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राजस्थान : हार पर रार से सरकार संकट में

राजस्थान : हार पर रार से सरकार संकट में

राजस्थान के मतदाताओं का अजब गजब फैसला प्रदेश कांग्रेस की राजनीति में तूफान का सबब बन गया है। एक ओर 67 साल की संसदीय चुनाव की यात्रा में लगातार दो बार लोकसभा की सभी 25 सीटे भाजपा (गठबंधन सहित) की झोली में भर नया इतिहास रचा। वही विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की ताजपोशी में सहायक बनने के बावजूद पांच माह बाद ही मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के गृहनगर जोधपुर संसदीय क्षेत्र में पुत्र वैभव गहलोत सहित कांग्रेस की शर्मनाक पराजय ने बूथ स्तर पर पार्टी प्रत्याशी को मिले वोटों का राजनीतिक पोस्टपार्टम एवं कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के मीडिया वार की कवायद से सरकार तथा संगठन के बीच दरार गहराने के साथ नेतृत्व परिवर्तन की मांग से सरकार के अस्तित्व को लेकर सवालिया निशान खड़े कर दिये है। उधर सियासी राजनीति के जादूगर अशोक गहलोत ने निकाय चुनावों के लिए वार्डो के परिसीमन की प्रक्रिया के बहाने प्रमुख विपक्ष भाजपा को उलझाने की चाल चली है तो प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के पिता स्वर्गीय राजेश पायलट की पुण्यतिथि पर शक्ति प्रदर्शन की गंूज सत्ता के गलियारों में सुनी गई। एक के बाद एक संकटों से जूझ रही सरकार को बजट सत्र में अपनों के साथ विपक्ष से भी सामना करना है।

अमेठी की परम्परागत लोकसभा सीट पर पराजित हुए राहुल गांधी द्वारा अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने की जिद तथा कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में चुनावी हार पर हुई चर्चा और इससे जुड़ी खबरों ने आग मे घी का काम किया। राहुल गांधी द्वारा मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सहित पार्टी के तीन वरिष्ठ नेताओं पर चुनाव में पुत्र मोह का आरोप जडऩे तथा महासचिव प्रियंका गांधी की जवाबतलबी से प्रदेश की सियासी राजनीति में घमासान मच गया है। अपने निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस प्रत्याषी की हार में सर्वाधिक एक लाख पन्द्रह हजार वोटो का अंतर रहने के मद्देनजर गहलोत समर्थक कृषि मंत्री लालचन्द कटारिया का इस्तीफा सुर्खियो में रहा। राजनीतिक गलियारों में इसे नैतिकता के नाते उठाया गया कदम बताया गया। लेकिन हकीकत यह है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट समेत अन्य मंत्रीगण अपने निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस प्रत्याशी को बढ़त नहीं दिला सके। यही नही 14 मंत्री खुद का बूथ और कांग्रेस के 18 प्रत्याशी भी बूथ बचाने में नाकामयाब रहे। गहलोत के क्षेत्र सरदारपुरा में यह अंतर 18 हजार से अधिक था। वैभव गहलोत को अपने बूथ पर 266 तथा भाजपा को 605 वोट मिले। पायलट के निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस प्रत्याशी 22 हजार वोटों से पिछड़ गया। केवल खाद्य मंत्री रमेश मीणा (सपोटरा) तथा महिला बाल विकास मंत्री ममता भूपेश (सिकराय) क्रमश: 12 हजार एवं 14 हजार से अधिक मतों की बढ़त दिला सके। कुल 200 विधानसभा क्षेत्रो में भाजपा प्रत्याशी 185 पर आगे रहे।

कांग्रेस पार्टी सूत्रों के अनुसार चुनावी पराजय के बाद कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में करीब चालीस वक्ताओं ने अपने विचार रखे। लेकिन राजस्थान से जुड़ी खबरो के संदर्भ में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की आपसी खींचतान सतह पर आ गई। विधानसभा और लोकसभा चुनाव में गहलोत, पायलट के साथ-साथ चुनाव प्रचार के प्रदर्शन की बुनियाद इतनी कमजोर रही कि चुनावी हार का ठीकरा एक दूसरे पर फोडऩे की होड़ लग गई।

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जयपुर में प्रदेश कांग्रेस कार्यकारिणी की 29 मई की बैठक का सार यह था कि जनादेश को स्वीकार करते हुए, पार्टी अपनी कमियों को दूर करते हुए एकजुट होकर काम करेगी। प्रदेश प्रभारी महासचिव अविनाश पांडे ने स्पष्ट किया कि प्रदेश सरकार और संगठन में कोई बदलाव नहीं किया जायेगा। इस मौके पर पीपलदा से वरिष्ठ कांग्रेस विधायक और पूर्व विधानसभा उपाध्यक्ष रामनारायण मीणा के बयान ने सभी को चौंका दिया। मीडिया की एक खबर के अनुसार मीणा का कहना था कि प्रदेश कांग्रेस के नेताओं ने यदि स्वार्थ नहीं छोड़ा तो जुलाई तक गहलोत सरकार गिर जाएगी। उदय इंडिया से बातचीत में रामनारायण मीणा का पार्टी के हालात पर दर्द झलक आया। लोकसभा चुनाव में पार्टी ने उन्हे कोटा से उम्मीदवार बनाया था। लोकसभा चुनाव की सफलता को वह भाजपा के आर्थिक एवं पूंजीवादी व्यवस्था की जीत मानते है। नरेन्द्र मोदी एवं सरसंघ चालक मोहन भागवत ही भाजपा का चेहरा है। उन्हे आशंका है कि पार्टी के नेता कुर्सी को लेकर इसी तरह लड़ते रहे तो भाजपा प्रदेश की कांग्रेस सरकार को गिरा भी सकती है। इस संकट से बचने के लिए संगठन और सरकार की दशा सुधारनी होगी। मीणा बताते है कि जो लोग कभी पंचायत समिति या वार्ड मेम्बर नहीं बन पाये उन्हे संगठन में बडे बड़े पदों से नवाजा जाता है। बार-बार दल बदलने या कांग्रेस का विरोध करने वालो को सरकार में तरजीह दी जा रही है। इसके उदाहरण देते हुए उन्होने बताया कि परसादी लाल मीणा 2008 निर्दलीय तथा रमेष मीणा बसपा से चुनाव जीते। प्रताप सिंह खाचरियावास कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़े। प्रमोद जैन भाया भी निर्दलीय चुनाव जीते। मास्टर भंवरलाल मेघवाल को पिछली गहलोत सरकार मे मंत्रिमण्डल से हटाया गया था। दो बार चुनाव हार चुके बी.डी.कल्ला को घडे बंदी तथा बड़ो की कृपा से टिकट भी थमाया और इन सभी को मंत्री पद मिला। संगठन और सरकार में प्रतिनिधित्व के लिए कोई मापदण्ड नही है। अपनो को महत्व देने से पार्टी कमजोर हो रही है। मीणा याद दिलाते है कि इंदिरा गांधी ने उन्हे 1977 में पहली बार नैनवा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़वाया था। जनजाति के नेता होने के बावजूद वह सामान्य सीट से अब तक ग्यारह चुनाव लड़ चुके है। जनसंघ और भाजपा के गढ़ कोटा से वह 1996 में डॉ. दाऊदयाल जोशी से मात्र 685 मतो से पराजित हुए और 1998 में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रहे रघुवीर सिंह कौशल को 17428 मतों से पराजित कर लोकसभा पहुंचे। हालांकि वह 1999 में कौशल से हार गये। पार्टी के लिए निष्ठापूर्वक काम करने वाले मीणा का कहना है कि वह किसी गुट में विश्वास नहीं करते। इसलिए इन्हे वरिष्ठ होने के बावजूद सरकार में स्थान नहीं मिला। सौम्य और मृदुभाषी रामनारायण मीणा को पिछली सरकार के कार्यकाल में लम्बी प्रतीक्षा के बाद विधानसभा का उपाध्यक्ष बनाया गया। पार्टी और सरकार में इतनी जलालत सहते हुए भी वह किसानों तथा वंचित वर्ग के हितों के लिए समर्पित भाव से जुटे हुए है।

मीणा कांग्रेस के पुराने नेता रहे है जिनका पं. जवाहर लाल नेहरू से सम्पर्क का सफर सोनिया गांधी और राहुल गांधी तक रहा है। मीणा बताते है कि राजस्थान से 15 प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को 20 नवम्बर 1960 को नेहरूजी से मिलने के लिए दिल्ली बुलाया गया था। बूंदी जिले से वहां पहुंचे ग्यारह विद्यार्थियो की पंक्ति में आखिर में सबसे लम्बे रामनारायण के कंधे पर हाथ रख नेहरूजी ने चम्बल नदी की नहर और उसकी उपयोगिता के बारे में सवाल पूछा था। जवाब सुनकर नेहरूजी इस विद्यार्थी को अलग ले गये तथा स्वयं ने चाय बनाकर पिलायी और ग्रामीण जनजीवन के सम्बन्ध में पन्द्रह बीस मिनट तक जानकारी हासिल की।

लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली हार पर रार के चलते मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का एक न्यूज चैनल को दिया गया इंटरव्यू पार्टी के शीर्ष नेताओं की तलवारबाजी का प्रतीक बन गया। इंटरव्यू में गहलोत ने कम से कम जोधपुर सीट पर हार की जिम्मेदारी पायलट द्वारा लिए जाने की बात कही थी। जोधपुर की सीट का पूरा पोस्टमार्टम होना चाहिए कि वहां हम क्यों नहीं जीते। गहलोत का बयान राजनीतिक बबाल बन गया। मामला हाईकमान तक पहुंचने पर पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सुरेजवाला को सफाई देनी पड़ी। वैभव गहलोत की नामांकन रैली मे पायलट के भाषण और मतदान के दूसरे चरण मे उनके बयान को लेकर गहलोत लॉबी ने समूचे घटनाक्रम से पार्टी हाईकमान को अवगत कराने में जरा भी चूक नहीं की। हार की सामूहिक जिम्मेदारी लेने की जद्दो जहद में खेमो मे बंटी कांग्रेस के नेताओं में बयानबाजी की होड़ लग गई। उपममुख्यमंत्री एवं प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट ने चुनावी पराजय के पोस्टमार्टम के लिए प्रत्येक बूथ पर कांग्रेस प्रत्याषियों को मिले मतों का विष्लेषण करने की बात कही है। खाद्यमंत्री रमेष मीणा ने सरकार के कामकाज पर सवाल उठाते हुए कहा कि वे पंच सात जिलों मे गए। सभी जगह कार्यकर्ताओं के काम नहीं होने और नौकरशाही के हावी होने की शिकायते मिली। मीणा का कहना है कि चुनाव में हार को लेकर मंथन में बुराई क्या है। सहकारिता मंत्री उदय लाल अंजना ने भी हार के कारणों की जांच और मंथन की मांग की है। अंजना का कहना है कि वैभव गहलोत को जालौर क्षेत्र से चुनाव लड़ाने तथा हनुमान बेनीवाल के रालोप से चुनावी गठबंधन से तस्वीर अलग होती। एक विधायक ने तो सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाये जाने की मांग कर दी है। प्रदेश प्रभारी महासचिव अविनाश पांडे द्वारा पार्टी नेताओं से अनर्गल बयानबाजी से परे रहने की अपील के बावजूद नेता प्रतिक्रिया देने में झिझक नहीं रहे है। जयपुर से प्रत्याशी और पूर्व महापौर ज्योति खण्डेलवाल ने तो मालवीय नगर में पार्टी की खिलाफत को लेकर पायलट प्रोजेक्ट के तहत जांच कराने की मांग की है। ज्योति ने पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी को भी पत्र लिखा है। बहरहाल शीष नेतृत्व पार्टी हाईकमान तक अपनी सफाई देने मे जुटे है लेकिन पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी के त्याग पत्र को लेकर व्याप्त असमंजस से उहापोह के हालात बने हुए है। प्रदेश स्तर पर कांग्रेस  प्रभारी नेतृत्व ने हार पर रार पर बयानबाजी से मचे बवाल की रोकथाम के लिए कांग्रेस  नेताओं को नोटिस थमाने का सिलसिला आरम्भ किया है।

विधानसभा चुनाव में बमुश्किल सत्ता पर काबिज हुई कांग्रेस पार्टी की सरकार जहां एक तरफ चुनावी वायदों की पूर्ति में विफलता का आरोप झेल रही है। वही प्रदेश की बिगड़ती कानून व्यवस्था को लेकर सरकार कठघरे में है। बलात्कार की बढ़ती घटनाओं तथा चुनाव के दौरान अलवर थानागाजी इलाके में विवाहिता से गैंगरेप और पीडि़त पक्ष को धमकाने सम्बन्धी वीडियो वायरल करने और पुलिस प्रशासन द्वारा 6 मई को आखिरी दौर के मतदान तक इस जघन्य प्रकरण को मीडिया से दबाये रखने की गूंज देशव्यापी हो गई। खुद कांग्रेस सुप्रीमो राहुल गांधी को पीडि़त पक्ष से मिलने आना पड़ा। आनन फानन में सरकार ने प्रशासनिक एवं पुलिस विभागीय जांच रिपोर्ट के बाद सम्बन्धित पुलिस कर्मियों के खिलाफ कार्यवाही की है। पुलिस ने चार्जशीट दाखिल कर दी है वही भविष्य में राज्य सरकार ने ऐसे मामलों पर प्रभावी कार्यवाही के लिए कुछ फैसले लिए है। पीडि़त पक्ष को सरकारी नौकरी तथा मुआवजा राशि देने के निर्णय पर राज्य मानवाधिकार आयोग ने इस प्रकार के अन्य प्रकरणों के पीडि़तो को भी राहत देने के संदर्भ में जवाब तलब कर सरकार को परेशानी में डाल दिया है।

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प्रदेश में बजरी माफिया का आतंक गहरा गया है। बजरी के अवैध खनन एवं परिवहन से जुड़े तत्वों को किसी की परवाह नही है। राजधानी जयपुर में एक आवासीय बस्ती से निकलने वाले रेत से भरे डम्पर को रास्ता बदलने की सलाह देने वाले एक बुजुर्ग को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। यह डम्पर चालक आवासीय कॉलोनी समिति के अध्यक्ष को कुचलकर फरार हो गया। ड्राइविंग लाइसेंस विहीन यह चालक बाद में पकड़ा गया। इस धंधे में लिप्त तत्वों ने पुलिस पर आक्रमण करने से भी गुरेज नहीं किया।

राजस्थान में सत्ता परिवर्तन के साथ ही शिक्षा क्षेत्र में तेजी से किए जा रहे बदलाव के चलते कांग्रेस भाजपा आमने सामने आ गए है। पाठ्यक्रम में परिवर्तन तथा शिक्षा से जुड़ी योजनाओं में पं. दीनदयाल उपाध्याय का नाम हटाने पर दोनो पक्षों में आरोप-प्रत्यारोप तेजी पर है। हल्दीघाटी युद्व अकबर महान महाराणा प्रताप सावरकर चित्तौडग़ढ़ दुर्ग में रानी पद्मिनी के जौहर का चित्र से जुड़ा मामला अधिक चर्चित है। सरकार बदलने पर पाठ्यक्रम में बदलाव की कवायद से स्टॉक में रखी करोड़ो रूपयों की कीमत की किताबे बेकार हो जाती है। कांग्रेस ने 1998-2003 तथा 2008-2013 में तथा भाजपा ने 2003 से 2008 के कार्यकाल में स्कूली पाठ्यक्रम में परिवर्तन किया था। राज्य सरकार के नवम्बर माह में स्थानीय निकाय चुनावों के लिए वार्डो के परिसीमन की प्रक्रिया के साथ अगले वर्ष फरवरी में प्रस्तावित पंचायत राज संस्थाओं के चुनाव के लिए भी परिसीमन के बहाने शहरी एवं ग्रामीण स्तर पर स्थानीय राजनीति का ध्यान बटाने की पहल की है। प्रमुख विपक्ष भाजपा भी इस दिशा में सक्रिय हो गई है।

गत 11 जून को पूर्व केन्द्रिय मंत्री राजेश पायलट की पुण्य तिथि पर दौसा के निकट भडाना में भारी संख्या में जन प्रतिनिधियों की सर्वधर्म सभा में मौजूदगी ने सियासी राजनीति में कई अटकलो को हवा दी है। इस मौके पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट एवं चौदह मंत्रियों सहित पांच दर्जन से अधिक विधायकों की उपस्थिति चर्चा का विषय रही। इसी स्थान पर राजेश पायलट का सड़क दुर्घटना में निधन हुआ था। इसी बीच प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट का मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के जोधपुर गृह संभाग के पाली, जालौर, सिरोही जिलों का दौरा भी चर्चित रहा। पायलट ने जालौर जिले के काछेला गांव में देसी अंदाज में एक झोंपड़ी में रात बिताई। गर्मी से बचाव के लिए कूलर लगी इस झोंपड़ी में बूंद-बंूद पानी छिड़कने की व्यवस्था की गई थी। अफसर तथा नेताओं के ठहरने के लिए इसी कृषि कुंए पर अलग व्यवस्था की गई थी। पिछली बार की तरह जयकिशन विश्नोई की मेजबानी थी। पश्चिमी राजस्थान की राजनीति में विश्नोई समुदाय की अहम भूमिका रही है।

वित्तीय संकट से जूझ रही सरकार 25 करोड़ से अधिक राषि के प्रोजेक्ट से हाथ खींचने को मजबूर है। वही विधायक कोष से स्वीकृत कार्य भी अधर झूल में है। चार मंत्रियों द्वारा अफसरो की कार्यशैली की खुली आलोचना से नौकरशाही से ठन गई है।

केन्द्रीय मंत्रिपरिषद में लम्बे अंतराल के गजेन्द्र सिंह शेखावत को केबिनेट मंत्री के रूप में शामिल कर नवगठित जल शक्ति मंत्रालय का प्रभार दिया गया है। पिछली बार कृषि राज्य मंत्री रहे शेखावत ने जोधपुर मे मुख्यमंत्री अषोक गहलोत के पुत्र वैभव गहलोत को पराजित किया। इस प्रकार कांग्रेस तथा भाजपा की अंदरूनी राजनीति में जोधपुर नये पॉवर सेंटर का प्रतीक बन गया है। बाड़मेर से भाजपा के दिग्गज नेता रहे जसवंत सिंह के पुत्र मानवेन्द्र सिंह को पराजित करने वाले कैलाष चौधरी को राज्यमंत्री बनाया गया है तथा अर्जुन राम मेघवाल को पुन: मंत्रिपरिषद में स्थान मिला है। जयपुर ग्रामीण से निर्वाचित कर्नल राज्यवद्र्वन सिंह राठौड को मंत्रिपरिषद में स्थान नहीं मिलने पर यह अटकले लगाई गई है कि उन्हे भाजपा संगठन में कोई अहम जिम्मेदारी दी जाएगी। प्रदेश भाजपा में भी संगठनात्मक चुनाव सम्बन्धी तैयारियां शुरू की जा रही है।

इधर राज्य विधानसभा का दूसरा सत्र सत्ताईस जून से आरम्भ होगा जिसमे वित्तीय वर्ष 2019-20 का बजट पारित किया जाना है। लोकसभा चुनाव में सत्तारूढ़ दल कांग्रेस की शर्मनाक पराजय के बाद इस सत्र में प्रतिपक्ष भाजपा के हावी रहने के साथ कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति तथा खेमेबाजी के सतह पर आने के कयास लगाए जा रहे है। भाजपा ने जब मुद्दों पर कांग्रेस को सदन से सड़क तक घेरने की राजनीति बनाई है।

यह भी संयोग है कि 2001 में विधानसभा को नये भवन मे स्थानान्तरित किये जाने के बाद 200 सदस्यीय सदन की कड़़ी टूटती रही। पिछली बार कुछ विधायकों के निधन के कारण सदन में कभी पूरे 200 विधायक नही रहे। अब लोकसभा चुनाव में निर्वाचित दो विधायको हनुमान बेनीवाल (खींवसर) तथा राजेन्द्र (मंडावा) खींचड़ के निर्वाचित होने से सदस्यो की संख्या 198 रह गई है। इससे पूर्व विधानसभा चुनाव के दौरान भी अलवर जिले के रामगढ़़ में बसपा प्रत्याशी का निधन होने से 199 सदस्य निर्वाचित हुए थे। विधानसभा के इस सत्र में विभिन्न अध्यादेशों को कानूनी जामा पहनाने के साथ उपाध्यक्ष का भी चुनाव किया जाना है।

जयपुर से गुलाब बत्रा

 

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