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वक्त की जरूरत मदरसों में धार्मिक शिक्षा के साथ आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा

वक्त की जरूरत  मदरसों में धार्मिक शिक्षा के साथ आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा

सबका साथ सबका विकास -मोदी सरकार का लोकप्रिय नारा है मगर लोकसभा के लिए दोबारा मिले प्रचंड बहुमत के बाद भारतीय जनता पार्टी और देश के पीएम नरेंद्र मोदी ने इसमें एक शब्द जोड़ दिया है। यानी सबका साथ सबका विकास सबका विश्वास। इस तरह वह अपने कामों से समाज के सभी समुदायों का विश्वास हासिल करना चाहती है। अलपसंख्यक समुदाय और खासकर मुसलमानों को लेकर भाजपा सरकार को अक्सर कठघरे में घड़ा किया जाता है। मगर अब किसी को इस तरह की शिकायत का मौका नहीं देना चाहती। मुसलमानों को भी विकास का भागीदार बनाना चाहती है। इसके लिए उसने कई योजनाएं शुरू की हैं। इन  योजनाओं से मोदी सरकार निश्चित ही अलपसंख्यको का विश्वास हासिल करने में कामयाब होगी। मोदी सरकार के इस कदम को जमीयत उलेमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना महमूद मदनी ने स्वागत करते हुए कहा, ‘मुसलमानों को औपचारिक शिक्षा से जोड़ा जाना चाहिए। देश के लाभ के लिए समाज के सभी वर्गों को समान अवसर प्रदान किया जाना चाहिए, विशेषकर शिक्षा के क्षेत्र में हम हमेशा इस तरह की पहल का स्वागत करेंगे।’ यह प्रतिक्रिया इस बात का प्रतीक है कि अलपसंख्यक समुदाय की इस योजनाओं पर सकारात्मक प्रतिक्रिया हुई है।

दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष और मुस्लिमों के लिए कई शिक्षण संस्थान चला रहे कमाल फारूकी कहते हैं कि अगर मोदी सरकार मदरसों में बिना किसी छेड़छाड़ और बदलाव किए बगैर आधुनिक शिक्षा की व्यवस्था करती है तो यह स्वागत योग्य कदम है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह लोकसभा चुनाव के बाद 26 मई को अपने सांसदों को संबोधित करते हुए मुसलमानों को लेकर बातें कहीं है, इसे सकारात्मक रूप से लिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि देश के 20 करोड़ मुस्लिमों को पीछे रखकर देश को तरक्की और विकास की राह पर नहीं लाया जा सकता।

मोदी सरकार ने अल्पसंख्यक समुदाय को लेकर बड़ा ऐलान किया हैं। मदरसों के लिए सरकार 50 फीसदी स्कॉलरशिप देने जा रही है। जिसका सीधा फायदा 17 करोड़ मुसलमानों को फायदा होगा। इसके अलावा सरकार तीन तलाक विधेयक को लेकर भी नया प्रस्ताव लाने की तैयारी में हैं। इस बाद दूसरे कार्यकाल के दौरान पीएम मोदी की मुसलमानों पर पैनी नजर है। इस नीति को न्यू मुस्लिम नीति भी कहा जा रहा है।

समुदाय में लोकप्रिय केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने  घोषणा की कि अल्पसंख्यक समाज के सामाजिक-आर्थिक सशक्तीकरण के लिए अगले पांच वर्षों में पांच करोड़ विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति दी जाएगी और इनमें आधी संख्या में लड़कियां होंगी। जानकारों का कहना है कि ”प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली इंसाफ, ईमान और इकबाल की सरकार ने विकास की सेहत को साम्प्रदायिकता एवं तुष्टीकरण की बीमारी से मुक्ति दिलाकर सेहतमंद समावेशी सशक्तिकरण का माहौल तैयार किया है।’’ नकवी नें कहा, ”अल्पसंख्यक वर्ग की स्कूल ड्रॉपआउट लड़कियों को देश के प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों से ब्रिज कोर्स करा कर उन्हें शिक्षा और रोजगार से जोड़ा जाएगा। देशभर के मदरसों में मुख्यधारा की शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए मदरसा शिक्षकों को विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों से प्रशिक्षण दिलाया जायेगा ताकि वे मदरसों में मुख्यधारा की शिक्षा- हिंदी, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान, कंप्यूटर आदि- दे सकें। यह काम अगले महीने से शुरू कर दिया जायेगा।’’

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इस 3ई- ऐजुकेशन (शिक्षा), एम्प्लायमेंट (रोजगार व रोजगार के मौके) एवं इम्पावरमेंट (सामाजिक-आर्थिक-सशक्तिकरण)’ कार्यक्रम के तहत अगले पांच वर्षों में प्री-मैट्रिक, पोस्ट मैट्रिक एवं मेरिट-कम-मीन्स आदि योजनाओं द्वारा पांच करोड़ विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति दी जाएगी, जिनमें 50 प्रतिशत से ज्यादा लड़कियों को शामिल किया जाएगा। इनमे आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग की लड़कियों के लिए 10 लाख से ज्यादा ‘बेगम हजरत महल बालिका छात्रवृत्ति’ भी शामिल हैं।

जिन क्षेत्रों में शैक्षणिक संस्थाओं के लिए पर्याप्त ढांचागत सुविधायें नहीं है वहां प्रधानमंत्री जन विकास कार्यक्रम (पीएमजेवीके) के तहत पॉलिटेक्निक, आई.टी.आई, गल्र्स हॉस्टल, स्कूल, कालेज, गुरूकुल टाईप आवासीय विद्यालय, कॉमन सर्विस सेंटर आदि का युद्ध स्तर पर निर्माण शुरू किया गया है। ‘पढ़ो व बढ़ो’ जागरूकता अभियान के अंतर्गत उन सभी दूर-दराज के क्षेत्रों में जहां सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़ापन है तथा लोग अपने बच्चों को शैक्षणिक संस्थानों में नहीं भेज पा रहे हैं, उन माता-पिता को अपने बच्चों को शैक्षणिक संस्थानों में भेजने हेतु जागरूक एवं प्रोत्साहित किया जाएगा। इसमें विशेष रूप से लड़कियों की शिक्षा पर फोकस किया जाएगा। साथ ही शैक्षणिक संस्थाओं को सुविधा एवं साधन उपलब्ध कराने के लिए प्रभावी काम किया जाएगा।

इसके अलावा नुक्कड़ नाटकों, लघु फिल्मों आदि जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से जागरूकता और प्रोत्साहन का अभियान चलाया जाएगा। इस कड़ी में पहले चरण में देश के 60 अल्पसंख्यक बहुल जिलों को चयनित कर इस अभियान को प्रारंभ किया जाएगा।

आर्थिक रूप से कमजोर अल्पसंख्यक- मुस्लिम, ईसाई, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी- युवाओं को केंद्र एवं राज्य की प्रशासनिक सेवाओं, बैंकिंग, कर्मचारी चयन आयोग, रेलवे एवं अन्य प्रतियोगी परिक्षाओं हेतु फ्री-कोचिंग की व्यवस्था की जाएगी। उन्होंने बताया कि राजस्थान के अलवर में विश्वस्तरीय अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान का निर्माण कार्य जल्द शुरू हो जाएगा।

मोदी सरकार अब मदरसों के शिक्षकों को आधुनिक ज्ञान-विज्ञान और शिक्षा पद्धति के वैज्ञानिक तौर तरीकों की तकनीकी ट्रेनिंग देगी। दूसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ग्रहण करने के बाद अपने पहले सम्बोधन में नरेंद्र मोदी ने सरकार की प्राथमिकता का दायरा भी खींच दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि अब सब अपने है, जिन्होंने वोट दिया वो भी और जिन्होंने वोट नहीं दिया वो भी। यह सरकार सबकी है।

इस नई स्कीम का मकसद मदरसा की पारम्परिक अरबी में धार्मिक शिक्षा के साथ आधुनिक शिक्षा भी पूरे वैज्ञानिक तरीके से देकर मदरसे से निकले छात्रों को भी मुख्यधारा में शामिल करना है। सरकार शुरुआत में जामिया मिलिया इस्लामिया और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के शैक्षिक प्रशिक्षण विभागों में इसके इंतजाम कराएगी। फिर एमिटी जैसे निजी संस्थानों को भी इससे जोड़ा जाएगा।

मदरसों के शिक्षकों को खास ट्रेनिंग दी जाएगी, ताकि वो अपने छात्रों को तकनीकी तौर पर भी तैयार कर सकें। उनको साहित्य के साथ ज्ञान-विज्ञान, कम्प्यूटर, इंटरनेट, ई-लर्निंग और स्मार्ट एजुकेशन सिस्टम से जोड़ सकें। इसके लिए केंद्रीय बजट में अलग से प्रावधान भी होगा, ताकि योजना जल्दी से अमल में आ जाए।

गुरुजनों के साथ अल्पसंख्यक समुदाय के गरीब छात्र-छात्राओं के वजीफे की भी स्कीम सरकार लाई है। इसका फायदा 5 करोड़ से ज्यादा छात्रों तक पहुंचाने का लक्ष्य है। हालांकि इस योजना के ऐलान के साथ ही वाराणसी के बाबाओं ने विवाद भी शुरू कर दिया है। प्रधानमंत्री और अल्पसंख्यक मंत्रालय को भेजी चिट्ठी में उन्होंने कहा कि इस स्कीम का फायदा सिर्फ मुस्लिम छात्रों को ही क्यों मिले, जबकि सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक देश के करीब आठ राज्यों में हिन्दू आबादी इतनी कम है कि इन्हें अल्पसंख्यक दर्जा और सुविधाएं मिलें। सरकार इसका ध्यान रखें।

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अल्पसंख्यक का दायरा और खाका राज्य सरकार तय करती है। कई राज्यों में जैन और बौद्ध भी अल्पसंख्यक हैं। वैसे भी केंद्र सरकार का काम अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए परियोजना बनाकर अपने हिस्से का धन मुहैया कराना है। साथ ही राज्यों के साथ मिलकर परियोजना के अमल पर निगरानी रखना है। इन योजनाओं के जरिए सरकार 3ई के साथ अल्पसंख्यक समुदायों का विकास करेगी। इन 3ई के तहत एजुकेशन, एम्प्लॉयमेंट और एम्पावरमेंट पर सरकार आगे बढ़ रही है।

मोदी सरकार ने देश के अल्पसंख्यकों के कायाकल्प की दिशा में कवायद शुरू कर दी है। सरकार अल्पसंख्यकों के लिए बेहतर शिक्षा के साथ-साथ मदरसों के शिक्षकों को खास ट्रेनिंग देकर मॉडर्न एजुकेशन से जोड़ेगी। साथ ही मदरसों को साहित्य के साथ ज्ञान-विज्ञान, कम्प्यूटर, इंटरनेट, ई-लर्निंग और स्मार्ट एजुकेशन सिस्टम से भी जोड़ा जाएगा। मोदी सरकार के इस कदम को मुस्लिम संगठन और बुद्धिजीवी मुसलमानो के लिए सकारात्मक कदम बता रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली इंसाफ, ईमान और इकबाल की सरकार ने विकास की सेहत को साम्प्रदायिकता एवं तुष्टीकरण की बीमारी से मुक्ति दिलाई है और सशक्तिकरण का माहौल तैयार कर दिया है वहीं, इस्लामिक स्कॉलर इसे हवा हवाई बयान करार दे रहे हैं।

अल्पसंख्यक वर्ग की स्कूल ड्रॉपआउट लड़कियों को देश के प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों से ब्रिज कोर्स करा कर उन्हें शिक्षा और रोजगार से जोड़ा जाएगा। देशभर के मदरसों में मुख्यधारा की शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए मदरसा शिक्षकों को विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों जैसे जामिया मिलिया इस्लामिया और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी आदि से प्रशिक्षण दिलाया जाएगा। ताकि वे मदरसों में मुख्यधारा की शिक्षा हिंदी, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान और कंप्यूटर आदि का ज्ञान दे सकें।

कमाल फारूकी कहते है कि मदरसों के शिक्षकों को ट्रेनिंग देने के साथ-साथ अगर सरकार वहां इग्नू और हृढ्ढह्रस् (ठ्ठड्डह्लद्बशठ्ठ द्बठ्ठह्यह्लद्बह्लह्वह्लद्ग शद्घ शश्चद्गठ्ठ ह्यष्द्धशशद्यद्बठ्ठद्द) के सेंटर खोलकर आधुनिक शिक्षा से जोड़ती है तो किसी को एतराज नहीं है। इसके अलावा सरकार को एक ऑर्डर देकर यह भी करना चाहिए कि मदरसे से निकलने वाले छात्रों को देश के तमाम विश्वविद्यालय में प्रवेश दिया जाना चाहिए। अभी देश के जामिया मिलिया इस्लामिया, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, जेएनयू और मौलाना आजाद उर्दू विश्वविद्यालय में ही एडमिशन दिया जाता है।

वहीं, आल इंडिया मुस्लिम मजलिस मुशावरत के महासचिव मौलाना हामिद नोमानी मोदी सरकार के कदम को हवा-हवाई बताते हुए कहा कि मदरसों को मॉडर्न एजुकेशन से जोडऩे के लिए किसने रोक रखा है। देश में जो मदरसे सरकार से मान्यता प्राप्त हैं और फंड लेते हैं उन्हें आप बेहतर बनाइए, लेकिन मोदी सरकार कुछ करने के बजाय सिर्फ मुद्दा बनाकर चर्चा में रहने चाहती है। वह आरएसएस की विचाराधारा से कैसे अलग जाकर मुसलमानों की शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाएगी, यह अहम सवाल है। सरकारी स्कूलों में छत नहीं है। बच्चे पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ रहे हैं और मदरसों को लेकर बातें की जा रही हैं।

जबकि, दिल्ली के फतेहपुरी मस्जिद में चल रहे मदरसे के कारी असरारुल हक कासमी कहते हैं कि सरकार मदरसों में बिना हस्ताक्षेप किए हुए अगर मॉडर्न एजुकेशन से जोड़ती है तो बेहतर कदम है। आधुनिक शिक्षा बेहद जरूरी है और हर मदरसों को हाईटेक किए जाने की जरूरत है। मोदी सरकार अगर एक बजट निर्धारित कर मदरसों में पढ़ाने वाले शिक्षकों को हाईटेक और आधुनिक शिक्षा की ट्रेनिंग देती तो यह स्वागत योग्य कदम है।

कासमी कहते हैं कि मदरसों का जो इस्लामी मकसद में उसमें तो वह कामयाब है। इस्लामी शिक्षा से जिंदगी जीने का सलीका मिलता है, लेकिन जिंदगी की जरूरतों को पूरा करने के लिए तरक्की भी करनी है। इस दिशा में मदरसे पीछे हैं। ऐसे में अगर मोदी सरकार मदरसों और उसके शिक्षकों को मार्डन बनाने का कदम बढ़ाती है तो सराहनीय कदम हैं। ये मुसलमानों के लिए वक्त की जरूरत है।

 

सतीश पेडणेकर

 

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