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वह जीतकर भी रोया घर की बात घर में ही रही

वह जीतकर भी रोया  घर की बात घर में ही रही

बेटा : पिताजी।

पिता : हां बेटा।

बेटा : पिताजी, आपको पता है हमारे पड़ोसी जो हमारी विधानसभा से जीते हैं, वह अपनी जीत से खुश नहीं हैं।

पिता : क्यों?

बेटा : वह तो उल्टे दहाड़ें मार-मार कर रो रहे हैं।

पिता : तेरे को कोई गलतफहमी हो गई लगती है। बेटा, कभी कोई अपनी जीत पर भी रोता है? जीतने वालों के घर पर तो बेटा दावतें होती हैं। मिठाइयां बांटी जाती हैं। कई तो शराब की छबीलें लगा देते हैं। बैंड-बाजे बजते हैं। डांस-गाने होते हैं।

बेटा : पर पिताजी उनके घर में यह सब कुछ नहीं हो रहा है।

पिता : मेरे को तो तेरी कोई बात समझ नहीं आ रही। मैंने तो आज तक किसी को अपनी जीत पर रोते नहीं देखा।

बेटा : आपको विश्वास आए या न आए पर जो मैं कह रहा हूं, वही सच है। मैंने तो सुना है कि वह ही नहीं उनका परिवार और उनके हितैषी व कार्यकर्ता भी उनके साथ रोने बैठ गए हैं।

पिता : कुछ भी हो बेटा, परिवार के लोगों व प्रत्याशी के समर्थकों का तो कर्तव्य है

कि वह अपने प्रत्याशी के साथ हर मोड़ पर उसका साथ दें ।

बेटा : मैंने भी पिताजी एक भनक सुनी है। उस नेता को उम्मीद थी कि चुनाव परिणाम के उपरांत विधान सभा त्रिशंकु निकलेगी जिसमें स्वतंत्र उम्मीदवार की चांदी हो जाएगी।

पिता : कैसे?

बेटा : आपने अखबारों में नहीं पढ़ा कि कर्नाटक के अनेकों विधायकों ने पार्टी छोड़ दी। कइयों ने तो विधानसभा की सदस्यता से ही त्यागपत्र दे दिया। कुछ निर्दलीय विधानसभा सदस्यों ने भी अपना समर्थन बदल लिया।

पिता : यह क्यों?

बेटा : इससे विधानसभा में सत्ताधारी दल का गणित बिगड़ गया। सदन में सदस्यों की संख्या कम हो गई। सत्ताधारी पक्ष का बहुमत गिर गया जिससे पांसा ही पलट गया। सरकार अपना बहुमत खो बैठी और विपक्ष सत्ता में आ गया।

पिता : तो फिर क्या हुआ? यह तो संवैधानिक प्रक्रिया है। सरकारें तो उलटती-पलटती रहती ही हैं।

बेटा : इसीलिये तो वह रो रहा है। यहां सरकार को जरूरत से भी ज्यादा बहुमत मिल गया। हमारा सदस्य तो स्वतंत्र है।

पिता : यह तो अच्छी बात है। स्वतंत्र तो स्वतंत्र होकर बात कर सकता है।  वह मुद्दों के आधार पर सरकार को समर्थन भी दे सकता है और विरोध करने में भी स्वतंत्र है। शर्त एक ही है कि विरोध और समर्थन जनहित में हो।

बेटा : पिताजी आप तो पक्ष-विपक्ष की बात कर रहे हैं। नैतिकता की दुहाई दे रहे हैं पर वह तो बात कर रहा है अपने अपने आर्थिक नुकसान की।

पिता : जीतने पर उसका क्या आर्थिक नुकसान हो गया? यदि हार जाता तो मैं समझ भी सकता था। उसे तो लाखों रुपये वेतन, भारी-भरकम भत्तो और करोड़ों रुपये अपने चुनाव क्षेत्र के विकास के लिए मिलेंगे।

बेटा : पिताजी, दु:ख उसे इनका नहीं है।

पिता : तो है किसका? तू तो पहेलियां डाले जा रहा है।

बेटा : पिछले दिनों कर्नाटक में जो घटा लगता है उसके समाचार आपने नहीं सुने लगते हैं।

पिता : वह तो मैंने टीवी चैनलों में सुने भी और अखबारों में पढे भी। वह तो हमारे जनतंत्र के लिए एक शर्मनाक धब्बा था।

बेटा : वह तो पिताजी आप नैतिकता और हमारे संस्कारों के हवाले से कह रहे हैं न।

पिता : मैं इसकी बात न करूं तो और क्या करूं?

बेटा : पिताजी, वह कहता है कि क्योंकि इस प्रदेश में सरकार को पूर्ण बहुमत मिल गया है, इसलिए सत्ताधारी पार्टी उस जैसे स्वतंत्र विधायक की परवाह ही नहीं करेगी और इस प्रकार वह पूरी तरह जनता की सेवा करने में असमर्थ रहेगा।

पिता : यह तो बेटा जनता को भी पता होता है। दूसरे दलों को नकार कर जब जनता ने उसे वोट दिया तो उन्हें पता होता है कि उसका नतीजा क्या निकलता है।

बेटा : उस से भी ऊपर एक और बात है। हमारे स्वतंत्र विधायक तो इस बात पर दुखी हैं कि यदि किसी दल को बहुमत न मिलता तो किसी भी दल को अपना बहुमत प्राप्त करने के लिए उसके समर्थन की अवश्य जरूरत पड़ती। तब वह उसे मंत्री भी बना देते। इस प्रकार वह हम सबकी सेवा और भी अच्छे ढंग से कर सकता था।

पिता : विधायक चाहे सत्ताधारी पक्ष के भी हों, सभी मंत्री नहीं बन जाते हैं और न सबको सब कुछ ही मिल जाता है।

बेटा : यह तो बाहर की बातें हैं। असल दु:ख तो कुछ और ही लगता है।

पिता : और क्या?

बेटा : मेरे को तो लगता है कि वह कर्नाटक वाली स्थिति की यहां भी उम्मीद लगाये बैठा था।

पिता : उससे क्या हो जाता?

बेटा : वही जो वहां हुआ।

पिता : मैं समझा नहीं।

बेटा : मीडिया रिपोर्टों के अनुसार वहां 25-25, 40-40 करोड़ रुपया सत्ता पक्ष या विपक्ष के साथ होने वालों को दिया गया था।

पिता : यह तो मैंने भी पढ़ा कि अपने-अपने विधायकों को प्रदेश के बाहर 5-7 सितारा होटलों में ठहराया गया। वहां उन्होंने बड़ी मौज मस्ती की। उनकी तो किस्मत ही खुल गई।

बेटा : मेरे को लगता है कि ऐसा ही कुछ यहां होने की वह उम्मीद कर रहा था।

पिता : मतलब वह भी अपने आपको करोड़ों-अरबों में बेचने के स्वप्न देख रहा था?

बेटा : अगर वह यह ही सोच रहा होगा तब तो इसका मतलब है कि वह अपने आप की खुले-आम बोली लगवाना चाहता था। जो उसकी सब से बड़ी बोली लगा देता वह उसके साथ हो जाता। उसके लिए जनता की या किसी दीन-ईमान की कोई बात नहीं है।

पिता : अभिप्राय यह कि वह अपने आपको, अपनी जमीर को खुले बाजार में बेचने को तैयार बैठा था।

बेटा : अगर यह बात है तो पिताजी, मुझे शर्म आ रही है कि हमने कैसे आदमी को वोट देकर जिताया।

पिता : ऐसे लोग ही हमारे देश और गणतन्त्र को लूटने-लुटाने पर तैयार बैठे हैं।

बेटा : ऐसे लोगों के कारण तो पिताजी जनता का सरकार से, जनतंत्र और गणतन्त्र से विश्वास ही उठजाएगा। देश के लिए तो वह समय बड़ा भयानक होगा।

पिता : बेटा, मेरा तो विश्वास है कि जो होता है वह अच्छा ही होता है।

बेटा : आपका का मतलब है कि उस विधायक को जो भी मिला उसे उस पर ही संतोष कर लेना चाहिए।

पिता : बिल्कुल। यहां तो अजीब हो रहा है। कोई जीतने के लिए रोते हैं और यह महानुभाव हैं जो जीतने पर रो रहे हैं।

बेटा : बात तो आपकी ठीक लगती है।

पिता : चल इसको छोड़, कोई और बात कर।

बेटा : पिताजी, बताओ यह कांग्रेस में क्या चल रहा है?

पिता : बेटा, कुछ नहीं। यह सब राजनीति के चोंचले हैं।

बेटा : फिर भी, समझाओ तो सही।

पिता : यही। पहले बेटा रूठा रहता था कि मुझे अध्यक्ष बनाओ। जब बना दिया तो अब वह जनता से नाराज कि उसने वोट नहीं दिया और उसकी मिट्टी पलीद हो गई। तब पार्टी की हार का जिम्मा लेकर तीन महीने पूर्व त्यागपत्र दे दिया।

बेटा : पर पार्टी ने तो त्यागपत्र को अस्वीकार कर दिया था। पार्टी प्रवक्ता सुरजेवाला ने तो घोषणा कर दी थी कि राहुल गांधी पार्टी के अध्यक्ष थे, हैं और रहेंगे।

पिता : पर राहुलजी अपनी जिद पर अड़ गए कि मैं त्यागपत्र वापस नहीं लूंगा।

बेटा : उन्होंने तो यह भी कहा था कि नए अध्यक्ष को मनोनीत करने के मामले में उनके परिवार का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा और न वह उनके परिवार से होगा।

पिता : बेटा, पालिटिक्स में नेता जो कहते हैं उसे पत्थर की लकीर मत समझा कर। यहां तो वह होता है जो कहा नहीं गया हो और वह नहीं होता जो कहा गया होता है।

बेटा : कहने को तो कुछ कांग्रेसी यह भी मांग कर रहे थे कि राहुलजी की बहन प्रियंका गांधी वाड्रा को ही अध्यक्ष बना दिया जाए।

पिता : पर इस बात पर तो प्रियंकाजी नाराज हो उठीं थीं और उन्होंने घुस्सा  होकर कहा था कि मेरा नाम मत लो।

बेटा : फिर यह कहानी क्या हुई?

पिता : होना क्या था? मां ने बेटे को अध्यक्ष बनाया था। बेटे ने मां को कुर्सी धन्यवाद सहित वापस लौटा दी।

बेटा : वैसे पिताजी, इस बार राहुलजी तो अपनी माताजी के मुकाबले 8 सीटें अधिक लाये थे। फिर भी राहुलजी ने नैतिकता के नाते त्यागपत्र दे दिया। पर सोनियाजी ने तो तब त्यागपत्र नहीं दिया था। तो क्या मानें कि राहुलजी में नैतिकता अधिक है?

पिता : तू पालिटिक्स में नैतिकता को मत घसीटा कर।

बेटा : बात तो आपकी ठीक है। राहुलजी ने ज्योतिरादित्य सिंधिया और अपनी बहन प्रियंकाजी को महामंत्री बनाया था और चुनाव में दोनों को ही उत्तर प्रदेश के एक-एक भाग की चुनावी कमान संभाली थी। पर राहुलजी ने सिंधिया से तो त्यागपत्र मांग लिया पर प्रियंकाजी को कुछ नहीं कहा।

पिता : उन्होंने भाई के नाते अपना कर्तव्य ही निभाया है। वरन लोग तो यही कहते कि राहुलजी कैसे भाई हैं जिन्होंने बहन के प्रति भाई होने का अपना कर्तव्य भी नहीं निभाया।

बेटा : चलो आपकी बात मान ली। घर की बात घर में ही रह गई।

पिता : लोग यह भी तो कह रहे हैं कि राहुलजी को पता है कि अक्टूबर-नवम्बर में तीन मत्वपूर्ण राज्यों महाराष्ट्र, झारखंड और हरियाणा में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। वहां भी कांग्रेस की हालत बड़ी कमजोर लगती है। यदि राहुलजी की अध्यक्षता में इन तीन राज्यों में भी बुरी कांग्रेस की बुरी हार होती, तो राहुलजी तो कहीं के न रहते।

बेटा : इसलिए राहुलजी ने अपने आपको उस झेंप से बचा लिया है।

पिता : तब तो ठीक है। उनकी हालत वही होती न खुदा ही मिला, न विसाले सनम। न इधर के रहे, न उधर के रहे।

 

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