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सिमटता जल, उजड़ती धरती

सिमटता जल, उजड़ती धरती

सौरमंडल के सर्वाधिक पांचवें विशाल ग्रह और प्राय: 4000 मील की त्रिज्या और 70 फीसदी जल से आप्लावित नीले रंग की धरती महज एक भौगोलिक पिंड नहीं है, बल्कि इस पर निवास कर रहे लगभग 800 करोड़ आबादी के जीवन का आधार भी है, उनके वजूद का कारण भी है। किंतु समय के तेज रफ्तार के साथ प्राय: 5 बिलियन वर्ष पुरानी धरती अब मानव से लेकर जीव-जंतु, पादप  तथा इसकी ओट में शरण पा रहे छोटे-बड़े अनंत प्राणियों के स्वस्थ पोषण के लिए असमर्थ हो गयी है।

अपने विशालकाय सीने पर संसार के भार का वहन करनेवाली धरती वर्ष-दर-वर्ष रुग्णता के दौर से गुजर रही है। पर्यावरण और जीवों की पारिस्थिति की प्रदूषित और असंतुलित होती जा रही है। वैश्विक जनसंख्या की 1.1 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि की दर से जब हम दुनिया में प्रतिवर्ष 8.5 करोड़ आबादी वाले जर्मनी जैसे देश को जोड़ते जा रहे हैं तो धरती की त्रासदी और बदहाली पर चिंता और भी घनी होती जाती है। लेकिन दुर्भाग्यवश सम्पूर्ण सृष्टि के अवलम्ब के रूप में पृथ्वी की बदतर होती दुर्दशा पर चिंतन करने वाली आबादी और विश्व भर में राष्ट्रों की संख्या को आसानी से उंगलियों पर गिना जा सकता है।

प्रत्येक वर्ष 22 अप्रैल को पृथ्वी दिवस के आयोजन के माध्यम से पर्यावरण और पृथ्वी के संरक्षण के लिए विश्व के राष्ट्रों के साथ चिंता साझा किया जाता है। 1970 में अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन के द्वारा पर्यावरण शिक्षा के रूप में प्रारंभ किये गये पृथ्वी दिवस की जड़े समय के साथ काफी मजबूत हो चुकी हैं और यह वर्तमान में 192 राष्ट्रों के द्वारा आयोजित किया जाता है। इस तरह की ऐतिहासिक दिवस की सार्थकता और संजीदिगी का अंदाजा महज इस सच्चाई से लगा सकते हैं कि यह विश्व का सबसे बड़ा नागरिक कार्य दिवस है जिसमें एक बिलियन से भी अधिक लोग शिरकत करते हैं और पूरी दुनिया को यह संदेश देते हैं कि धरती की सुरक्षा में ही समस्त जैविक और अजैविक प्राणियों का वजूद महफूज है।

कदाचित इस सत्य से इनकार करना आसान नहीं होगा है कि पृथ्वी पर सृष्टि के जीवन धारण के लिए हवा और पानी दो महत्वपूर्ण कारक हैं  और समय के साथ धरती पर निवास कर रहे सभी प्राणियों के लिए ये जीवनदायी संसाधन अभूतपूर्व संकट के दौर से गुजर रहे हैं। वैसे जब हम जल संकट के बारे में बात करते हैं तो सबसे अधिक हैरानगी इस बात पर होती है कि जब धरती के समस्त भू-भाग का प्राय: दो-तिहाई से भी अधिक भाग जल से आच्छादित है तो फिर इस धरातल पर रहने वाले जीवों के लिए समय के साथ यह दुर्लभ कैसे होता जा रहा है?

लेकिन आपको यह जानकर हैरत होगी कि धरती के लगभग 71 फीसदी भू-भाग पर फैले जल के साम्राज्य का केवल 3 फीसदी भाग ही पीने के लायक है। हम इस सच्चाई को भी जानकर विस्मित हुए बिना नहीं रह पायेंगे कि इस तीन प्रतिशत ताजे पेय जल के दो-तिहाई से भी अधिक भाग ग्लेशियर्स में फंसे हुए हैं। कुल मिलाकर केवल एक प्रतिशत पानी ही विश्व के करीब आठ अरब आबादी के दैनिक जीवन में विभिन्न कार्यों के उपयोग के लिए शेष बचा रह जाता है।

यदि 70 प्रतिशत जल से घिरे भू-भाग में केवल एक प्रतिशत पानी ही मानव के पहुंच और प्रयोग के लिए उपलब्ध हो तो दुनिया में जल संकट की गंभीरता का बड़ी आसानी से कयास लगाया जा सकता है। यही कारण है कि आज पूरी दुनिया में भारत की आबादी के बराबर का अर्थात 1.3 बिलियन लोग जल की पहुंच से बाहर है। भारत और चीन की आबादी को यदि एक साथ मिला दें तो दुनिया की लगभग 3 बिलियन आबादी साल में कम-से-कम दो महीने गंभीर जल संकट का सामना करने के लिए अभिशप्त होते हैं। लिहाजा पृथ्वी के साथ-साथ जल का संरक्षण और संवर्धन धरती पर रहने वाले सभी जीवों की धारणीयता का प्रश्न है और इस पर गहरे चिंतन की दरकार है।

जीवन धारणीयता के लिए सांस और उसके लिए स्वच्छ हवा की महत्ता जगजाहिर है। लेकिन दुर्भाग्यवश जिस क्षिप्रता से उद्योगों का विकास हो रहा है और जीवाश्म इंधन का बिना विवेक के दोहन हो रहा है तो वायु प्रदूषण एक अन्य बड़े पर्यावरणीय संकट के रूप में मानव अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न के रूप में आ खड़ा हुआ है। प्रदूषित वायु के शिकार महानगरों में रहनेवाले लोगों की सांसे घुटती जा रही हैं। स्मॉग और धुएं से आम लोगों का जीवन कठिन होता जा रहा है। खेतों में पराली के जलाये जाने से स्थिति दिन-ब-दिन बदतर होती जा रही है।

ग्रीनहाउस गैसों में वृद्धि के प्रभाव के कारण धरती का तापक्रम बढ़ता जा रहा है और इसके कारण ग्लेशियर के पिघलने का संकट बढ़ता जा रहा है। हाल के सर्वे के अनुसार पिछले पांच दशकों में धरती के तापक्रम में बेतहाशा वृद्धि हुई है और इसके फलस्वरूप समुंद्र के जल स्तर में भी वृद्धि हुई है। ओजोन की परतों में निरंतर क्षीणता के फलस्वरूप अल्ट्रावायलेट किरणों के धरती पर पहुंचने के कारण लोगों का जीवन कठिन और असुरक्षित हो गया है।

भू-मंडलीकरण की आंधी में तेजी से पनप रही आधुनिकता के साथ प्लास्टिक के बढ़ते प्रयोग से पृथ्वी और पर्यावरण दोनों को होने वाले भारी नुकसान की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता है। वनों की कटाई, मिट्टी अपरदन और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के फलस्वरूप अनियमित जलवायु परिवर्तन ने दुनिया में रहनेवाले लोगों के जीवन की दशा और आजीविका की प्रकृति में प्रतिकूल परिवर्तन ला दिया है। जीवाश्म इंधन के

तेजी से घटते भंडार और जैव-विविधता के सिमटते संसार में सृष्टि के विलुप्त होने का खतरा तेजी से हकीकत में तब्दील होता प्रतीत हो रहा है।

आशय यह है कि जिस प्रकार हम वैश्विक प्रगति की राह पर अदूरदर्शी तरीके से आगे बढ़ते जा रहे हैं तो संकट की ऐसी स्थिति में केवल सरकारी प्रयास और प्रोग्राम धरती को सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त नहीं है। इस दिशा में जनसामान्य की दिल से कोशिश और पर्यावरण को सुरक्षित रखने के प्रति नैतिक जिम्मेदारी के पालन की सख्त जरूरत है।

केप टाउन दक्षिण अफ्रीका का दूसरा सबसे बड़ा शहर है। यहां पर जल संरक्षण के लिए एक नायाब तरीके की शुरूआत की गयी है जिसे ‘डे जीरो’ के नाम से जाना जाता है। इस दिन केप टाउन में घरों के पानी के नलों को बंद कर दिया जाता है। हर एक परिवार को 25 लीटर पानी के लिए घंटों कतार में खड़े रहने होते हैं।

आशय यह है कि इस दिवस के द्वारा परिवारों को जल के जीवनदायी अहमियत के बारे में नसीहत दी जाती है और जल की जरूरत को किसी विशेष दिन शून्य करने के फलस्वरूप उससे बचने के लिए विभिन्न तरीकों के बारे में प्रशिक्षित किया जाता है। पर्यावरण के जिस जानलेवा संकट के दहलीज पर आज हम खड़े हैं वहां पर मेट्रोपोलिटन नगरों से लेकर गांवों और कस्बों में ‘डे जीरो’ सरीखें नवोन्मेषी उपायों को अपनाकर धरती के साथ-साथ सम्पूर्ण सृष्टि को महफूज रखने की दिशा में एक बड़ा सार्थक और ऐतिहासिक प्रयास साबित हो सकता है।

श्रीप्रकाश शर्मा

 (लेखक जवाहर नवोदय विद्यालय में प्राचार्य हैं)

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