर रहे हैं।

वर्तमान सरकार के कार्यकाल में सैन्य आधुनिकीकरण के बारे में आप क्या कहना चाहंगे?

सैन्य आधुनिकीकरण को अभी काफी लम्बा सफर तय करना है। पिछले 10 से 15 वर्षों से सेना के बजट में कटौती हो रही है।  हर साल आप पाएंगे कि सेना जीडीपी का कम और कम प्रतिशत प्राप्त कर रही है।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हाल ही में एक बयान दिया कि भारत का नो-फस्र्ट- यूज की न्यूक्लियर पॉलिसी परिस्थिती पर निर्भर करेगी। इस पर आपकी क्या राय है?

परमाणु हथियारों के प्रयोग करने के संबन्ध में पाकिस्तान में काफी अस्पष्टता है। जब प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा कि हम सबसे पहले न्यूक्लियर हमला नहीं करेंगे, उसके तुरंत बाद ही पाकिस्तान आर्मी का बयान आया की उनकी ऐसी कोई नीति नहीं है। इसलिए, जब हमारे पास पहले से ही ‘नो फस्र्ट यूज’ की पॉलिसी है, तो हमे इसमें कुछ लचीलापन लाना चाहिये ताकि इसका इस्तेमाल स्थिति के अनुसार किया जा सके।

 

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