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श्री चन्द्रप्रभ सागरजी महाराज : आध्यात्मिक एवं नैतिक क्रांति का शंखनाद

श्री चन्द्रप्रभ सागरजी महाराज : आध्यात्मिक एवं नैतिक क्रांति का शंखनाद

भारत अध्यात्म की अनूठी एवं विलक्षण धरा है, उसकी तेजस्विता एवं उसके गौरव की स्थापना के लिये अनेक संत-मनीषी महापुरुषों ने अपनी साधना, अपने त्याग, अपने कार्यक्रमों एवं अनुभूत विचारों से बहुआयामी उपक्रम किये हैं। ताकि जनता के मन में अध्यात्म एवं धर्म के प्रति आकर्षण जाग सके। अध्यात्म ही एक ऐसा तत्व है, जिसको उज्जीवित और पुनप्र्रतिष्ठित कर भारत अपने खोए गौरव को पुन: उपलब्ध कर सकता है। जैन संतों एवं आचार्यों का इस दृष्टि से महनीय योगदान है। उन्हीं में एक नाम है श्री चन्द्रप्रभ सागरजी महाराज। वे महान् तपोधनी, ओजस्वी वक्ता, प्रखर लेखक, शांतमूर्ति, परोपकारी संत हैं।

श्री चन्द्रप्रभ सागरजी महाराज न केवल जैन साहित्य में अपितु सम्पूर्ण हिन्दी साहित्य में एक प्रमुख हस्ताक्षर के रूप में प्रतिष्ठित हैं। फुल सर्कल और हिन्द पॉकेट बुक जैसे राष्ट्रीय प्रकाशकों ने देश के महान पचास साहित्यकारों में आपको न केवल स्थान दिया है बल्कि आपकी पुस्तकों को प्रकाशित कर जन-जन के बीच पहुंचाया है। आपने पंथ-परम्पराओं में पाये जाने वाले आडम्बरों, दिखावा और भेदों पर कबीर की तरह निर्भीकता से चोट की है, साम्प्रदायिकता से पूरी तरह मुक्त एवं जीवन-सापेक्ष साहित्य रचकर सार्थक जीवन का मार्ग सुझाया है। आप महान कवि, गीतकार एवं कहानीकार, हैं, आपकी काव्य पुस्तिका ‘प्रतीक्षाÓ का अवलोकन करते हुए महान कवयित्री महादेवी वर्मा ने कहा है कि- ”इन कविताओं ने मेरी आत्मा को छू लिया है।ÓÓ आपने जीवन के हर सकारात्मक पहलू का स्पर्श करते हुए धर्म, शिक्षा, नारी, अध्यात्म, ध्यानयोग, व्यक्तित्व-निर्माण, परिवार, स्वास्थ्य, मानवीय एकता, प्रेम, विश्वशांति, राष्ट्र-निर्माण जैसे हर क्षेत्र में अब तक दो हजार से अधिक दिल-दिमाग को झकझोरने वाले लेख लिखे हैं, जो देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में प्रकाशित हुए हैं।

श्री चन्द्रप्रभ सागरजी महाराज का जन्म वैशाख शुक्ला सप्तमी, विक्रम संवत् 2021, 10 मई 1962 को बीकानेर-राजस्थान में हुआ। आपके पिता श्री मिलापचंदजी दफ्तरी एवं माता श्रीमती जेठी देवी है। श्वेताम्बर मूर्तिपूजक के खरतरगच्छ आम्नाय में दीक्षा गुरु आचार्य प्रवर श्री जिन कांतिसागर सूरिजी महाराज के करकमलों से आपने अपने माता-पिता एवं भाई ललितजी के साथ माघ शुक्ला एकादशी, विक्रम संवत् 2036, 27 जनवरी 1980 को बाड़मेर शहर में दीक्षा ली। आपके नानाजी श्री अगरचंदजी नाहटा जैन समाज के प्रतिष्ठित व्यक्तित्व, महान साहित्य-सेवी, इतिहासवेत्ता रहे हैं। आपकी प्राथमिक शिक्षा बीकानेर के जैन स्कूल में हुई।

श्री चन्द्रप्रभ सागरजी महाराज आत्म-कल्याण एवं परोपकार के अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए जूझते रहते हैं-अपनों से भी, परायों से भी और कई बार खुद से भी। इस जुनून में अपने मान-अपमान की भी प्रवाह नहीं करते। सिद्धांतों को साकार रूप देने की रचनात्मक प्रवृत्ति के कारण मुनियों के लिए ज्यादा करणीय माने जाने कार्यों की अपेक्षा जीवदया, मानव सेवा व तीर्थ विकास में उनकी रूचि ज्यादा परिलक्षित होती है। जीवदया व मानवसेवा के कई प्रकल्प उन्होंने चला रखे हैं। मन्दिरों के निर्माण एवं जीर्णोद्धार के द्वारा वे न केवल जैन संस्कृति बल्कि भारतीय संस्कृति सुदृढ़ कर रहे हैं। उन्होंने राष्ट्रीय स्तर की अनेक संस्थाओं की स्थापना की हैं, जिनमें सम्मेतशिखर महातीर्थ में भव्य जैन म्यूजियम की स्थापना, जोधपुर शहर में कायलाना रोड पर प्रसिद्ध साधना स्थली संबोधि धाम का निर्माण, सत्साहित्य प्रकाशन के क्षेत्र में अपनी अग्रणी भूमिका निभाने वाली श्री जितयशा फाउंडेशन की स्थापना, देश भर में लोकप्रिय संबोधि टाइम्स नामक विचारप्रधान पत्रिका का प्रकाशन आदि रचनात्मक एवं सृजनात्मक प्रवृत्तियों आपके साधनामय जीवन को भी सार्थक कर रही हैं। आपके व्यापक दृष्टिकोण एवं बहुआयामी गतिविधियों के कारण ही इण्डिया टूडे प्रकाशन समूह द्वारा आपको मुखपृष्ठ पर जगह दी गयी थी। सन् 1988 में हम्पी की गुफा में साधना करते हुए उपलब्ध हुए आत्म-प्रकाश के बाद आपने समस्त उपाधियों का त्याग कर जन-जन के उन्नयन एवं उद्धार के लिये अपने आपको नियोजित कर दिया हैं। आप दार्शनिक हैं, महाज्ञानी हैं, अनेकों ग्रंथों के लेखक, वक्ता, शास्त्रों के मर्मज्ञ एवं भाष्यकार तथा बेजोड़ प्रबुद्ध व्यक्तित्व के धनी हैं। पूरे विद्वद्जगत में अपनी एक अनूठी पहचान एवं विरलता बनाए हुए हैं। उनका जीवन एक बहुआयामी यात्रा का नाम है, अक्षर से अर्थ की यात्रा, स्थूल से सूक्ष्म की यात्रा, सीमा से असीम होने की यात्रा, विद्वता से विनम्रता की यात्रा।

श्री चन्द्रप्रभ सागरजी महाराज का सम्पूर्ण जीवन आश्चर्यों की वर्णमाला से गुम्फित हैं। आप मात्र 19 वर्ष में उम्र में पीएच.डी करने वाले पहले संत हैं। आपने अपने प्रवचनों को दार्शनिक शैली से मुक्त कर जीवन सापेक्ष चिंतन किया हैं। पारलौकिक स्वर्ग की बजाय इसी जीवन को स्वर्ग बनाने के कीमिया गुर देने वाले आप धर्मगुरु हैं। युवा पीढ़ी को कॅरियर-निर्माण, व्यक्तित्व-निर्माण और संस्कार-निर्माण पर महान सोच देने वाले एवं मैनेजमेंट गुरु की तरह जीवन जीने की कला सिखाने वाले महान् संत हैं। आपने सार्वजनिक मैदानों में विभिन्न जाति, वर्ग, भाषा, वर्ण, धर्म एवं सम्प्रदाय के पच्चीस हजार से ज्यादा जनसमुदाय को इकठ्ठा करके धर्म के वास्तविक स्वरूप से प्रेरित किया हैं। आपने अब तक एक लाख से ज्यादा लोगों को मांसाहार एवं दुव्र्यसनों का त्याग करवाया हैं। लाखों हिन्दुओं को नवकार मंत्र एवं लाखों जैनों को गायत्री मंत्र याद करवाकर धार्मिक मिसाल कायम करने वाले अनूठे एवं विलक्षण संत हैं। श्रीमद्भागवत गीता पर जोधपुर के गीता भवन में लगातार अठ्ठारह दिन तक संबोधित करने एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित मां की ममता पर हृदयस्पर्शी प्रवचन देने वाले पहले जैन संत हैं। नैतिक एवं मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठापना के लिए देश के 20 राज्यों में चालीस हजार से अधिक किलोमीटर की पदयात्रा करके अपने नन्हें पांवों से जन-जन के दर्द को समझने का आपने प्रयत्न किया। भूकंप, बाढ़, सुनामी जैसी राष्ट्रीय आपदाओं में जनसहयोग भिजवाकर राष्ट्र-भक्ति का परिचय देने वाले एवं सूर्यास्त से लेकर सूर्योदय तक 20 वर्षों से लगातार मौन रखने वाले मौन-महाव्रती संत हैं। आपने भागमभाग भरी जिंदगी से क्लांत और अशांत मन को शांति और समाधि की सुवास देने के लिए संबोधि साधना मार्ग का प्रवर्तन किया हैं। आपने सभी धर्मों के सिद्धांतों एवं महापुरुषों के संदेशों में निकटता स्थापित कर सर्वधर्म सद्भाव की मिसाल कायम की हैं। आप धर्म के नाम पर होने वाले आडम्बरों और अनावश्यक खर्चों को कम करने के लिये सामाजिक जनजागृति शंखनाद किया हैं। आपने धर्म की शुरुआत मंदिर-मस्जिद-चर्च-गुरुद्वारा-स्थानक-उपाश्रय से करने की बजाय परिवार से करने की सीख दी हैं। आप मंदिरों के निर्माण से अधिक मानव-समाज के उत्थान पर बल देते हैं। इसी कारण आप संतों और मुनियों को गरीबों का भी सम्मान करने के लिए प्रेरित करते हैं। आपने आत्मकल्याण के लिए एक हाथ में माला और आत्मरक्षा के लिए दूसरे हाथ में भाला रखने का सिद्धांत एवं संबोध दिया और विदेशी संस्कृति की आलोचना करने की बजाय उनकी अच्छाइयों से प्रेरणा लेने की सीख दी हैं। आप धर्म, जाति, रूप, रंग, परम्परा की बजाय इंसानियत को महत्त्व देने का अनूठा पाठ पढ़ा रहे हैं। अपने क्रांतिकारी विचारों से भारत-निर्माण के लिए युवाशक्ति को आगे आने का जोश भर रहे हैं।

श्री चन्द्रप्रभ सागरजी महाराज ने अहमदाबाद में लगभग एक वर्ष, दिल्ली में सात माह, बनारस में पाश्र्वनाथ शोध संस्थान में लगातार तीन वर्ष तक धार्मिक एवं शास्त्रीय अध्ययन किया। संस्कृत, प्राकृत, हिन्दी, प्राचीन राजस्थानी, गुजराती, अंग्रेजी आदि भाषाओं के अतिरिक्त प्राचीन लिपि, भाषा-विज्ञान में आप दक्ष हैं। आगम, शास्त्र, दर्शन, इतिहास, मनोविज्ञान, काव्यशास्त्र, पिटक, उपनिषद्, विधि-विधान, व्याकरण शास्त्र के अध्ययन के साथ अनुसंधान में आप संलग्न हैं।  चिंतन, दर्शन, काव्यशास्त्र आदि वांगमय के समस्त महत्त्वपूर्ण अंगों पर 200 से अधिक पुस्तकों का आपने लेखन किया हैं।

श्री चन्द्रप्रभ सागरजी महाराज का उदार और व्यापक दृष्टिकोण एवं व्यक्तित्व और कर्तृत्व इक्कीसवीं सदी के क्षितिज पर पूरी तरह छाया हुआ है। उनके प्रकल्पों, विचारों व प्रवचनों में हमें कोरी आदर्शवादिता या सिद्धांतवादिता के दर्शन नहीं होते। उनमें हमें प्रयोग सिद्ध वैज्ञानिक स्वरूप उपलब्ध होता है। अपने ज्ञान गर्भित प्रवचनों व क्रांतधर्मी साहित्य के माध्यम से उन्होंने आध्यात्मिक एवं नैतिक क्रांति का शंखनाद किया है। वे धर्म को रूढि़ या परंपरा के रूप में स्वीकार नहीं करते। धार्मिक आराधना-उपासना से व्यक्ति की जीवनशैली और वृत्तियों में बदलाव आए, उनके समग्र जीवनदर्शन का निचोड़ यही है।

 

ललित गर्ग

 

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