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‘हिन्दू आतंक’ का झूठ उजागर

‘हिन्दू आतंक’ का झूठ उजागर

पानीपत के पास फरवरी 2007 में दिल्ली-लाहौर समझौता एक्सप्रेस में धमाके के मामले में स्वामी असीमानंद और तीन अन्य की रिहाई न्याय की जीत ही मानी जाएगी। उस धमाके में 68 लोगों की मौत हो गई थी। स्वामी असीमानंद, साध्वी प्रज्ञा और लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित की गिरफ्तारी से एक खास सियासी तबके, पेशेवर एक्टिविस्टों और मीडिया के कुछ लोगों को काफी सुख और संतोष मिला था। गौरतलब है कि बतौर गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने अगस्त 2010 में ‘हिंदू आतंक’ का मुद्दा उठाया था। उसके फौरन बाद तत्कालीन कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह और तत्कालीन गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने उसे लपक लिया। शिंदे ने 20 जनवरी 2013 को कांग्रेस के जयपुर चिंतन शिविर में एक निराधार और उल-जलूल आरोप लगाया कि आरएसएस और भाजपा के प्रशिक्षण केंद्रों में हिंदू आतंकवाद को शह दी जा रही है। उनके बयान पर पाकिस्तान स्थिति आतंकी गुटों ने जश्न मनाया था। लगता है, कांग्रेस ने अल्पसंख्यक वोटों के खातिर हिंदुत्व को आतंकवाद से जोडऩे की सोची-समझी रणनीति अपनाई थी। दिलचस्प यह भी है कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) के गठन के बाद यूपीए सरकार ने ऐसे सारे मामलों को जोड़ दिया, जिससे ‘हिंदू आतंक’ जैसा शब्द उछालने में मदद मिली।

हालांकि यहां इसका भी जिक्र करना जरूरी है कि ‘सेकुलर ब्रिगेड’ के मुताबिक 2014 में केंद्र में सरकार के बदलने के साथ एनआइए के मामले कमजोर कर दिए गए। लेकिन एक दूसरी संभावना भी है। अति-उत्साह में यूपीए सरकार ने ‘हिंदू आतंक’ का झूठा अफसाना गढऩे की कोशिश की हो। इस वजह से मुकदमे टिक नहीं पाए। समझौता एक्सप्रेस धमाके को सियासी रंग देने की नीयत से उच्च अधिकारियों ने उसे ऐसा मोड़ दे दिया क्योंकि तत्कालीन सरकार उस घटना को तथाकथित ‘हिंदू आतंकियों’ की करतूत साबित करना चाहती थी। लेकिन जांच में शामिल रहे एक रिटायर अफसर ने भंडाफोड़ किया कि कैसे उस समय पूरे मामले को भगवा रंग देने के लिए नया मोड़ दिया गया और यहां तक कि घटना के फौरन बाद गिरक्रतार एक पाकिस्तानी को इसलिए छोड़ दिया गया, ताकि अपने एजेंडे पर आगे बढ़ा जा सके।

लेकिन मजेदार तो यह है कि आतंकियों का पनाहगाह देश तो हमेशा हर आतंकी घटना में शिरकत से इनकार करता रहा है और हमारे भारतीयों का एक तबका ‘हिंदू आतंक’ को साबित करने पर तुला रहा है। क्या वे वाकई खुद से ही इतनी घृणा करते हैं? या हमेशा की तरह यह मोदी से घृणा का ही एक रूप है? जहां तक यह आशंका है कि सरकार बदलने के बाद गवाह मुकर गए, उससे भी तगड़ी यह आशंका है कि ‘हिंदू आतंक’ का अफसाना गढऩे के लिए ये घटनाएं की गईं। जब ‘सेकुलर ब्रिगेड’ इन मुकदमों को कमजोर करने में सरकार के हाथ होने की हायतौबा मचा रहा है, तो क्या हम यह कभी जान पाएंगे कि धमाकों की साजिश में लश्कर-ए-तैयबा का हाथ होने की सूचनाओं पर क्यों नहीं आगे बढ़ा गया? गौरतलब है कि इन तीनों मामले- मालेगांव धमाके, अजमेर शरीफ धमाके और समझौता एक्सप्रेस धमाके- में शुरू की जांच में पाकिस्तान स्थित आतंकी गुटों की शिरकत की बात सामने आई थी। इसका जिक्र डेविड हेडली के कबूलनामे में भी है। वे सार्वजनिक भी हो गए थे। लेकिन कुछ समय बाद जांच एजेंसियों ने दिशा बदल दी और असीमानंद तथा दूसरे हिंदू धार्मिक नेताओं पर फोकस किया। यह आशंका बनी हुई है कि समझौता एक्सप्रेस धमाके में लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी शामिल थे। इनमें कुछ पहले पकड़े भी गए थे और बाद में यूपीए की सरकार के दौरान छोड़ दिए गए। फिर अचानक स्वामी असीमानंद की अगुआई वाले हिंदू गुटों की ओर मामला मोड़ दिया गया। इसमें पी. चिदंबरम की विशेष रुचि थी, ताकि ‘हिंदू आतंक’ का उनका अफसाना साबित हो सके। आरोपियों के बारे में पुलिस के इस अचानक फोकस में कुछ तो गड़बड़ लगता है। शायद इसी वजह से वे जबरन दिलाए गए अपने पहले के बयानों से मुकरे और छूट गए।

Deepak Kumar Rath

 दीपक कुमार रथ

(editor@udayindia.in)

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