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हंगामा क्यों है बरपा?

हंगामा क्यों है बरपा?

देश नागरिक संशोधन विधेयक (CAB), अब नागरिक संशोधन अधिनियम (CAA) के खिलाफ हिंसक विरोध प्रदर्शन के दौर से गुजर रहा है। यहां यह उल्लेखनीय है कि CAB का उद्देश्य पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में सताए गए अल्पसंख्यकों को देशीकरण प्रक्रिया में एक विशेष दर्जा प्रदान करना है और इसका किसी भी तरह से यह मतलब नहीं है कि अन्य समुदायों के लोगों को देशीकरण से अलग किया जाएगा। अन्य समुदाय के लोगों के साथ सामान्य शरण प्रक्रिया के नियमों का पालन किया जाएगा। इसलिए, यह अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं है। लेकिन इस देश में पिछले 70 सालों से लगातार हिंदुओं को कमजोर करने के लिए धर्मनिरपेक्षता का इस्तेमाल करने वाले शहरी नक्सली CAB के बारे में लोगों को गुमराह कर रहे हैं। वास्तव में, चूंकि CAB के आधार के रूप में धार्मिक उत्पीडऩ है और यह उन लोगों का समर्थन कर रहा है जो धार्मिक रूप से सताए जा रहे हैं – यहां अल्पसंख्यक निर्दिष्ट इस्लामी देशों में – तो उन देशों में बहुसंख्यक धर्म से संबंधित समुदाय धार्मिक उत्पीडऩ का दावा नहीं कर सकता। यह हिंदू शरणार्थियों के लिए एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, क्योंकि उनके पास भारत के अलावा कहीं और जाने का विकल्प नहीं है। लेकिन यहां हिंदू शरणार्थियों को धर्मनिरपेक्षता के नाम पर अनदेखा किया जा रहा है, जिसे रोकना होगा। जो लोग सताए हुए हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता देने का इतना विरोध कर रहे है, वे किस तरह के उदारवादी हैं? इस बिल में कोई भेदभाव नहीं है, क्योंकि यह केवल उपरोक्त धार्मिक देशों में उन धार्मिक अल्पसंख्यकों को संरक्षण देने का प्रयास करता है, जिन्हें वहां सताया जाता है। उन देशों में मुसलमान अल्पसंख्यक नहीं हैं। इसलिए, यह बिल उन पर लागू नहीं होता है। जो लोग इस बिल का विरोध कर रहें हैं उन्हें इस बिल की बारीकियों को समझने के लिए प्राथमिक तर्क सीखना होगा, क्योंकि उनके तर्क पूरी तरह से खोखले हैं। अफसोस की बात है कि अकादमिक चर्चाएं और बहसें उपरोक्त देशों में अल्पसंख्यकों के उत्पीडऩ को रोकने में सक्षम नहीं हो पाई हैं। एक आदर्श दुनिया की आकांक्षा करना अच्छा है लेकिन जमीनी हकीकत को नजरअंदाज करना मूर्खता है। धार्मिक आधार पर भारत का विभाजन एक तथ्य है और पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों का संगठित उत्पीडऩ एक वास्तविकता है। पाकिस्तानी मंत्री शाहबाज भट्टी की हत्या क्योंकि वह एक ईसाई था, और राज्यपाल सलमान तासीर की हत्या इसलिए हुई क्योंकि उसने ईशनिंदा कानूनों का विरोध किया था, और बाद में उनके हत्यारों के महिमामंडन को आसानी से नहीं भुलाया जा सकता। यदि अल्पसंख्यकों की रक्षा के लिए मंत्रियों और राज्यपालों को मार दिया जाता है, तो वहां अल्पसंख्यकों की दुर्दशा की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। हमारे पास पूरी दुनिया के सताए गए लोगों को राहत प्रदान करने के लिए संसाधन नहीं हैं, लेकिन उन लोगों को आश्रय प्रदान करना, जो विभाजन के दौरान पलायन नहीं कर पाये, लेकिन अब प्रवास करना चाहते हैं, उसी कारण से जैसे 1947 में अन्य लोगों ने एथनिक क्लींजिंग से बचने के लिए किया था, हमारे साधनों के भीतर है और हमारा कर्तव्य भी।

यह स्पष्ट है कि CAB के खिलाफ अपेक्षित विरोध प्रदर्शनों से निपटने में सरकार की अधिक तैयारी होनी चाहिए थी। ये हिंसक विरोध देश की छवि को नुकसान ही पहुचायेंगे। यह कहने के बाद इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता की भारत भले ही एक सेकुलर राज्य हो लेकिन यह एक निर्विवाद तथ्य है कि दुनिया में हिंदुओं का एकमात्र देश भारत ही है और इसलिए पूरी दुनिया में हिंदू जब भी संकट में होते हैं तो वे भारत की ओर ही आशाभरी नजरों से देखते हैं।  इस पृष्ठभूमि में, यह उचित है कि धार्मिक उत्पीडऩ के कारण पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आने वाले सभी हिंदुओं को सभी अधिकारों के साथ पूर्ण भारतीय नागरिकता दी जानी चाहिए। वास्तव में इन हिंदू परिवारों का तो देश के हिंदू समाज द्वारा सम्मान किया जाना चाहिए, क्योंकि पाकिस्तान में अमानवीय अत्याचार झेलने के बाद भी इन्होंने अपना हिंदू धर्म नहीं छोड़ा।  इन शरणार्थियों का कहना है कि वे पाकिस्तान जाने की बजाय भारत की जेलों में रहना पसंद करेंगे। उनका कहना है कि पाकिस्तान में हिंदू सुरक्षित नहीं है। वहां स्त्रियों का अपहरण किया जाता है, उनका बलात्कार होता है और फिर उन्हें जबरन मुसलमान बनाया जाता है। हिंदू वहां अपने मृतकों का अंतिम संस्कार तक नहीं कर सकते क्योंकि कट्टर मुसलमान उन्हें दफनाने के लिए कहते हैं। पाकिस्तान में हिंदुओं की संख्या लगातार घटी ही है। परंतु संख्या से अधिक महत्वपूर्ण है उनकी सामाजिक व राजनीतिक स्थिति। वहां के हिंदुओं की सामाजिक-राजनीतिक स्थिति निरंतर खराब हुई है। वे वहां मूल अधिकारों से भी वंचित हैं। इसलिये इस परिपेक्ष्य में यहां यह कहना आवश्यक है कि पाकिस्तान के पहले गवर्नर जनरल मोहम्मद अली जिन्ना ने 11 अगस्त, 1947 को कंस्टीट्यूएंट असेंबली के सामने अपने भाषण में कहा था – ‘आप स्वतंत्र हैं, आप अपने मंदिरो-मस्जिदों या अपने अन्य उपासना स्थलों में जाने के लिए स्वतंत्र हैं। आप किसी भी जाति या संप्रदाय के हों, इससे राज्य को कोई लेना-देना नहीं है। हम इस मूल सिद्धांत के साथ नया देश बना रहे हैं कि हम सब एक राज्य के नागरिक हैं और एक समान नागरिक हैं।’

Deepak Kumar Rath

  दीपक कुमार रथ

 (editor@udayindia.in)

 

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