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योगगुरु भारत भूषणजी : योग से शांति का सिंहनाद

योगगुरु भारत भूषणजी : योग से शांति का सिंहनाद

भारत धर्मप्रधान देश है। यहां समय-समय पर अनेक महापुरूषों ने धर्मक्रांति का स्वर बुलंद किया। भगवान महावीर और बुद्ध ने धर्म के क्षेत्र में जाति के आधार पर व्यक्ति को उच्च और नीच मानने की प्रथा पर कड़ा प्रहार करके मनुष्य जाति की एकता का स्वर बुलंद किया। राजा राममोहनराय ने सन् 1924 में ब्रह्म समाज की स्थापना के माध्यम से धर्म के क्षेत्र में बद्धमूल रूढ़ धारणाओं, बालविवाह, जातिवाद तथा सतीप्रथा आदि को बदलने के लिए भगीरथ प्रयत्न किया। सन् 1875 में महर्षि दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना करके न केवल मूर्तिपूजा का विरोध किया अपितु जातिप्रथा और अस्पृश्यता से मुक्त धार्मिक आस्था का स्वर भी बुलंद किया। श्री रामकृष्ण परमहंस तथा स्वामी विवेकानंद ने विभिन्न धार्मिक मतों में आंतरिक एकता को उजागर करने का स्तुत्य प्रयत्न किया। श्री अरविंद घोष ने धर्म के साथ योग और साधना को जोड़ा। इक्कीसवीं सदी में भारत की धार्मिक परम्परा में योगगुरू भारत भूषणजी ऐसे व्यक्तित्व का नाम हैं, जिन्होंने जड़ उपासना एवं अंध क्रियाकांड तक सीमित मृतप्राय: धर्म को जीवित और जागृत करके धर्म के शुद्ध, मौलिक और वास्तविक स्वरूप को प्रकट करने में अपनी पूरी शक्ति लगाई। धर्म के बंद दरवाजों और खिड़कियों को खोलकर उसमें ताजगी और प्रकाश भरने का दु:साध्य कार्य उन्होंने किया। इक्कीसवीं सदी में धर्म के नए एवं क्रांतिकारी स्वरूप को प्रकट करने का श्रेय उनको जाता है। साथ ही साथ वे शिक्षा के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय उपक्रम करके सरस्वती के मंदिर में ज्ञान का ऐसा महायज्ञ शुरू किया कि आराधना स्वयं ऋचाएं बन गई, आत्मा की ऐसी ज्योति जगी मानो अतीन्द्रिय ज्ञान पैदा हो गया, आत्मविश्वास के ऊंचे शिखर पर खड़े होकर उन्होंने कभी स्वयं में कार्यक्षमता का अभाव नहीं देखा। उनके परूषार्थ ने उन लोगों को जगाया है जो सुखवाद और सुविधावाद के आदि बन गये हैं और सम्बोध दिया उन लोगों को जो जीवन के महत्वपूर्ण कार्यों को कल पर छोड़ देने की मानसिकता से घिरे हैं जबकि जीवन का सिर्फ  सच यही क्षण है। इसी क्षण को सार्थक करने के लिए वे योग के माध्यम से विभिन्न उपक्रम करते हुए मानवता को उपकृत कर रहे हैं।

योगी भारत भूषणजी का जन्म 30 अप्रैल 1952 को उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में पिता पण्डित विशम्भरसिंह एवं माता रामकली के यहां हुआ। उन्होंने 20 वर्ष की छोटी सी आयु में सन् 1971 में अपने घर पर ही मोक्षायतन अन्तर्राष्ट्रीय योगाश्रम की नींव डाली। इसी प्रतिष्ठान के बैनर तले उन्होंने अपनी पुत्री प्रतिष्ठा के साथ देश के कई शहरों में योग-शिविर लगाकर आम आदमी को योग के प्रति जागरूक करने का अनूठा उपक्रम किया। देशी-विदेशी शिष्यों के बीच योग की लोकप्रियता में अपनी गहरी पैठ बनाते हुए शीघ्र ही योग गुरू के रूप में विख्यात हो गये। सन् 1978 से उन्होंने विभिन्न टीवी चैनलों पर भी अपने कार्यक्रम देने प्रारम्भ कर दिये। योग एवं शिक्षा के क्षेत्र में राष्ट्रपति से पद्म श्री सम्मान प्राप्त करने वाले वे प्रथम भारतीय हैं। योग के साथ-साथ बॉडी बिल्डिंग में भी उन्हें भारतश्री का अतिविशिष्ट सम्मान मिल चुका है। उनका ऐसा मानना है कि योग में ही समस्त मनुष्य जाति की शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं का एकमात्र समाधान निहित है। श्री नरेन्द्र मोदी जब प्रधानमंत्री बने तो अपनी मुलाकात में योगगुरु भारत भूषणजी ने उन्हें योग को विश्व स्तर पर प्रतिष्ठापित करने की प्रेरणा दी। इसी प्रेरणा का परिणाम है कि आज दुनिया में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाने लगा है।

इस गृहस्थ संन्यासी योगगुरू भारत भूषणजी ने भारतीय सशस्त्र सेनाओं, औद्योगिक प्रतिष्ठानों, वैज्ञानिकों, विद्यालयों और विभिन्न धर्माबलम्बियों के बीच योग के माध्यम से आध्यात्मिक अभिरूचि जागृत करने का उल्लेखनीय कार्य किया है। गंगा नदी के किनारे योग सिखाने की भूमिका को लेकर उन्होंने तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार से सम्पर्क करके अन्तर्राष्ट्रीय योग महोत्सव की शरूआत ऋषिकेश से प्रारम्भ की और पहली बार में ही एक विशाल कार्यक्रम किया। बाद में जब उनके कार्यक्रमों में विदेशी सैलानी भी भारी संख्या में जुटने लगे तो उनके संस्थान को ऋषिकेश के परमार्थ निकेतन में अत्याधुनिक सुविधाओं के साथ स्थानांतरित कर दिया गया। जबकि भारत भूषणजी का मानना था कि भारतीय ऋषि-मुनियों की परम्परा को प्रकृति की गोद में ही सिखाना सही है ना कि योग के सहारे अत्याधुनिक सुख सुविधाओं से सम्पृक्त पांच सितारा होटलों की प्रवृत्ति को बढ़ावा देना। उन्हें सरकार का यह तरीका ठीक नहीं लगा और उन्होंने स्वयं को ही उस प्रतिष्ठान से अलग कर लिया और सहारनपुर के बेरी बाग स्थित अपने प्रतिष्ठान मोक्षायतन अन्तर्राष्ट्रीय योगाश्रम में वापस आ गये। तब से लेकर आज तक वे अपने परिवार के साथ रहते हुए एक गृहस्थ संन्यासी की सशक्त भूमिका निभा रहे हैं।

योगगुरू भारत भूषणजी ने जी नेटवर्क के साथ मिलकर जागो भारत आन्दोलन के नाम से एक देशव्यापी अभियान संचालित कर रहे है। योग के साथ-साथ वे ध्यान, धारणा और समाधि की शिक्षा अपने प्रवचन और प्रदर्शन के माध्यम देते हैं। टीवी चैनल के माध्यम से उनके कार्यक्रम को लाखों लोग प्रतिदिन देखते हैं। उन्होंने योग के साथ-साथ बॉडी बिल्डिंग में भी खुलकर हाथ आजमाये और भारत के लगभग सभी प्रांतों की शरीर सौष्ठव प्रतियोगिताओं के कई पुरस्कार जीते।

योगगरू भारत भूषणजी के व्यक्तित्व निर्माण में अनेक गुर छिपे पड़े हैं जहां उनके बाहरी व्यक्तित्व में  गौर वर्ण, मजबूत मांसल, हमेशा हंसमुख और चमकता हुआ चेहरा और गहरी चमकदार आंखें, प्रचुर ऊर्जा, आत्मविश्वास, नेतृत्व कौशल, वक्तृत्व कला की अद्भुत क्षमता, वाणी में ओज, जनसंपर्क में निपुणता जैसे गुण हैं वहीं आत्मिक गुणों में उनमें अहंकार तनिक भी नहीं हैं। वे तनाव के भीड़ में शांति का संदेश हैं। अशांत मन के लिए समाधि का नाद हैं। संघर्ष के क्षणों में संतुलन का उपदेश हैं। चंचल चित्त के लिए एकाग्र की प्रेरणा हैं। जो स्वयं जागृत है और जन-जन को जागृत करने के अभियान के साथ सक्रिय है। स्वामी दयानंद और स्वामी विवेकानंद, कबीर और नानक को अपना आदर्श मानते हुए वे क्रांतिकारी जीवन जी रहे हैं। नि:स्वार्थ सेवा और सच्चाई के द्वारा मानवता के दिव्य सेवक के रूप में अपने आपको अग्रसर किये हुए हैं। उन्होंने भारत की युवापीढ़ी को सशक्त एवं नशामुक्त बनाने के लिए विशेष प्रयत्न किये हैं। इतनी कम उम्र में वे हमेशा युवाओं से घिरे युवकों के एक लोकप्रिय शिक्षक बन गए हैं। सभी वर्गों और धर्मों के युवक उनकी सन्निधि में अपने जीवन का निर्माण कर रहे हैं। सच्चे स्वास्थ्य, शक्ति, सौंदर्य, धर्म, सामाजिक सेवा, देशभक्ति और सह-अस्तित्व और आध्यात्मिकता के महत्व को समझते हुए वे गुरूजी की प्रेरणा से कुछ अनूठा करने के लिए तत्पर हैं।

गुरूदेव भारत भूषणजी का जीवन महान आत्माओं की उच्च परंपरा का एक जीवंत उदाहरण है, वे ऐसे क्रांतिकारी द्रष्टा हैं जो समाज में अज्ञानता और दुखों के अंधकार को दूर करने के लिए सच्चे ज्ञान को प्रतिष्ठापित कर रहे हैं। उनकी मानवीय संवेदना ने पूरी मानवता को करुणा से भिगोया है। इसीलिए वे बुराइयों के विरूद्ध संघर्ष करते हुए आदमी को सही मायने में आदमी बनाने के लिए तत्पर हैं। उन्होंने पद प्रतिष्ठा पाने की न कभी चाह की और न कभी चरित्र को हाशिये में डाला। उनके केंद्र में सदा पवित्रता और साधुता रही। जो भी उनकी संतता की छांव में आता, विभाव स्वभाव में बदल जाता।

साठ से अधिक देशों में भारत के योग को प्रतिष्ठापित करने वाले योगगुरु भारत भूषणजी के तेजस्वी व्यक्तित्व का प्रगतिशील सफर सीख देता है कि संकल्प जब भी करो, पूरी प्राणवत्ता के साथ करो। कोई विकल्प शेष न रह जाए। आज संकल्प किया और कल परिस्थितियां बदल गई तो संकल्प भी बहाना ढूंढऩे लग जाए, यह काम्य नहीं। संकल्प फौलादी चट्टान-सा मजबूत हो। हमारा संकल्प सृजनशील संकल्प हो, न उसमें विचारों का आग्रह हो, न परम्पराओं का व्यामोह हो, न सिद्धांतों की कट्टरता हो, न क्रिया में जड़ता हो। समय का हर पल पुरूषार्थ के साथ निर्माण का नया इतिहास रचे। सफलता स्वयं उपलब्धि बने। योगगुरू भारत भूषणजी ने वर्तमान को सुधारने और वर्तमान को आनंदमय बनाने के लिए धर्म का आध्यात्मिक रूप हमारे सामने प्रस्तुत किया है। आज मैं देखता हूं कि हजारों-हजारों बुद्धिजीवी अपने मन की शांति और वर्तमान में मन की पवित्रता के लिए उनके चरणों में आते हैं और शांति का अनुभव करते हैं।

ललित गर्ग

 

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