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रमेश भाई ओझा क्रांतिकारी योद्धा

रमेश भाई ओझा  क्रांतिकारी योद्धा

भारतीय परम्परा एवं संस्कृति में ऋषियों एवं धर्मगुरुओं के कथा-प्रवचनों एवं व्याख्यानों का विशेष महत्व है क्योंकि शब्दों का सीधा प्रभाव व्यक्ति के जीवन पर पड़ता है। ‘मा भै:’ उपनिषद् की इस वाणी ने अनेकों को निर्भय एवं साहसी बना दिया। ‘खणं जाणाहि’ भगवान महावीर के इस उद्बोधन ने लाखों को अप्रमत्त जीवन जीने का दिशा बोध दे दिया तथा ‘अप्पदीवो भव’ बुद्ध की इस अनुभवपूत वाणी ने हजारों के अंधकारमय जीवन को आलोक से भर दिया। इसी श्रृंखला में रमेश भाई ओझा एक सम्मोहक सा, चमकती आंखों वाला अध्यात्म का शिखर पुरुष व्यक्तित्व है, जो पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक पूरी दुनिया में जीवनपर्यंत राम-कथा एवं भागवत-कथा के मिशन को लेकर मनुष्य को मनुष्य बनाने की ललक के साथ गतिशील हैं।

श्री रमेश भाई ओझा भाईश्री और भाईजी के रूप में लोकप्रिय हैं। रमेश भाई ने  कथाकार के रूप में अपनी एक अलग ही पहचान बनाई हैं। वे धर्मगुरु के साथ एक आध्यात्मिक विचारक के रूप में अपने अनुयायियों में हमेशा लोकप्रिय रहे हैं। भाईश्री ने अपनी कथा और प्रवचनों के जरिए कोशिश की है कि लोग सर्वशक्तिमान के अस्तित्व में विश्वास करें। भाईश्री का प्रयास है कि दुनिया अपनी अच्छाई के लिए जानी जाए। श्री रमेश भाई लोगों को प्यार, ईमानदारी, पवित्रता, अच्छाई और आध्यात्मिकता के रास्ते पर चलने के लिए हमेशा प्रेरित करते हैं।

श्री रमेश भाई एक आध्यात्मिक हिन्दू धर्मोपदेशक हैं, जो वेदान्त दर्शन पर धाराप्रवाह व्याख्यान देते हैं। न केवल देश बल्कि दुनिया में उनकी रामकथा सुनने भारी संख्या में श्रोता पहुंचते हैं। गुजरात के देवका में पैदा हुए श्री रमेश भाई ने अपनी जन्मभूमि में देवका विद्यापीठ की स्थापना की है। इस विद्यापीठ में भारतीय गुरुकुल परम्परा के अनुसार शिक्षा दी जाती है।

भाईजी की वाणी आत्मिक अनुभूति की वाणी है। उनके शब्दों में अध्यात्म की वह तेजस्वी शक्ति है, जो क्रूर से क्रूर व्यक्ति का हृदय परिवर्तन करने में सक्षम है। उन्होंने अपने जीवन में हजारों बार रामकथा पर प्रवचन किये हैं। उनके कथा-वाचन करने का उद्देश्य श्रीराम के चरित्र को लोकव्यापी बनाने, जन-जन को राममय बनाने के साथ-साथ आत्मविकास एवं स्वानंद है। वे प्रवचन करके किसी पर अनुग्रह का भार नहीं लादते वरन् उसे साधना का ही एक अंग मानते हैं। इस बात की अभिव्यक्ति वे अनेकों बार देते हैं कि मेरे उपदेश और प्रवचन को यदि एक भी व्यक्ति ग्रहण नहीं करता है तो मुझे किंचित् भी हानि या निराशा नहीं होती क्योंकि उपदेश देना मेरा पेशा नहीं वरन् साधना है, वह अपने आप में सफल है। उनकी प्रवचन साधना एवं कथा वाचना मात्र वस्तुस्थिति की व्याख्या नहीं अपितु साधना एवं दर्शन से व्यक्ति और समाज को परिवर्तित कर देने की चेष्टा है। एक धर्मगुरु के मन में निहित समष्टि-कल्याण की भावना का निदेर्शन निम्न वाक्यों में पाया जा सकता है-”मैं चाहता हूं जन-जन में सद्गुण भर जाएं, इंसानियत का उजाला व्याप्त हो जाये और पापों से घुटती हुई दुनिया को प्रकाश मिले। मुझे जो ज्ञान और प्रकाश मिला है, वह औरों को भी दे सकूं ऐसी मेरी हार्दिक इच्छा है। इसके लिए मैं हृदय से प्रयत्नशील हूं।’’

रमेशभाई केवल अपने श्रद्धालुओं एवं भक्तों के लिए ही प्रवचन नहीं करते, मानव मात्र की मंगल भावना से ओतप्रोत होकर भी उनके प्रवचनों की मंदाकिनी प्रवाहित होती है। वे अपनी दिव्यवाणी और लोकरुचि वाली अभिव्यक्ति के लिए प्रभु प्रेमियों में आदर से सुने जाते हैं। जीवन के हर क्षेत्र, हर विषय एवं हर समस्या पर भाईश्री का विश्लेषण अद्भुत और अनुकरणीय है। वे जीवन की समस्याओं का हल अपने प्रवचनों के माध्यम से सहजता से देते हैं। भक्ति, परमात्मा प्राप्ति और ज्ञानार्जन के विषय में उनके दिए सूत्र अद्वितीय हैं। भागवत श्रवण से चित्तरूपी दीपक जलाने का प्रयास मानव को करना चाहिए। मानव को अज्ञानता से लडऩा चाहिए मगर आलोचना और अज्ञानता पर चर्चा करके अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहिए।

श्री रमेश भाई ओझा कहते हैं कि मानव उत्साह की रंगोली सजाकर उमंग के रंग भरे, व कुंठा, हताशा और निराशा से बचे। सभी जीवों को अपने जीवन में प्रभु के प्रकाश को समाहित करना चाहिए, भय मृत्यु का शंखनाद है जबकि निर्भयता नारायण का प्रसाद है। निर्भयता प्रभु को स्वयं को समर्पित करने से आती है। भाईजी के अनुसार दुनिया में तीन तरह के लोग होते हैं साधक, सिद्ध और विषय भोगी। अयोध्या साधकों, मथुरा सिद्धों और लंका विषय भोगी लोगों की प्रतीक हैं। शास्त्रों ने शरीर को रथ, इंद्रियों को घोड़ा, मन को लगाम और बुद्धि को सारथी कहा है। अगर हमारी बुद्धि इंद्रियों के घोड़ों को मन की लगाम से नियंत्रित करना सीख जाती है तो मोक्ष का मार्ग प्राप्त किया जा सकता है।

01-10-2016श्री रमेश भाई के उपदेशों में जीवन का सार निहित है। वे कहते हैं कि यह शरीर बहुत ही दुर्लभ और मूल्यवान है। इसे हमेशा परमार्थ में लगाना सीखिए, निरंतर सत्कार्य करना सीखिए। प्रेम से किया गया कर्म, यज्ञ के समान होता है। हर काम पवित्र भाव से करो, प्रेम से करो, परमार्थ को केंद्र में रख कर करो तो हर कर्म का फल यज्ञ जैसा मिलेगा। राम के जीवन को देखिए, सारा काम पवित्र भाव से किया, परमार्थ के लिए किया। उनका जन्म सिर्फ रावण वध के लिए नहीं हुआ था, वो तो भक्तों के दु:ख दूर करने के लिए अवतरित हुए थे।

रमेश भाईजी ने सत्यं, शिवं और सौन्दर्य की युगपत् उपासना की है, इसलिए उनकी कथा मनोरंजन एवं व्यावसायिकता से ऊपर सृजनात्मकता को पैदा करने वाली है। उनकी कथा या वक्तव्य का उद्देश्य आत्माभिव्यक्ति, प्रशंसा या किसी को प्रभावित करना नहीं, अपितु स्वान्त: सुखाय एवं स्व-परकल्याण की भावना है। इसी कारण उनके विचार सीमा को लांघकर असीम की ओर गति करते हुए दृष्टिगोचर होते हैं। उनकी कथा शैली हृदयग्राही एवं प्रेरक है, क्योंकि वह सहज है। वे कथा-शैली के मोहताज नहीं, अपितु वह हृदय एवं अनुभव की वाणी है, जो किसी भी सहृदय को झकझोरने एवं आनंद-विभोर करने में सक्षम है।

भाईश्री एक योगी की भांति जीवनभर मनुष्य की उलझी ग्रंथियों को सुलझाते रहे हैं। रूढि़-उन्मूलन की दिशा में किये गये अथक श्रम के कारण इस योगी का नाम महर्षि दयानंद सरस्वती एवं स्वामी विवेकानन्द की कोटि में रखा जा सकता है। नशीले पदार्थ इस युग की सबसे बड़ी समस्या बन चुके हैं। बल्कि यह कहें कि नशा ही सब बुराइयों की जड़ है। अपनी कथाओं के दौरान वह व्यसनों पर सबसे ज्यादा प्रहार करते हैं।

सम्पूर्ण विश्व में ‘श्रीमद् भागवत कथा’ के पर्याय पूज्य रमेश भाई ओझा को उनके अनुयायी प्रेम से ‘भाईश्री’ कहकर बुलाते है। निर्मलता आपश्री का गहना है। आपके द्वारा भागवत पर रचित टीकाओं और पुस्तकों को पढ़-पढकर देश में अगणित कथावाचक हुए है. गुजरात के भावनगर में भाईश्री ने बहुत ही भव्य आश्रम और कृष्ण मंदिर का निर्माण करवाया है, जो किसी पावन तीर्थ से कम नहीं है।

केवल कथा ही नहीं अपितु कथा के माध्यम से सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक चेतना का भी जन-जन में विकास करना श्री रमेश भाई का मुख्य उद्देश्य है। सन् 1987 में लंदन में कथा से प्राप्त ढाई करोड की राशि आपने गुजरात में आधुनिक चिकित्सा  से युक्त नेत्र अस्पताल बनाने के लिए प्रदान कर दी। दिल्ली में हुई रामकथा से प्राप्त दो करोड की धनराशि आपने गोवर्धन तीर्थ के सम्पूर्ण विकास एवं परिक्रमा के मार्ग को प्रदूषण-मुक्त करने एवं मार्ग की असुविधा मिटाने के लिए प्रदान की।

रमेश भाई ने पोरबन्दर में संस्कार एवं संस्कृति के विद्याधाम के रूप में सन्दीपनी विद्यानिकेतन की स्थापना की, जहां वैदिक परम्परानुसार संस्कृत साहित्य की निशुल्क शिक्षा दी जाती है। प्रतिवर्ष यहां नेत्रयज्ञ का आयोजन भी किया जाता है जिसमें  निशुल्क आपरेशन  एवं आंखों का इलाज किया जाता है। पोलियो आपरेशन केम्प लगाकर उत्तम गुणवत्ता वाले केलिपर्स प्रदान किए जाते हैं। सेवा कार्य के अतिरिक्त वेद विद्या में निपुण  भारत के ख्याति प्राप्त विद्वानों को आमंत्रित कर वेद सम्मेलन का आयोजन भी आपके सान्निध्य एवं सहयोग से होता रहता है। आपके द्वारा स्थापित  संस्कृति फाउंडेशन की शाखायें इंग्लैंड, मलेशिया, केन्या, स्वीडन आदि अनेक देशों में कार्य कर रही है। आपकी कथा के आडियो कैसेट तथा सीडी लाखों की संख्या में बिक्री होते हैं, व टीवी के अनेक चेनलों पर आपकी कथा प्रवचन प्रसारित होते रहते हैं।

प्रशंसा और यश के विपुल धन से निरे विमोहित भाईजी अपनी साधना एवं मानव कल्याण के उपक्रम में संलग्न है। वे कथाकर्ता हैं पर जीवन की समस्याओं पर बोलते हैं, दिशा-संकेत देते हैं, दुविधाओं और संशयों से मुक्त होने का रास्ता बताते हैं। मैंने ही नहीं, हजारों-लाखों भक्तों ने उन्हें सुना है और जो सुना है, उसके साथ जब-जब चलने का यत्न किया गया है, तब-तब असंख्य लोगों को चिंता से, दुविधा से मुक्त होते हुए देखा गया है। इसी तरह चिंता और दुविधा से मुक्त होने के भाईजी से प्राप्त क्षण यदि स्थायित्व लेते चले जायें, यदि श्रोता-समाज इन क्षणों को काल-गणना का एक नया नाम देता चला जाये तो विश्व-बंधुत्व, मनुष्य-मनुष्य का भाईचारा ही तो रूपायित होगा। इससे बड़ा कल्याण इस धरती का, इस समाज का और क्या होगा?

इस तरह इक्कीसवीं सदी के भाल पर अपने कार्य की जो अमिट रेखाएं रमेश भाई ने खींची हैं, वे इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेंगी। उपदेष्टा के साथ-साथ वे धर्मक्रांति एवं समाजक्रांति के सूत्रधार भी कहे जो सकते हैं।

ललित गर्ग

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