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विगत के गर्भ में आगत के संकेत

विगत के गर्भ में आगत के संकेत

हर बीते साल के साथ ढेरों ऐसी घटनाएं होती हैं, जो समय के गर्त में समा जाती हैं। जो समय में गहरे-अंधेरे खोह में कहीं समा जाती हैं, जहां से उन्हें स्मृतियों में वापस लाना आसान नहीं होता। लेकिन कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं, जो तारीखों में दर्ज हो जाती हैं और आने वाले बरसों को प्रभावित करती रहती हैं। इस लिहाज से देखें तो बीते साल की चार महत्वपूर्ण तारीखें रहीं, जो इतिहास में दर्ज हो गईं।

बीते साल की सबसे महत्वपूर्ण तारीख है, 23 मई..इसी दिन सत्रहवीं लोकसभा के नतीजे आए। इन नतीजों ने भारतीय राजनीति के दो बड़े सितारों के भाग्य ही नहीं लिखे, बल्कि देश आने वाले भारत की तस्वीर को भी साफ कर दिया। साल 2018 के विधानसभा चुनावों में कर्नाटक में कड़ी टक्कर देने के साथ ही छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान से भारतीय जनता पार्टी की सत्ताओं को उखाड़ फेंकने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने उम्मीद पाल रखी थी कि सत्रहवीं लोकसभा के चुनावों में कांग्रेस नई कहानी लिखकर केंद्र की सत्ता पर काबिज हो सकेगी। लेकिन 23 मई को जब ईवीएम मशीनें खुलीं तो उन्होंने कांग्रेस को चौंका दिया। बेशक उसकी सीटें 44 से बढ़कर 52 हो गई, लेकिन उसके साथ खड़ी भारतीय जनता पार्टी ने 282 की बजाय 303 सीटों की अजेय बढ़त के साथ भारी जीत हासिल की। इसके साथ ही नरेंद्र मोदी की अगुआई में उस भारतीय जनता पार्टी ने इतिहास रच दिया, जिसे सत्ता से दूर रखने के लिए कांग्रेस समेत समूचा विपक्ष अरसे से प्रयासरत रहा था। यह उस भारतीय जनता पार्टी की जीत थी, जिस पर 1996 के आम चुनावों में सबसे बड़ा दल बनने के बाद सत्ता से दूर रखने के लिए ना सिर्फ समूचे गैर भाजपाई दलों ने गठबंधन कर लिया था, बल्कि अटल बिहारी वाजपेयी की हंसी उड़ाई थी। भारतीय जनता पार्टी को सिर्फ केरल और तमिलनाडु से जनसमर्थन नहीं मिला, अलबत्ता हर राज्य में उसने ना सिर्फ अपनी मौजूदगी दर्ज कराई, बल्कि धमाके से कराई। पश्चिम बंगाल में तो उसकी उपस्थिति इतनी धमाकेदार रही कि ममता बनर्जी तब से परेशान नजर आ रही हैं। उत्तर प्रदेश में समाजवादी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन के बावजूद पार्टी ने ना सिर्फ 80 में से 65 सीटें जीत ली, बल्कि कांग्रेस के गढ़ अमेठी से राहुल गांधी को स्मृति ईरानी ने पराजित कर दिया। कांग्रेस को सबसे ज्यादा सफलता पंजाब और केरल से मिली। लेकिन इसका श्रेय राहुल की बजाय स्थानीय समीकरणों और पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह को मिला।

साल की दूसरी बड़ी राजनीतिक तारीख रही पांच अगस्त..इसी दिन लोकसभा ने आजादी के बाद से भी भारतीय राजनीति के लिए नासूर बने जम्मू-कश्मीर को विशिष्ट दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 में संशोधन को मंजूरी दे दी। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर को विशिष्ट राज्य का दर्जा देने वाले इस अनुच्छेद के कई प्रावधान और कैबिनेट का आदेश 35 ए निरस्त हो गया। अगले ही दिन राज्यसभा ने भी इसे मंजूरी दे दी और सात अगस्त को राष्ट्रपति ने भी इसे मंजूरी देकर जम्मू-कश्मीर को दो केंद्रशासित प्रदेशों के तौर पर बांट दिया। इसमें एक हिस्सा जम्मू-कश्मीर है और दूसरा लद्दाख। लद्दाख को जहां प्रशासक के जरिए शासन चलाया जाएगा, वहीं जम्मू-कश्मीर में आने वाले दिनों में पुद्दूचेरी और दिल्ली की तरह विधानसभा होगी। इसके साथ ही राज्य के दोनों हिस्से नए रूप में एक अक्टूबर से अस्तित्व में आ गए। जम्मू-कश्मीर को अनुच्छेद 370 के तहत मिले विशेष प्रावधानों को खत्म करना भारतीय जनता पार्टी का मुख्य एजेंडा जनसंघ के दिनों से रहा है। भारतीय जनसंघ के जमाने से ही भारतीय जनता पार्टी का नारा रहा है, एक निशान, एक प्रधान और एक विधान…जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इस नारे को लेकर अभियान चलाया था, उस दौरान उन्हें वहां गिरफ्तार कर लिया गया और इस दौरान उनका निधन हो गया। इसके बाद से जनसंघ ने एक और नारा दिया था, जहां दिया बलिदान मुखर्जी ने, वह कश्मीर हमारा है। जाहिर है कि तब से कश्मीर का मामला भारतीय जनता पार्टी का कोर मुद्दा रहा है।

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भारतीय जनता पार्टी के शासनकाल की पिछले साल की बड़ी तारीख नौ नवंबर भी रही, जिस दिन राममंदिर विवाद पर देश की सबसे बड़ी अदालत ने फैसला दिया। यह फैसला तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गगोई की अध्यक्षता में अदालत की संविधान पीठ के पांच जजों ने एकमत से दिया इस फैसले में अदालत ने कहा है कि अयोध्या में विवादित भूमि पर राम मंदिर बनेगा। इसके लिए तीन महीने के अंदर एक ट्रस्ट बनाया जाएगा, जो मंदिर बनाने के तौर-तरीके तय करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि मुस्लिमों को मस्जिद बनाने के लिए मुस्लिम पक्ष को दूसरी जगह पर पांच एकड़ जमीन दी जाएगी। अपना फैसला सुनाते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि इस बात के सबूत नहीं हैं कि मुस्लिमों ने मस्जिद का त्याग कर दिया था। हिंदू हमेशा से मानते रहे हैं कि मस्जिद का भीतरी हिस्सा ही भगवान राम की जन्मभूमि है। इस बात के सबूत हैं कि अंग्रेजों के आने के पहले से राम चबूतरा और सीता रसोई की हिंदू पूजा करते थे। रिकॉर्ड्स के सबूत बताते हैं कि विवादित जमीन के बाहरी हिस्से में हिंदुओं का कब्जा था। अदालत ने यह भी कहा कि कहा कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण इसका सबूत नहीं दे पाया कि कि मस्जिद का निर्माण मंदिर को ध्वस्त कर किया गया था। बहरहाल इस फैसले के बाद राममंदिर के लिए राह खुल गई।

बीते साल की एक और अहम राजनीतिक तारीख रही 11 दिसंबर…इसी दिन केंद्र सरकार ने नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 लोकसभा में प्रस्तुत किया और इसे लोकसभा की मंजूरी मिल गई। इसके बाद बुधवार 12 दिसंबर को इसे राज्यसभा ने भी पास कर दिया। तेरह दिसंबर को राष्ट्रपति की इसे मंजूरी भी मिल गई। इस विधेयक में बांग्लादेश, अफगानिस्तान और पाकिस्तान से आने वाले अल्पसंख्यकों मसलन हिंदू, सिख, बौद्ध और ईसाई समुदाय के लोगों को नागरिकता देने के सामान्य कानून की बजाय 2014 तक भारत आए सभी लोगों को नागरिकता देने का प्रावधान है। विधेयक को कानूनी जामा पहनाने के अगले दिन शुक्रवार था। इस दिन की जुम्मे की नमाज का इस्तेमाल मुसलमानों को बरगलाने में कांग्रेस, आम आदमी पार्टी समेत कई दलों ने इस्तेमाल किया। इसी दिन दिल्ली के जामिया इलाके में वहां के आम आदमी पार्टी के विधायक अमानुल्लाह खान की अगुआई में उत्तेजक प्रदर्शन हुआ। इसके बाद जामिया में इसे लेकर विरोध शुरू हुआ और यह विरोध हिंसक हो गया। इसके बाद तो देशव्यापी हिंसा हुई। लेकिन ध्यान देने की बात यह है कि हिंसा की घटनाएं उन शहरों में ज्यादा हुई हैं, जहां मुस्लिम आबादी भारी संख्या में है। यह बात और है कि हिंसा की घटनाएं भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों में ज्यादा हुई हैं। हैरतअंगेज तरीके से देखें तो कांग्रेस शासित राज्यों में हिंसा नहीं हुई है। ऐसे में समझदारों का एक वर्ग मानने लगा है कि हिंसा की ये घटनाएं भारतीय जनता पार्टी से निजी खुन्नस रखने वाले दलों ने उसे बदनाम करने के लिए की गई उकसावे की कार्रवाही पर हुई है।

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इस साल तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए। तीनों राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें थीं। लेकिन सिर्फ हरियाणा में ही सरकार लौट पाई। वह भी जननायक जनता पार्टी के सहयोग से, जबकि नवंबर-दिसंबर में हुए चुनावों में झारखंड में भारतीय जनता पार्टी की हार हुई। यहां भारतीय जनता पार्टी करीब चौंतीस फीसद वोट पाई, फिर भी वह हार गई। महाराष्ट्र में वह अपने सहयोगी दल शिवसेना के साथ गठबंधन के चलते जीत तो गई, लेकिन जीत के बाद शिवसेना ने जिस तरह आधे-आधे वक्त तक मुख्यमंत्री पद की मांग रख दी, उससे भारतीय जनता पार्टी पीछे हट गई। बाद में पार्टी ने आनन-फानन में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अजित पवार के साथ मिलकर सरकार तो बना ली, लेकिन महज अस्सी घंटे में ही सरकार गिर गई। अब वहां एक-दूसरे की वैचारिक स्तर पर कट्टर विरोधी कांग्रेस और शिवसेना के साथ ही राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी सरकार चला रही है। इस सरकार को पारिवारिक लिमिटेड पार्टी कहा जा सकता है, जिसमें उद्धव मुख्यमंत्री हैं और उनके बेटे आदित्य मंत्री। कांग्रेस की तरफ से महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहे अशोक चव्हाण अपना दर्जा घटाकर मंत्री बन गए हैं। अजित पवार सिर्फ 34 दिनों बाद ही दूसरी सरकार में उपमुख्यमंत्री बन गए। महाराष्ट्र ने साबित किया है कि राजनीतिक दल और नेता अपने विरोधी दलों को चाहे जितनी भी नैतिकता का पाठ पढ़ाएं, लेकिन जब सत्ता की मलाई सामने होती है तो उन्हें उन्हीं नैतिकताओं को ताक पर रखने में देर नहीं लगती, जिसकी आलोचना करते वे नहीं थकते। तीन राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की हार ने पार्टी को एक संदेश दिया है। संदेश यह है कि सत्ता पाने के बाद अपने कार्यकर्ताओं को संतुष्ट करने, उन्हें प्रोत्साहित करने, उनका वाजिब-गैरवाजिब काम करने की जब राजनीतिक परिपाटी बन चुकी हो तो भारतीय जनता पार्टी इस परिपाटी से बचने की कोशिश करेगी तो उसके कार्यकर्ता उससे दूर होंगे। झारखंड की हार और हरियाणा में बहुमत से दूर रहने के पीछे बड़ी वजह यह रही कि कार्यकर्ताओं के वाजिब काम भी नहीं हो रहे थे, नौकरशाही पर भरोसा ज्यादा बढ़ा और नौकरशाही ने नेताओं को ठेंगे पर रखा। ये बात और है कि उसने अपनी झोली खुद भरी। भारतीय जनता पार्टी का स्थानीय नेतृत्व अहंकारी हो गया। इसे कार्यकर्ता देखते रहे और उन्होंने अपनी नाराजगी दिखा दी।

बीते साल की एक बड़ी घटना और है, पश्चिम बंगाल के चिटफंड घोटाले की जांच करने पहुंची सीबीआई की टीम ने जब कोलकाता के पूर्व कमिश्नर राजीव कुमार को गिरफ्तार करने की कोशिश की तो उनके बचाव में वहां की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद आ गईं। इसे संघीय ढांचे पर सीधा कुठाराघात माना गया और मामला तभी सुलझा, जब न्यायपालिका ने हस्तक्षेप किया।

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इन राजनीतिक घटनाओं का मौजूदा दौर में बड़ा असर पड़ा है। लेकिन यह भी सच है कि इनके चलते आगत के दिनों में कई बड़े असर पडऩे वाले हैं। महाराष्ट्र की सरकार चाहे जितनी दूर तक की यात्रा करे, लेकिन आने वाले दिनों में वैचारिक समझौते का खामियाजा शिवसेना को भुगतना पड़ सकता है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का तो कुछ नहीं बिगडऩा है, क्योंकि उसकी छवि ही सत्ता, ताकत और पैसे के लिए घूमने की है। अतिवादी अल्पसंख्यकवाद की छवि में कैद कांग्रेस को शिवसेना के साथ के लिए महाराष्ट्र में कीमत चुकानी पड़ सकती है। बेशक इन दिनों उसकी थैली कुछ मजबूत हो जाए। अल्पसंख्यकवाद का जिस तरह गैर भारतीय जनता पार्टी दल नागरिकता कानून पर राजनीति कर रहे हैं, इससे बहुसंख्यक ध्रुवीकरण बढ़ा है और आने वाले दिनों में इसका खामियाजा गैर भाजपा दल भुगतें तो हैरत नहीं होनी चाहिए। वहीं अगर हरियाणा और झारखंड से भारतीय जनता पार्टी ने सबक नहीं सीखा और अहंकारी स्थानीय नेतृत्व को छूट देना जारी रखा, कार्यकर्ताओं को किनारे रखने की परिपाटी बनाई रखी तो उसके लिए भी स्थितियां चुनौतीपूर्ण होंगी।

बीता साल तीन बड़ी राजनीतिक हस्तियों की जुदाई के लिए भी याद किया जाएगा। 17 मार्च को भारतीय जनता पार्टी के होनहार नेता और पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर का निधन हो गया तो भारतीय जनता पार्टी की प्रभावशाली वक्ता और पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज छह अगस्त को नहीं रहीं। अभी उनके निधन से हतप्रभ भारतीय जनता पार्टी उबरी भी नहीं कि 24 अगस्त को उस पर दूसरा वज्रपात हो गया। इस दिन पार्टी के रणनीतिकार अरूण जेटली नहीं रहे।

 

उमेश चतुर्वेदी

 

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