सरकार राष्ट्रवाद का स्वरूप हो

सरकार राष्ट्रवाद का स्वरूप हो

आजादी के दशकों बाद बाद भी कुछ राजनेता अभी भी गुलाम मानसिकता के कारण पीडि़त है, जो अपनी राजनीतिक रोटी सेकने के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। राष्ट्र-प्रथम को प्राथमिकता देने की जगह इन राजनेताओं ने समाज को विखंडित करने हेतु एक गठबंधन बनाया है। राष्ट्रवाद की अवधारण देशभक्ति के तानेबाने को अनुसरण करने की कुंजी है। राष्ट्रवाद का मतलब किसी राजनीतिक दल से नहीं होता है, बल्कि यह भारत की वर्षों पुरानी परम्परा है, जो सभी को एक धागे में पिरोती हैं, जिसका तात्पर्य एक ताकतवर राष्ट्र का निर्माण करना है। लेकिन धर्मनिरपेक्षता के नाम पर बेमेल महागठबंधन को देखना दूर्भाग्यपूर्ण लगता है।  मोदी को गद्दी से उतारने के लिए ये लोग कुछ भी करने के लिए तैयार हैं। यही नहीं ये लोग लोकतांत्रिक संस्थाओं को भी बदनाम कर रहे हैं।

इस परिप्रेक्ष्य में हाल ही में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा कोलकाता पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार को सीबीआई की पुछताछ से बचाने के लिए दिये गये धरने पर नजर डालने की आवश्यकता है। ममता बनर्जी का यह धरना संवैधानिक नियमों का पूर्ण रूप से उलंघन है। यह इतिहास में पहली बार ही होगा जब किसी राज्य के मुख्यमंत्री ने एक सरकारी नौकरशाह के लिए धरना-प्रदर्शन किया हो।  राजीव कुमार, जिनका शारदा घोटाले में हाथ होने का संदेह किया जा रहा है, उनके बचाव में  ममता बनर्जी द्वारा दिया गया धरना अभी भी समझ से परे है। राज्य के पुलिस-प्रशासन की अखंडता को बनाये रखने के लिए उन्हें सर्वोंच्च न्यायालय के निर्णय के बिना धरने पर नहीं बैठना चाहिये था। यहां तक कि उन्हें कोलकाता में सीबीआई ऑफिस के बाहर तैनात किये गये पुलिस को भी हटा लेना चाहिये था। चाहे कुछ  भी हो पर ममता बनर्जी के इस कारनामे सेे उनकी मोदी और भारतीय संस्थाओं के प्रति कटुता भी उजागर हो गई। इससे बिल्कुल साफ हो जाता है कि आखिर कौन भारतीय संविधान का सम्मान करता है और कौन नहीं करता। जब नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब उन पर सुपी्रम कोर्ट के निर्देशानुशार गुजरात दंगे में एसआईटी बैठाई गई थी और उन्हें रोज एसआईटी का सामना करना पड़ता था। उन्होंने इसके लिए कभी मना नहीं किया और वह जांच में भरपुर सहयोग देते थे। हां, मोदी ने इस सब के लिए यूपीए सरकार पर निशाना अवश्य साधा, लेकिन कभी भी उन्होंने एसआईटी की मंशा और क्षमता पर सवाल नहीं उठाया। और यह साफ-साफ दिखाता है कि आखिर कौन संविधान का सम्मान करता है।

दूसरी तरफ ममता बनर्जी का धरना सिर्फ एक राजनीतिक नाटक था और इसका लोकतंत्र, संविधान या लोकतांत्रिक परंपराओं की भावना से कोई लेना-देना नहीं था। हां यह बिल्कुल सत्य है कि किसी भी हालत में राज्य सरकार के संवैधानिक अधिकार की रक्षा की जानी चाहिये। लेकिन प्रश्न यह उठता है कि क्या धरने के माध्यम से ममता बनर्जी एक भ्रष्ट अधिकारी का बचाव कर रहीं थी? इस संदर्भ में मेरा मानना है कि केन्द्र सरकार और पश्चिम बंगाल की सरकार का यह आमना-सामना केवल एक राजनीतिक खेल है। एक आम आदमी भी यह बता सकता है कि इस राजनीतिक विवाद में किसी की भी जीत नहीं होगी। परन्तु भारत के संविधान और उसकी की हार अवश्य होगी। लेकिन इसे कौन मानता है? इस पृष्टभूमी में यह कहना गलत नहीं होगा कि जांच एजेंसी सीबीआई ने अपनी विश्वसनीयता खो दी है, क्योंकि जो भी सरकार केन्द्र में आती है वह इसका दुरूपयोग करती रही है।  किंतु यह इतिहास में पहली बार ही हुआ है एक मुख्यमंत्री ने सीबीआई के अधिकारियों को उनका काम करने से रोका। यहां यह बताना महत्वपूर्ण है कि सीबीआई ने पहले ही राजीव कुमार को पूछताछ के लिए पेश होने के लिए कहा था, लेकिन क्या उन्होंने ममता बनर्जी के कहने पर पूछताछ से मना कर दिया? प्रश्न यह भी उठता है कि क्या एक मुख्यमंत्री ऐसा कर सकता है? हां वह सीबीआई पर प्रश्न खड़ा कर सकती थीं। इससे यह साफ होता है कि टीएमसी एक  ”तृण मुल्ला कांग्रेस’’ है। बंगाल पंचायत चुनाव में हुई हिंसा को देखा जाए तो उससे साफ होता है कि वह कितना संविधान का सम्मान करती हैं और इसलिए उनसे राष्ट्रीय स्तर पर कुछ अच्छे कार्य की आशा भी नहीं की जा सकती है।

आज जब राज्य में कांग्रेस और वामपंथी अपने कार्यकाल के कुशासन का फल चख रहे हैं, तो उस समय केवल भाजपा ही एक विपक्ष के रूप में बचती है, जिसे राजनैतिक हिंसा का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन 2019 के चुनाव में ममता को लोगों की नाराजगी का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि राज्य में हुए पंचायत चुनाव एक तमाशा था, और अब यह धरना।

Deepak Kumar Rath

  दीपक कुमार रथ

(editor@udayindia.in)

 

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