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श्री अबधूत के 24 गुरू और जीवन दर्शन

श्री अबधूत के 24 गुरू और जीवन दर्शन

अवधूत महाराज के चौबीस गुरूओं के बारे में हम में से बहुत लोगों को ज्ञान है, लेकिन हम उन गुरूओं से मिलने वाली शिक्षा से अवगत नहीं है। श्रीमद्भागवत के ग्यारहवें  स्कंध में राजा यदु व अवधूत महाराजा के बीच में होने वाले कथन का वर्णन किया गया है, जिसमें अवधूत महाराजा जी ने अपने जीवन के विश्ष्टिता को समझते हुए अपने गुरूओं के ज्ञान का विश्लेषण किया है। ये चौबीस गुरू  हैं-पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य,कबूतर, अजगर, समुंद्र, पतंग, भ्रमर (भंवरा), हाथी, मधुहा (मधु निकालने वाला), हिरण, मीन, पिंगला, वैश्या, कुरर (टिटवी पक्षी), बालक,  कुमारी के कंगन, सर्प, सरकार (बाण बनानेवाला), पेशस्कार (कुम्मारिन मक्खी), मकड़ी।

हम उन गुरूओं से मिलने वाले ज्ञान  का विश्लेषण करके जीवन को समझ पाएगें और जीने का आनंद ले पाएगें। ‘पृथ्वी’ को गुरू के रूप में चुने हैं क्योंकि पृथ्वी के रूप में असीम सहनशीलता परिलक्षित होती है। एक सााधक को साधना के लिए सहनशील होना अत्यंत आवश्यक है। बिना धैर्य और सहनशीलता के   हम कभी मंजिल तक नहीं पहुंच पाएंगे। अवधूत महाराज के द्वितीय गुरू हैं वायु। वायु सर्वदा गतिमान रहती ह। उसके मार्ग में मिलने वाली शीत, उष्णता, गंध-दुर्गन्ध इत्यादि गुण-दोषों से भेंट होने पर भी किसी से प्रभावित नहीं होती, इसी प्रकार मनुष्य सरल स्वभाव रखते हुये जगत की विभिन्न परिस्थितियों एवं गुण-दोषों के सम्पर्क में आकर भी उनसे विरक्त रह सकता है। आकाश को गुरू के रूप में पाकर उन्होंने  यह बताया है कि आत्मा संपूर्ण चराचर जगत में निर्वीकार रूप से एक समान व्यापप्त है, उसी प्रकार आत्मदृष्टि से युक्त योगी सर्वदा एक अद्वितीय आत्मा के दर्शन करता है। महराज अवधूत ने जल को गुरू के रूप में ग्रहण किया है। यदि हम  अपने जीवन को जल जैसा स्वच्छ और पवित्र रख पाएगें तो जरूर परमात्मा को पा पाएंगे। अग्नि से यह शिक्षा मिलती है कि तप का तेज स्वंय प्रकाशित होकर दुसरों को सत्मार्ग दिखाना एक असली योगी की पहचान है। चन्द्रमा का घटना और बढऩा हमें दृष्यमान जरूर होता है लेकिन वास्तव में चन्द्रमा अपरिवर्तनीय और स्थिर है, इसलिए देह में उत्पन्न होने वाले विकारों का आत्मा पर कोई भी प्रभाव नहीं पडऩा चाहिए। सूर्य की विशालता को ध्यान ने रखते हुए उन्हें गुरू बनाया है, लेकिन सूर्य मूल रूप से स्थिर है। उसी प्रकार उपाधिग्रस्त विकार आत्मा को प्रभावित नहीं करने चाहिए।

अवधूत महाराज ने कबूतर के जीवन से यह ज्ञान पाया की साधकों को सांसारिक आसक्ति से मुक्त रहना चाहिए। अजगर जैसे भयंकर सर्प से भी हमें यह शिक्षा मिलती है कि जैसे उसके सामने आने वाले किसी भी वस्तु में भिन्नता ना करके उसे भक्षण कर लेता है, हमें भी प्रत्येक वस्तु को परखना-चुनना छोड़कर सुविधा के अनुसार गुजारा करना चाहिए। समुद्र स्वत: नित्य पूर्ण है। वर्षा ऋतु में जब नदियां अथाह जल राशि के साथ समुद्र में आकर मिलती हैं तब वह अपनी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता और ग्रीष्म ऋतु में उसी प्रकार जल की कमी से ना क्षीण होता है। इसी प्रकार हमें अनुकूल व प्रतिकूल दोनों परिस्थितियों में एक प्रकार रहना चाहिए। संसार में कुछ प्राणी ऐसे होते हैं जो विषय का अर्थ न समझने के कारण अपनी क्षति कर बैठते हैं। उनकी गतिविधिीयों को लक्ष्य करके अवधूत ने उन्हें भी अपना गुरू बनाया है। पतंगे से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जिस प्रकार पतंगा दीपक की ज्योति के प्रति आकृष्ट होकर जल जाता है, हमें उसी प्रकार विषय-वासना के प्रति आकृष्ट होकर खुद का विसर्जन नहीं करना चाहिए। कुछ भ्रमर विचरण करके अनेक फूलों से मधु को इकठ्ठा करके एक बड़ा सा छता बना पाते हैं, जिससे काफी मधु मिल सकता है। इसी प्रकार हमें अनेक ग्रंथों से थोड़ा-थोड़ा ज्ञान पाने से कोई फायदा नहीं होता है। हर ग्रंथ से मिलने वाले ज्ञान को इकठ्ठा करके जो सृष्टि होती है वह संसार के लिए लाभवान होता है। हाथी को जब हथनी के चाह होती है तो वह उन्माद-प्राय हो जाता है और खुद की जान गंवा बैठता है। इससे हमें यह शिक्षा मिलती है कि वासना के वश में अपनी क्षति करने से बचना चाहिए। मधुहा मधुमक्खी के द्वारा इकठ्ठा होने वाले समस्त मधु को हड़प लेता है। अनेक व्यक्ति वस्तुओं के लोभ के कारण उन्हें समेटने में लगे रहते हैं। यहां तक खुद भी भोग नहीं कर पाते हैं। तीव्र वेगगामी हिरण भी मधुर संगीत के वश में आकर शिकारी का शिकार बन जाता है। हमें विवेक शून्य होकर चीजों के मोह में नहीं आना चाहिए। हमारी किसी कमी का कोई भी उपयोग करके अपना फायदा कर सकता है। इसी प्रकार मछली भी अपनी जिह्वा इन्द्रिय की आसक्ति के कारण बंधन में फंस जाती है। पिगंला वैश्या को गुरू बनाकर अवधूत महाराजा ने विवेकपूर्ण वैराग्य की शिक्षा ली। टिटवा पक्षी (कुरर) से उन्होंने अपरीग्रह का गुण सिखा है। एक छोटे बालक के क्रियाकलापों का सूक्ष्म अवलोकन करने पर उन्होंने यह सिखा कि जगत में मान-अपमान की चिंता छोडऩे से हम सुखी हो सकते हैं। कुमारी के कंगन से यही शिक्षा मिलती है कि संगति से प्रमाद उत्पन्न होता है और साधक की साधना में बाधा उत्पन्न होती है, इसिलिए प्रत्येक साधक को एकांत में रहकर साधना करनी चाहिए। एकाग्रता का गुण उन्होंने सर्प से सिखा है। बाण बनाने वाले सरकार को गुरू बनाकर एकाग्रता की शिक्षा प्राप्त कर पाए थे। कुम्मारिन मक्खी के दृष्टांत से यह स्पष्ट होता है कि किसी रूप का सत्त ध्यान करने से प्राणी तदाकार हो जाता है, यही ध्यान साधना का मर्म है। मकड़ी को गुरू बनाकर उससे अद्वैत का उपदर्श ग्रहण किया, जो जीवन का एक मात्र सत्य है। इन चौबीस गुरूओं को ध्यान में रखकर एवं इन्हें भलीभांति जानकर कोई भी मनुष्य जीवन निर्वाह करे तो वह परमात्मा को आसानी से प्राप्त कर पाएगा।

 

उपाली अपराजिता रथ

 

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