ब्रेकिंग न्यूज़

विकास के लिए जरूरी है जनसंख्या नियंत्रण

विकास के लिए जरूरी है जनसंख्या नियंत्रण

इस स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के सामने एक ऐसा मुद्धा उठा दिया है जो सबको नजर आता है मगर वोटबैंक की भूखी राजनीतिक पार्टियां इस पर चुप्पी साधे रहती हैं। आखिर बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे। आबादी में चीन के बाद भारत का ही नंबर आता है। मगर 1977 के बाद नसबंदी के कारण इंदिरा सरकार क्या हारी सारी पार्टियां इस मुद्दे से ही गुरेज करने लगी। कोई पार्टी जनसंख्या नियंत्रण के मुद्दे को उठानें को तैयार नहीं थी। ऐसे समय नरेंद्र मोदी ने अपने नए कार्यकाल की शुरूआत में ही यह मुद्धा उठाया है।

इस साल स्वतंत्रता दिवस के भाषण में उन्होंने खुलकर यह मुद्धा उटाया। उन्होंने कहा- मैं आज लाल किले से स्पष्ट करना चाहता हूं, और वह विषय है, हमारे यहां हो रहा बेतहाशा जनसंख्या विस्फोट, यह जनसंख्या विस्फोट हमारे लिए, हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए अनेक नए संकट पैदा करता है लेकिन यह बात माननी होगी कि हमारे देश में एक जागरूक वर्ग है, जो इस बात को भली-भांति समझता है, वे अपने घर में शिशु को जन्म देने से पहले भली-भांति सोचता है कि मैं कहीं उसके साथ अन्याय तो नहीं कर दूंगा, उसकी जो मानवीय आवश्यकताएं हैं उनकी पूर्ति मैं कर पाऊंगा कि नहीं, उसके जो सपने हैं, वो सपने पूरा करने के लिए मैं अपनी भूमिका अदा कर पाऊंगा कि नहीं कर पाऊंगा, इन सारे पैरामीटज से अपने परिवार का लेखा-जोखा लेकर हमारे देश में आज भी स्व: प्रेरणा से एक छोटा वर्ग परिवार को सीमित करके, अपने परिवार का भी भला करता है और देश का भला करने में बहुत बड़ा योगदान देता है, ये सभी सम्मान के अधिकारी हैं, ये आदर के अधिकारी हैं, छोटा परिवार रखकर भी वह देशभक्ति को ही प्रकट करते हैं, वो देशभक्ति को अभिव्यक्ति करते हैं, मैं चाहूंगा कि हम सभी समाज के लोग इनके जीवन को बारीकी से देखें कि उन्होंने अपने परिवार में जनसंख्या वृद्धि से अपने-आपको बचा करके परिवार की कितनी सेवा की है, देखते ही देखते एक दो पीढ़ी नहीं, परिवार कैसे आगे बढ़ता चला गया है, बच्चों ने कैसे शिक्षा पाई है, वह परिवार बीमारी से मुक्त कैसे है, वह परिवार अपनी प्राथमिक आवश्यककताओं को कैसे बढिय़ा ढंग से पूरा करता है, हम भी उनसे सीखें और हमारे घर में किसी भी शिशु के आने से पहले हम सोचें कि जो शिशु मेरे घर में आएगा, क्या उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मैंने अपने-आपको तैयार कर लिया है? क्याी मैं उसको समाज के भरोसे ही छोड़ दूंगा? मैं उसको उसके नसीब पर ही छोड़ दूंगा? कोई मां-बाप ऐसा नहीं हो सकता है, जो अपने बच्चों को जन्म देकर इस प्रकार की जिंदगी जीने के लिए मजबूर होने दें और इसलिए एक सामाजिक जागरूकता की आवश्यकता है।

देश की कई संस्थाएं यह मुद्दा उठा चुकी हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी मंडल में जनसंख्या नीति का पुनर्निर्धारण नीति को सभी पर समान रूप से लागू करने का प्रस्ताव भी पास किया जा चुका है। संघ के प्रस्ताव में कहा गया कि अखिल भारतीय कार्यकारिणी मंडल सभी स्वयंसेवकों सहित देशवासियों का आह्वान करता है कि वे अपना राष्ट्रीय कर्तव्य मानकर, जनसंख्या में असंतुलन उत्पन्न कर रहे सभी कारणों की पहचान करते हुए जनजागरण के जरिए देश को जनसंख्या के असंतुलन से बचाने के सभी कानून सम्मत कोशिश करें।

पिछले साल सितंबर में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने तीन दिन की लेक्चर सीरीज के बाद कई सवालों के जवाब दिए। उनसे पूछा गया कि क्या जनसंख्या नियंत्रण का कानून आना चाहिए? जिसके जवाब में संघ प्रमुख ने कहा कि जनसंख्या के बारे में जो नीति है उस पर फिर से विचार करना चाहिए कि वह अगले 50 साल के हिसाब से हो। जो भी नीति बनती है उसे सब पर समान रूप से लागू किया जाए किसी को छूट न हो। जहां समस्या है वहां पहले उपाय हो।

कई नेता इस मुद्दे को उठाते रहे हैं। कुछ दिनों पहले इस को लेकर बीजेपी सांसद गिरिराज सिंह भी ट्वीट कर चुके हैं। गिरिराज सिंह ने ट्वीट कर कहा था कि जनसंख्या विस्फोट देश में आर्थिक और सामाजिक समरसता और संतुलन बिगड़ रहा है। उन्होंने कहा कि देश में जनसंख्या नियंत्रण को लेकर देश में ऐसा कानून लागू किया जाना चाहिए जिसमें दो से ज्यादा बच्चे पैदा करने वालों का वोटिंग अधिकार छीन लिया जाना चाहिए।

राज्यसभा में बीजेपी सांसद और आरएसएस विचारक राकेश सिन्हा ने ‘जनसंख्या विनियमन विधेयक, 2019’ प्राइवेट मेम्बर बिल भी पेश किया था। हालांकि इस बिल की आलोचना भी हुई। कुछ लोगों का कहना था कि इससे गरीब आबादी पर बुरा प्रभाव पड़ेगा तो कुछ का कहना है कि ये बिल मुसलमान विरोधी है।

दक्षिणपंथी नेताओं द्वारा हमेशा यह भ्रम फैलाया जाता रहा है कि भारत में मुसलमानों की आबादी तेजी से बढ़ रही है और उनके नेताओं द्वारा समय-समय पर हिंदुओं को भी ज्यादा बच्चे पैदा करने की सलाह दी जाती है।

हालांकि 2011 के जनगणना के मुताबिक वास्तविकता यह है कि भारत में पिछले 10 सालों में हिंदुओं और मुसलमानों की आबादी बढऩे की रफ्तार में गिरावट आई है। साल 2011 में हुई जनगणना के मुताबिक हिंदुओं की जनसंख्या वृद्धि दर 16.76 फीसदी रही जबकि 10 साल पहले हुई जनगणना में ये दर 19.92 फीसदी पाई गई थी। वहीं, पिछली जनगणना के मुताबिक भारत में मुसलमानों की आबादी 29.5 प्रतिशत की दर से बढ़ रही थी जो अब गिरकर 24.6 फीसदी हो गई है।

ये कहा जा सकता है कि भारत में मुसलमानों की दर अब भी हिंदुओं की जनसंख्या वृद्धि दर से अधिक है, लेकिन यह भी सच है कि मुसलमानों की आबादी बढऩे की दर में हिंदुओं की तुलना में अधिक गिरावट आई है। आंकड़े बताते हैं कि हिंदुओं की वृद्धि दर में 3.16 प्रतिशत की कमी आई तो मुसलमानों की वृद्धि दर में 4.90 प्रतिशत की कमी आई।

अगर आंकड़ों को देखें तो पता चलता है कि देश में प्रजनन दर में लगातार कमी आ रही है। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया के अन्तर्गत आने वाले सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम के साल 2017 के आंकड़ों को देखें तो पता चलता है कि देश में कुल प्रजनन दर 2.2 प्रतिशत है, वहीं कुल प्रतिस्थापन दर (रिप्लेसमेंट रेट) 2.1 प्रतिशत है। अब तक देश में ‘छोटा परिवार, सुखी परिवार’ का नारा लोकप्रिय रहा है, दो कदम और आगे बढ़ते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने छोटे परिवार के कंसेप्ट को देशभक्ति से जोड़ दिया है।

अब तक बीजेपी में ऐसे कई नेता हैं जो बढ़ती आबादी पर काबू पाने के लिए रह-रह कर एक से एक खतरनाक सलाह देते रहे हैं। ऐसी सलाहें होती तो हिंदुओं के लिए भी है, लेकिन निशाने पर अक्सर मुस्लिम समुदाय ही नजर आता है। ऐसे बीजेपी नेताओं की सलाहियत में हिंदू और मुस्लिम आबादी को बैलेंस करने की फिक्र नजर आती है – और ये बताने लगते हैं कि हिंदू महिलाओं को कितने बच्चे पैदा करने चाहिये।

आबादी रोकने को लेकर सबसे ज्यादा सख्ती उस वक्त देखने को मिली थी जब देश में इमरजेंसी लगी हुई थी। इमरजेंसी के दौरान जिन ज्यादतियों का जिक्र होता है – परिवार नियोजन भी उनमें से एक है। माना ये भी जाता है कि बाद में किसी भी सरकार ने जनसंख्या नीति को लेकर सख्ती बरतने की हिम्मत नहीं दिखायी – और परिवार कल्याण कार्यक्रम जैसे-तैसे चलता रहा।

क्या मोदी सरकार की जनसंख्या नीति में भी इंदिरा गांधी के ‘हम दो हमारे दो’ वाले परिवार नियोजन को सख्ती (नसबंदी) से लागू किया जाना होगा? या फिर चीन की तरह कोई ‘वन चाइल्ड पॉलिसी’ जैसी जनसंख्या नीति हो सकती है?

वैसे चीन की वन चाइलड पालिसी फ्लाप हो चुकी है। बढ़ती आबादी से परेशान होकर चीन ने वन चाइल्ड पॉलिसी लागू की थी, मगर अब ये पॉलिसी उसी पर भारी पड़ रही है, क्योंकि वहां अब जनसंख्या का अनुपात बुरी तरह बिगड़ गया है। इस वन चाइल्ड पॉलिसी की वजह से जीन में अब बूढ़ी आबादी ही ज्यादा है और युवा कम हो गए है जिसे देखकर सरकार अब परेशान हो रही है।

चीन में बूढ़ी आबादी ज्यादा हो गई है और युवाओं की संख्या कम है। इस समस्या से निपटने के लिए चीन ने 2015 में वन चाइल्ड पॉलिसी में ढील देते हुए। दो बच्चे पैदा करने की छूट दी थी। लेकिन अब सरकार ने दो बच्चों की नीति से पीछे हटने के संकेत दिए हैं और बच्चे पैदा करने को लेकर लगाए गए प्रतिबंधों में भी ढील देने की सोच रही है। हाल ही में सरकार ने एक पोस्टल स्टैम्प जारी किया है जिसमें सुअर के 3 बच्चे दिखाई दे रहे हैं। इसे भी इस बात के संकेत के तौर पर लिया जा रहा है कि चीन बच्चों की संख्या को लेकर लगाए प्रतिबंध को हटा सकता है।

दूसरी तरफ आपातकाल की जबरन नसबंदी नीति के कारण असंतोष बढ़ा। जिसके कारण इंदिरा सरकार हारी तबसे किसी सत्तारूढ़ पार्टी ने जनसंख्या नियंत्रण की बात करना ही बंद कर दिया। मोदी ने भी अपने पहले कार्यकाल में कभी जनसंख्या नियंत्रण की बात नहीं की। मगर अब इस मुद्दे को जोर शोर से उठाया है।

सतीश पेडणेकर

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.