शिखर पर कार्यकर्ता का सम्मान

शिखर पर कार्यकर्ता का सम्मान

जब भी दुनिया में लोकतंत्र और लोकतांत्रिक परंपराओं की चर्चा होती है, भारत इस पर गर्व करते नहीं थकता। आजादी के तुरंत बाद जब भारत ने लोकतंत्र को अपनाया तो दुनिया को लगता था कि भारत का लोकतंत्र तार-तार हो जाएगा। जिस ब्रिटेन के हम करीब दो सौ साल तक गुलाम रहे, उसके भी कुछ कद्दावर नेता मानकर चल रहे थे कि वक्त के साथ भारतीय लोकतंत्र की दीवारें भरभराकर ढह जाएंगी। भारतीय लोकतंत्र पर कुछ किंतु-परंतु भले ही रहे, लेकिन चुनाव-दर-चुनाव, साल-दर-साल अपनी जड़ें लगातार गहरी कीं। भारतीय लोकतंत्र लगातार ताकतवर बनकर उभरा। लेकिन इस लोकतंत्र में एक कमी रही, कई दल सिर्फ प्राइवेट लिमिटेड पार्टी बनकर रह गए तो कुछ दल एक या दो परिवारों के इर्द-गिर्द घूमते रहे। लेकिन इसी दौर में भारतीय जनता पार्टी ऐसा दल बनकर उभरी, जिसने हर बार नया नेतृत्व उभारा, हर बार नया व्यक्तित्व पार्टी की कमान संभालने के लिए सामने आया। 20 जनवरी को अपनी परिपाटी के ही अनुरूप भारतीय जनता पार्टी ने एक बार फिर अपने एक कार्यकर्ता को ही अपनी कमान सौंपी और वह कार्यकर्ता हैं, जगत प्रकाश नड्डा।

कार्यकर्ताओं और भारतीय जनता पार्टी के सर्किल में जेपी नड्डा के नाम से मशहूर नए अध्यक्ष पार्टी के अनुशासित सिपाही हैं। उनके पिता भले ही प्राध्यापक और कुलपति रहे, लेकिन कहा जा सकता है कि नड्डा अपने परिवार में पहली पीढ़ी के राजनेता हैं। 02 दिसंबर 1960 को बिहार की राजधानी पटना में जन्मे नड्डा ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आनुषंगिक संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से की। पटना विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान ही वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ गए थे। बिहार के प्रसिद्ध जयप्रकाश आंदोलन के दौरान उनकी उम्र कम थी। बिहार की राजनीति को बदलने में उस छात्र आंदोलन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उससे नड्डा बेहद प्रभावित रहे और कम उम्र के बावजूद इस आंदोलन में उन्होंने बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। इस आंदोलन में शामिल होने के बाद उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की सदस्यता ली और 1977 में आपने छात्रसंघ का चुनाव लड़ा। पटना विश्वविद्याल छात्रसंघ के सचिव पद के चुनाव में वे विजयी रहे। इसके बाद राजनीति में उनके कदम लगातार बढ़ते गए। पटना विश्वविद्यालय से डिग्री लेने के बाद उन्होंने हिमाचल विश्वविद्यालय, शिमला से कानून की पढ़ाई की। कानून की पढ़ाई करते हुए हिमाचल में भी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यक्रमों में नड्डा सक्रिय रहे। उन्होंने हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में भी छात्र संघ का चुनाव लड़ा और उसमें जीत हासिल की। कानून की पढ़ाई करने के बाद वे भारतीय जनता पार्टी के युवा मोर्चे में सक्रिय हो गए। उनकी संगठन क्षमता और कार्यशैली को देखते हुए 1991 में उन्हें भारतीय जनता युवा मोर्चा का राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया।

भारतीय जनता पार्टी के युवा मोर्चे में सक्रिय होने के चलते नड्डा की युवाओं के बीच पहचान बनी। उन्होंने बोफोर्स घोटाले के खिलाफ जारी भारतीय जनता पार्टी के अभियान में भी हिस्सा लिया। उनकी सक्रियता को याद करते हुए केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान कहते हैं कि नड्डा के ही कहने से उन्होंने 1988 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में तत्कालीन राजीव सरकार के घोटालों के खिलाफ हुए आयोजन में ना सिर्फ हिस्सा लिया था, बल्कि भाषण भी दिया था।

1990 के हिमाचल विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को विजय मिली और शांता कुमार मुख्यमंत्री बनाए गए। इसी बीच 6 दिसंबर 1992 को बाबरी ढांचा ढहा दिया गया। इसके लिए नरसिंह राव की अगुआई वाली केंद्र सरकार ने भारतीय जनता पार्टी को जिम्मेदार माना और उसने उत्तर प्रदेश की कल्याण सिंह सरकार के साथ ही भारतीय जनता पार्टी शासित मध्य प्रदेश, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश की सरकारों की भी बर्खास्त कर दिया। इसके बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। राष्ट्रपति शासन खत्म होने के बाद साल 1993 में विधानसभा के चुनाव हुए और भारतीय जनता पार्टी ने जेपी नड्डा को यहां की बिलासपुर सीट से चुनाव मैदान में उतारा। इस चुनाव में भले ही भारतीय जनता पार्टी को बहुमत हासिल नहीं हुआ, लेकिन बिलासपुर सीट पर जीत दर्ज की और इसके बाद उन्हें प्रदेश की विधानसभा में विपक्ष का नेता चुना गया। इस सीट से नड्डा ने साल 1998 और साल 2007 में हुए चुनावों में भी विजय हासिल की। इसी दौरान उन्हें राज्य की प्रेम कुमार धूमल सरकार में जगह दी गई। साल 1998 में बनी सरकार में उन्हें हिमाचल प्रदेश का स्वास्थ्य मंत्रालय दिया गया और साल 2007 में वे वन पर्यावरण और संसदीय मामलों के मंत्री रहे। कुछ दिनों तक उनके पास राज्य के परिवहन मंत्रालय का भी दायित्व रहा।

नड्डा को संगठन का आदमी माना जाता है। अच्छे संगठनकार के तौर पर उनकी पहचान है। कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद और उनके दुख-सुख में शामिल होना उनकी खासियत है। अपने इसी सहज व्यक्तित्व के चलते वे भारतीय जनता पार्टी में बेहद लोकप्रिय हैं। उनकी सांगठनिक क्षमता को देखते हुए उन्हें भारतीय जनता पार्टी की केंद्र की राजनीति में सक्रिय किया गया। इसी दौरान साल 2012 में नड्डा को राज्यसभा का सांसद चुना गया। इसके बाद साल 2014 में जब केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनी तो कुछ महीने पर स्वास्थ्य मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई। 09 नवंबर 2014 से 24 मई 2019 तक वे देश के बाद में उन्हें स्वास्थ्य मंत्री रहे। इसी दौरान उन्होंने माताओं और बच्चों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए टीकाकरण की इंद्रधनुष योजना लागू की। उन्हीं के कार्यकाल के दौरान मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी स्वास्थ्य बीमा योजना आयुष्मान भारत लागू की गई।

साल 2019 के आम चुनावों में नड्डा को उत्तर प्रदेश राज्य की जिम्मेदारी दी गई। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन के चलते राजनीतिक जानकार मान कर चल रहे थे कि उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी 2014 का इतिहास नहीं दोहरा पाएगी। उस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने 71, जबकि उसके सहयोगी अपना दल ने दो सीटों पर कब्जा किया था। 2014 के आम चुनाव का करिश्मा भारतीय जनता पार्टी 2019 के चुनाव में नहीं दिखा सकी, लेकिन बहुत पीछे भी नहीं रही। पार्टी ने अपने सहयोगी अपना दल के साथ 65 सीटें जीत लीं। प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद भारतीय जनता पार्टी के इस प्रदर्शन का श्रेय नड्डा को ही दिया गया। जब मोदी सरकार दोबारा केंद्र में सत्ता में आई तो भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह को गृहमंत्री बनाया गया। इसके बाद से ही माना जाने लगा था कि नड्डा को पार्टी की कमान मिल सकती है। इस सिलसिले में पहले उन्हें 17 जून 2019 को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया और फिर 20 जनवरी 2020 का वह दिन भी आ गया, जब पटना में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता के तौर पर अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत करने वाला व्यक्ति देश की सबसे बड़ी पार्टी का अध्यक्ष चुन लिया गया।

नड्डा अध्यक्ष बन गए हैं, लेकिन उनके सामने कई चुनौतियां है। उनके कार्यभार संभालने के ठीक पहले भारतीय जनता पार्टी अपने एक महत्वपूर्ण राज्य झारखंड की सत्ता से बाहर हो चुकी है। उनके कार्यभार संभालते वक्त ही दिल्ली में विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं। लोकसभा चुनावों के बाद से पार्टी की स्थिति बेहतर नहीं है। हरियाणा में पार्टी खींच-खांचकर ही सरकार बना सकी। जबकि महाराष्ट्र में उसके ही सहयोगी शिवसेना ने गच्चा दे दिया और गठबंधन में सबसे बड़ा दल बनने के बावजूद पार्टी सत्ता से दूर है।

नड्डा के सामने जहां दिल्ली में जीत दिलाने के दबाव होगा, वहीं निरूत्साहित चल रहे कार्यकर्ताओं के मन में उत्साह भरने की चुनौती है।

नड्डा जब अध्यक्ष बने, उन्हीं दिनों पार्टी का नागरिकता कानून और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर को लेकर देशव्यापी विरोध जारी है। भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ पूरा विपक्ष लामबंद है। मुस्लिम समाज भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ सड़कों पर है। उज्ज्वला योजना और प्रधानमंत्री आवास योजना के साथ ही अल्पसंख्यक कल्याण की दूसरी योजनाओं का फायदा हासिल करने के बावजूद मुस्लिम तबका भारतीय जनता पार्टी के इन योगदानों को भूल गया है। तीन तलाक की अपमानजनक परिपाटी से जिन मुस्लिम महिलाओं को भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने निजात दिलाई है, वे महिलाएं भी विपक्षी दलों के बहकावे में भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ सड़कों पर हैं। ऐसे माहौल में नड्डा के सामने भारतीय जनता पार्टी का भरोसा बढ़ाने की भी चुनौती है।

 

उमेश चतुर्वेदी

 

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