स्वदेशी रक्षा उत्पादन एक दूरदर्शी पहल

स्वदेशी रक्षा उत्पादन  एक दूरदर्शी पहल

पिछले कुछ वर्षों में भारतीय रक्षा उद्योग में काफी बदलाव देखने को मिला है। अब भारत रक्षा उत्पादों के निर्माण में कॉरपोरेट की भागीदारी बढ़ा रहा है। हालांकि भारत में रक्षा उद्योग की शुरूआत 200 वर्ष पहले ही काशीपुर में गन और शेल फैक्ट्री की स्थापना से हो गई थीं। अंग्रेजों ने जहाज निर्माण और धातुशोधन पर जोर दिया। उसके बाद धीरे-धीरे रक्षा उद्योग ने भूमि, समुद्री और वायु प्रणालियों को आधार बनाकर उत्पादन का विस्तार किया।  स्वतंत्रता के बाद हथियार और गोला-बारूद के उद्योग को सार्वजनिक क्षेत्र के लिए रखा गया। और इस तरह आयुध कारखाने रणनीतिक रूप से घातक और गैर-घातक उत्पादों के लिए आधार बन गये।

1962 में भारत और चीन के बीच हुए युद्ध के बाद अलग से रक्षा उत्पादन विभाग का निर्माण किया गया ताकि स्वदेश में ही किफायती दर पर अत्याधुनिक हथियारों का निर्माण कर भारतीय सेनाओं की क्षमता बढ़ाई जा सके। 1965 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध ने भारत को रूस के साथ एक दीर्घकालिक रक्षा संबंध बनाने के लिए विवश कर दिया। क्योंकि उस समय अमेरिका ने भारत को युद्ध सामाग्री बेचने पर प्रतिबंध लगा दिया था।

आयात

स्वतंत्रता के बाद 1962 और 1965 के युद्ध के अनुभव को देखते हुए भारत ने आर्डिनेन्स फैक्ट्री बोर्ड और डिफेन्स सेक्टर से जुड़ी कम्पनियों का बड़ा जाल बनाया। जिसका एक मात्र उद्देश्य अत्याधुनिक और किफायती सैन्य उपकरणों का निर्माण कर रक्षा आयात को कम करना था। इसे वैश्विक प्रतिस्पर्धा के रूप में भी देखा जा सकता है। इस रक्षा उद्योग में काफी भारी मात्रा में निवेश  किया गया। इसके माध्यम से कई सारी  प्रयोगशाला, रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेंटर तथा अन्य व्यवस्थाओं पर खर्च किया गया लेकिन प्रश्न यह उठता है कि आर्डिनेन्स फैक्ट्री बोर्ड के तहत आने वाले कुल 41 आर्डिनेन्स फैक्ट्रीयों, 9 डिफेन्स पीएसयू तथा डीआरडीओं के कुल 50 प्रयोगशाला होने के बावजूद भी भारत विश्वभर में रक्षा उत्पादों के  आयात करने वाले देशों की श्रेणी में सबसे उपर क्यों है? आखिर ऐसा क्या गलत हुआ?

यह सच है कि भारत ने विश्व की अत्याधुनिक हथियारों को खरिदा और इनका स्वदेश में निर्माण करने का लाइसेंस भी प्राप्त किया। लेकिन रिसर्च एंड डेवलपमेंट की प्रक्रिया में धीमापन के कारण यह रूक सा गया। आगे अर्थव्यवस्था की धीमी रफ्तार, विदेशी तथा पब्लिक निवेश की अनुपस्थिति के कारण  रिसर्च एंड डेवलपमेंट में पैसे की कमी आ गई, जिससे स्वदेशी रक्षा उत्पादन का कार्य बिल्कुल ही धीमा पड़ गया। उसके बाद अत्याधुनिक हथियारों का आयात करने के अलावा भारत के पास कोई विकल्प नहीं बचा। हालांकि पिछले पांच वर्षों में भारत में ‘मेक इन इंडिया’ के तहत स्वदेशी रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में साकारात्मक बदलाव को साफ देखा जा सकता है।

पड़ोस

भारत एक क्षेत्रीय शक्ति होने की सामथ्र्यं रखता है। लेकिन उत्तरी मोर्चं पर चीन हमेशा भारत के लिए एक खतरे के रूप में है। हाल के दिनों में तो चीन अपने आप को बलशाली दिखाने में कोई कसर भी नहीं छोड़ रहा। चीन के राष्ट्रपति सी जिंगपिन का पूरा ध्यान चीन के रक्षा उद्योग में बदलाव तथा अत्याधुनिक हथियारों के निर्माण करने पर है। चीन के रक्षा उद्योग ने अपने आप को काफी विकसित किया है। यही कारण है कि रक्षा उद्योग से जुड़ी चीन की 8 कंपनिया विश्व की सर्वश्रेष्ठ 20 कामयाब कंपनियों में है। चीन ने अपनी सैन्य ताकत को 2035 तक अत्याधुनिक कर 2049 तक विश्व की सबसे ताकतवर सेना बनाने पर जोर दे रहा है। वर्तमान में चीन की वायुसेना टैक्टिकल एयर कम्बेट तथा नौसेना दूर तक के ऑपरेशन को सफल बनाने पर जोर दे रही हैं।

रक्षा क्षेत्र का उदारीकरण

आत्मनिर्भरता, क्षेत्रीय शक्ति होने तथा आत्याधुनिक हथियारों को प्राप्त करने के लिए भारत ने 2001 में रक्षा क्षेत्र को विदेशी तथा प्राईवेट निवेशकों के लिए खोला। लेकिन फिर भी भारत कुछ ही सीमित उपकरणों का निर्माण कर पाता है। हालांकि डिफेन्स प्रोडक्शन पॉलिसी 2018 के तहत भारत 2025 तक 5 बिलियन डॉलर का रक्षा उत्पाद का निर्यात करने का लक्ष्य रखा है। पिछले वर्ष इंडियन चेम्बर ऑफ कॉमर्स द्वारा आयोजित इंडिया राईजिंग नामक प्रोग्राम में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि भारत 2025 तक 26 बिलियन डॉलर की डिफेन्स इंडस्ट्री के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध है।

भारतीय एयरोस्पेस और रक्षा बाजार भारतीय और विदेशी कंपनियों के लिए एक आकर्षक और महत्वपूर्ण अवसर प्रस्तुत करता है। भारत पारंपरिक रक्षा उपकरणों के सबसे बड़े आयातकों में से एक है और पूंजी अधिग्रहण पर अपने कुल रक्षा बजट का लगभग 30 प्रतिशत खर्च करता है। भारत 70 प्रतिशत आवश्यक रक्षा उत्पादों का आयात करता है। वर्तमान में भारत के अधिकांश सामरिक युद्धक बेड़े पुराने हो चुके हैं। और दूसरी सबसे बड़ी समस्या यह है कि भारतीय वायुसेना की सामरिक युद्धक स्क्वार्डन भी आवश्यकता से कम है। आज चीन और पाकिस्तान दोनों भारत के लिए खतरा है। चीन न केवल अपनी सेना का तेजी से आधुनिकीकरण कर रहा है, बल्कि वह पाकिस्तान को भी आधुनिक हथियार दे रहा है। इसी तरह, भारतीय नौसेना भी अपनी महत्वाकांक्षी नौसेना विस्तार योजनाओं में पीछे रह गई है। भारत को हिंद महासागर में गहरे विस्तार का एक बड़ा भौगोलिक लाभ है। क्योंकि यह विश्व का सबसे प्रमुख ट्रेड रूट है, खासकर चीन का। अत: भारत अपनी मजबूत वायु और नौसेना से न केवल अपने ट्रेड रूट की रक्षा करेगा, बल्कि अपने हिसाब से दूसरे शक्तिशाली देशों की रणनीतिक समुद्री जीवन रेखा को भी तय करेगा।

रक्षा क्षेत्र को प्राईवेट और विदेशी निवेशकों के लिए खोलकर सरकार ने न केवल एक घरेलू औद्यौगिक आधार बनाने की कोशिश की है, बल्कि 70 प्रतिशत स्वदेशीकरण करने का एक चुनौतीपूर्ण लक्ष्य भी निर्धारित किया है। सरकार ने ग्लोबल बिडिंग के लिए डिफेन्स प्रोक्यूरमेंट प्रोसीजर बनाया है, जिसमें प्रतिवर्ष कुछ बदलाव किये जाते हैं। अब इसके माध्यम से रक्षा क्षेत्र में कार्य कर रही कंपनियां भारत में अपनी यूनिट खोल सकेंगी। भारत की कई सारी निजी कंपनियां और प्रयोगशाला अंतर्राष्ट्रीय पार्टनरों की तालाश कर रही हैं।

रक्षा मंत्रालय ने पहले ही अगले पांच वर्षों में डिफे न्स इनोवेशन आर्गेनाईजेशन के माध्यम से 250 स्टार्ट अप्स, 16 व्यक्तिगत पहल और 5 डिफे न्स इनोवेशन हब को निधि देने के लिए प्रतिबद्ध किया है। इंडियन चेम्बर ऑफ कॉमर्स द्वारा आयोजित इंडिया राईजिंग नामक प्रोग्राम में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि डीआरडीओं द्वारा ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी के तरीके को सरल बनाने के लिए ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी (टीओटी) नीति को विकसित किया जा रहा है। 900 से अधिक टीओटी लाइसेंसिंग समझौतों पर उद्योगों के साथ हस्ताक्षर किए गए हैं। यह रक्षा विनिर्माण क्षेत्र को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। स्पेशल इकोनॉमिक जोन (सेज) के संदर्भ में बनाई गई अच्छी नीति न केवल निर्यात के वातावरण के लिए अच्छी होती है। इस प्रकार की नीति से निवेशकों को भारतीय बाजार का फायदा मिलेगा। और वे किफायती दर पर उत्पादों का निर्माण करने वाली मैनुफैक्चरिंग हब बनायेंगी।


 

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”डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग में भारत की आत्मनिर्भरता का एक और महत्वपूर्ण पहलू है, हम पर मानवता को भी सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी है। खुद के साथ-साथ पड़ोस के मित्र देशों को भी सुरक्षा देने का दायित्व हम पर है। हम पर सुरक्षा से जुड़ी तमाम चुनौतियां हैं। रक्षा उत्पाद को लेकर हमारी सोच किसी दूसरे देश के खिलाफ नहीं है। भारत हमेशा से ही विश्व शांति का भरोसेमंद पार्टनर रहा है। भारत दुनिया का एक प्रमुख एयरोस्पेस रिपेयर और ओवरहाउल हब बनाने की क्षमता रखता है। भारत में डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग में असीमित संभावनाएं हैं। यहां टैलेंट है और टेक्नोलॉजी भी है। यहां इनोवेशन है और इन्फ्रास्ट्रक्चर भी है। हमने आइडीइएक्स के विचार को बढ़ावा देने के लिए 200 नए स्टार्ट-अप का लक्ष्य रखा है। हम इस पहल के तहत कम से कम 50 नई तकनीक का उत्पादन करने की कोशिश कर रहे हैं। इसके अलावा, स्वदेशीकरण को बढ़ावा देने के लिए सहयोगी शैक्षिक अनुसंधान के लिए डीआरडीओ में काम जारी है। भारत बाहरी अंतरिक्ष में अपने हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक क्षमताओं की खोज कर रहा है। बाहरी अंतरिक्ष में भारत की उपस्थिति मजबूत रही है और आगामी वर्षों में इसे और मजबूत किया जाएगा। डिफेंस-एक्सपो का यह संस्करण न केवल भारत में, बल्कि दुनिया में सबसे बड़ी प्रदर्शनियों में से एक है। जो लोग अर्थव्यवस्था और रक्षा को समझते हैं, वे जानते हैं कि भारत केवल एक बाजार नहीं है, बल्कि एक बड़ा अवसर भी है।’’

–नरेन्द्र मोदी, प्रधानमंत्री, डेफएक्सपो 2020, लखनऊ


सेल्फ-रिलायंस की ओर कदम

कोयम्बटूर में पहले से ही डिफेंस इनोवेशन हब कार्य कर रहा है। और भारत सरकार ने हाल ही में तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में दो डिफेन्स कॉरीडोर बनाने का निर्णय लिया है। यूपी के मुख्यमंत्री ने बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे को छह हब बनाने के लिए चुना है, जो झांसी, आगरा, अलीगढ़, चित्रकूट, कानपुर और लखनऊ है।

यह औद्योगिक गतिविधि क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था के विकास में अत्यधिक योगदान देगी और रोजगार के अवसर प्रदान करेगी। आईआईटी कानपुर और आईआईटी बीएचयू ने देश में प्रौद्योगिकी पहुंच और कौशल अंतराल को पाटने के उद्देश्य से सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर की स्थापना के लिए हाथ मिलाया है। अपने भौगौलिक लाभ के कारण भारत को अंतर्राष्ट्रीय बाजार में एक निर्यात केंद्र के रूप में उभरने की उम्मीद है।

भारत रक्षा क्षेत्र में एफडीआई नियमों में ढ़ील दे रहा है। इससे एयरोस्पेस और रक्षा बाजार में प्रवेश करना अब विदेशी निवेशकों के लिए आसान हो जाएगा। अमेरिकी, यूरोपीय एयरोस्पेस और रक्षा क्षेत्र की कंपनियां भारत, चीन और पश्चिमी एशिया के बाजारों में अपना ध्यान केंद्रित कर रही हैं। इनमें से कुछ है:

  • बोईंग और टाटा एडवांस सिस्टम मिलकर एएच-64 के फ्यूजलेगस का निर्माण कर रहे हैं। अब ये भारत में काम करने के लिए इच्छुक हैं।
  • अगस्त 2018 में, एंटी टैंक गाईडेड मिसाईल बनाने के लिए, कल्याणी राफाल सिस्टम- कल्याणी स्ट्रैटेजिक सिस्टम्स लिमिटेड और इजरायल के राफेल एडवांस्ड डेफेंस सिस्टम्स के बीच एक संयुक्त उद्यम ने हैदराबाद में अपने स्टेट आफ आर्ट फैसीलिटी का उद्घाटन किया।
  • राफेल एडवांस्ड डफेंस सिस्टम्स का अस्त्र माईक्रोवेव प्रोडक्ट लिमिटेड के साथ ज्वाइंट वेंचर है, जो सॉफ्टवेयर आधारित रेडियो बनाती है।
  • अक्टूबर 2017 में डीसाल्ट एविएशन और अनिल अंबानी की रिलायंस ने डीसाल्ट रिलायंस एरोस्पेस लिमिटेड का मैनुफैक्चरिंग सेंटर नागपुर में स्थापित किया, जो फ्रांस से मिलने वाले 36 राफाल फाईटर प्लेंस के लिए अफसेट तैयार करेंगे।

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नौकरी और विकास का अवसर

नि:संदेह, स्वदेशी रक्षा उत्पादन भारत को एक प्रमुख हथियार निर्यातक देश बनने की दिशा में तथा हमारे युवाओं को रोजगार के अवसर प्रदान करने में लाभकारी होगा। यह ब्रेन-ड्रेन की समस्या को कम करने में भी मदद करेगा। यह देश में स्टार्ट अप को बढ़ाने में भी मदद करेगा।

हमारे रक्षामंत्री कहते है कि मनुष्य का मस्तिष्क सबसे शक्तिशाली और रचनात्मक प्रयोगशाला है, जो रोज लाखों विचारों का परीक्षण करता है और जब विचारों को स्वतंत्रता के पंख और कल्पना की उड़ान दी जाती है तो नए और अभिनव समाधान बनते हैं। अब समय आ गया है कि नौजवानों को इस डिफेंस प्रोडक्शन से जोड़ा जाए। नौजवानों को सुरक्षा के क्षेत्र में हो रहे वैश्विक बदलाव का जानने का आवश्यकता है।

भारतीय रक्षा उद्योग दुनिया भर के प्रमुख व्यावसायिक घरानों के साथ मिलकर आधुनिक संयंत्र और मशीनरी के क्षेत्र में विकास कर रहा है। इसके लिए आक्रामक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है, ताकि निर्यात को बढ़ावा दिया जा सके। बाहरी देशों की मांग के कारण भारतीय रक्षा उद्योग हमेशा फायदे की स्थिति में रहेगा।

नि:संदेह, नीति में बदलाव के कारण भारत जो कि संसार का सबसे बड़ा हथियार आयात करने वाला देश है, एक दिन ऐरोस्पेस और रक्षा निर्माण का हब बन जायेगा। हालांकि  इस क्षेत्र का विकास निर्भर करेगा कि प्रबंधन, जवाबदेही, नौकरशाही प्रक्रिया के पहलुओं को कैसे संभाला जाता है।

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ले. जनरल अभय कृष्ण (रिटा.)

(लेखक भूतपूर्व आर्मी कमांडर हैं)

 

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