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खिलाडिय़ों द्वारा रक्त अपमिश्रण के नतीजे

खिलाडिय़ों द्वारा रक्त अपमिश्रण के नतीजे

किसी भी कार्य को करने के लिए व्यक्ति को ऊर्जा की आवश्यकता होती है। ऊर्जा के लिए व्यक्ति भोजन विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार अधिक से अधिक पोषक तत्वों को अपने भोजन में शामिल करता है। इसके अतिरिक्त नित्य योग, व्यायाम, प्राणायाम, प्रात: भ्रमण, दौड़ आदि क्रियाओं का सहारा व्यक्ति की ऊर्जा क्षमता को बढ़ाता है। सामान्य जीवन में लोग इस विषय पर अधिक ध्यान नहीं देते कि उन्हें अपने कार्यों को करने के लिए कितनी ऊर्जा की आवश्यकता है और यह ऊर्जा उन्हें किस प्रकार के भोजन में पाये जाने वाले पोषक तत्वों से प्राप्त होगी।

खेलों में भाग लेने वाले खिलाडिय़ों को ऊर्जा के प्रति अत्यन्त सचेत रहना पड़ता है। उनके प्रशिक्षक जहां एक तरफ उन्हें खेलों की तकनीकों का अभ्यास कराते हैं वहीं भोजन विशेषज्ञ उनके लिए आवश्यक ऊर्जा प्रदान करने वाले भोजन की योजना तैयार करते हैं। खेलों में भी विशेष रूप से दौड़ आदि में भाग लेने वाले खिलाडिय़ों को तो कुछ ही पलों में अपनी सारी ऊर्जा का भरपूर प्रयोग करते हुए अपना प्रदर्शन करना पड़ता है। भोजन से प्राप्त पोषक तत्वों की ऊर्जा हमारे शरीर में प्राकृतिक तरीके से रक्त को उत्तेजक बनाती है। भोजन की ऊर्जा रक्त को बलशाली बनाकर खिलाड़ी को अपने प्रदर्शन में सहायता प्रदान करती है।

आज के युग में किसी भी राष्ट्र की प्रसिद्धि दो मुख्य लक्षणों पर आधारित नजर आती है – प्रथम, देश के खिलाडिय़ों द्वारा भिन्न-भिन्न खेलों के माध्यम से अर्जित पदक आदि द्वितीय, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में देश के वैज्ञानिकों द्वारा सम्पन्न शोध कार्यों के माध्यम से। एक मुख्य मनोरंजन माध्यम के रूप में भी खेलों पर आज सारी दुनिया की नजर है। इसी प्रकार शोध कार्यों पर भी सारी दुनिया की नजर रहती है क्योंकि इन शोध कार्यों का लाभ विश्व के सभी लोग उठाना चाहते हैं।

इसमें कोई संदेह नहीं कि खिलाड़ी अपनी शारीरिक और मानसिक शक्तियों का पूरा जोर लगाकर जब प्रतियोगिताओं में भाग लेते हैं तो उनके प्रयास से न केवल उनका नाम रोशन होता है, उन्हें बड़े-बड़े पदक मिलते हैं बल्कि राष्ट्र की छवि पर भी चार चांद लगते हैं। परन्तु दूसरी तरफ यह भी ध्रुव सत्य है कि पिछले कुछ दशकों से ऐसी कुछ घटनाएं सामने आ रही जिनमें धावकों पर यह आरोप सिद्ध हुए कि उन्होंने दौड़ जैसे कुछ खेलों में बेहतर प्रदर्शन हेतु अपने रक्त को कृत्रिम तरीके से तेज गति देने के लिए रक्त में उत्तेजक औषधियों का मिश्रण करवाया। परिणामस्वरूप रक्त की गति तेज होने लगी और धावक ने सफलता प्राप्त कर ली। परन्तु बाद में जब यह आरोप सिद्ध हुआ तो एक तरफ उसकी जीती हुई बाजी पर कलंक लगता है और ऐसे खिलाडिय़ों को एक निर्धारित अवधि के लिए खेल के दायरे से वंचित करने का आदेश खेल प्रबंधन संस्थाओं द्वारा घोषित कर दिया जाता है। इसके अतिरिक्त संभवत: खिलाड़ी यह भूल जाते हैं कि रक्त में तीखे कैमिकल्स से बनी औषधियां भावी जीवन में उनके स्वास्थ्य से कितना खिलवाड़ करेंगी। वर्ष 2004 में खेल जगत के प्रबन्धकों ने खिलाडिय़ों द्वारा रक्त अपमिश्रण की जांच का प्रयास प्रारम्भ किया गया था। रक्त अपमिश्रण का यह सिलसिला वैसे तो 1950 से चल रहा था, परन्तु 1980 के ओलम्पिक खेलों में 5 और 10 किलोमीटर दौड़ का मेडल जीतने वाले विजेता की जांच के दौरान यह पहली बार उजागर हुआ जिसके रक्त में रक्त की दो इकाईयां अतिरिक्त पाई गई थीं। 1984 के ओलोम्पिक में साईकल दौड़ के विजेता एक अमेरिकन खिलाड़ी पर यह आरोप सिद्ध हुआ था। बाद में तो यह सिद्ध हुआ कि अमेरिका की पूरी टीम के एक तिहाई से अधिक खिलाडिय़ों ने रक्त अपमिश्रण करवाया था। इसके अतिरिक्त अब तक अनेकों ऐसी घटनाएँ सामने आ चुकी हैं। भारत के खिलाड़ी भी इस गलत कार्य से अपने आपको रोक नहीं पाये।

युवा एवं खेल मंत्रालय के समक्ष राज्यसभा के माध्यम से मैंने यह प्रश्न प्रस्तुत किया कि विगत कुछ वर्षों में कितने भारतीय खिलाडिय़ों को खेलों के दौरान अपने रक्त में औषधियों के अपमिश्रण का दोषी पाया गया है। तब के युवा एवं खेल मंत्री श्री सोनोवाल ने मेरे प्रश्न के उत्तर में बताया कि वर्ष 2012 से 2015 के बीच लगभग 433 खिलाडिय़ों के विरुद्ध रक्त अपमिश्रण का दोष सिद्ध हुआ था। निर्धारित नियमों के अनुसार ऐसे दोषी खिलाडिय़ों को अधिकतम दो वर्ष तक खेलों में भाग लेने से प्रतिबन्धित किया जा सकता है। दुबारा ऐसा दोष सिद्ध होने पर प्रतिबन्ध की यह अवधि चार वर्ष की भी हो सकती है। श्री सोनोवाल ने मेरे प्रश्नों के उत्तर में यह भी बताया कि सरकार कई संस्थाओं के माध्यम से इस रक्त अपमिश्रण की गतिविधियों के विरुद्ध खिलाडिय़ों में जागृति फैलाने का प्रयास भी करती है। इस सम्बन्ध में केन्द्र सरकार ने सारे देश में पांच क्षेत्रीय केन्द्र स्थापित करने का निर्णय लिया है जो हर स्तर के खिलाडिय़ों को रक्त अपमिश्रण के दोषों के प्रति जागरूक करेंगे। गत दो वर्षों के दौरान केन्द्र सरकार ने रक्त अपमिश्रण के विरुद्ध देशभर के खिलाडिय़ों के मध्य 100 से अधिक शिक्षण कार्यक्रम तथा कार्यशालाएं आयोजित की हैं।

01-10-2016

हमारे रक्त में उपस्थित हिमोग्लोबिन का कार्य शरीर के सभी हिस्सों में ऑक्सीजन की आपूर्ति करना है। जितनी अधिक ऑक्सीजन शरीर के अन्य हिस्सों तक पहुंचती है उतनी अधिक ऊर्जा का निर्माण हमारे शरीर की एक-एक कोशिका कर पाती है। सामान्यत: किसी रोगी को बाहरी रक्त तब चढ़ाया जाता है जब किसी दुर्घटना या अन्य कारण से उसके रक्त में लाल रक्त कोशिकाओं की कमी हो जाती है। जबकि खिलाड़ी ऊर्जा बढ़ाने के लोभ में तीन प्रकार के नकली तरीके अपनाने का प्रयास करते हैं। प्रथम, अपने शरीर में बाहरी रक्त चढ़वाना। दूसरा, कुछ कैमिकल आधारित औषधियों के टीके लगवाना। तीसरा, खिलाडिय़ों के शरीर से पहले रक्त निकाल लिया जाता है। उस रक्त को भविष्य के लिए स्टोर किया जाता है और खेल के अन्तिम दौर से पूर्व खिलाड़ी को उसका अपना ही रक्त चढ़ाया जाता है।

जब भी कोई व्यक्ति किसी बाहरी व्यक्ति का रक्त लेता है तो उसे अवश्य ही किसी न किसी रूप में कोई अन्य प्रभाव झेलने पड़ते हैं। दूसरों का रक्त लेने की प्रक्रिया में संक्रमण की संभावना भी प्रबल होती है। यदि गलती से थोड़ा बहुत भिन्न रक्त खिलाड़ी को चढ़ा दिया गया तो इसका परिणाम उसे भविष्य में कई रोगों के रूप में देखने को मिल सकता है।

कृत्रिम कैमिकल औषधियों के बल पर एक बार शरीर में ऊर्जा तो अवश्य बढ़ती है परन्तु इन कृत्रिम कैमिकल्स का स्वास्थ्य पर अवश्य ही बुरा प्रभाव पड़ता है। तीसरे प्रकार के प्रयोग में जब खिलाड़ी का अपना पहले से निकाला हुआ रक्त उसे खेल के अन्तिम दौर से पूर्व चढ़ाया जाता है तो स्टोर की अवधि में उस रक्त की गुणवत्ता बहुत कम हो जाती है। खिलाड़ी का रक्त 4-5 सप्ताह पूर्व निकाला जाता है, उसे फ्रीजर में लगभग -80 डिग्री सेल्सियस पर स्टोर किया जाता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस ठंडक के कारण उस रक्त की लगभग 40 प्रतिशत लाल रक्त कणिकाएं तो वैसे ही क्षतिग्रस्त हो जाती हैं।

इसके अतिरिक्त खिलाडिय़ों को प्रशिक्षण के लिए आजकल जिम में प्रयोग की जाने वाली भिन्न-भिन्न मशीनों तथा मांसपेशियों की शक्ति बढ़ाने के लिए भिन्न-भिन्न रासायनिक पेय पदार्थों और यहाँ तक कि औषधियों का सेवन भी शामिल है। जबकि वास्तविकता यह है कि इन रासायनिक पेय पदार्थों और औषधियों के सेवन से मांसपेशियों की शक्ति दीर्घकाल में घटनी प्रारंभ हो जाती हैं। इसके विपरीत यदि खिलाडिय़ों को अपने खेल अभ्यास के साथ-साथ योग क्रियाओं में अभ्यस्त करा दिया जाये तो उनके अन्दर मांसपेशी शक्ति का स्थाई रूप बन पायेगा।

रक्त अपमिश्रण का सीधा सा अर्थ यह है कि एक खेल में अच्छे परिणाम के लिए जीवन भर साथ निभाने वाले अपने रक्त में स्वयं ही मिलावट का प्रयास करना। इस घिनौने प्रयास के फलस्वरूप खिलाडिय़ों के भावी जीवन में हृदय रोग, रक्त का जमाव, एच.आई.वी. जैसे संक्रमणकारी रोग, कई प्रकार की एलर्जी प्रतिक्रियाएं, बुखार, त्वचा पर दाने, किडनी को क्षति की संभावना, लीवर की कार्यक्षमता कम होने तथा उच्च रक्तचाप आदि कई अन्य प्रकार के गंभीर रोगों की संभावना बनी रहती है।

इसलिए अखिल विश्व के खिलाडिय़ों, प्रशिक्षकों तथा सरकारों सहित समूचे खेल प्रेमियों से मेरा निवेदन है कि खेल जीतने को इतना अधिक महत्व देने के स्थान पर खिलाडिय़ों के स्थाई स्वास्थ्य को अधिक महत्त्वपूर्ण समझा जाना चाहिए। कुछ मेडल जीतने के बाद यदि शेष अवधि रोगी होकर ही काटनी पड़े तो ऐसी जीतों का कोई लाभ नहीं। अत: सरकारों तथा गैर-सरकारी संगठनों को विशेष अभियान चलाकर खिलाडिय़ों को अपने रक्त में उत्तेजना पैदा करने के लिए रासायनिक औषधियों और रक्त अपमिश्रण जैसे खतरनाक मार्ग को नहीं अपनाना चाहिए। खिलाडिय़ों को यह भी समझना चाहिए कि उनकी ऐसी हरकतों से जहां एक तरफ उनकी व्यक्तिगत छवि धूमिल होती है, वहीं राष्ट्र की छवि पर भी दाग लगता है।

(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व भारतीय रेड क्रॉस सोसायटी के उपाध्यक्ष हैं)

अविनाश राय खन्ना

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