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शरणार्थियों को सुरक्षा अच्छे दिनों का आगाज

शरणार्थियों को सुरक्षा अच्छे दिनों का आगाज

यह तो सत्य है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में हिंदूओं पर अत्याचार होते रहे हैं और इस पृष्ठभूमि में नागरिकता (संशोधन) विधेयक आवश्यक था। क्योंकि  उनके  हित के बारे में सोचने वाला कोई अन्य देश नहीं है। प्रश्न तो यहां यह उठता है कि क्या इन प्रताडि़त लोगों को जिंदगीभर अवैध शरणार्थी के रूप में रहना चाहिये। यहां यह बताना महत्वपूर्ण है कि 1947 में भारत और पाकिस्तान का बंटवारा तो धर्म के नाम पर ही हुआ था। उस नियमानुसार पाकिस्तान इस्लाम के नाम पर अस्तित्व में आया जबकि भारत के संदर्भ में यह कहा गया कि सभी पंथ के लोग इस देश के नागरिक होंगे। लाखों गैर-मुस्लिमों के हित में इस बिल को तो भारत के विभाजन के समय ही लाया जाना चाहिये था। लेकिन सच्चाई तो यह है कि यह सब होने में 71 वर्ष गुजर गये, जिससे प्रताणित शरणार्थियों की कई पीढिय़ों को अवैध नागरीक के रूप में ही जीवन गुजारना पड़ा। यह बिल काफी सरल था, लेकिन देर से आया। तथाकथित पंथनिर्पेक्ष ब्रिगेड इस विधेयक के लिए भाजपा को जिम्मेदार ठहराते हुए इसे मुस्लिम-विरोधी बता रही है। समूचा विश्व जानता है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान मुस्लिम-बहुल देश हैं, जहां गैरमुस्लिम (हिन्दू, सिख, ईसाई, बौध व अन्य) लगभग नगण्य हैं। और समूचा विश्व यह भी जानता है कि किस प्रकार से इन देशों में इन पर दूराचार होता रहा है। यहां यह बताना आवश्यक है कि यह सब मुस्लिम कट्टरपंथी और सरकारों की मिली-भगत से होता रहा है। इन देशों में गैर-मुस्लिमों का नरसंहार, उनके साथ बलात्कार और लूट की घटनाएं लगातार होती रही हैं। इन लोगों को ‘ब्लेस्फेमी’ जैसे मध्यकालीन कानून से डराया जाता है और इतने प्रमाण होने के बावजूद भी हमे विश्वास दिलाया जाता है कि इन देशों में गैर-मुस्लिमों के साथ किसी भी प्रकार का दुव्र्यवहार नहीं किया जाता है।

यहां इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में गैर-हिन्दूओं के साथ लगातार हो रहा दुव्र्यवहार भारत के लिए हमेशा से चिन्ता का विषय रहा है। इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा सताये गये इन हिंदूओं की शरण के लिए भारत को छोड़कर कोई अन्य जगह नहीं है। उदाहरण के तौर पर 2013 में 600 से अधिक हिंदू भारत आए और अपने देश में हुए अत्याचार से बचने के लिए इन लोगों ने दिल्ली के बिजवासन में शरण ली। इस पृष्ठभूमि में यह बताना आवश्यक है कि भारत को बांग्लादेश और पाकिस्तान से नेहरू-लियाकत समझौते को तब लागू करवाना चाहिये था, जो अल्पसंख्यकों को सुरक्षा का वायदा करता है। यहां 11 अगस्त 1947 में पाकिस्तान के पहले गवर्नर जनरल मुहम्मद अली जिन्ना के असेम्बली में दिये गये भाषण की चर्चा करनी आवश्यक है, जिसमें उन्होंने कहा था ”तुम आजाद हो; आप अपने मंदिरों में जाने के लिए स्वतंत्र हो, आप अपनी मस्जिद या किसी अन्य स्थान पर जाने के लिए स्वतंत्र हो। आप किसी भी धर्म या जाति या पंथ के हो सकते हैं इसका राज्य से कोई लेना-देना नहीं है। हम इस मूल सिद्धांत से शुरू कर रहे है कि हम सभी एक राज्य के नागरिक और समान नागरिक हैं। ‘‘ इसलिए हमें पाकिस्तान से आने वाले शरणार्थियों को जगह देकर भारत के अन्य नागरिकों की तरह नागरिकता प्रदान करनी चाहिये। जिन्होंने भारत में वीजा के लिए निवेदन किया है, उन्हें भारतीय अधिकारियों द्वारा सताया नहीं जाना चाहिये। उन्हें बीपीएल स्टेटस दिया जाना चाहिये, क्योंकि ये शरणार्थी आर्थिक रूप से काफी कमजोर हैं। नागरिकता न होने के कारण ये लोग न तो बैंकों में खाता ही खोल सकते हैं, न ही अन्य व्यवसाय कर सकते हैं। उन्हें मुफ्त शिक्षा और अपनी जीविका चलाने के अधिकार मुफ्त में दिये जाने चाहिये। क्योंकि इस प्रकार के अधिकार तिब्बत से आये शरणार्थियों को पहले ही दिये जा चुके हैं।

Deepak Kumar Rath

 

दीपक कुमार रथ

(editor@udayindia.in)

 

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