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राजनीतिक दलदल में चुनाव का महाकुम्भ

राजनीतिक दलदल में चुनाव का महाकुम्भ

भारत में कुम्भ 12 साल के बाद लगता है। 6 वर्ष के बाद लगने वाले पर्व को अर्धकुम्भ कहा जाता है। भारत के धार्मिक व सांस्कृतिक महापर्व कुम्भ के सम्पन्न होने के लगभग तीन मास के बाद इस समय चालू लोकसभा चुनाव को हमारे गणतंत्र का महाकुम्भ कहा जा रहा है।

एक प्रकार से इस राजनीतिक महाकुम्भ और हमारे सांस्कृतिक कुम्भ में एक समानता अवश्य है। कहते हैं कि अपने इस धार्मिक व सांस्कृतिक कुम्भ में जो स्नान कर लेता है और दान-पुन्य करता है उसके सारे पाप धुल जाते हैं, माफ हो जाते हैं। आजकल के इस राजनीतिक व चुनावी महाकुम्भ में एक प्रकार से यही काम चल रहा है। हमारे नेता अपने राजनीतिक जीवन को एक दल से दूसरे दल में जाने के कदम को भी इसी चीज की संज्ञा दे रहे हैं। दल बदलने वाले हमारे नेता राजनीति की दलदल में स्नान करने के बाद जब दूसरे दल में जा रहे हैं तो उनका नया जीवन शुरू हो जाता है और उनके पुराने राजनीतिक पाप धुल जाते हैं। नए दल में नए जीवन में उन्हें कई बार सफलता भी मिल जाती है और तब उनका जीवन धन्य हो जाता है।

हमारी राजनीति में एक ढंकोसला है ‘सैकुलर’ व ‘सांप्रदायिकता’ का। पर ज्योंहि एक राजनीतिक महानुभाव अपनी पार्टी को छोड़कर दूसरे दल में जाता है तो वहां उसका बड़ा स्वागत किया जाता है। उसे स्टेज पर बिठाया जाता है और पार्टी के पुराने कार्यकर्ता नीचे जमीन पर या कुर्सियों में बैठे ताली बजा कर उसका स्वागत करते हैं। उसके हक में नारे लगाते हैं। स्टेज पर पार्टी के बड़े-बड़े नेता उसके गले में हार पहना कर उसका पार्टी में आने का स्वागत करते हैं। पार्टी में शामिल होने वाला नेता एक दम ‘सांप्रदायिक’ से ‘सैकुलर’ और ‘सैकुलर’ से ‘सांप्रदायिक’ बन जाता है। एक प्रकार से दल बदलने वाले महानुभाव का राजनीति में एक पुनर्जीवन हो जाता है। पुनर्जीवन में शरीर तो नष्ट हो जाता है पर आत्मा नया शरीर धारण कर लेती है। पर राजनीतिक पुनर्जीवन में शरीर भी वही रहता है और आत्मा भी वही, पर नैतिकता के मानदंड अवश्य बदल जाते हैं। कई तो यह भी कहते हैं कि आज की पॉलिटिक्स में नैतिकता की बात करना तो किसी छोटे से गंदे नाले में मछली ढूंढने के बराबर है।

इस राजनीतिक-चुनावी महाकुम्भ में रिश्तों का कोई महत्व नहीं रहता। हमनें अपने विदेशी शासकों से बहुत-सी सीख भी ली है। मुस्लिम शासक कई बार अपने बड़े भाई और पिता को गद्दी से हटा कर, बंदी बना कर, और कई बार तो उनकी हत्या कर भी स्वयं शासक बन बैठे थे। हमारी पॉलिटिक्स ने भी उसी परम्परा को आगे बढ़ाया है। ठीक उसी तरह हमारे राजनीतिक दलों में भी कुछ ऐसा ही बड़ी बार हुआ है। अपने पिता या भाई को पार्टी के कर्णधार व सर्वेसर्वा के पद हटा कर कई स्वयं ही सर्वेसर्वा बन बैठे हैं। हां, इतना अवश्य हुआ है कि कभी किसी की हत्या नहीं की गई, केवल पद से ही हटाया गया है।

देखा जाए तो आज जिस प्रकार चुनाव प्रचार चल रहा है, उससे तो भारत की महान उच्च परम्पराओं को ही मिट्टी में मिलाया जा रहा है। स्वर्ग से महात्मा गांधीजी, सुभाष चन्द्र बोस, महान शहीद भगत सिंह, राजगुरु व चन्द्रशेखर आजाद, सरदार पटेल व मौलाना अब्बूल कलाम आजाद सरीखे अनेक महान नेता यदि भारत में इस समय जो कुछ घट रहा है, उसे देखकर उनके सिर अवश्य ही झुक रहे होंगे। वह स्वयं से यही पूछ रहे होंगे कि क्या उन्होंने इसी भारत की कल्पना की थी जैसा आज बनता जा रहा है? उस भारत की जिसमें चुनाव की लड़ाई को इतने निचले गड्ढे में धकेल दिया गया है?

वर्तमान विरोधी पक्ष सत्ताधारी एनडीए के साथ और उसके नेताओं को आजकल जिस प्रकार गाली दे रहें हैं, उससे तो यह अंदाजा लगाना कठिन है कि भारत की वर्तमान पॉलिटिक्स किस हद्द तक गिर चुकी है। यह कहना भी जोखिम भरा है कि बस, इससे नीचे नहीं जा सकती।

एक तरफ तो विपक्षी दल यह आरोप लगा रहे हैं कि एनडीए के शासनकाल में संवैधानिक संस्थाओं की मान्यताओं का हरण हो रहा है। एक तरीके से तो इस दयनीय स्थिति के लिए तो वह स्वयं ही इसके दोषी हैं।

सत्ताधारी दल कोई भी हो, प्रधानमंत्री या मंत्री समूचे देश के होते हैं, न कि उस दल के जो सत्ता में होता है या उस क्षेत्र के जहां से वह सांसद चुने गए हों। सब से बड़ा दु:ख तो यह है कि विपक्ष इनको सारे देश का नहीं, केवल अपने विरोधी दल का ही मानते हैं और वह उनसे ऐसा ही व्यवहार करते हैं। इसलिए वह सत्ताधारी दल की हर बात का विरोध करते हैं, तब भी जब उसमें देश का हित भी निहित हो। ऐसा कर वह केवल उनका ही नहीं, समूचे देश का अपमान करते हैं।

हम सबको भलीभांति याद है कि जब डॉक्टर मनमोहन सिंह यूपीए के प्रधानमंत्री थे तो तबका विपक्ष उनको देश का एक कमजोर प्रधानमंत्री कहते थे जिसकी डोर पीछे से कोई और खींचता है। उन्हें मौनी बाबा भी कहते थे।  डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल के अंतिम पांच वर्ष तो इसी बात को दोहराने में बीत गए कि राहुल गांधी में प्रधानमंत्री बनने के पूरे गुण हैं और पार्टी जब चाहे मैं अपनी कुर्सी उनके लिए छोडऩे के लिए हर क्षण तैयार बैठा हूं। इस में तो कुछ अतिशयोक्ति भी नहीं थी।

प्रधानमंत्री का पद एक संवैधानिक पद है। पर गैर-नेहरु-गांधी परिवार के किसी भी व्यक्ति को इसी परिवार ने कभी सम्मान नहीं दिया चाहे वह पी वी नरसिम्हा राव हों या स्वयं इसी परिवार द्वारा चयनित डॉ. मनमोहन सिंह हों या कोई और। डॉ. सिंह को भी इस परिवार ने एक कठपुतली की तरह ही बरता। प्रधानमंत्री के पद का अपमान तो असल में किसी विपक्षी दल ने नहीं, कांग्रेस ने स्वयं ही अपने तत्कालीन उपाध्यक्ष राहुल गांधी के हाथों से शुरू किया था। प्रधानमंत्री पद की गरिमा को नीचा दिखाने का काम स्वयं राहुल ने एक अनोखी परम्परा का श्रीगणेश कर सितम्बर 2013 में किया था। उनकी माता कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया जी की सहमति से एक अध्यादेश बनाया गया था जिसमें अदालत द्वारा दण्डित जन प्रतिनिधियों की सदस्यता को बनाये रखने का प्रावधान था। पार्टी के प्रमुख प्रवक्ता अजय माकन एक प्रेस वार्ता में अध्यादेश की सार्थकता का पाठ पढ़ा रहे थे। उसी समय के कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी उस प्रेस वार्ता में आ धमके थे। प्रेस के सामने ही उन्होंने उस अध्यादेश की कॉपी को प्रेस के सामने फाड़कर कहा था कि यह तो रद्दी की टोकरी के काबिल है। उस समय डॉ, सिंह अमरीका की यात्रा पर थे। वहां हमारे प्रधानमंत्री की कितनी फजीहत हुई होगी, वह तो वह ही जाने।

एनडीए की सरकार ने लगभग दो वर्ष पूर्व आरोप लगाया गया था कि कांग्रेसी नेता के घर पर पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री के घर पर रात के खाने पर एक बैठक हुई जिसमें मोदी सरकार हटाने पर एक रणनीति पर चर्चा हुई जिसमें पूर्व  प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह भी उपस्थित थे। इस पर संसद में बड़ा हंगामा हुआ। मोदी सरकार ने इस पर खेद व्यक्त कर दिया यह कहकर कि वह डॉ. मनमोहन सिंह का पूरा सम्मान करते हैं।

इस शालीनता के इस प्रदर्शन के विपरीत प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस के समेत सभी दल एनडीए के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर इतने घटिया शब्द प्रयोग कर रहे हैं कि उनकी चर्चा करने में भी शर्म आती है। पूर्व मंत्री मणिशंकर अय्यर ने पाकिस्तानी मीडिया में मोदी सरकार को हटाने के लिए पाकिस्तान की मदद मांगी थी। पिछले गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री को एक ‘नीच आदमी’ कहा। कांग्रेस पार्टी ने अय्यर को कुछ दिन के लिए पार्टी से निलंबन का ड्रामा किया पर बाद में उनके निलंबन को रद्द कर दिया।

प्रधानमंत्री मोदी के लिए ‘चोर’ शब्द का प्रयोग कर कांग्रेस अपने आपको धन्य समझती है। जब मोदी जी ने अपने आपको और देश की जनता को जनहित का चौकीदार बताया तो कांग्रेस ने कहा कि चौकीदार चोर है। उन्हें भ्रष्टाचारी होने का आरोप भी लगाते हैं पर यह नहीं बताते कि भ्रष्टाचार क्या और कहां किया है। यह तो हमारे जनतंत्र की खूबी है कि इसमें किसी को कुछ भी सच-झूठ बोलने की छूट दे रखी है। कोई सबूत नहीं मांगता और झूठ बोलने वाले को कोई सजा नहीं मिलती, मानों कि झूठ बोलना हमारे राजनीतिज्ञों का संवैधानिक जन्मसिद्ध अधिकार है।

पता नहीं कि चौकीदार शब्द से कुछ नेताओं को तकलीफ क्यों है? चौकीदार से तो चोर डरता है, साध नहीं। तो फिर जिन नेताओं ने कुछ गलत नहीं किया है तो वह इस शब्द से तिलमिलाते क्यों हैं? कहीं चोर कि दाढ़ी में तिनका वाली बात तो नहीं?

केंद्र में कांग्रेस के एक पूर्व मंत्री ने तो मोदी जी को ‘नपुंसक’ तक कह डाला। लोग तो यह भी पूछते हैं कि उस मंत्री महोदय को इस बात का ज्ञान कैसे हुआ?

मोदी जी को अपने आप को चायवाला कहने में कोई शर्म नहीं आती पर उनके विरोधियों को इस पर भी इतराज है।

एक ओर तो कांग्रेस भारत की सेनाओं के शौर्य की तारीफ करती है और दूसरी ओर उसके ही एक बड़े नेता वीरप्पा मोइली हमारे वायूसेना प्रमुख को झूठा कहकर सेना का अपमान करते हैं। हमारे कई महानुभाव कहते हैं कि विपक्ष को प्रतिद्वंदी माना जाना चाहिए न कि राष्ट्र-विरोधी। यह समझ नहीं आता कि विरोधी तो सरकार के होते हैं, सेना के नहीं। सेना तो राष्ट्र की होती हैं किसी पार्टी की नहीं। तो देश की सेना के विरोधी राष्ट्रभक्त कैसे हो सकते हैं?

कहते हैं कि भाई जैसा कोई दोस्त नहीं होता। इसका एक ताजा उदाहरण मुकेश अंबानी हैं जिन्होंने कुछ सैंकड़े करोड़ देकर अपने छोटे भाई अनिल अंबानी को जेल जाने से बचा लिया। पर दूसरी ओर यह भी सच्चाई है कि एक भाई से बुरा कोई दुश्मन भी नहीं होता। इसका एक जीता-जागता उदाहरण पाकिस्तान है। 1947 में वह एक भाई की तरह भारत से जुदा हो गया। उसने भारत को कभी भाई नहीं समझा; सदा दुश्मन ही समझा और ऐसा ही व्यवहार किया। तो फिर जो पाकिस्तान की भाषा बोल रहे हों, कोई व्यक्ति या राजनीतिक दल उन्हें राष्ट्र का दुश्मन न हो कर सत्ताधारी दल का विरोधी कैसे समझ सकता है?

हम सब मानते हैं कि आतंकी का कोई धर्म नहीं होता। इसी कारण हालांकि देश में सैंकड़ों आतंकी घटनाएं हुईं और उनमें संललिप्त व्यक्ति मुस्लिम ही पाये गए, पर फिर भी किसी ने उनको ‘मुस्लिम आतंक’ नहीं कहा। यह ठीक भी है। पर जब यूपीए की सरकार थी तो उन्होंने ‘हिन्दू आतंक’ का एक मनघडंत हौवा खड़ा करने की कोशिश की। इसलिए देश को हक है कि वह कांग्रेस के बड़े नेताओं को पूछे कि उन्होंने किसी भी आतंकी घटना को ‘मुस्लिम आतंक’ की संज्ञा क्यों नहीं दी?

कांग्रेस ने प्रधानमंत्री मोदीजी को यमराज, मौत का सौदागर, रावण, गंदीनाली का कीड़ा, बंदर, भस्मासुर, गंगू तेली, और बहुत कुछ और भी। इन शब्दों को बोलते शायद हमारे नेताओं को शर्म नहीं आई, पर मतदाता को इसे सुनने में अवश्य आई है।

अम्बा चरण वशिष्ठ

 

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