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समाज में हम

समाज में हम

अपने रोजमरा की जिंदगी हम ऐसे कार्यों को करते हैं जोकि काफी विचित्र और हास्यास्पद होते हैं। वर्तमान की अनौपचारिक चर्चा तो अक्सर हिन्दी में लफ्फाजी की हद तक होती है, लेकिन उस पर गंभीर विचार-विमर्श का रिवाज इसमें अभी बना ही नहीं है। यह विडंबना ही है कि जिस वर्तमान को हम ओढ़ते-बिछाते हैं, अपने गंभीर विचार-विमर्श में हम उसी से परहेज करते हैं। यह किताब अलग है- यह अपने समय के आसपास को उलट-पलट कर देखती-परखती है। यहां निर्णय नहीं है? यह निर्णय का समय भी नहीं है। यहां अक्सर निष्कर्ष जैसा कुछ है, जो हमें अपने को समझने में मदद करता है और समाज की हमारी व्यापक पहचान का आधार भी बनता है।

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हमारे समय की कई अभिलक्षणाएं इस किताब में बनती-बिगड़ती मिलती हैं। मूल्य संक्रमण, बाजार का नया अवतार, तकनीक का प्रसार, स्त्री-पुरुष संबंध, यौनिकता, नैतिकता, संगीत, स्वास्थ्य आदि जीवन में तत्काल शामिल कई मुद्दे इस किताब की चिंताओं में आते-जाते हैं। समय के बीच जीवन की यह दैनंदिन उठापटक ही इस किताब की भी उठापटक है। इसको पढऩा परिवर्तन में शामिल रहकर उसकी नब्ज टटोलने जैसा है। हिन्दी में गद्य कमोबेश एकरूप है। यह अक्सर अपना भी कम लगता है। इस किताब का गद्य अलग है- एकदम निजी और आत्मीय। यह पाठकों को अपनी ओर आकर्षित करेगी।

उदय इंडिया ब्यूरो       

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