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”रिश्ता’’ खुशी हो या गम

”रिश्ता’’ खुशी हो या गम

प्रत्येक मनुष्य की पहचान होती है उसके दूसरों से रहने वाले सम्पर्क से। सम्पर्क मनुष्य को उसकी स्थिति का एहसास कराता है। सम्पर्क किसी का भी हो, जैसे माता-पिता, भाई-बहन, दोस्त या फिर कोई दूर का सम्पर्क क्यूं न हो, यहां तक कि अपने पड़ोसी की मौजूदगी से भी हमारी पहचान का पता चलता है। मनुष्य को उसके माता-पिता जन्म देते ही उसका नामकरण करते हैं, उससे उसकी पहचान की दुनिया में सृष्टी होती है। केवल नाम से ही उसकी पहचान नहीं होती बल्कि कुछ सम्पर्क जो उसे जन्म से मिलते हैं और कुछ सम्पर्क उसके अपने द्वारा बनाए गए होते हैं। यह समस्त सम्पर्क उसके चारों ओर मंडरा कर उसकी पहचान की वृद्धि करते हैं। सम्पर्क कितना भी गहरा क्यों न हो हम किस तरह उसे निभा पाते हैं वह हमारे ऊपर निर्भर करता है। हमारी दूसरों के प्रति रहने वाले सम्पर्क को हम अपने खाने के साथ तुलना कर सकते हैं। जैसे शरीर के लिए खाद्य का प्रयोजन होता है। हमारे सम्पूर्ण विकास के लिए हमारे सम्र्पक का प्रयोजन होता है। अलग-अलग खाने की हमारे शरीर के लिए अलग-अलग आवश्यकताएं हैं और कौन से खाद्य पदार्थ कितनी मात्रा में लेना चाहिए उसका भी एक नियम होता है। उसमें थोड़ा सा व्यतिक्रम हो तो शरीर अस्वस्थ हो जाता है। ठीक उसी तरह हर सम्पर्क को एक नियम से निभाना चाहिए, किसी भी चीज की अधिकता हमारे जीवन में दुख का कारण बन सकती है। जैसे कुछ रिश्ते कड़क अथवा कड़वे होते हैं, लेकिन उसका जिंदगी में अलग महत्व होता है। कुछ रिश्ते मिठे होते हैं, कुछ चटपटे भी होते हैं, हर चीज को सही मात्रा में लेने से हम आनंद लाभ कर सकते हैं। दोस्तों के साथ हमारा रिश्ता चटपटा होता है, अधिक चटपटा खाना खाने से शरीर बिगड़ सकता है, लेकिन हर रिश्ते का स्वाद  हमें लेना चाहिए।

सम्पर्क एक ऐसी चीज है जो हमें अनेक तरह से आनंद दे सकता है, लेकिन हम अक्सर दूसरों से रहने वाले सम्पर्क के कारण दुखी हो जाते हैं। जैसे कि हमने अभी तक जितना भी ज्ञान ग्रहण किया है, यह एहसास हो गया है कि हर दुख का कारण हमारी अपनों से रहने वाली अपेक्षा होती है। जब हम अपने किसी भी सम्पर्क के कारण तनाव में आते हैं तो मन में तुरंत ही हम उनके  प्यार को मापने लगते हैं, जो उस समय हमें कुछ अच्छी अनुभूति प्रदान कर सकता है। उस क्षण को हम उन्हें समझने पर नापतोल करने में नष्ट कर बैठते हैं। किस तरह वह हमारा स्वागत करते हैं, हमें देखकर उनके चेहरे पर किस प्रकार का भाव होता है, ऐसे क्यों नहीं होता है। हमें केवल मिले और मिलने की खुशी को अनुभव करें। हमारे सामने वाले व्यक्ति को केवल यह एहसास होना चाहिए कि हमें बस उनके साथ की कुछ समय आवश्यकता है। कुछ पल जो हम साथ गुजारें, वह पल एक दूसरे के सुख या दुख बांटने के लिए ही हों, तो हमाराा संपर्क सुदृढ़ हो जाता है।

कोई भी सम्पर्क हो हमें नाजुकता से निभाना चाहिए, बल्कि अत्यंत प्रेमभाव से रहकर हर हालात को बेहतरीन बना सकते हैं। सामने वाले की कुछ गलती को नजरअंदाज करना हमारे रिश्ते में मिठास ला सकता है। देखा जाए तो विश्व में रहने वाला हर प्राणी परमात्मा की संतान है। इस तरह हम सभी एक-दूसरे के सम्र्पकी हैं। सभी से प्रेम, दया, क्षमा आदि भाव से रहने से सबके साथ हमारा अच्छा रिश्ता हो सकता है। जब हमारा सबसे अच्छा सम्पर्क रहता है तो हम अंदर से संतोष अनुभव करते हैं।

उपाली अपराजिता रथ

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