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सब के लिए परिवार, मोदी जी के लिए?

सब के लिए परिवार, मोदी जी के लिए?

बेटा: पिताजी।

पिता: हां, बेटा।

बेटा: पिताजी, दुनिया बदल जाएगी लेकिन आप नहीं बदलेंगे।

पिता: अब क्या हो गया?

बेटा: पिताजी, सारी दुनिया ने अपनी-अपनी पार्टियां बना लीं, पर आपने कुछ नहीं किया।

पिता: बेटा, भारत में राजनितिक दलों की कमी है जो और बनाने की आवश्यकता है? एक राजनीति ही तो है जिसमें जनसंख्या नियंत्रण नहीं है। बच्चे पैदा हों या न हों, पर रोज नया राजनितिक दल अवश्य पैदा हो जाता है।

बेटा: लगता है कि आपने आजकल अखबार पढने और समाचार चैनल देखने बंद कर दिए हैं।

पिता: नहीं। में तो अखबार भी रोज पढता हूं और टीवी की खबरे भी देखता हूं।

बेटा: तो फिर आपको कैसे पता नहीं कि कई राजनितिक पार्टियां जो आगे ही वंशवाद पर आधारित थीं, उनमें विद्रोह हो गया और भाई-भाइयों ने और पार्टियां खड़ी कर दीं हैं।

पिता: ऐसे तो बेटा राजनीति में चलता ही रहता है।

बेटा: तो आपने देखा होगा कि हरियाणा में जिस राष्ट्रीय लोक दल को स्वर्गीय देवीलाल जी के सुपुत्र श्री ओम प्रकाश चौटाला चला रहे थे उसे भाइयों-भाइयों ने बांट डाला है जबकि चौटाला तो जेल में अभी सजा काट रहे हैं।

पिता: उसमें क्या नयी बात है? आंध्र प्रदेश में वर्तमान मुख्यमंत्री चन्द्र बाबु नायडू ने अपने ससुर स्वर्गीय एन टी रामाराव को हटाकर उनकी पार्टी पर स्वयं कब्जा जमा लिया था। अब नायडू जी अपने पुत्र को आगे कर रहे हैं। यही सब कुछ और पार्टियों में चल रहा है। कांग्रेस में राहुल जी अपनी बहन को ले आये हैं।

बेटा: उत्तर प्रदेश में भी अखिलेश जी ने समाजवादी पार्टी की कमान अपने हाथ में लेकर अपने पिताजी को किनारे कर दिया है। आपने देखा होगा कि हरियाणा में जिस राष्ट्रीय लोक दल को स्वर्गीय देवीलाल जी के सुपुत्र श्री ओम प्रकाश चौटाला चला रहे थे उसे भाइयों-भाइयों ने बांट डाला है जबकि चौटाला तो अभी जेल में सजा काट रहे हैं।

पिता: कश्मीर में भी तो वंशवाद ही चल रहा है। एक ओर है शेख अब्दुल्ला की नैशनल कांफ्रेंस जहां शेखजी के पुत्र फारूख के बाद उनके पौत्र उमर चला रहे हैं।

बेटा: वहीं पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के संस्थापक स्वर्गीय मुफ्ती मोहम्मद शरीफ पहले वह इस पार्टी के अध्यक्ष और मुख्यमंत्री रहे। उनके स्वर्गवास होने के बाद उनकी बेटी महबूबा सईद ने उनका स्थान लिया और पार्टी अध्यक्ष भी बनीं और जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री भी।

पिता: इस तरह गिनने लगेंगे तो यह लिस्ट बहुत लम्बी है। पर इस कहानी को लम्बा करने से तेरा मतलब क्या है?

बेटा: पिताजी, आपने भी अपनी एक अलग पार्टी बनाई होती तो आज हमारे भी वारे-न्यारे हो हो गए होते।

पिता: कैसे?

बेटा: तब आप हमारे दल के अध्यक्ष होते, चाचाजी कार्यकारी अध्यक्ष, हम दोनों भाई राष्ट्रीय महामंत्री, हमारी माताजी होतीं महिला मोर्चा की अध्यक्ष, मेरी बहन होती हमारी स्टार प्रचारक और हमारा भतीजा होता युवा मोर्चा का अध्यक्ष। थोड़ा समय और मिलता तो हम परिवार के हर सदस्य को राष्ट्रीय स्तर का कोई और पद देते जाते।

पिता: फिर क्या हो जाता?

बेटा: पिताजी, हम आपको अपनी पार्टी के प्रधानमंत्री का प्रत्याशी घोषित कर देते।

पिता: अभी पार्टी बनी नहीं और तुम इतने दिवास्वप्न देखने लगे हो। मैं कैसे प्रधानमंत्री का प्रत्याशी बन बैठता? यह शेख चिल्ली वाली बातें छोड़ो।

बेटा: पिताजी, पालिटिक्स में ऐसा ही चलता है। किसी ने सोचा था कि देवेगौड़ा जी प्रधान मंत्री बन जाएंगे? विश्वनाथ प्रताप सिंह जी, चन्द्रशेखर जी और इंद्र कुमार गुजराल जी भी। कोई अगर कभी यह कह भी देता, तो यही नेता विश्वास न करते और उल्टे कह देते कि क्यों मुझे बेवकूफ बना रहे हो? फस्र्ट अप्रैल तो अभी दूर है।

पिता: इतना तो मैं भी कहता हूं कि व्यक्ति सफल तो तभी होगा जब वह अपना लक्ष्य निर्धारित कर ले और उसे प्राप्त करने के लिए प्रयास करे।

बेटा: हां, पिताजी, कोई परीक्षा में बैठेगा तभी तो वह सफल होगा। घर बैठे तो कोई उसे डिग्री देने नहीं आएगा। और इसी तरह जब कोई लाटरी का टिकिट खरीदेगा तभी उसकी लाटरी निकलेगी। जब उसने टिकिट ही नहीं खरीदा तो वह बहुत भाग्यशाली कैसे निकलेगा?

पिता: कुछ हद तक तो मैं तेरी बात से सहमत हूं। पर तेरे मामले में तो तुझे कैसे सफलता मिलेगी?

बेटा: उसी तरह जैसे और पार्टियों को मिल रही है।

पिता: तेरे पर तो चोरी का मुकदमा भी चल रहा है।

बेटा: यह तो और भी अच्छा है। और बड़े नेताओं की तरह मैं भी छाती पीट-पीट कर शोर मचा सकता हूं कि सत्ताधारी दल मेरे और मेरे दल के साथ राजनीतिक द्वेश भावना से पीडि़त हो कर मुझ पर झूठे मुकदमें चला रहा है मुझे बदनाम करने के लिए। यह मुकद्दमें मेरी जुबान को बंद करने के लिए चलाये जा रहे हैं ताकि में उनके खिलाफ बोलना बंद कर दूं। पर मैं झुकने वाला नहीं हूं। सत्ताधारी दल मुझ पर, मेरे परिवार पर, मेरे समर्थकों पर जितने भी जुल्म कर लें, पर मैं झुकूंगा नहीं, चाहे मेरी जान ही क्यों न चली जाए। मैं मर सकता हूं, पर झुक नहीं सकता।

पिता: आज तो तेरी भाषा और जोश एक बड़े मंजे हुये नेता की तरह गरज रहा  है।

बेटा: पिताजी, आप एक बार नई पार्टी तो बनाओ, फिर मैं बताता हूं कि में क्या कुछ कर दिखा सकता हूं। मैं तो इलान कर दूंगा कि सत्ताधारी दल व मुख्यमंत्री व प्रधानमंत्री पर मुझे देखना है कि जोर कितना बाजुये कातिल में है।

पिता: यह जोश और जज्बा तू ने कहां से सीखा?

बेटा: अपने वर्तमान नेताओं से ही। वह यही तो करते और कहते हैं जब उन पर, उनके परिवार व समर्थकों पर पुलिस व प्रशासन कोई अपराध जड़ देता है।

पिता: पर इसका यह मतलब तो नहीं हो सकता है कि सरकार राजनीति में अग्रसर व्यक्तियों के खिलाफ कुछ भी न करे चाहे उन्होंने कोई अपराध या गलती की भी हो।

बेटा: पिताजी, पालिटिक्स की यही तो ब्यूटी है।

पिता: अच्छा। अब समझा कि राजनीतिज्ञ लोग क्यों ऐसा करते हैं।

बेटा: यही नहीं पिताजी, जब किसी नेता के घर आयकर विभाग या अन्य कोई इकाई छापा मारते हैं तो संबन्धित नेता नहीं, उसका दल बोलता है कि यह सब राजनीतिक द्वेश भावना से किया जा रहा है। वह अपने नेता को ईमानदार और निर्दोष होने का प्राणपत्र जारी कर देते हैं।

पिता: इसका क्या मतलब निकला?

बेटा: पिताजी, पार्टी ऐसा कैसे कर सकती है? व्यवसाय वह नेता चलाता है या उसकी पार्टी जो पार्टी को सब कुछ पता होता है?

पिता: यही तो सोचने की बात है। पर हैरानी तो तब होती है जब किसी पार्टी नेता पर बलात्कार या व्यभिचार का आरोप लगता है। पार्टी तब भी यही काम करती है।

बेटा: उस नेता पर लगे आरोपों का खंडन पार्टी कैसे कर सकती है? क्या वह पार्टी व उसके नेता जनता को यह आभास देना चाहते हैं कि वे दिन-रात उस नेता के साथ होते हैं और बेडरूम में रात को उसके साथ ही सोते हैं?

पिता: चल यह तो हुई बड़े-बड़े नेताओं की बात। पर तुझे कैसे इसका लाभ मिल सकता है?

बेटा: अपने पर लगे चोरी के आरोपों का खंडन मैं थोड़े करूंगा। यह तो मेरी पार्टी के लोग करेंगे। और कहीं अपनी पार्टी या हमारा गठबंधन सत्ता में आ गया तो अपनी सरकार अपने आप ही मेरे पर लगे आरोपों के मुकद्द्मों को अदालत से वापस ले लेगी यह तर्क देकर कि मुझ पर लगाए गए आरोप राजनीतिक द्वेष भावना से प्रेरित थे।

पिता: हां, तब तो राजनीति में जाने का यह फायदा तो हो जाएगा। चलो, अभी तो यह सब ख्याली पुलाव ही हैं, पर तेरे जैसे इसका मतलब यह न लगा लें कि अपराध करते जाओ, अंत में पार्टी तुम्हें निर्दोष साबित तो करवा ही देगी।

बेटा: ईश्वर का शुक्र है कि एक जगह तो आप मुझ से सहमत तो हुये।

पिता: यह तो सब अभी तेरे सपने ही हैं।

बेटा: पिताजी, यह सपनें अब सच्चे हो जाने की कगार पर हैं। पिछले 40 साल तक तो गठबंधनों का ही बोलबाला रहा जिस कारण बेचारे छोटे दलों को भी सरकार में प्रतिनिधित्व मिल पाया और वह अपना महत्वपूर्ण व स्कारात्मक योगदान दे सके। उसके बाद 2014 में पता नहीं जनता को क्या हो गया जो उसने एक ही पार्टी को बहुमत दे दिया। पर अब लगता है कि अगले चुनाव में पालिटिक्स का पुराना स्वर्णिम युग लौट आयेगा और देश के हर हिस्से को अपना प्रतिनिधित्व मिल सकेगा।

पिता: किसी को कुछ मिलेगा या नहीं, मुझे इससे कोई सरोकार नहीं। तू बता तेरा क्या होगा?

बेटा: पिताजी, आजकल तो पालिटिक्स में परिवारवाद का ही बोलबाला है, इसलिए में तो बहुत आशावान हूं।

पिता: पर बेटा यदि केंद्र में गांधी परिवार, कश्मीर में अब्दुल्ला परिवार, हरियाणा में चौटाला परिवार, यूपी में मुलायम परिवार, तमिलनाडू में करूणानिधि परिवार, आन्ध्र प्रदेश में नायडू परिवार, महाराष्ट्र में ठाकरे या पवार परिवार आदि सत्ता में आ गए तो देश में वही हालात हो जायेंगे जो अंग्रेजों और मुगलों के समय थे। सब अपने-अपने प्रदेश के राजे-महाराजे बन बैठेंगे। उससे तो देश एक नहीं रह पायेगा।

बेटा: पिताजी, आप अपनी सोचो, देश की नहीं। आज देश में कोई देश की नहीं, अपनी और अपने परिवार की सोच रहा है।

पिता: और नरेन्द्र मोदीजी?

बेटा: उनकी बात और है। उन के लिए तो देश ही अपना परिवार है।

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