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श्वास, वातज, उदर आदि रोगों का सामक ‘तेजपात’

श्वास, वातज, उदर आदि रोगों का सामक ‘तेजपात’

गांव के गोचर में उगे वनौषधीय जंगल अब लुप्त हो रहे हैं। खेतों में कंकरीट के जंगल उग रहे हैं। जड़ी-बूटियों की जगह इंजेक्शन व रासायनिक टेबलेट में स्वास्थ्य खोजा जा रहा हैं। यह विडम्बना उस देश की है, जिसने विश्व को आयुर्वेद महान का नारा दिया। पतंजलि आयुर्वेद व पतंजलि योगपीठ का संपूर्ण आंदोलन इन्हीं बातों से चिंतित है और औषधि के नाम पर परमात्मा के इस शरीर रुपी मंदिर के साथ हो रहे अत्याचार को वैश्विक स्तर पर समाप्त करने के लिए पतंजलि आयुर्वेद सतत अनुसंधानरत है। इन्हीं शोध निष्कर्षों पर आधारित है बनौषधियों में स्वास्थ की यह श्रृंखला। इस अंक में प्रस्तुत है स्वास्थ व पोषण के लिए अति उपयोगी, पत्र, पुष्प, फल, बीज, काण्ड व मूल सभी प्रयोग में आने वाली वनौषधि तेजपत्र के  गुण-कर्म व प्रयोग विधि हैं।

भारत में उपउष्णकटिबंधीय, हिमालय से भूटान तक 900-1500 मी तक  की ऊचाई तक, सिक्किम में 2400 मी. तथा सिल्हट एवं खासिया के  पहाड़ी क्षेत्रों में 900-1200 मी की ऊचाई तक तेज पत्र के जंगली वृक्ष पाये जाते हैं। इसके सुखाये हुये पत्ते बाजारों में तेजपात के नाम से बिकते हैं। पत्तियों का रंग जैतूनी हरा तथा ऊध्र्व पृष्ठ चिकना, 3 स्पष्ट शिरओं से युक्त  तथा इसमें लौंग एवं दालचीनी की सम्मिलित मनोरम गन्ध पाई जाती हैं।

बाह्यस्वरुप

तेजपत्ते का 7-5 मीटर ऊंचा छोटे से मध्यामाकार सदाहरित वृक्ष होता हैं। इसकी काण्डत्वक् गहरे भूरे वर्ण की अथवा कृष्णाभ, थोड़ी खुरदरी, दालचीनी की अपेक्षा कम सुंगधित तथा स्वादरहित, बाहा- भाग गुलाबी अथवा रक्ताभ भूरे वर्ण की श्वेत धारियों से युक्त  होती हैं। इसके पत्र सरल, विपरीत अथवा एकांतर,10-12-5 सेमी लम्बे, विभिन्र चौड़ाई के, अण्डाकार, चमकीले, नोंकदार, 3 शिराओं से युक्त सुगन्धित एवं स्वाद में तीक्ष्ण होते हैं। इसके नवीन पत्र कुछ गुलाबी वर्ण के होते हैं। इसके पुष्प हल्के पीत वर्णी, फल अण्डाकार, मांसल, कृष्ण वर्ण के, 13 मिमी लम्बे होते हैं। इसका पुष्पकाल एवं फलकाल अगस्त से फरवरी तक होता हैं।

रासायनिक सघ्ंटन

इसके पत्र में सिनामिक एल्डीहाईड, लिनालूल, युजिनॉल, यूजिनॉल एसीटेट, केम्फॉर, कैरियोफायलिन, वेमजेल्डीहाईह,  कार्डीनीन, टर्पीनिओल तथा बी पिनीन, सायमीन, लिमोनीन, जेरानिओर, ओसिमिन, टर्पीनिन, बेन्जिल सिननमेट, बेन्जिल एसीटेट तथा वाष्पशील तैल पाया जाता हैं।

औषधीय प्रयोग

शिरो रोग:

  • सिर दर्द- 10 ग्राम तेजपात के पत्तों को जल में पीसकर, कपाल पर लेप करने से ठंड या गर्मी से उत्पन्र सिर दर्द में आराम मिलता है, आराम होने पर लेप साफ कर लें।
  • सिर की जुंए- तेजपात के 5-6 पत्तों को एक गिलास पानी में इतना उबालें कि पानी आधा रह जाये। इस पानी से रोजाना सिर की मालिश करने के बाद नहायें। इससे सिर में जुऐ नहीं होती।

नासा रोग:

  • सर्दी-जुकाम: चाय पत्ती की जगह तेजपात के चूर्ण की चाय पीने से छीकें आना, नाक बहना, जलन, सिर दर्द में शीघ्र आराम मिलता हैं। पत्तों को सूंघना भी गुणकारी हैं।
  • 5 गाम्र तेजपात छाल और 5 ग्राम छोटी पिप्पली को पीसकर 2 चम्मच शहद के साथ चटाने से खांसी और जुकाम मिटता हैं।

01-10-2016

नेत्र रोग:

  • तेजपात को पीसकर आंख में लगाने से आंख का जाला और धुंध में लाभ मिलता हैं।

मुख रोग:

  • दातों का मैल: तेजपात के पत्तों का बारीक चुर्ण सुबह-शाम दांतो पर मलने से दांतो में चमक आ जाती हैं।

मुख रोग:

  • दातों का मैल : तेजपात के पत्तों का बारीक चूर्ण सुबह-शाम दांतो पर मलने से दांतो में चमक आ जाती हैं।
  • तेजपात के डंठल को चबाते रहने से दातों से खून आने की तकलीफ में आराम मिलता हैं।
  • हकलाहट: तेजपात के पत्रों को नियमित रुप से चूसते रहने से हकलाहट में लाभ मिलता हैं।

वक्ष रोग:

  • श्वास (दमा): तेजपात और पीपल को 2-2 ग्राम की मात्रा में अदरक के मुरब्बे की चाशनी में बुरक कर चटाने से दमा और श्वास नली का उपद्रव मिटता हैं।
  • सूखे तेजपात के पत्र चुर्ण को एक चम्मच की मात्रा में एक कप गर्म दूध के साथ सुबह-शाम नियमित सेवन करने से लाभ मिलता हैं।

खांसी : एक चम्मच तेजपात चूर्ण को शहद के साथ सेवन करने से खांसी में आराम मिलता है।

उदर रोग:

  • अरुचि: तेजपात का रायता सुबह -शाम खाने से अरुचि दुर होती हैं।

आध्मान (पेट फुलना)- इसके पत्तों का काढ़ा पिलाने से आतों की खराबी से पेट का फूलना, अतिसार आदि में लाभ होता हैं।

  • उबकाई- इसके 2-4 गा्रम चूर्ण का सेवन करने से उबकाई मिटाती हैं।
  • वातज गुल्स: 2-4 ग्राम छाल चूर्ण का सेवन करने से वातज गुल्म में लाभ होता हैं।
  • छर्दि: इलायची, लौंग, दालचीनी तथा तेजपत्र चूर्ण (प्रत्येक 1-4 ग्राम) में शहद मिलाकर सेवन करने से छर्दि का शमन होता हैं।
  • अतिसार : 1-3 ग्राम पत्र चूर्ण में मिश्री तथा शहद मिलाकर सेवन करने से अतिसार तथा उदरशूल का शमन होता हैं।

यकृत्प्लीहा रोग:

  • पीलिया और पथरी: तेजपत्ता का 5-6 पत्ते नियमित रुप से चबाने से रोग की तीव्रता कम होती है।
  • यकृत्वृद्धि- समभाग तेजपत्र, लहसुन, काली मरिच, लौंग तथा हल्दी के चूर्ण का क्वाथ बनाकर, इसे 10-20 मिली मात्रा में पीने से यकृत् में लाभ होता है। विकारों में लाभ होता हैं।

प्रजननसंस्थान रोग:

  • सुख प्रसवा: तेजपात के पत्तों की धूनी (योनि में) देने से बच्चा सुख से उत्पन्न हो जाता हैं।
  • गर्भाशय शुद्धि के लिये: 1-3 ग्राम तेजपात के पत्र चुर्ण को प्रात:- सायं सेवन करने से गर्भशय शुद्ध होता हैं।
  • तेजपात के क्वाथ में बैठने से गर्भाशय की पीड़ा शान्त होती हैं।
  • प्रसूता को 40-60 मिली तेजपात के पत्तों का काढा प्रात:-सायं पिलाने से दूषित रक्त तथा मल आदि निकल कर गर्भाशय शुद्ध होता हैं।

अस्थिसंधि रोग:

  • संधिवात- तेजपात के पत्तों को पीसकर जोड़ों पर लेप करने से सन्धिवात में लाभ मिलता हैं।

सर्वशरीर रोग:

  • रक्त स्राव- शरीर के किसी भी अंग से रक्त स्राव होने पर एक चम्मच तेजपात चूर्ण को एक कप पानी के साथ 2-3 बार सेवन करने से लाभ होता हैं।
  • शरीर दौर्गन्ध्य: समभाग तेजपत्र, सुगंधबाला, अगरु, हरीतकी एवं चंदन को पीसकर शरीर पर लगाने से पसीने से उत्पन्र होने वाली शरीर दौर्गन्ध्य का शमन होता है।

विष चिकित्सा:

  • समभाग मंजिष्ठा, नागकेसर, तेजपत्र तथा हल्दी को पीसकर दंश स्थान पर लेप करने से मकड़ी के विष से उत्पन्र प्रभावों का शमन होता हैं। यद्यपि भारत शदियों से तेजपत्र का सब्जी रुप में प्रयोग करता आ रहा हैं,पर इसे औषधि रुप में प्रयोग करके स्वाद के साथ स्वस्थ जीवन का मार्ग सहज ही प्रशस्त कर सकता हैं, तो आइये हम इस दिशा में बढ़ें और स्वस्थ व दीर्घ जीवन पायें।

साभार: योग संदेश

आचार्य बालकृष्ण

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