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स्वभाव से विनम्र लेकिन स्पष्टवादी

स्वभाव से विनम्र लेकिन स्पष्टवादी

1991 का साल…उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में तत्कालीन भारतीय जनता युवा मोर्चा महासचिव का दौरा हुआ…बलिया का पूर्वी इलाका तब कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था, लेकिन राम मंदिर आंदोलन के उभार के बाद भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की पूछ-परख बढ़ रही थी…सहतवार कस्बे के चौराहे पर भारतीय जनता युवा मोर्चा महासचिव के स्वागत में नौजवानों और छात्रों का हुजूम उमड़ पड़ा…स्वागतार्थियों में स्थानीय स्तर पर उपलब्ध गेंदे के फूलों की माला लेकर कुछ छात्र भी खड़े थे…भारतीय जनता युवा मोर्चा के महामंत्री स्वागताकांक्षी लोगों को देखकर कार से उतरे…बड़े-बुजुर्गों और भाजपा कार्यकर्ताओं के हाथों खुशी-खुशी माला पहन ली…माला तो छात्रों की भी स्वीकार की, लेकिन उन्हें एक संदेश भी दिया: ‘स्वागत-सत्कार की जगह आप अपने स्कूलों और कॉलेजों की कक्षाओं में लौट जाएं और मन लगाकर पढ़ाई करें…’ फिर थोड़ी देर रूक कर उन्होंने कहा, ‘हम उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने जा रहे हैं और सत्ता में आते ही हम नकल नहीं होने देंगे, इसलिए पढ़ाई ज्यादा जरूरी है राजनीति की बजाय…’

कुछ महीने बाद उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव हुए और तत्कालीन 425 सदस्यीय विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी 213 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में कामयाब हुई। कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने। चुनाव बाद उत्तर प्रदेश में जो परीक्षाएं हुईं, उनमें नकल रोकने के लिए राज्य सरकार ने नकल विरोधी अध्यादेश को हथियार बनाया और नकल पूरी तरह रोक दिया। जानते हैं, तब इसकी जिम्मेदारी किसकी थी: भारतीय जनता युवा मोर्चा के महासचिव रहे नेता की, जो कल्याण सिंह सरकार में शिक्षा मंत्री का दायित्व निभा रहे थे। वे सज्जन कोई और नहीं, राजनाथ सिंह थे। नकल विरोधी अध्यादेश अच्छे लक्ष्य को हासिल करने का औजार था। नकल के लिए बदनाम उत्तर प्रदेश की कम से कम पढ़ाई-लिखाई के संदर्भ में इससे अच्छी छवि बन सकती थी..लेकिन छात्र-छात्राओं की गिरफ्तारियों ने इस अच्छे लक्ष्य वाले कानून पर ही सवाल उठा दिया।

तेरह साल की उम्र सोचने-समझने के लिहाज से कुछ खास उम्र नहीं होती। लेकिन घर के पास लगती राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा की ओर किशोरावस्था की ओर बढ़ते राजनाथ के कदम आकर्षित हो गए थे। वरिष्ठ पत्रकार प्रबाल मैत्र को इस बाल स्वयंसेवक में तभी प्रतिभा नजर आ गई थी। उन्होंने राजनाथ को भरपूर स्नेह दिया। प्रबाल जी की राजनाथ सिंह कितनी इज्जत करते हैं, यह इन पंक्तियों के लेखक ने खुद देखा है। प्रबाल जी ने बाद के दिनों में गृहस्थ जीवन अख्तियार किया और पत्रकारिता में भी बड़ा मुकाम हासिल किया। अमर उजाला के राजनीतिक संपादक पद से अवकाश ग्रहण करने के बाद इन दिनों वे समाज सेवा में अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं। तेरह साल की उम्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वैचारिक छाया स्वीकार करने वाले राजनाथ सिंह को आज भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का करीबी माना जाता है। उत्तर प्रदेश के तत्कालीन वाराणसी और अब चंदौली जिले के भभौरा गांव में रामबदन सिंह और गुजराती देवी के घर 10 जुलाई 1951 को जन्मे राजनाथ सिंह तीन भाइयों में सबसे छोटे हैं। उनके बड़े भाई का काफी अरसा पहले निधन हो गया है। दूसरे नंबर के भाई काशीनाथ सिंह हैं, जबकि राजनाथ सिंह सबसे छोटे हैं। राजनाथ सिंह आज भले ही राजनीति के शीर्ष पर हों, लेकिन उन्होंने सादगी का दामन नहीं छोड़ा है। वरिष्ठों का सम्मान और छोटे लोगों को स्नेह देने में वे कभी कोई कंजूसी नहीं करते। उनके एक रिश्तेदार बताते हैं कि उनका पसंदीदा खाना दाल-भात और लिट्टी-चोखा है। वे हाथ से ही खाना पसंद करते हैं। भोजपुरीभाषी इलाके के किसी व्यक्ति को वे पश्चिमी ढंग से खाना खाते देखते हैं तो वे उसे टोकने से बाज नहीं आते। जब वे राज्यसभा के सदस्य के तौर पर साल 2002 में दिल्ली आए तो अशोक रोड स्थित उनके घर पर अक्सर वे लिट्टी पार्टी दिया करते थे।

कहा जाता है कि राजनीतिक कौशल और योग्यता के साथ ही संघ की करीबी के ही चलते उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की राजनीति में वह मुकाम हासिल किया, जो भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेता अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने हासिल किया। वे भारतीय जनता पार्टी के दो बार राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। पहली बार वे 24 दिसम्बर 2005 से 24 दिसम्बर 2009 तक भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का दायित्व निर्वहन किया। यहां ध्यान देने की बात है कि उन्होंने पार्टी के सर्वोच्च पद की जिम्मेदारी पार्टी को फर्श से अर्श पर पहुंचाने वाले लालकृष्ण आडवाणी के बाद हासिल की थी। दूसरी बार उन्हें पार्टी ने 23 जनवरी 2013 को अपनी सर्वोच्च कमान संभाली और  09 जुलाई 2014 तक इस पद पर रहे। उनका दूसरा कार्यकाल बेहद ऐतिहासिक कहा जाएगा। उनके इसी कार्यकाल में भारतीय जनता पार्टी ने भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में पहली बार अपने दम पर लोकसभा चुनावों में बहुमत हासिल किया। इस दौरान पार्टी के 283 सांसद चुनकर लोकसभा पहुंचे। राजनाथ सिंह का दूसरा कार्यकाल बेहद चुनौतीपूर्ण रहा। इसी दौरान भारतीय जनता पार्टी ने मई 2013 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को पहले भारतीय जनता पार्टी की ओर से 2014 के चुनावों का मुख्य रणनीतिकार नियुक्त किया। इसके बाद 13 जुलाई 2013 को दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में 2014 के आम चुनावों के लिए मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाया। राजनाथ सिंह के लिए यह दौर बेहद चुनौतीपूर्ण रहा। नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाए जाने के बाद भारतीय जनता पार्टी के शिखर पुरूष अनमने बने रहे। लेकिन राजनाथ सिंह ने मजबूती दिखाई। इसका नतीजा भारतीय जनता पार्टी के लिए सुखद रहा। तीन दशकों के बाद पहली बार कोई पार्टी अपने दम पर आम चुनावों में बहुमत हासिल करने में कामयाब रही। निश्चित तौर पर इसका ज्यादा श्रेय नरेंद्र मोदी के चमत्कारिक नेतृत्व और उनके प्रति आम लोगों के भरोसे को जाता है। लेकिन यह भी सच है कि तब भारतीय जनता पार्टी की कमान राजनाथ सिंह के हाथ थी। कहा जा सकता है कि 2014 के आम चुनावों की ऐतिहासिक जीत मोदी और राजनाथ की जोड़ी की कुशल रणनीति और नेतृत्व की रही। इसके बाद उन्हें नरेंद्र मोदी सरकार में नंबर दो की हैसियत देते हुए गृहमंत्री बनाया गया। इस दौरान उन्होंने आंतरिक मोर्चे पर देश के लिए नासूर बन चुके आतंकवाद से लोहा लेने में बड़ी भूमिका निभाई। गृह मंत्रालय की चुस्ती और नरेंद्र मोदी के रणनीतिक नेतृत्व के चलते देश में कोई बड़ी आतंकवादी घटना नहीं घट सकी। आतंकवाद किनारे होता गया। राजनाथ सिंह देश के 26 मई 2014 से लेकर 31 मई 2019 तक गृहमंत्री रहे। इसके बाद जब दूसरी बार नरेंद्र मोदी की अगुआई में भारतीय जनता पार्टी को आम चुनावों में भारी जीत मिली तो उन्हें रक्षा मंत्री का दायित्व दिया गया। रक्षा मंत्री बनते ही उन्होंने सेना को चुस्त-दुरूस्त करने में अपनी ऊर्जा झोंक दी है। अभी हाल ही में उन्होंने स्वदेश निर्मित लड़ाकू विमान तेजस में उड़ान भरी और भारत के जांबाज सैनिकों का मनोबल बढ़ाया।

अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में कृषि मंत्री रहे राजनाथ सिंह ने साल 2004 के जून महीने में गन्ना किसानों के बकाये के भुगतान के लिए बड़ा कदम उठाया था। इसके पहले वे उत्तर प्रदेश राज्य के 28 अक्टूबर 2000 से लेकर  8 मार्च 2002 तक मुख्यमंत्री रहे। उन्हें भारतीय जनता पार्टी ने रामप्रकाश गुप्त के बाद मुख्यमंत्री बनाया था। मुख्यमंत्री बनने के बाद वे लखनऊ के नजदीक बाराबंकी जिले की हैदरगढ़ विधानसभा सीट से उपचुनाव लड़कर विधायक बने। पार्टी को तब लगा था कि उनकी अगुआई में उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव वह जीत लेगी। लेकिन साल 2002 के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी का प्रदर्शन बेहद बुरा रहा। राजनाथ सिंह दोबारा हैदरगढ़ से जीत तो गए, लेकिन भारतीय जनता पार्टी तीसरे स्थान पर खिसक गई। इसके बाद राजनाथ सिंह को राज्यसभा का सदस्य बनाया गया और साल 2003 में उन्हें अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में कृषि मंत्री बनाया गया।

विज्ञान के विद्यार्थी रहे राजनाथ सिंह की दिलचस्पी राजनीति में बनी रही। उन्होंने गोरखपुर विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में भौतिक विज्ञान में एमएससी की डिग्री हासिल की है। इसके बाद मिर्जापुर के डिग्री कॉलेज में वे भौतिकी के प्रोफेसर बने। नौकरी के बावजूद उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दामन नहीं छोड़ा। राजनाथ सिंह की राजनीतिक यात्रा साल 1974 उत्तर प्रदेश मंय भारतीय जनसंघ का सचिव नियुक्त किया गया। इसके बाद उनके राजनीतिक जीवन में उतार चढ़ाव आते रहे, लेकिन उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। साल 2009 में गाजियाबाद से लोकसभा का सांसद चुने जाने के बाद साल 2014 में उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी की खाली की हुई सीट लखनऊ का रूख किया और भारी मतों से जीत हासिल की। 2019 में भी एक बार फिर वे यहां से जीत हासिल करने में कामयाब रहे।

राजनाथ सिंह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समर्पित कार्यकर्ता हैं। उनके व्यक्तित्व की खासियत है कि वे राजनीति के हर हलके में समादृत हैं। उनके दोस्त हर पार्टियों में हैं। लेकिन उनकी यह दोस्ती उनकी राजनीतिक विचारधारा के प्रति समर्पण में आड़े नहीं आती। यही वजह है कि हालिया अतीत में जब भी पार्टी को किसी समस्या से जूझना पड़ा, पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने उन पर सबसे ज्यादा भरोसा जताया। राजनाथ सिंह जब भी बोलते हैं, नपे-तुले अंदाज में बोलते हैं। हालांकि उनकी वाणी में स्पष्टता रहती है। जिस स्पष्टता से उन्होंने कुछ दिनों पहले पाक अधिकृत पर भारत का दावा ठोका है, उसे काफी सराहना मिली है। 68 साल के राजनाथ सिंह अब भी बेहद ऊर्जावान हैं। उनसे राजनीति और भारतीय जनता पार्टी को ढेरों अपेक्षाएं हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि समय की शिला पर राजनाथ उन उम्मीदों के साथ खरा जरूर उतरेंगे।

 

उमेश चतुर्वेदी

 

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