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योगी मंत्रिमंडल का विस्तार सशक्त प्रशासन

योगी मंत्रिमंडल का विस्तार सशक्त प्रशासन

लम्बी प्रतीक्षा के बाद उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी ने अंतत: अपने मंत्रिमंडल का विस्तार कर दिया। 18 नये चेहरों के साथ 23 मंत्रियों को शपथ दिलाते हुए योगी आदित्यनाथ ने 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा की रणनीति की भी झलक दे दी। वर्षों से उपेक्षित बुंदेलखण्ड और पूर्वांचल (पूर्वी उत्तर प्रदेश) को खास तरजीह देकर उन्होंने जनता को यह संदेश दिया कि भाजपा सिर्फ बातों से उपेक्षित क्षेत्र की जनता का पेट नहीं भरेगी बल्कि वास्तव में पिछड़े क्षेत्र को विकसित करने की मंशा को सफल करने की दिशा में बढ़ रही है। यूपी में भाजपा की सरकार बनने के बाद सवा दो साल से मंत्रिमंडल के विस्तार की प्रतीक्षा की जा रही थी। कभी लोकसभा चुनाव तो कभी विधानमंडल की बैठक के कारण यह विस्तार टलता गया। ग्रह-नक्षत्र का गणित और शुभ मुहुर्त का मेल बना तो योगी जी ने उस प्रतीक्षित पल को उन विधायकों के सपने साकार करने के लिए थाम लिया जो जाने कब से उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। अंतत: दो महिलाओं सहित 23 को शपथ दिलायी गयी और इस तरह मंत्रियों की कुल संख्या 38 से बढ़कर 56 हो गयी। राज्यपाल आनंदी बेन पटेल ने मुख्यमंत्री की मौजूदगी में 23 लोगों को मंत्री पद की शपथ दिलायी। पुराने मंत्रिमंडल के पांच मंत्रियों का कद बढ़ाते हुए 6 को कैबिनेट मंत्री बनाया गया जबकि छह को स्वतंत्र प्रभार के साथ राज्य मंत्री बनाया गया। इसके अतिरिक्त 11 विधायकों को राज्य मंत्री के रूप में शपथ दिलायी गयी।

छह कैबिनेट मंत्रियों में पांच राज्य मंत्री थे जिनका ओहदा बढ़ाया गया जबकि एक को सीधे कैबिनेट मंत्री बनाया गया है। राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार से कैबिनेट मंत्री बनाये जाने वालों में डा. महेन्द्र सिंह, सुरेश राणा, भूपेन्द्र सिंह, अनिल राजभर और नये मंत्री बनने वाले रामनरेश अग्निहोत्री और श्रीमती कमल रानी वरूण हैं। छह राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार वालों में नीलकंठ तिवारी, कपिल देव अग्रवाल, सतीश द्विवेदी, अशोक कटारिया, श्रीराम चौहान और रवीन्द्र जायसवाल हैं। इनमें नीलकण्ठ तिवारी पहले से राज्यमंत्री थे जिन्हें प्रोन्नत कर स्वतंत्र प्रभार दिया गया है। कपिल देव अग्रवाल, सतीश द्विवेदी, अशोक कटारिया, श्रीराम चौहान और रवीन्द्र जायसवाल नये चेहरे हैं जिन्हें मंत्री बनाते हुए स्वतंत्र प्रभार दिया गया है। रवीन्द्र जायसवाल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के वाराणसी लोकसभा क्षेत्र के हैं और वाराणसी उत्तरी विधानसभा क्षेत्र से दूसरी बार चुनाव जीते हैं। पिछड़े वर्ग से आते हैं और व्यापारी हैं। क्षेत्र में अच्छी पकड़ होने के चलते दूसरी बार चुनाव जीतकर आये वरना वाराणसी उत्तरी मुस्लिम बहुल क्षेत्र है इसलिए यहां से कांग्रेस अथवा समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार ही प्राय: जीतते रहे हैं।

नये राज्यमंत्रियों में अनिल शर्मा, महेश गुप्ता, आनन्द स्वरूप शुक्ल, विजय कश्यप, डा. जी.एस. धर्मेश, लाखन सिंह राजपूत, नीलिमा कटियार, चौधरी उदय भान सिंह, चंद्रिका प्रसाद, रमाशंकर सिंह पटेल और अजित सिंह पाल अपने-अपने क्षेत्र में लोकप्रियता और खास जातीय समीकरण के चलते पार्टी और मुख्यमंत्री की पसन्द बने।

पहले से राज्यमंत्री रहे नीलकंठ तिवारी को प्रोन्नत कर स्वतंत्र प्रभार दिये जाने की वजह एक तो उनका प्रधानमंत्री के लोकसभा क्षेत्र वाराणसी के वाराणसी दक्षिणी विधानसभा क्षेत्र से चुना जाना और दूसरा उनकी संघ की पृष्ठभूमि होना रहा है। वाराणसी दक्षिणी से लगातार सात बार चुने गये श्यामदेव रायचौधरी (भाजपा) को पिछली बार टिकट न देकर नीलकंठ को टिकट देने पर ही यह साफ हो गया था कि यह भाजपा के लिए तुरूप का पत्ता साबित होंगे। और हुआ भी वही। नीलकंठ तिवारी शायद भविष्य में राजेश मिश्रा, पंडित कमलापति त्रिपाठी परिवार और सुधाकर पाण्डेय परिवार (सभी कांग्रेसी) के लिए चुनौती होंगे। अनिल राजभर जो ढाई वर्ष के भीरत भाजपा विधायक, स्वतंत्र प्रभार मंत्री से कैबिनेट मंत्री बने, पूर्वांचल के सबसे भाग्यशाली राजनीतिक शख्सियत साबित हुए हैं। अनिल के पिता स्व. राजीत राजभर चिरई गांव विधानसभा क्षेत्र से विधायक (समाजवादी पार्टी) थे। उनकी मृत्यु के बाद उपचुनाव मे मुलायम सिंह ने उनके युवा बेटे अनिल को टिकट दिया लेकिन तब बसपा की मुख्यमंत्री रहीं मायावती ने वीरेन्द्र सिंह को बसपा का टिकट देकर अनिल के प्रति उपजी सहानुभूति की लहर को जातीय समीकरण से दबा दिया और अनिल राजभर चुनाव हार गये। बाद में सपा की घर की लड़ाई में अनिल अमर सिंह की नजदीकी का खामियाजा भुगते और लिहाजा सपा छोड़ भाजपा में आ गये। भाजपा में उनकी ‘टाई’ ओम प्रकाश राजभर से पड़ी। ओम प्रकाश अपनी जाति के राजनीतिक हक की लड़ाई के माहिर खिलाड़ी हैं। वे योगी और मोदी से भिडऩे में भी नहीं हिचके। अत: पार्टी ने अनिल को ताकत देने की ठानी और अमित शाह ने स्वयं अनिल राजभर के सिर पर हाथ रख दिया। लिहाजा अनिल पहले विधायक, फिर राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार और ढाई वर्ष के भीतर कैबिनेट मंत्री बन गये। फिलहाल वे पूर्वी उत्तर प्रदेश में पार्टी के सबसे दमदार मंत्री हैं।

नये मंत्रियों में डा. महेन्द्र सिंह का कद काफी बड़ा हो गया है और इसके लिए उनके राजनीतिक कौशल के साथ ही उनकी जनता के प्रति प्रतिबद्धता बतायी जा रही है। महेन्द्र सिंह ने पी.एम. आवास योजना और मनरेगा में रिकार्ड रोजगार उपलब्ध कराये। इन्होंने अपने विभाग को 12 राष्ट्रीय पुरस्कार दिलवाये। इससे मुख्यमंत्री ने उन्हें प्रमोट कर सेवा का पुरस्कार दिया। ऐसे ही गन्ना मंत्री सुरेश राणा ने अपने विभाग में महत्वपूर्ण उपलब्धियों से ख्याति अर्जित की। 10 वर्षों में सपा-बसपा सरकारों के कार्यकाल में गन्ना मूल्य का जितना भुगतान हुआ उतना राणा के दो वर्षों के कार्यकाल में ही हो गया। लिहाजा इसका पुरस्कार उन्हें मिलना ही था। पंचायत राज्य मंत्री चौधरी भूपेन्द्र सिंह ने रिकार्ड 160 लाख शौचालय बनाकर और पंचायती राज व्यवस्था को ज्यादा मजबूती देकर सरकार की छवि को ज्यादा बेहतर बनाया। इसलिए मुख्यमंत्री ने उन्हें ज्यादा महत्वपूर्ण दर्जा दिया।

नये मंत्रियों में कानपुर नगर के छातमपुर की कमल रानी वरूण को कैबिनेट मंत्री बनाकर अनुसूचित जाति का कोटा भरा गया। एस. पी. सिंह बघेल के सांसद बन जाने के बाद अनुसूचित जाति के कोटे का मंत्री पद खाली था। इसी तरह मैनपुरी के भोगांव क्षेत्र के विधायक रामनरेश अग्निहोत्री ने लोकसभा चुनाव में सपा के गढ़ में बिगुल बजा कर जीत अर्जित कर ली थी। सपा के पिता मुलायम सिंह यादव के क्षेत्र में भाजपा की हनक बनाने वाले राम नरेश को कैबिनेट मंत्री बनाकर उन्हें पुरस्कृत करना हर तरह से जायज रहा। सिद्धार्थ नगर के इटवा से पहली बार चुनाव जीतने वाले सतीश द्विवेदी ने सपा सरकार में विधानसभा अध्यक्ष रहे माता प्रसाद पाण्डेय को चुनाव में हराया था। इसलिए उन्हें मंत्री बनाया गया। इसी तरह श्रीराम चौहान तो अटल जी की सरकार में भी मंत्री थे। इसी तरह आजमगढ़ मंडल में बलिया से आनंद शुक्ल और बिन्ध्य मंडल से रमाशंकर पटेल को मंत्री बनाया जाना राजनीतिक दृष्टि से वाजिब माना जा रहा है।

दरअसल अपना दल की अनुप्रिया पटेल दबाव की राजनीति की माहिर रही हैं। वह पिछले वर्षों में खुद अपने लिए तो राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण पद हासिल ही कर चुकी थीं, अपने पति और अपना दल के अध्यक्ष आशीष पटेल को भी एम एल सी बनवा चुकी थीं। अब वे दबाव बना कर अशीष को मंत्री बनवाने की जुगत में भी थीं। लेकिन भाजपा बदले वक्त में किसी का दबाव मानने के पक्ष में नहीं है। इसलिए न तो इस बार अनुप्रिया को केन्द्र में मंत्री पद मिला और न ही आशीष को लखनऊ में मंत्री बनाया गया। पिछड़ी राजनीति को संतुलित करने के लिए इस वजह से मिर्जापुर के ही मड़िहान से जीते विधायक रमाशंकर पटेल को मंत्री बना दिया गया। इसके अलावा नीलिमा कटियार को भी मंत्री बना कर संतुलन साध लिया गया।

कहा यह जा रहा है कि योगी मंत्रिमंडल का विस्तार भाजपा की अगले विधानसभा चुनाव की रणनीति के तहत हुआ है जिसमे सपा-बसपा को ध्वस्त करते हुए पार्टी को पुन: सत्ता में वापस लाने का इरादा है।

लखनऊ से सियाराम यादव

 

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