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सेहत से खिलवाड़ जुड़ी खबरों पर दबाव क्यों

सेहत से खिलवाड़ जुड़ी खबरों पर दबाव क्यों

विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा कराये गये शोध में यह दावा किया गया है कि मधुमेह रोगियों के लिए शुगर फ्री उत्पाद भी चीनी जैसे नुकसानदेह हैं। ब्रिटिश मेडिकल जनरल में प्रकाशित इस शोध के अनुसार चीनी के विकल्प से वजन कम करने में मदद नहीं मिलती है। इस बात के पर्याप्त सबूत नहीं है कि यह कितना सुरक्षित है। शुगर फ्री का दावा करने वाली कम्पनियों के खाद्य व पेय पदार्थो में मिलाये जा रहे स्वीटनर में भी चीनी जितने ही नुकसान हैं। संगठन के अनुसार वर्ष 2030 तक भारत में मधुमेह रोगियों की संख्या आठ करोड़ को पार कर जायेगी। दुनिया में इस रोग के शिकार 35 करोड़ लोगो में अभी 6.3 करोड़ लोग भारत के हैं। मधुमेह से बचाव के लिए करोड़ो भारतीय शुगर सब्सिटयूट का उपयोग करते हैं।

मानव स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने वाली ऐसी खबरों का प्रकाशन बरसों पहले किया जाना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है। अमरीका में यह माना गया है कि सेचुरेटेड फेट स्वास्थ्यवर्धक है। कोलेस्ट्रोल का दिल की बीमारी से सम्बन्ध नही हैं इसलिए अब चिकित्सक भी देशी घी के इस्तेमाल की वकालत करने लगे है। हृदय रोग सम्बन्धी खबरों को भी दबाने का प्रयास विशेषकर पश्चिमी मीडिया के माध्यम से किया जा रहा है। ऐसे तत्व सिविल सोसायटी तथा समूची मानवता को ठगने की पुरजोर कोशिश में हैं। ऐसी खबरों को दबाने के इस युग में पत्रकारों को अधिक हिम्मत दिखाने की जरूरत है। पत्रकार वैज्ञानिकों के दिलो-दिमाग तक पहुंचें और आम जनता के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने वाली खबरों को उजागर करने की पहल करे। मीडिया को जमीनी हकीकत की प्रस्तुति के साथ-साथ लोक कल्याणकारी योजनाओं के संदर्भ में जनमत जगाने की जिम्मेदारी भी निभानी होगी।

समूची मानवता के हित में पत्रकारों को यह नसीहत पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओ. पी. रावत ने दी। वह मूर्धन्य पत्रकार पं. झाबरमल्ल शर्मा की स्मृति में 28वें व्याख्यान के लिए जयपुर आये थे। मीडिया के वर्तमान हालात के संदर्भ में रावत का कहना था कि सच्ची पत्रकारिता के लिए समाज को भी अपनी सक्रिय जिम्मेदारी निभानी होगी। मीडिया के माध्यम से सही तथ्य और समाचार जानने के लिए जब कोई रास्ता नहीं बचेगा तब मीडिया की साख एवं उस पर विश्वास का संकट उत्पन्न होता है। आज विश्वास का यह संकट गहराता जा रहा है यह चिंताजनक है। जब समाज यह चाहे कि मीडिया हर पहलू यानि 360 डिग्री के अनुरूप जो सही और सटीक है, उसे विश्लेषण के साथ प्रस्तुत करने का दम रखे तो समाज का भी यह दायित्व है कि वह मीडिया का हौंसला बनाये रखने मे कोई कसर बाकी नहीं रखे। विज्ञापनों सहित अन्य दबावों को झेलते हुए मूल्यों को जिंदा रखने की मशाल को जलाये रखने वाले समाचार पत्रों के लिए पाठक अधिक दाम देने को तैयार रहें। सत्य की खोज में अपनी परवाह नहीं करने वाले समाचार पत्र समूहो को जनता अपना समर्थन देगी तभी सही मायनों में स्वस्थ लोकतंत्र की सुरक्षा संभव होगी।

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एक राष्ट्र एक चुनाव के मुद्दे पर राष्ट्रव्यापी बहस के बीच रावत ने अपने पद पर रहते हुए साफ कर दिया था कि संविधान संशोधन के बिना लोकसभा तथा विधानसभा चुनाव एक साथ कराना संभव नही है। इसी प्रकार उन्होंने ई.वी.एम. मशीनो में गड़बड़ी तथा इन्हे हैक करने का आरोप लगाने वाले राजनीतिक दलों की चुनौती स्वीकार कर जून 2017 में उन्हें बुलाया। महज दो दलों के प्रतिनिधि पहुंचे और उन्होने भी मशीन हैकिंग का प्रयास नहीं किया। अपने उद्धोधन में रावत ने चुनाव प्रक्रिया तथा ई. वी. एम. मशीनों मे कथित गड़बड़ी सम्बन्धी शिकायतों का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि ऐसे प्रसंगो में चुनाव व्यवस्था से जुड़े कार्मिकों की लापरवाही अधिक रही। एक प्रांत में मशीन का पुराना डेटा डिलिट किये बिना ही ई. वी. एम. प्रदर्शित की गई। मीडिया द्वारा एक बटन दबाने पर एक राजनीतिक दल का चुनाव चिन्ह प्रदर्शित हुआ। यदि दूसरी या तीसरी बार बटन दबाया जाता तो अन्य चिन्ह दिखाई देते। इस अफरातफरी से घबराये अधिकारियों ने नासमझी में यह घटनाक्रम उजागर करने पर मीडिया को जेल भेजने की धमकी देकर इस प्रकरण को अनावश्यक तूल देने की गलती की। रावत का यह भी दावा था कि मतदान के लिए इस्तेमाल की जाने वाली ई. वी. एम. मशीनें सर्वाधिक सुरक्षित है। मशीन ऐसी तकनीक से बनी है जिसमे जरा सी छेड़छाड़ की कोशिश पर यह बंद हो जायेगी। वी. वी. पैट से निकलने वाली पर्ची से मतदाता द्वारा किए गए मतदान की पुष्टि हो जाती है। अलबत्ता मतदान की इस प्रक्रिया में थोड़ा अधिक समय लगता है। मतदान के लिए ई. वी. एम. मशीनों के उपयोग से मतपत्र की पुरानी पद्धति से मतपत्र फाडऩे या बूथ कैपचरिंग से फर्जी मतदान सम्बन्धी शिकायतों की गुंजाईश नही रही।

इसी प्रकार महाराष्ट्र में निकाय चुनावमें पराजित हुए प्रत्याशी ने गलत जानकारी  वायरल की। इस प्रत्याशी को एक वार्ड में खुद के परिवार के कुल तेरह वोट मिले और दूसरे वार्ड में एक भी वोट नहीं मिला। जांच पड़ताल से पता चला कि इस परिवार ने दो जगह मतदाता सूची में नाम जुड़वा रखे थे। कानूनन यह अपराध है। निर्वाचन आयोग की सख्ती पर स्वयं प्रत्याशी ने यह भ्रम दूर किया। एक स्थान पर सेक्टर ऑफिसर द्वारा विश्राम के समय ई. वी. एम. मशीन अपने साथ रखने से अनावश्यक विवाद उत्पन्न हो गया। मध्य प्रदेश राजस्थान में मतदाता सूचियों में गड़बड़ी की शिकायतें की गई। जयपुर के हवामहल विधानसभा क्षेत्र में 14 हजार मतदाताओं के नाम नही होने की शिकायत पर वीडियोग्राफी के साथ जांच पड़ताल की गई और यह शिकायत भी गलत पाई गई। निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूची को अपडेट करने की पुख्ता व्यवस्था है। कई बार इस प्रक्रिया में जुड़ी टीम की कमजोरी से गलती होना स्वाभाविक है। अब तो आयोग ने अधिकाधिक मतदान पर विशेष बल दिया है। भारत के सैनिकों की मतदान में हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए आयोग ने कई कदम उठाये हैं। इलेक्ट्रॉनिक पोलिंग सिस्टम के तहत सम्बन्धित निर्वाचन क्षेत्र का  मतपत्र सैनिकों को भिजवाने की व्यवस्था की गई है ताकि उसका प्रिंट निकालकर सैनिक डाक से मतदान कर सकें। इस तकनीक से अब सैनिकों के मतदान का प्रतिशत साठ तक बढ़ गया है। भविष्य में मतदान की प्रक्रिया को टू वे इलेक्ट्रानिक सिस्टम बनाने के प्रयास किये जा रहे हैं। इसी प्रकार एन आर आई द्वारा मतदान में भागीदारी के लिए कदम भी उठाये जा रहे हैं।

                             गुलाब बत्रा

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