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राजनीति में सितारे कितने गंभीर, कितने कामयाब

राजनीति में सितारे  कितने गंभीर, कितने कामयाब

लोकसभा के मौजूदा चुनाव को जितना बदजुबानी के लिए याद किया जाएगा, उतना ही उत्तर भारत, खासकर हिंदीभाषी इलाके में फिल्मी सितारों के चुनाव लडऩे के लिए भी इसकी स्मृति लंबे समय तक बनी रहेगी। सबसे ज्यादा फिल्मी सितारे मैदान में उतारने वाले दल का खिताब इस बार संभवत: भारतीय जनता पार्टी के नाम है। एक ही फिल्मी परिवार के दो सदस्यों हेमा मालिनी को जहां पार्टी ने दोबारा उत्तर प्रदेश की मथुरा सीट पर भरोसा जताया तो वहीं उनके पति धर्मेंद्र के बड़े बेटे सन्नी देओल को पार्टी ने पंजाब की गुरूदासपुर सीट से मैदान में उतारा है। यहां यह ध्यान देने की बात है कि इस सीट से पहले भी हिंदी सितारे विनोद खन्ना भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर ना सिर्फ जीतते रहे हैं, बल्कि वे वाजपेयी सरकार में विदेश राज्य मंत्री भी रहे। इस बार भारतीय जनता पार्टी ने एक बार फिर पश्चिम बंगाल की आसनसोल सीट से  अपने पुराने सांसद और केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो पर ही भरोसा जताया। पिछले आम चुनाव और 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों तक भारतीय जनता पार्टी की विरोधी रहीं हिंदी फिल्मों के गुजरे जमाने की अभिनेत्री जयाप्रदा को पार्टी ने उत्तर प्रदेश की रामपुर सीट से मैदान में उतारा है। दिलचस्प यह है कि इस बार उत्तर प्रदेश की दो सीटों पर पार्टी ने भोजपुरी फिल्मी दुनिया के दो बड़े नामों दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’  और रविकिशन पर दांव लगाया है। निरहुआ के रूप में विख्यात दिनेश लाल यादव भोजपुरी फिल्मों के स्टार कलाकार ही नहीं, गायक भी हैं। वहीं रविकिशन भी भोजपुरी फिल्मी दुनिया के जाने-माने सितारे हैं। निरहुआ को भारतीय जनता पार्टी ने जहां समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के सामने उत्तर प्रदेश की आजमगढ़ सीट से उतारा है, वहीं रविकिशन को पार्टी ने  गोरखपुर सीट से लड़ाया है, जिस पर पिछले उपचुनाव के पहले तक गोरखपुर के गोरक्षनाथ पीठ के महंत अवैद्यनाथ और बाद में योगी आदित्य नाथ का कब्जा रहा।

यह कहना कि पहले राजनीति सत्तापेक्षी नहीं होती थी, बेमानी ही होगा। आजादी के बाद चाहे किसी भी दल की राजनीति रही हो, उसका घोषित मकसद भले ही सेवा रहा हो, लेकिन उसका अघोषित लक्ष्य सत्ता प्राप्ति ही रहा है। सत्ता उसे ही मिल सकती है, जिसे लोकसभा या विधानसभा में बहुमत हासिल हो। जाहिर है कि ऐसे में एक-एक सीट की कीमत बढ़ जाती है। चूंकि सितारों का आम लोगों में बड़ा क्रेज होता है, उनका आकर्षण होता है, इसलिए सितारों के जरिए प्रचार करने की शुरुआत तो आजादी के फौरन बाद ही हो गई थी। फिल्मी सितारे का चुनाव प्रचार में पहली बार बड़ा इस्तेमाल 1962 के आम चुनाव में मुंबई में मिलता है, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के कहने पर तब के सुपर स्टार दिलीप कुमार ने मुंबई से चुनाव लड़ रहे नेहरू के चहेते वी के कृष्णमेनन का प्रचार किया था। जिसमें उन्हें जीत हासिल हुई थी।

हालांकि हिंदीभाषी इलाकों में एक दौर तक चूंकि फिल्म देखना कम से कम पारिवारिक संरक्षकों की नजर में उचित नहीं माना जाता था, इसलिए फिल्मी सितारों से प्रचार कराने या उन्हें चुनावी मैदान में उतारने से परहेज किया जाता रहा। लेकिन साल 1984 से स्थितियां बदलीं। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उपजी सहानुभूति का कांग्रेस ने जमकर फायदा उठाया। तब फिल्मी सितारों के बिना भी कांग्रेस का डंका बजना ही था, जो चुनाव नतीजों से साबित भी हुआ। लेकिन तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष और प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने मुंबई से सुनील दत्त, इलाहाबाद से अमिताभ बच्चन और चेन्नई से वैजयंतीमाला बाली को चुनावी मैदान में उतारा। तीनों कामयाब रहे। लेकिन इनमें से सिर्फ एक सुनील दत्त ही राजनीति में अपनी लंबी और गंभीर भूमिका निभा पाए। जबकि अमिताभ बच्चन को लोकसभा का कार्यकाल पूरा करने के पहले ही इस्तीफा देना पड़ा। उनका नाम बोफोर्स घोटाले में भी घसीटा गया। रही बात बैजयंतीमाला बाली की तो वे भी राजनीति में लंबी पारी नहीं खेल पाईं और सियासी परिदृश्य से गायब हो गईं। अमिताभ बच्चन की एक मशहूर फिल्म है मिस्टर नटवर लाल। उन्होंने अपनी सियासी पारी में राजनीति के नटवर लाल माने जाने वाले हेमवती नंदन बहुगुणा जैसी हस्ती को करारी शिकस्त दी। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री रहे हेमवंती नंदन बहुगुणा का राजनीतिक कद बहुत बड़ा था। उन्होंने राजनीति में कई परंपराएं भी स्थापित की थीं। उन्होंने कांग्रेस की राजनीति में सर्वशक्तिमान मानी जाती रहीं इंदिरा गांधी से लोहा लिया था। इस वजह से उन्हें इलाहाबाद की जनता पर पूरा भरोसा था, जहां उन्होंने पढ़ाई की थी, स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया था और राजनीति की लंबी और कुशल पारी खेली थी। बहरहाल फिल्मी सितारे के सामने उन्हें हार झेलनी पड़ी और कहा जाता है कि इस शिकस्त से उनका अंतर्मन ताजिंदगी बहुत व्यथित रहा।

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राजनीति की दुनिया में आने वाले सितारों में देखा जाता है कि वे चुनाव तो जीत जाते हैं, लेकिन वे अपना संसदीय दायित्व निभा नहीं पाते। साल 2004 में हेमा मालिनी के पति धर्मेंद्र को बीकानेर से भारतीय जनता पार्टी ने उम्मीदवार बनाया। वे जीते भी, लेकिन जीतने के बाद शायद ही वे कभी बीकानेर गए। हालांकि हेमा के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता है। इसी तरह उसी साल के चुनाव में मुंबई उत्तर की सीट से कांग्रेस ने हिंदी फिल्मों के जाने-माने सितारे गोविंदा को मैदान में उतारा था। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के राम नाइक जैसे जमीनी नेता को धूल चटाई। लेकिन राजनीति में वे भी नहीं रम पाए। बहरहाल 2019 के चुनाव में कांग्रेस ने एक बार फिर यहां से एक फिल्मी हीरोइन उर्मिला मातोंडकर पर दांव लगाया है। यह देखना होगा कि वे जीत पाती हैं या नहीं और राजनीति में कितनी लंबी पारी खेलती हैं। साल 1991 के आम चुनावों में उन दिनों के लोकप्रिय सीरियल रामायण में रावण का किरदार निभा चुके अरविंद त्रिवेदी को भाजपा ने गुजरात की सांबरकाठा सीट से जहां उम्मीदवार बनाया था, वहीं इसी सीरियल में सीता की भूमिका निभा चुकीं दीपिका चिखलिया को उस बड़ोदरा सीट से उम्मीदवार बनाया था, जहां से पिछले आम चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी ने जीत दर्ज की थी। यह बात और है कि अब ये दोनों राजनीति में सक्रिय नहीं हैं। फिल्मी सितारों पर दांव लगाने में कोई भी दल पीछे नहीं रहे हैं। 1991 के ही आम चुनावों में नई दिल्ली लोकसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी के खिलाफ कांग्रेस ने हिंदी फिल्मों के चाकलेटी सुपर हीरो रहे राजेश खन्ना पर दांव लगाया था, जिसमें उन्हें महज 15 सौ वोटों से हार हाथ लगी थी। उस बार आडवाणी ने गुजरात के गांधीनगर से भी चुनाव जीता था, लिहाजा उन्होंने नई दिल्ली की सीट छोड़ दी। इसके बाद हुए उपचुनाव में राजेश खन्ना ने जीत दर्ज की, उनके खिलाफ भारतीय जनता पार्टी ने हिंदी फिल्मों में शॉटगन के नाम से मशहूर रहे शत्रुघ्न सिन्हा को मैदान में उतारा था। बाद में शत्रुघ्न सिन्हा पटना की पाटलिपुत्र सीट से चुनाव जीतते रहे। इस बार उन्होंने टिकट कटने के बाद कांग्रेस का दामन थाम लिया है और अपनी परंपरागत सीट से ही मैदान में हैं। हालांकि इस बार उनका चुनाव निशान कमल के फूल की जगह हाथ का पंजा हो गया है। कांग्रेस ने पिछले चुनाव में हिंदी फिल्मों की स्टार रही नगमा को भी मेरठ से मैदान में उतारा था। हालांकि उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा था।

राज्यसभा में तो संस्कृति और कला के कोटे से फिल्मी सितारों को सदस्य बनाने की परंपरा पुरानी है। कभी कांग्रेस ने सुनील दत्त की पत्नी और हिंदी की जानी-मानी सितारा नरगिस दत्त को राज्यसभा भेजा था तो एचडी देवेगौड़ा की सरकार ने शबाना आजमी को भेजा। कांग्रेस पार्टी के उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष राजबब्बर को राजनीति में समाजवादी पार्टी ही लेकर आई थी। तब से वे राजनीति में ही जमे हुए हैं। अमर सिंह जब समाजवादी पार्टी के महासचिव थे, तब उन्होंने थोक के भाव से फिल्मी सितारों को राजनीति की राह पकड़ाने की कोशिश की। जया बच्चन और जया प्रदा समाजवादी पार्टी की सांसद उनकी ही बदौलत रहीं। अब जयाप्रदा भाजपा की उम्मीदवार हैं, तो जया बच्चन अब भी समाजवादी पार्टी की राज्यसभा में सांसद हैं। वैसे जया प्रदा को राजनीति में एन चंद्रबाबू नायडू लाए थे, और उन्हें राज्यसभा का सदस्य चुनवाया था।

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ममता बनर्जी भले ही अपनी सादगी के लिए जानी जाती हैं, लेकिन उन्होंने भी बांग्ला फिल्मी सितारों पर जमकर दांव लगाया है। पिछली बार उन्होंने हिंदी और बांग्ला फिल्मों की जानी-मानी हीरोइन मुनमुन सेन को बांकुड़ा से मैदान में उतारा था तो इस बार वे आसनसोल से बाबुल सुप्रियो के खिलाफ मुकाबला कर रही हैं। बांग्ला फिल्मों की एक और हीरोइन शताब्दी रॉय ममता की ही पार्टी से पश्चिम बंगाल के वीरभूम लोकसभा सीट से सांसद हैं और एक बार फिर मैदान में हैं।

दक्षिण भारत में राजनीति में तो फिल्मी सितारों का दबदबा रहा ही है। खासकर आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में फिल्मी सितारों की बनाई पार्टियां ही सत्ता में रही हैं या हैं। आंध्र प्रदेश की सत्ताधारी पार्टी तेलुगू देशम की स्थापना तेलुगू स्वाभिमान के नाम पर दक्षिण के सुपर स्टार नंदमुरि तारक रामाराव ने की थी, तो तमिलनाडु की दोनों प्रमुख पार्टियां डीएमके और एआईडीएमके के कर्ता-धर्ता हीरो ही रहे हैं। डीएमके के हाल तक मुखिया रहे स्वर्गीय करूणानिधि तमिल फिल्मों के जाने-माने पटकथाकार थे, तो एआईडीएमके के संस्थापक एमजी रामचंद्रन तमिल सिनेमा के सुपर स्टार थे। उनकी उत्तराधिकारी रहीं जयललिता भी दक्षिण की फिल्मों की सुपर स्टार रहीं। तमिलनाडु में इन दिनों दक्षिण के सुपर स्टार रजनीकांत के भी राजनीति में आने की चर्चा है तो दूसरे बड़े सितारे विजयकांतन ने डीएमडीके नाम से अलग पार्टी बना ली है। इसी तरह हिंदी और दक्षिण भारत के सुपर स्टार कमल हासन ने भी अपनी पार्टी मक्कल निधि मय्यम बना ली है।

उमेश चतुर्वेदी

 

 

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