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राजनीति में बदजुबानी की जंग

राजनीति में बदजुबानी की जंग

लोकतंत्र की अवधारणा के मूल में अपने हितों की देखभाल करने वाले बेहतर व्यक्तियों के चुनाव के जरिए शासन का विचार है। चूंकि मतदान के लिए भी समानता के अधिकार को मूल में रखा गया है, इसलिए उम्मीद की जाती रही है कि राजनीतिक तंत्र पर कब्जा जमाने की कोशिश में जुटने वाले नेता कम-से-कम अपने आचार-व्यवहार से दूसरों के लिए उदाहरण तो पेश करेंगे ही, खुद ऐसे कदम उठाने से बचेंगे, जिससे लोकतंत्र की उदात्त अवधारणा को चोट पहुंचे। लेकिन दुर्भाग्यवश चुनाव-दर-चुनाव इस पूरी सोच पर राजनीतिक तंत्र ग्रहण ही लगाता जा रहा है। हालांकि संविधान का अनुच्छेद 324, 325 और 326 जाति, धर्म, और नस्ल आदि के आधार पर चुनाव ना हों, राजनीतिक दल और नेता चुनावों के दौरान कदाचार ना करें, इसके लिए चुनाव आयोग को व्यापक अधिकार देता है। यह अधिकार ही है कि चुनाव आयोग ने मौजूदा चुनाव में जहां समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को 72-72 घंटे के लिए प्रचार पर रोक लगा दी तो मायावती पर 48 घंटे की पाबंदी लगाई। लेकिन इन पाबंदियों के बावजूद इन राजनेताओं ने अपने लिए राह निकाल ली। योगी आदित्यनाथ हनुमान मंदिर पूजा करने पहुंच गए और इस तरह बजरंग बली के नाम पर अपने वोटरों को संदेश दे दिया, तो आजम खान ने एक पत्रकार के सवाल पर बदजुबानी की हद ही लांघ दी। उन्होंने कहा कि देखते नहीं, तुम्हारे अब्बा के इंतकाल पर आया हूं।

लेकिन चुनाव आयोग के इन कदमों का भी बाकी राजनेताओं की बदजुबानी पर कोई असर पड़ता नजर नहीं आ रहा है। संविधान में साफ लिखा है कि जाति, धर्म और नस्ल के नाम पर वोट नहीं मांगा जा सकता। लेकिन बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती ने सहारनपुर में हुई महागठबंधन की रैली में मुस्लिम मतदाताओं से अपील करने से नहीं चूकीं कि वे उन्हें ही अपना वोट दें। दरअसल उत्तर प्रदेश के महागठबंधन में कांग्रेस को शामिल नहीं किए जाने की वजह से कांग्रेस ने राज्य में चुन-चुन कर उन जगहों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं, जहां खासतौर पर महागठबंधन के हिस्से में बहुजन समाज पार्टी की सीटें आई हैं। अगर बहुजन समाज पार्टी ने मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं तो वहां कांग्रेस ने भी अपनी तरफ से मुसलमान ही मैदान में उतार दिया है। इससे माना जा रहा है कि उत्तर प्रदेश के मुस्लिम मतदाताओं में भ्रम की स्थिति है। इसे ही देखते हुए मायावती ने मुसलमानों से खुलकर धर्म के नाम पर वोट मांग लिया और इस तरह से वे संविधान के अनुच्छेद 325 का उल्लंघन कर बैठीं। जवाब में अगले दिन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ कहां चुप बैठने वाले थे। उन्होंने कह दिया कि उनके यानी मायावती के साथ अली यानी मुसलमान हैं तो हमारे साथ बजरंगबली हैं। जाहिर है कि दोनों ही बयान आपत्तिजनक थे। इसे लेकर विवाद बढ़ा तो चुनाव आयोग को दखल देना पड़ा।

समाजवादी पार्टी के नेता और रामपुर निवासी आजम खान पढ़ाई-लिखाई के हिसाब से आलिम यानी विद्वान माने जाते हैं। लेकिन उनकी जुबान कैंची की तरह चलती है। उनकी जुबान जब चलती है तो वह भूल जाती है कि सामाजिक जीवन में कानून की मर्यादा कमजोर भले ही हो, नैतिकता का दायरा कहीं ज्यादा गहरा है और चौड़ा है। उन्होंने अपने खिलाफ चुनाव लड़ रही जयाप्रदा के खिलाफ जिन शब्दों का इस्तेमाल किया, उन्हें किसी भी तरह से जायज नहीं ठहराया जा सकता। आजम ने इशारों-इशारों में ही जयाप्रदा के अंधो और अंत: वस्त्रों के रंग का जिक्र कर दिया। फिल्मी दुनिया में बेहद सम्मानित और दो-दो बार सांसद रह चुकी महिला के लिए इससे ज्यादा अपमान की बात क्या होगी। हैरत की बात यह है कि आजम खान जब इस बात का जिक्र कर रहे थे, तब उनके साथ मंच पर उनकी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव भी मौजूद थे। लेकिन उन्होंने आजम खान को नहीं रोका। अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव ने तो यहां तक कह दिया कि यह बहुत छोटी बात है। इसे इतना तूल देने की जरूरत नहीं है।

वैसे इस चुनाव में बदजुबानी की शुरूआत प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस और उसके अध्यक्ष की ओर से हुई है। उन्होंने अपनी हर सभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए कहना शुरू किया, चौकीदार चोर है। वे भीड़ से नारे भी लगवाते हैं। दुनिया जानती है कि घर-परिवार से अलग रहने वाले प्रधानमंत्री कम से कम व्यक्तिगत रूप से भ्रष्टाचारी नहीं हो सकते। इसीलिए राहुल गांधी का दिया यह नारा परवान चढ़ता नजर नहीं आ रहा। फिर भी उन्होंने शुरूआत कर दी है, जिसका असर राजनीतिक माहौल पर पडऩा ही था। वैसे कांग्रेस के ही नेता रहे हैं मणिशंकर अय्यर, जिन्होंने पिछले आम चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए कहा था कि वे प्रधानमंत्री नहीं बन सकते, उनके लिए वे तालकटोरा स्टेडियम के सामने चाय का ठीया लगवा देंगे। इतना ही नहीं, उन्होंने मोदी को नीच तक कहा था। उनकी इस बदजुबानी ने राजनीतिक तालाब को गंदा तो किया ही, गांधीनगर से दिल्ली तक की मोदी की यात्रा को आसान भी बना दिया। वैसे एक दौर में बहुजन समाज पार्टी की ओर से आक्रामक नारा दिया ही गया था, तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार। अगर उन्हीं दिनों चुनाव आयोग ने इस नारे पर संज्ञान ले लिया होता और कार्रवाई की होती तो भविष्य के लिए नजीर होती। लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं हो सका। जबकि यह नारा कुछ जाति समूहों के खिलाफ विध्वंसक रूप से दुव्र्यवहार को आमंत्रित करता था।

ऐसा नहीं कि चुनावी राजनीति में बदजुबानी नहीं होती थी। लेकिन बड़े नेता भाषा का संयम नहीं खोते थे। इस वजह से नीचे तक साफ-सुथरे ढंग से चुनाव लडऩे का संदेश जाता था। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। अब बड़े नेता ही बदजुबानी करते हैं। ममता बनर्जी तो इन सभी नेताओं से भी आगे निकल गई हैं। पूरे देश के नेता तो देश के नाम पर चुनाव लड़ रहे हैं, लेकिन वे बांग्लादेश के नाम पर चुनाव लड़ रही हैं। मुस्लिम ध्रुवीकरण तो वे कर ही चुकी हैं, उनकी निगाह अब बांग्लादेश से आए अवैध अप्रवासियों पर है, जिन्होंने भारतीय नागरिकता हासिल कर ली है और वे यहां के नागरिक बन गए हैं। उनके बीच प्रचार के लिए ममता ने बांग्लादेशी लोकप्रिय अभिनेता फिरदौस को बुला लिया। यह बात और है कि उनके इस कदम को चुनाव आयोग ने जायज नहीं माना और फिरदौस को प्रचार से दूर रहने का आदेश सुना दिया।

सवाल यह है कि राजनीति और सत्ता के लिए राजनेता किस हद तक गिरेंगे, क्या उनका कोई मानक भी होगा, क्या वे मर्यादाएं स्वीकार करेंगे? भारतीय राजनीति स्वतंत्रता आंदोलन की कोख से उपजी और विकसित हुई है। उस आंदोलन के दौरान भारतीय लोकवृत्त ने कुछ जीवन मूल्य गढ़े थे। उन मूल्यों के आधार पर ही राजनीति करने की अघोषित परंपरा बनी थी। लेकिन दुर्भाग्यवश भारतीय राजनीति ने उन मूल्यों को तिलांजलि दे दी है। तभी कोई बड़ा नेता किसी को चोर कहता है तो कभी कोई किसी महिला के अंतर्वस्त्र के रंगों की सार्वजनिक जानकारी देने लगता है। तो कभी धार्मिक आधार पर गोलबंदी करने लगता है तो कभी कोई नेता जातियों के नाम पर खुलकर वोट मांगने लगता है। सभी जानते है कि राजनीतिक रूप से ये कदम धत्कर्म हैं। लेकिन सत्ता के लिए उन्हें सब जायज लगता है। आज की राजनीति का साध्य सेवा नहीं रहीं, बल्कि सत्ता हो गई है। लिहाजा मूल्यों की परवाह कहीं पीछे छूट गयी है। लेकिन राजनीति को इससे चेतना होगा, अन्यथा आने वाले दिन और भयावह हो सकते हैं।

 

उमेश चतुर्वेदी

 

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