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राजनेताओं के विवादास्पद बोल जिम्मेदार कौन?

राजनेताओं के विवादास्पद बोल जिम्मेदार कौन?

भारत एक लोकतांत्रिक देश है और ऐसे लोकतांत्रिक देश में चुनाव एक उत्सव की तरह होता है। चुनाव चाहे लोकसभा का हो या फिर किसी अन्य निकाय का, चुनाव ही एक ऐसा समय है जिससे देश की जनता अपने उस ‘ब्रह्मास्त्र’ का प्रयोग करती है, जिसके माध्यम से वह कुछ भी कर सकती है। किंतु आजकल देखने में आ रहा है कि चुनाव प्रचार का स्तर दिन-प्रतिदिन गिरता जा रहा है। चुनाव प्रचार के दौरान जिस तरह की भाषा का प्रयोग हो रहा है वह विकृत होती जा रही है। कुल मिलाकर कहने का आशय यह है कि अपने भाषण के दौरान नेता वे बातें भी बोल जाते हैं, जिससे दूसरों की भावनाएं व्यक्तिगत रूप से भी आहत होती है। राजनीतिक मंच से राजनीतिक बातें की जाएं यह अच्छी बात है किंतु जब एक दूसरे पर व्यक्तिगत प्रहार होने लगते हैं तो स्थिति बद से बदतर होने लगती है। भारत की सभी पार्टियों के वरिष्ठ नेताओं से यह उम्मीद की जाती है कि वे चुनाव के समय ऐसा वातावरण तैयार करें जिससे एक स्वस्थ चुनावी प्रतिस्पर्धा की परिपाटी विकसित हो। ऐसे वातावरण से भावी पीढ़ी कुछ सीखे और सबक लें किंतु अभी जो कुछ हो रहा है उससे क्या सीखेगी यह समझ से परे हो जाता है। चुनाव प्रचार के दौरान वर्तमान समय में जो कुछ देखने एवं सुनने में आ रहा है उससे सिर्फ देशवासी ही हैरान एवं परेशान नहीं हैं बल्कि चुनाव आयोग भी परेशान होगा। चुनाव आयोग की परेशानी का एक कारण यह भी हो सकता है कि उसके सामने शिकायतों का एक ढेर लग जाता है। चुनाव आयोग के साथ-साथ इस देश की जनता भी चाहती है कि वरिष्ठ नेता नैतिकता, शालीनता एवं मर्यादा का पालन करें। कानून का पालन यदि वे नहीं करते हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई भी हो सकती है, किंतु नैतिकता, मर्यादा एवं शालीनता के मामले में कानून क्या करेगा? अत: इसकी मर्यादा का ध्यान तो नेताओं को स्वयं रखना होगा।

इस परिप्रेक्ष्य में यहां यह कहना अनुचित नहीं होगा कि 2019 के लोकसभा चुनाव में अमर्यादित भाषा के प्रयोग में ना सिर्फ कांग्रेस बल्कि बाकी पार्टियां भी कुछ कम नहीं हैं। उत्तर प्रदेश की रामपुर सीट से गठबंधन प्रत्याशी आजम खान ने हाल ही में तहसील शाहबाद में एक जनसभा में अमर्यादित टिप्पणी की थी। आजम खान ने कहा था कि जिसको हम उंगली पकड़कर रामपुर लाए, आपने 10 साल जिनसे प्रतिनिधित्व कराया, उसकी असलियत समझने में आपको 17 साल लगे, मैं 17 दिन में पहचान गया कि इनका अंडरवियर खाकी रंग का है। इस मामले में सपा नेता आजम खान के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया गया है। बीजेपी ने आईपीसी की धारा 509 (महिलाओं को लेकर अपमानजनक टिप्पणी) और धारा 125 के तहत पुलिस में एफ आई आर दर्ज करवाई है।

इसी तरह आजम खान के बेटे अब्दुल्ला आजम खान ने भी भाजपा प्रत्याशी जयाप्रदा के खिलाफ विवादित बयान दिया है। रामपुर में प्रचार के आखिरी दिन अब्दुल्ला खान ने एक रैली के दौरान बिना नाम लिए जयाप्रदा पर आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए कहा कि हमें अली और बजरंगबली की जरूरत है, न कि अनारकली की।

यहां यह कहना अनिवार्य है कि 2017 के शुरुआत में वित्तमंत्री अरुण जेटली ने एक फेसबुक पोस्ट लिखी थी जिसका प्रारंभ उन्होंने संसद में जीएसटी को लेकर चल रहे गतिरोध के साथ किया था। लेकिन उनकी यह पोस्ट मुख्यत: राजनीतिक बहस के दौरान भाषा में आ रही गिरावट का उल्लेख करती है। प्रारंभिक और सैद्धांतिक रूप से सभी राजनीतिक व्यक्तियों को उनके इस विचार का स्वागत करना चाहिये। इस बात में कोई शक नहीं है कि हाल के समय में राजनीतिक बहस का स्तर लगातार गिरता जा रहा है और अधिकतर बहस एक दूसरे की आलोचना के स्थान पर अपशब्दों पर केंद्रित होकर रह गई हैं। असंसदीय भाषा और भावों का प्रयोग इतना आम हो गया है कि इस बात में अंतर करना काफी मुश्किल हो गया है कि क्या संसदीय है और क्या नहीं। इसे एक प्रकार से राजनीति का ‘मानसिक दिवालियापन’ कहा जा सकता है। जिस प्रकार अपराधी छवि के लोगों का निरंतर राजनीति में आना हो रहा है और विभिन्न सरकारों और राजनीतिक दलों में वह महत्वपूर्ण स्थान पा रहे हैं उसके बाद ऐसा होना कोई अप्रत्याशित नहीं है।

अगर भारतीय राजनीतिक इतिहास का अध्ययन करें तो बड़ी दिलचस्प बातें निकल आती हैं, जो चुनावों के दौरान बिगड़े बोल के पैदा होने की कहानी बताते हैं। आजादी की लड़ाई के दौरान एक समय ऐसा भी था जब कांग्रेस पार्टी का लगभग पूरा शीर्ष नेतृत्व इंग्लैंड के सर्वश्रेष्ठ कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में शिक्षा प्राप्त समाज के एक चुनिंदा तबके से आता था। वे सब बेहतरीन अंग्रेजी संसदीय परंपराओं का अनुसरण करते थे। वे सभी अंग्रेजी भाषा और संस्कृति से बहुत अच्छी तरह वाकिफ थे और अंग्रेजी विशेषता को आत्मसात कर रहे थे। इसके साथ ही वे एक भाषा और संस्कृति को लेकर आए जो भारतीय परिस्थितियों से विदेशी होने के बावजूद उस समय देश के नेतृत्व की पहचान बन गई थी। यह परंपरा महात्मा गांधी के भारतीय राजनीति में पदार्पण के साथ दरकनी  शुरू हुई। उन्होंने  खादी अपना कर इस तबके को हिलाने का प्रयास किया। उनकी खादी की धोती और दुशाला ब्रिटिश हुक्मरानो को टीसने लगी थी। ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री चर्चिल उनकी इस पोशाक से बहुत नाराज रहता था और नफरत से उन्हें ‘आधा नंगा फकीर’ कहकर पुकारता था। गांधी जी को  यह बात बहुत अच्छी तरह पता थी कि विदेशी कपड़े पहनकर और विदशी भाषा में बातचीत कर जनता के साथ नहीं जुड़ा जा सकता। खादी के साथ उनका प्रयोग बेहद सफल रहा था।

दूसरी तरफ नेहरू अंग्रेजो  की तरफ अधिक आसक्त थे। अंग्रेजी भाषा पर उनकी पकड़ भी बहुत बेहतरीन थी। वो खुद को अंग्रेजो के साथ बहुत ‘कम्फर्टेबल’ मानते थे।  उन्हें उन सभी को बढ़ावा देना बहुत पसंद था जो उसके साथ उस वातावरण में संवाद कर सकने में कामयाब रहते थे। उनके साथियों में शायद लाल बहादुर शास्त्री इकलौते ऐसे व्यक्ति थे जिनकी परवरिश निचले दर्जे की थी। लेकिन भारतीय राजनीतिक वर्ग की उत्कृष्ट और भाषा की बाधा को सबसे पहले राममनोहर लोहिया ने तोड़ा जिन्हें गैर-कांग्रेसवाद और पिछड़ों की राजनीति का मूल वास्तुकार माना जाता है। उनका प्रवेश और अभिव्यक्ति भारतीय राजनीति में स्थानीयों का पहला परिचय था। इससे पहले कांग्रेस सबसे अधिक प्रभावशाली पार्टी थी जिसका नेतृत्व समाज के ‘कुलीन वर्ग ‘ करते थे। लोहिया ने कहा, ”जो संख्या में अधिक हैं उन्हें समाज का नेतृत्व करना चाहिये।’’ उनका यह तर्क सत्तारूढ़ अभिजात वर्ग की इच्छाओं के विरुद्ध सबसे आदर्श लोकतांत्रित तर्क था। हालांकि वे अपनी पिछड़ों की राजनीति की सफलता को देखने के लिये अधिक समय तक जीवित नहीं रहे लेकिन 90 के दशक के प्रारंभ में मंडल आयोग के लागू होने के साथ ही एक ऐसा नेतृत्व सामने आया जो हर मामले में बिल्कुल अलग था।


 

भारतीय चुनावों में बांग्लादेशी घुसपैठ!


 

देश में इस समय लोकसभा चुनावों को लेकर सियासी महासंग्राम छिड़ा हुआ है।  राजनीतिक दल चुनावी जीत हासिल करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं तथा चुनाव जीतने के लिए, मतदाताओं को लुभाने के लिए देश के विभिन्न क्षेत्रों की लोकप्रिय हस्तियों का सहारा ले रहे हैं। लेकिन एक राजनीतिक पार्टी ऐसी है जिसने अपने प्रचार में बांग्लादेशी फिल्म इंडस्ट्री के लोगों को बुलाया है तथा वो पार्टी है ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस। यह सुनने में अजीब लग सकता है लेकिन  ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में पार्टी की जीत के लिए बांग्लादेशी कलाकार फिरदौस को बुलाया तथा फिरदौस बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी की जीत के लिए रोड शो किये, लोगों से वोट मांगे। यहां सवाल ये नहीं किसी फिल्म कलाकार को प्रचार के लिए बुलाया गया है, बल्कि सवाल तो ये है कि आखिर बांग्लादेशी कलाकार को क्यों बुलाया गया तथा खासकर पश्चिम बंगाल के लिए ही क्यों बुलाया गया? सभी जानते हैं कि भारत बांग्लादेशी घुसपैठियों की ज्वलंत समस्या से जूझ रहा है तथा बड़ी संख्या में बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठिये पश्चिम बंगाल में रह रहे हैं। असल में ममता बनर्जी ने इन्हीं बांग्लादेशी घुसपैठियों का वोट पाने के लिए फिरदौस को बुलाया। यह सोचने वाली बात है कि जो व्यक्ति बांग्लादेशी घुसपैठियों के वोट पाकर संसद में जाएगा वो किसके लिए काम करेगा? यही कारण है कि जब असम के लिए एनआरसी जारी हुआ तो ममता बनर्जी ने सबसे तीव्र विरोध किया। एनआरसी के विरोध में ममता ने देश में हिंसा, आगजनी की चेतावनी तक दी थी क्योंकि वह जानती है कि असम की तरह अगर बंगाल के लिए एनआरसी आया तो बांग्लादेशी घुसपैठियों पर चाबुक चलेगा, जो ममता बनर्जी की पार्टी के वोटर हैं।


लालू, मुलायम, मायावती, कांशीराम, कल्याण सिंह, उमा भारती न तो चांदी की चम्मच लेकर पैदा हुए थे और न ही उनका झुकाव किसी भी प्रकार की संभ्रांतवादी सुविधाओं के प्रति था। ये सब जमीन से उठकर आज इस मुकाम पर पहुंचे हैं। इन्होंने भारतीय राजनीति में एक नई भाषा को प्रस्तुत किया जो निश्चित रूप से कभी खुद को शासक मानने वाले राजनीतिक समूहों को पसंद नहीं आई। इन समूहों ने लालू, मुलायम और मायावती का मजाक तक बनाया। उनकी भाषा का उपहास उड़ाया गया। ये नेता अभिव्यक्ति के मामले में संभ्रांत नहीं थे। इनमें से अधिकांश की समस्या अंग्रेजी बोलने से संबंधित थी। इसके अलावा इनके प्रति तमाम तरह के पूर्वाग्रह भी थे। ये अलग बात है कुछ के की भ्रस्टाचार और अक्षमता ने कई पूर्वाग्रहों को सच साबित किया। लेकिन कांग्रेस के ‘कुलीन’ शासकों के पास इनके ”संख्या आधारित प्रभुत्व’’ को स्वीकार करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था।

इस टकराव के फलस्वरूप देश के राजनितिक विमर्श में एक अलग भाषा का आगाज हो गया। अंग्रेजी का स्थान स्थानीय भाषा ने ले लिया था। यह नई भाषाई संस्कृति अंग्रेजीभाषी वर्ग के लिये एक आघात की तरह थी। दो समूहों के बीच ‘टकराव’ ने इस मुद्दे को और अधिक जटिल बना दिया। शासक वर्ग के लिये इस नए राजनीतिक वर्ग द्वारा चुनौती पेश किया जाना और प्रतिस्थापित किया जाना बेहद दर्दनाक था। इसने भारतीय राजनीति में गलतियों की नई संभावनाओं को जन्म दिया। यह बंटवारा अधिक मौलिक था और तीव्र कड़वाहट से भरा था। दोनों समूह एक ही राजनीतिक जमीन के लिये लड़ रहे थे और कोई भी झुकने को तैयार नहीं था। लेकिन संख्याबल ने अंतत: बाजी मार ली जिसके फलस्वरूप सबसे पहले एक दूसरे के लिये आपसी सम्मान और प्रशंसा की बली चढ़ी। राजनीतिक मतभेद राजनीतिक दुश्मनी में बदल गए। और बहस का स्थान अपशब्दों ने ले लिया।

कांग्रेस का यही कुलीन वर्ग आज भी अपनी मानसिकता से पीछा नहीं छुड़ा पा रहा है। 2014 में नरेंद्र मोदी को मिले भारी बहुमत से कांग्रेस का यह अभिजात्य वर्ग अभी तक बौखलाया हुआ है और 2014 से ही या सही कहा जाए तो 2001 में मोदी के गुजरात के सत्ता संभालने के बाद से ही, मोदी के बारे में अनर्गल प्रलाप करने में लगा है। लोकसभा चुनाव का तीसरा चरण खत्म हो चुका है और हर बार की तरह  एक बार फिर से कांग्रेस के नेताओं ने पीएम मोदी पर विवादित टिप्पणी और धर्म की राजनीति करना शुरू कर दिया है। अपने ही नेताओं द्वारा दिए जा रहे विवादित बयानों से कांग्रेस को ही नुकसान हो रहा है। वैसे ये कोई नयी बात नहीं है, सियासी घमासान के बीच कांग्रेस के नेता अक्सर ही अपनी मर्यादा भूल जातें हैं और कुछ ऐसा बोल जातें जो विवाद उत्पन्न कर देता है। अब लोकसभा चुनाव में असली मुद्दे गायब हैं तो कांग्रेस के नेताओं में हताशा बढ़ रही है और वो अब पीएम मोदी पर व्यक्तिगत हमले

करने से भी बाज नहीं आ रहे हैं।  कांग्रेस के कुछ ‘कुलीन’ नेताओं के बयान की कुछ बानगी देखिये :–

मणिशंकर अय्यर

कांग्रेस के नेता मणिशंकर अय्यर अक्सर कुछ न कुछ ऐसा बोल ही जातें हैं जो न सिर्फ बीजेपी पर हमले के मकसद से होता है बल्कि देश के पीएम को नीचा दिखाने के प्रयास की तरह लगता है। इसके साथ ही वो बीजेपी को मुस्लिम विरोधी पार्टी होने का राग भी अलापते रहते हैं। मणिशंकर अय्यर के ही एक बयान ने साल 2014 के आम चुनाव में बीजेपी की चुनावी रणनीति को बदलकर रख दिया था। दरअसल, 2014 के आम चुनाव से पहले उन्होंने कहा था, ”मैं आपसे वादा करता हूं कि 21वीं सदी में नरेंद्र मोदी इस देश के प्रधानमंत्री कभी नहीं बन पाएंगे लेकिन, अगर वो यहां आकर चाय बेचना चाहते हैं’’ तो हम उनके लिए जगह दिला सकते हैं।’ मणिशंकर अय्यर के इस बयान का बीजेपी ने फायदा उठाया और पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आ गयी और नरेंद्र मोदी ही देश के पीएम बन गये।

ऐसा ही कुछ मणिशंकर अय्यर ने गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान भी कहा था जहां बीजेपी को अपनी साख बचानी थी और कांग्रेस तब पाटीदार नेता हार्दिक पटेल और कांग्रेस नेता अहमद पटेल के सहारे अपनी पकड़ मजबूत बनाने की पूरी कोशिश कर रही थी और कांग्रेस के पाले में जीत आ भी सकती थी लेकिन कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर के दांव-पेंच उलटे पड़ गये। उन्होंने इस दौरान एक विवादित बयान दे डाला, ”मुझे लगता है कि ये आदमी बहुत ‘नीच किस्म’ का आदमी है, इसमें कोई सभ्यता नहीं है?’’ मणिशंकर अय्यर के इस बयान का फायदा बीजेपी को चुनाव में मिला और बीजेपी की जीत हुई थी।

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शशि थरूर

कांग्रेस नेता शशि थरूर अक्सर ही अपने विवादित बोल के लिए जाने जातें हैं और वो अपनी भाषा में इस तरह के शब्दों का प्रयोग करते हैं जिससे न वो सिर्फ कांग्रेस के लिए एक नयी मुश्किल खड़ी कर देते हैं, बल्कि उनके इस कदम से बीजेपी की तरफ जनता का झुकाव बढ़ जाता है। अक्सर ही वो ‘अच्छे हिंदू, बुरे हिंदू’ की परिभाषा देते हुए नजर आते हैं तो कभी वो देश को ‘हिंदू पाकिस्तान’ बोल जाते हैं। कांग्रेस की मेहनत पर पानी फेरने का काम शशि बहुत ही कुशलता के साथ करते हैं और उनकी इस कुशलता के क्या कहने क्योंकि उन्हीं के बयानों से तो कांग्रेस की हिंदू धर्म के लिए नफरत और ढोंग सामने आ जाते हंै। थरूर ने चन्नई में हुए ‘द हिंदू लिट फॉर लाइफ डायलॉग 2018’ में बाबरी विवाद पर पर बयान में कहा, ”ज्यादातर हिंदू मानते हैं कि अयोध्या भगवान राम की जन्मभूमि है। कोई ‘अच्छा हिंदू’ ऐसी जगह पर राममंदिर का निर्माण नहीं चाहेगा, जहां किसी अन्य धार्मिक स्थल को तोड़ा गया हो।’’ उन्होंने अपने बयान से अपनी पार्टी की धर्मनिरपेक्षता के ढोंग को सामने रख दिया जो तुष्टिकरण की राजनीति के लिए कुछ भी करती है। इससे पहले शशि थरूर ने अपने एक बयान में कहा था, कि, ”भारत ‘हिंदू पाकिस्तान’ बन जायेगा यदि बीजेपी 2019 के आम चुनावों में जीत दर्ज कर सत्ता में वापस आती है।’’ अक्सर ही वो हिंदू धर्म पर हमले करते नजर आते हैं और दूसरी तरफ उनकी पार्टी ‘शिवभक्ति तो कभी रामभक्ति तो कभी माता की भक्ति’ के ढोंग में लिप्त रहती है। ऐसे में शशि थरूर का बयान दर्शाता है कि वास्तव में उनकी पार्टी धर्म की राजनीति करती है और आरोप बीजेपी पर मढ़ती है।

मल्लिकार्जुन खडग़े

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खडग़े ने न सिर्फ बीजेपी पर हमला बोला था बल्कि हिंदुत्व की विचारधारा को मानने वाले आरएसएस को ‘कुत्ता’ कहा था। वो आरएसएस के विचारों की तुलना जहर से भी कर चुके हैं। कांग्रेस के इस वरिष्ठ नेता ने महाराष्ट्र के जलगांव में एक सभा को संबोधित करते हुए कहा था, ”हम लोगों (कांग्रेस) ने देश के लिए अपना जीवन बलिदान किया है। इंदिरा गांधी ने देश की एकता-अखंडता के लिए अपना बलिदान दिया जबकि राजीव गांधी ने देश के लिए अपना जीवन कुर्बान किया था। आप मुझे बताईये कि देश की आजादी के लिए भाजपा और संघ (नेताओं) के घर का एक कुत्ता भी कुर्बान हुआ है।’’ ‘यही नहीं लोकसभा में उन्होंने अधिवेशन में पीएम मोदी पर निशाना साधते हुए उन्हें चाय वाला कहा था। अपने बयान में उन्होंने कहा था, ”सिर्फ चाय वाला होने से कुछ नहीं होता, देश के लिए कुछ करना भी पड़ता है।’’ उन्होंने इससे ये जताने की कोशिश की थी कि देश का प्रधानमंत्री एक चाय वाला नहीं बन सकता है बल्कि सिर्फ उन्हीं के पार्टी के नेताओं का पीएम पद पर अधिकार है। ये समझ से बाहर है कि मल्लिकार्जुन खडग़े इतिहास की बात तो करते हैं लेकिन एक लोकतांत्रिक देश के शीर्ष पद को अपने घर की खेती समझते हैं और हर बड़े पद पर अपनी पार्टी के अधिपत्य को दर्शाने की कोशिश करते हैं। मल्लिकार्जुन का ये बयान दर्शाता है कि कांग्रेस बस सत्ता में आना चाहती है। उनकी मानें तो कांग्रेस पार्टी के अनुसार किसी अन्य नागरिक को ये अधिकार नहीं है कि वो प्रधानमंत्री के पद पर बैठे।


 

राहुल का ‘झूठ’!


 

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देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी के झूठ का पर्दाफाश हो गया है। राहुल गांधी ने ‘चौकीदार चोर है’ मामले में झूठ बोलने की बात कबूल की है। राहुल ने सुप्रीम कोर्ट से माफी मांगी है। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामें में राहुल गांधी ने कहा कि चुनाव के आवेश में उन्होंने यह बयान दिया है। राहुल गांधी ने इस मामले में अंडरटेकिंग देते हुए कहा कि आगे से पब्लिक में कोई भी ऐसी टिप्पणी नहीं करेंगे। राहुल गांधी सुप्रीम कोर्ट के बयान को गलत तरह से पेश कर देश के लोगों को गुमराह कर रहे थे। इसके पहले सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी के ‘चौकीदार चोर है’ के बयान पर नोटिस जारी कर 22 अप्रैल तक जवाब देने को कहा था। राफेल मामले में प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ दिए गए राहुल के बयान पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम ये साफ करना चाहते हैं कि राहुल गांधी ने सुप्रीम कोर्ट के हवाले से जो कुछ कहा है वो गलत है। कोर्ट ने ऐसी कोई टिप्पणी नहीं की है।


कपिल सिब्बल

कपिल सिब्बल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और वरिष्ठ वकील भी हैं। तीन तलाक और अयोध्या विवाद में कपिल सिब्बल की भूमिका काफी अहम रही है। उनकी भूमिका ने कांग्रेस के दोहरे रुख को सामने रख दिया था। अयोध्या विवाद दशकों से देश की राजनीति को प्रभावित करता रहा हो लेकिन इस विवाद को कांग्रेस ने सालों पानी देकर सींचा है। वो चाहती ही नहीं है कि ये विवाद सुलझे तभी तो जब एनडीए सरकार और सुप्रीम कोर्ट जल्द ही इस विवाद को सुलझाकर हिंदू-मुस्लिम में सांप्रदायिक सौहार्द को कायम करने के प्रयास में हैं तो कांग्रेस इसके खिलाफ साफ नजर आती है। सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से पक्ष रखते हुए वरिष्ठ वकील और कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि सुनवाई को जुलाई 2019 तक टाल दिया जाए। बाद में सुन्नी वक्फ बोर्ड ने कपिल से इस मामले में पीछे हटने के लिए कह दिया था क्योंकि वो कपिल के रुख से नाराज थे। कपिल सिब्बल की ये अपील स्पष्ट करती है कि वास्तव में कांग्रेस अयोध्या विवाद को विवाद ही रहने देना चाहती है।

राहुल गांधी

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी लोकसभा चुनाव में बीजेपी की जीत में सबसे बड़ी भूमिका निभाएंगे, ये कहना कुछ गलत नहीं होगा। जिस आत्मविश्वास के साथ वो एक के बाद एक झूठ बोलते हैं अपने दावों को सच बताते हैं वो किसी से छुपा नहीं है। वो धर्म से जुड़े ढोंग भी बहुत ही खूबसूरती से करते हैं- कभी शिवभक्त बन जाते तो कभी रामभक्त, तो कभी देवी मां के भक्त बन जाते हैं और दूसरी तरफ ये भी कहते हैं, ”मैं किसी भी तरह के हिंदुत्व में विश्वास नहीं रखता चाहे वो नरम हिंदुत्व हो या फिर कट्टर हिंदुत्व।’’ वो हर बार पीएम मोदी पर निशाना साधते हैं और हर बार खुद एक मजाक बनकर रह जाते हैं। वो आम जनता को भी बता देते हैं कि अगली बार उन्हें प्रधानमंत्री क्यों नहीं बनाना चाहिए। राफेल डील को वो आज भी बार-बार घोटाले के रूप में चित्रित करने की कोशिश कर रहे हैं और इसके लिए न जाने कितने झूठे तर्क दे चुके हैं और उनके हर दावों की धज्जियां उड़ गयी जब फ्रांस की सरकार और दस्सौल्ट एविएशन कंपनी ने राफेल डील पर सफाई दी। यही नहीं उन्होंने विधानसभा के चुनावी राज्य मध्य प्रदेश में चुनावी रैली के दौरान एक और झूठ का पुलिंदा बांध दिया। उन्होंने कहा, ”नीरव मोदी 35,000 करोड़ रुपये लेकर भागता है तो वित्तमंत्री अरुण जेटली से मिलकर भागता है।’’ अरुण जेटली ने उनके इस झूठ का पर्दाफाश कर दिया। अविश्वास प्रस्ताव हो या चुनावी रैली या हो अंतर्राष्ट्रीय मंच हर जगह राहुल ने अपने भाषण और झूठे तर्कों से बता दिया है कि वो एक असफल नेता हैं जो कभी झूठ नहीं बोलना छोड़ते। हालांकि, उनके हर भाषण और आरोपों से बीजेपी सरकार को फायदा ही हुआ है क्योंकि आम जनता को भी ये समझ आ गया है राहुल गांधी भले ही एक असफल नेता हो लेकिन उनके जैसा ‘मसखरा’ कोई और नहीं हो सकता।

इसमें दो राय नहीं की भाजपा या अन्य दलों ने कांग्रेस की इस मानसिकता का प्रतिकार ‘ईंट का जवाब पत्थर’ वाले स्टाइल से किया है लेकिन सभी राजनैतिक दलों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि देश की जनता को बहुत अधिक दिनों तक बरगलाया नहीं जा सकता है। अब वोटिंग मशीन में नोटा या यूं कहें की नापसंदगी का भी बटन मिल रहा है। कहीं ऐसा न हो जाए कि सभी दलों की पोल खुल जाए। काफी अरसे से यह बात महसूस की जा रही है कि राजनीति अब रुटीन से हटकर होनी चाहिए यानि कि जिस तर्ज पर वर्तमान राजनीति चल रही है, उससे थोड़ा हटना होगा। चुनाव प्रचार के दौरान जो कुछ भी हो रहा है, ऐसा नहीं है कि कोई एक दो दिन में ऐसी स्थिति बनी है। चुनाव प्रचार के दौरान मर्यादा एवं शालीनता का उल्लंघन तो एक लंबे अरसे से हो रहा है, किंतु ये चीजें अब कुछ ज्यादा हो गई हैं। यदि इस प्रकार की भाषा पर लगाम नहीं लगाई गई तो इस प्रवृत्ति को और बढ़ावा मिलेगा। आज सवाल यह उठता है कि इस स्थिति के लिए सबसे अधिक जिम्मेवार कौन है? यदि इस पर विचार किया जाए तो देखने में यही मिलेगा कि कोई भी दल यह मानने को तैयार नहीं है कि इस प्रकार का वातावरण उसकी तरफ से तैयार किया गया है। बहरहाल जो भी हो, आज आवश्यकता इस बात की है कि देश के सभी नेता सामूहिक जिम्मेदारी निभाते हुए एक स्वच्छ वातावरण बनाने का काम करें।

नीलाभ कृष्ण

 

 

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