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हताश पाकिस्तान और भारत की चुनौतियां

हताश पाकिस्तान और भारत की चुनौतियां

अब तो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने भी मान लिया है कि वे जम्मू-कश्मीर पर दुनिया के नजरिए से निराश हैं। असल में ये निराशा खुद पाकिस्तान की पैदाइश है। जब आप जमीनी असलियत को पहचान नहीं पाते हैं तो आपको इस स्थिति के लिए तैयार रहना ही चाहिये। अमेरिका में सार्वजनिक बयानों, भाषणों, भेंट वार्ताओं, राजनयिक सरगर्मियों और पैंतरेबाजियों से हटकर सोचकर देखा जाए तो एक बात स्पष्ट है। भारत ने जम्मू-कश्मीर में 70 साल के यथास्थितवाद और नीतिगत जड़ता को तोड़ कर एक नई पहल की है। मोदी सरकार के धारा 370 और 35ए को निष्प्रभावी करने के गुण दोष की चर्चा किए बगैर भी ये तो सब कहते ही हैं कि यह एक साहसिक कदम है। उधर पाकिस्तान फिलहाल इतिहासगत बोझ, गर्त और नजरिये से बाहर नहीं आ पा रहा है। वह अभी भी पुरानी भाषा, रणनीति और तर्कों के सहारे दुनिया को समझाने की कोशिश में लगा है। नई  परिस्थितियों में उसका ये पुराना रिकॉर्ड नक्कारखाने में तूती की तरह किसी को सुनाई ही नहीं पड़ रहा।

संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत के प्रधानमंत्री मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के भाषणों में आशा और हताशा का ये फर्क साफ नजर आया। प्रधानमंत्री मोदी का भाषण अंतर्राष्ट्रीय मंच और मौके के अनुकूल सद्भाव, शांति, विकास और आतंक के खिलाफ संकल्प पर केंद्रित रहा। यह उद्बोधन भारत की गरिमा और अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी में उसकी हैसियत को भी दर्शाता नजर आया। श्री मोदी ने एक बार भी कश्मीर का जिक्र नहीं किया। उधर इमरान खान का भाषण थोड़ा अजीब सा लगा। हताश और निराश इमरान कभी तो अपने भाषण में इस्लाम के प्रचारक के तौर पर नजर आये तो कभी खूनखराबे की धमकी देते हुए एक गैर जिम्मेदार उन्मादी नेता के रूप में दिखाई दिए। अपने उन्माद में उन्होंने अपने भाषण में कई गलतियां भी कीं और एक बार तो दुनिया को उन्होंने परोक्ष रूप में विश्व युद्ध तक की धमकी दे डाली। वे भूल गए कि वे पाकिस्तान की किसी रैली में नहीं बल्कि संयुक्त राष्ट्र महासभा में बोल रहे हैं। असल में उन्होंने अपने हावभाव और तर्कों से पाकिस्तान को ही कठघरे में खड़ा कर दिया। उनके तर्कों में खासा विरोधाभास था।

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पाकिस्तान के मूलत: अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी के सामने तीन तर्क रखे। पहला ये कि चूंकि जम्मू-कश्मीर का मामला संयुक्त राष्ट्र में गया था इसलिए कश्मीर एक विवादग्रस्त मुद्दा है इसलिए भारत इसमें कोई एकतरफा कदम नहीं उठा सकता। इस तर्क में कोई खास दम नहीं है क्योंकि पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में पाकिस्तान खुद कई बदलाव कर चुका है। उसका एक हिस्सा वह चीन को दे चुका है। भारत का ये तर्क अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी को समझ आता है कि उसने बिना नियंत्रण रेखा में बदलाव किया हुए कुछ प्रशासनिक कदम उठाये हैं। ये कदम पूरी बहस के बाद भारत की संसद ने दो तिहाई बहुमत से स्वीकार किये है। अर्थात कानूनी लिहाज से भारत ने कोई अनुचित कदम नहीं उठाया। यों भी आज पाकिस्तान में जो नारा लगता है वह है ‘कश्मीर बनेगा पाकिस्तान।’ ये नारा इमरान खान की रैलियों से लेकर न्यूयार्क में हुए प्रदर्शन में भी था। यानि पाकिस्तान को भी कश्मीर की कथित ‘खुदमुख्तारी’ से कुछ लेना देना नहीं है। उसका मकसद तो किसी भी तरह जम्मू-कश्मीर पर कब्जा करना है। अब अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी कैसे पाकिस्तान के इस ‘कश्मीर हड़पो’ अभियान में साथ दे सकती है, ये इमरान को सोचना चाहिए?

पाकिस्तान का दूसरा बुनियादी तर्क जम्मू- कश्मीर में मानवाधिकारों के कथित उल्लंघन का है। भारत ने कहा कि ये फैसला विकास, समानता और भारतीय संविधान में नागरिकों को प्रदत्त सभी अधिकारों को जम्मू-कश्मीर में भी लागू करने के लिए किया गया। पाकिस्तान का एक ही राग था कि भारत कश्मीर से कर्फ्यू हटाकर तो देखे। इसी दौरान इमरान और पाकिस्तान के नेता लगातार धमकी देते रहे कि जैसे ही पाबंदियां हटेंगी कश्मीर में खून की नदियां बह जाएंगी। उनका ये कृत्य एक भड़काऊ बयानबाजी की तरह ही हैं। ये दिखता है कि पाकिस्तान वहां क्या करने की तैयारी में है। इसका अर्थ हुआ कि भारत को बहुत चौकन्ना रहने की जरुरत है।

पाकिस्तान का तीसरा तर्क अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी को धमकी की तरह है कि या तो उसकी मर्जी के मुताबिक मामला सुलझाओ नहीं तो फिर परमाणु युद्ध के लिए तैयार रहो। ये धमकी इमरान ने संयुक्त महासभा के अपने भाषण में कई बार दोहराई। वे ये भूल गए कि इस तरह की सीधी धमकी पाकिस्तान की रही सही साख को भी काम करने वाली है। इमरान भूल गए कि परमाणु शक्ति संपन्न देशों से दुनिया उत्तरदायित्व पूर्ण व्यवहार और संयत आचरण की अपेक्षा रखती है।

पाकिस्तान की ये सभी दलीलें इस तरह की है कि मानो वहां की जमीन में पिछले सालों  में जो आतंकवाद की जो फसल बोई गई है वह उसे बर्बाद नहीं करेगा। और यदि उस पर ज्यादा जोर डाला गया तो वह परमाणु युद्ध से भी नहीं कतराएगा। ये तर्क एक तरफ बहुत खतरनाक है तो दूसरी तरफ खासा मूर्खतापूर्ण भी है। अंतर्राष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान का पिछले कोई दस दिनों का बर्ताव विश्व में उसके प्रति चिंता को और बढ़ाएगा ही। कहते हैं कि मूर्ख दोस्त से समझदार दुश्मन अच्छा होता है। पर यहां तो भारत का पाला एक ऐसे पड़ोसी से है जो मूर्ख होने के साथ साथ बेहद उन्मादी भी है। एक वाकया में यदि कहा जाए तो भारत के खतरे और बढ़ गए हैं।

उमेश उपाध्याय

 

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