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राज बनाम महल का खेल विरासत का जिन्न बोतल से बाहर

राज बनाम महल का खेल  विरासत का जिन्न बोतल से बाहर

अपने सौंदर्य के लिए विख्यात रही राजमाता गायत्री देवी से जुड़े जयपुर के पूर्व राजघराने की परिसम्पत्तियों के मामले में राजस्थान सरकार से विवाद के चलते होटल राजमहल पैलेस से सटी जमीन पर जयपुर विकास प्राधिकरण की ‘शिखर टीम’ द्वारा कब्जा लेने की कार्यवाई की गई। इसके दौरान पूर्व राजकुमारी भाजपा विधायक दीया कुमारी से प्राधिकरण आयुक्त शिखर अग्रवाल की तनातनी हुई। होटल में आवागमन के प्रवेश द्वार पर ताला जडऩे के विरोध में राजपरिवार के अदालत में जाने और सड़क पर उतरने तथा उत्तर प्रदेश विधानसभा के आसन्न चुनाव में राजपूत समाज के मतदाताओं की नाराजगी की आशंका को ध्यान में रखते हुए पार्टी हाईकमान के हस्तक्षेप से इस ग्यारह दिवसीय नाटकीय घटनाक्रम के परिणामस्वरूप ताला खुलने की कवायद हुई। साथ ही अदालती आदेश में 24 अगस्त से पूर्व की यथास्थिति बनाये रखने में सरकार की किरकिरी से जुड़ा बवाल भले ही थम गया है लेकिन सामान्यजन में इसके पीछे छिपा कड़वा सच जानने की उत्सुकता बरकरार है।

पूर्व राजपरिवार की परिसम्पतियों एवं जमीन संबंधी विवाद कोई नया नहीं है। इन्हें लेकर सरकार और स्वयं राजपरिवार के सदस्यों के बीच भी परिसम्पत्तियों के बंटवारे को लेकर विवाद रहे है। अनेकानेक कानूनी सवालों को सुलझाने की इस जटिलता में कॉवेनेन्ट संबंधी विवाद के साथ राजस्व भी, नामांतरण भी, अवाप्ति एवं कब्जे सहित कई विवाद शामिल है। सरकार एवं जयपुर विकास प्राधिकरण सहित अन्य संस्थाओं और पूर्व राजपरिवार के बीच अदालतों में लम्बित विवाद के साथ जनहित याचिका में उठाए गए मुद्दे भी शामिल है। लेकिन इस बार अदालती विवाद को राजनीतिक लड़ाई में बदलने के प्रयास देश-प्रदेश की भावी राजनीति में क्या रंग लायेंगे, यह अभी गर्भ में है।

यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि पूर्व राजपरिवार की परिसम्पत्तियों पर पहले भी बुलडोजर का इस्तेमाल हो चुका है। भाजपा के दिग्गज नेता भैंरोसिंह शेखावत के मुख्यमंत्रित्व के दूसरे चरण के कार्यकाल में सिटी पैलेस में बनाये गये नियम विरूद्ध निर्माण कार्य को ध्वस्त करने के लिए बुलडोजर भेजा गया था। तब कांग्रेस के विधायक रामनारायण मीणा ने राज्य विधानसभा में प्वाइंट ऑफ इन्फार्मेशन के जरिए यह मामला उठाया था। मीणा बाद में विधानसभा के उपाध्यक्ष भी बने। तब यह अफवाह भी उड़ी थी कि सिटी पैलेस में की गई इस कार्रवाई के पीछे सरकार की मंशा पूर्व राजपरिवार पर कांग्रेस से रिश्ता खत्म करने के लिए दवाब बनाना था।

01-10-2016

लेकिन अब तो हालात बदले हुए है। पूर्व राजपरिवार की दीया कुमारी सवाई माधोपुर से भाजपा की विधायक है और स्वास्थ्य एंव चिकित्सा विभाग की बेटी बचाओं योजना की जुलाई 2014 से ब्राण्ड एम्बेसडर भी है। राजमहल पैलेस होटल के वर्तमान प्रकरण से जुड़ा सबसे अहम सवाल इसकी तारीख और समय से है। पूर्व राजघराने की मुखिया पद्मिनी देवी ने यह सार्वजनिक किया है कि 21-22 अगस्त को मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने उनके साथ डिनर किया था और इसी तारीख में जयपुर विकास प्राधिकरण ने पूर्व राजपरिवार को नोटिस भेजा था। मुख्यमंत्री अगले दिन दिल्ली होते हुए भूटान में एक साहित्यिक सम्मेलन में भाग लेने चली गई। उन्होंने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह द्वारा बुलाये गये भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियो की बैठक में भी हिस्सा नहीं लिया।

प्राधिकरण ने 24 अगस्त की सुबह अवाप्तशुदा जमीन पर कब्जा लेने की कार्रवाई शुरू की। इसी दौरान कथित अतिक्रमणों की तोड़-फोड़ होटल के आवागमन के लिए एक मुख्य गेट सहित चार गेटों को सील कर ताला जडऩे का परिदृश्य बना। इसी दौरान जे.डी.ए. सी. शिखर अग्रवाल तथा भाजपा विधायक दीया कुमारी के बीच जिस तल्खी में बात-चीत हुई उसने आग में घी का काम किया। अगले दिन दीया कुमारी ने रोष भरे अंदाज मे प्राधिकरण की तानाशाह कार्रवाई को राजपरिवार का अपमान बताते हुए आयुक्त को अंजाम भुगतने तक की खुली चेतावनी दी, वही उनकी माता पद्मिनी देवी ने जारी बयान में साफ किया कि पूर्व राजपरिवार ने कभी भी राज्य सरकार या जेडीए के स्वामित्व वाली किसी भी सम्पत्ति को अपने कब्जे में नहीं लिया। यही नहीं उन्होंने कहा कि राजपरिवार से संबंधित सभी महत्वपूर्ण स्मारक और इमारते अब सरकार के पास है, जिनमें विद्यालय, महाविद्यालय, अस्पताल, संग्रहालय इत्यादि शामिल है। दीया कुमारी के पति नरेन्द्र सिंह ने इसका खुलासा करते हुए कहा कि राजमहल पैलेस के सामने तीन बीघा जमीन पर बना रेजीडेंसी स्कूल एवं अस्पताल तथा चिकित्साा विभाग के तीन दफ्तर है जिनकी कीमत 110 करोड़ रूपये है। इसी तरह पुराना पुलिस मुख्यालय, पुरानी विधानसभा टाउनहाल की लगभग 36 हजार करोड़ की इमारते एवं जमीन पूर्व राजपरिवार के नाम होने का दावा किया जाता है, लेकिन ये सभी सरकारी कब्जे में है। इस प्रकरण की तीव्र प्रतिक्रिया हुई और अगला सप्ताह राजपरिवार के सम्मान एवं धरोहर बचाने की खातिर सड़कों पर उतरने के रूप में सामने आया। पूर्व राजपरिवार की परिसम्पत्तियों के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा नियुक्त रिसीवर जस्टिस यू.एन. बछावत के आफिसर इंचार्ज कर्नल राजेश ने 26 अगस्त को अशोक नगर थाने में शिकायत दी जिसमें आयुक्त सहित पांच अधिकारियों पर पूर्व राजघराने की विवादित सम्पत्ति, राजस्थान विलय के महत्वपूर्ण दस्तावेज इत्यादि गायब होने का आरोप लगाया गया। अगले दिन राजपूत सभा भवन और सिटीपैलेस में बुलाई गई बैठक में होटल राजमहल पैलेस का गेट खोलने और आयुक्त को हटाने की मांग की गई। राजपूत समाज सहित सर्वसमाज की ओर से रैली निकालने का निर्णय लिया गया। पद्मिनी देवी की ओर से इसके लिए समाचार पत्रों में अपील प्रकाशित कराई गई। सिटी पैलेस परिसर के त्रिपोलिया गेट से तीज माता और गणगौर की सवारी निकाले जाने की परम्परा रही है। लेकिन एक सितम्बर को इसी गेट से राजमहल पैलेस तक रैली निकाली गई। सत्तर बरस पहले देश विभाजन के समय देशी रियासतों के एकीकरण की प्रक्रिया में सर्वप्रथम जयपुर के तत्कालीन महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय ने राजस्थान के पुर्नगठन में अपनी रियासत के विलय की घोषणा की थी और अब ऐसा संयोग बना कि राजपरिवार की विरासत को बचाने की गरज से उनकी पुत्रवधु एवं भारत-पाक युद्ध में छापामार सैन्य अधिकारी की वीरता दर्शाने वाले दिवंगत ब्रिगेडियर भवानी सिंह की जोड़ायत राजमाता पद्मिनी देवी तथा परिवारजनों को सड़क पर उतरने की मजबूरी झेलनी पड़ी। इस कूच में शामिल होने के लिए खुली गाड़ी में परिवार की मुखिया पद्मिनी देवी पद्यनाभ सिंह सहित अन्य प्रमुख लोग सवार थे। भाजपा विधायक दीयाकुमारी ने रैली से दूरी बनाये रखी। उनके पुत्र पद्यनाभ सिंह को पूर्व महाराजा भवानी सिंह ने दत्तक पुत्र के रूप में गोद लिया था। भवानी सिंह के निधन के बाद उन्हें महाराजा की पदवी मिली। वयस्क होने पर पद्यनाभ ने सिटी पैलेस में आयोजित समारोह में राजनीति में सक्रिय होने की मंशा जाहिर की थी और इसका खुलासा इस रैली में उनका स्वागत सत्कार कराये जाने से भी हो गया। रैली से पहले सरकार ने डेमेज कन्ट्रोल के काफी प्रयास किए। तीन राजपूत मंत्रियों से कराई गई समझाइश का भी कोई असर नहीं हुआ। संघर्ष समिति प्राधिकरण आयुक्त को हटाने तथा गेट खोलने की मांग पर अड़ी रही। इसीलिए रैली की समाप्ति पर होटल राजमहल पैलेस के बाहर हुई सभा में अपनी मांग के लिए सरकार को 24 घंटे का अल्टमेटम दिया गया। पद्मिनी देवी ने इससे अपने को अलग करते हुए सरकार से सुलह के संकेत दे दिए और दो दिन बाद इसके नतीजे भी आ गए।

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इससे पहले अपनी परिसम्पतियों पर आये संकट को लेकर भाजपा विधायक दीया कुमारी ने एक तरफ दिल्ली में केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकात की। इसी संदर्भ में उत्तर प्रदेश के विधानसभा के मद्देनजर राजपूत समुदाय के वोट बैंक का मसला भी ध्यान में आया। वही राजपरिवार की ओर से अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायालय संख्या 11 कैलाश चन्द्र मिश्रा की अदालत में राजपरिवार को मिली डिक्री के निष्पादन के लिए याचिका लगाई गई जिसमें राजमहल का गेट खुलवाने का मसला अहम था। प्राधिकरण ने भी वर्ष 2011 में पारित डिक्री के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील की हुई है। महानगर मजिस्टे्रट कोर्ट में जेडीए द्वारा राजमहल होटल तथा आसपास की जमीन पर तोडफ़ोड़ कब्जा कार्रवाई के खिलाफ पूर्व राजपरिवार के पावर ऑफ अटोर्नी होल्डर नारायण सिंह की ओर से इस्तगासा दायर किया गया। राज परिवार से जुड़े एस.एम.एस इंवेस्टमेंट कारपोरेशन की ओर से उच्च न्यायालय में दायर याचिका में भी प्राधिकरण की कार्रवाई को चुनौती दी गई। याचिका में कहा गया कि किसी भी सरकारी एजेंसी सहित किसी ने भी आजतक इस जमीन का कभी भी कब्जा नहीं लिया। नये भूमि आपत्ति कानून के लागू होने से 1974 में शुरू की गई भूमि आवप्ति की कार्रवाई भी लैप्स हो चुकी है। जेडीए द्वारा महज एक दिन पहले नोटिस देकर जमीन व भवन पर कब्जे की कार्रवाई किया जाना गैर कानूनी है।

पूर्व राजपरिवार द्वारा की गई अदालती कार्रवाई के मद्देनजर जी.एस.टी. बिल के अनुमोदन के लिए बुलाये गये राज्य विधानसभा के संक्षिप्त सत्र के पहले ही दिन सरकार ने आनन-फानन में नगरीय विकास मंत्री राजपाल सिंह शेखावत से सचिवालय में प्रेस कान्फ्रेंस कर जेडीए की कार्रवाई को सही ठहराया।

नगरीय विकास मंत्री राजपाल सिंह शेखावत ने एक सितम्बर की प्रेस कान्फ्रेंस में साफ कहा था कि जेडीए ने 24 अगस्त को होटल राजमहल पैलेस से सटी अवाप्तिशुदा जमीन के खसरा नम्बर 188 व 194 में ही कार्रवाई की है तथा होटल का एक मुख्य गेट खसरा नम्बर 194 में ही है। यह गेट चौराहे के समीप है जिसका एक मार्ग सिविल लाइन्स, राजभवन तथा मुख्मंत्री निवास की तरफ जाता है। खसरा नम्बर 195 में राजमहल पैलेस का मुख्य द्वार है जिसे सील नहीं किया गया है। इसी तरह राजपरिवार द्वारा जिस डिक्री की बात कही जा रही है उस वाद मे खसरा नम्बर 188 व 194 नहीं है। यदि गेट को लेकर खसरा नम्बर 194 तथा 195 का विवाद है तो पुन: पैमाइश कराने में कोई हर्ज नहीं है। इसी तरह विधायक दीया कुमारी से दुव्र्यवहार की कोई बात सामने आएगी तो जांच करवा लेंगे। पूर्व राजपरिवार प्राधिकरण आयुक्त को हटाने के लिए दबाव बनाए हुए है लेकिन वह ढाई साल से इस पद पर बने हुए है।

शेखावत के अनुसार तत्कालीन ग्राम हथरोई तहसील जयपुर की कुल 120 बीघा 03 बिस्वा भूमि हैै। इसमें से 62 बीघा 18 बिस्वा भूमि वर्ष 1993, 1994 तथा 1995 में अलग-अलग अवार्ड पारित कर अवाप्त की जा चुकी है। प्रथम अवार्ड 1993 में 65 बीघा 16 बिस्वा भूमि के लिए हुआ जो मुख्यत: तीन पक्षकारों व पूर्व महाराजा भवानी सिंह एस.एम.एस. लैण्ड डवलपमेंट कारपोरेशन एवं गांधी गृह निर्माण सहकारी समिति के संबंध में पारित हुआ। इसी तरह अन्य अवार्ड पारित हुए। पूर्व राजपरिवार तथा प्राधिकरण के बीच अदालतों में कई वाद लम्बित है। एडीजे कोर्ट संख्या 11 में एक सितम्बर को पूर्व राजपरिवार की याचिका पर सुनवाई हुई लेकिन भोजनावकाश के बाद न्यायाधीश स्वास्थ्य ठीक नहीं होने से घर चले गये। पांच सितम्बर को फैसले की संभावित तिथि के दिन जयपुर जिला कलैक्टर सिद्धार्थ महाजन ने छठ मेले के सार्वजनिक स्थानीय अवकाश को रद्द कर गणेश चतुर्थी का अवकाश घोषित कर दिया।

01-10-2016

मामला दिल्ली तक पहुंचने पर भाजपा हाईकमान ने राष्ट्रीय सहसंगठन मंत्री सौदान सिंह को जयपुर भेजा। पहले दीया कुमारी और बाद में मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे ने भाजपा के प्रदेश मुख्यालय पर सौदान सिंह से लम्बी बातचीत कर अपना अपना पक्ष रखा। मामले को तूल न देते हुए प्रकरण को सुलझाने की दिशा में पहल की गई। इस बीच राजपरिवार की ओर से सरकार को दिए गए आवेदन मे सशर्त गेट खुलवाने का अनुरोध किया गया। दो दिन पहले तक मुख्यमंत्री से दुबारा नहीं मिलने की बात कहने वाली राजपरिवार की मुखिया पद्मिनी देवी ने तीन सितम्बर को श्रीमति वसुंधरा राजे से उनके निवास पर भेंट की। इस मुलाकात से बर्फ पिघलनी शुरू हो गई। आनन फानन में राज्य सरकार ने कमेटी गठित की। नगरीय विकास मंत्री राजपाल सिंह शेखावत की अध्यक्षता में गठित चार सदस्यीय समिति में चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री राजेन्द्र राठौड़, उद्योग मंत्री गजेन्द्र सिंह खींवसर तथा भाजपा प्रदेश अध्यक्ष विधायक अशोक परनामी शामिल किए गए। परनामी के निवास पर इस कमेटी ने रात दस बजे सशर्त गेट खोलने के संबंध में रिपोर्ट तैयार की। रिपोर्ट पर शेखावत ने हस्ताक्षर किए। देर रात सचिवालय में यूडीएच के प्रमुख सचिव मुकेश शर्मा ने समिति की रिपोर्ट के आधार पर नोटशीट चलायी और अद्र्धरात्रि में शेखावत ने गेट का ताला खोलने के लिए प्राधिकरण आयुक्त को निर्देशित करने पर मोहर लगा दी और रविवार सुबह बिना किसी शोरगुल के तीन चार घंटे में बनी ‘सियासी चाबी’ से गेट खुल गये। उधर सम्मान व धराहर बचाओं समिति के आव्हान पर रविवार को पूर्व उपराष्ट्रपति भैंरोसिंह शेखावत की समाधि परिसर में आयोजित सद्बुद्धि यज्ञ, विजय यज्ञ में परिवर्तित हो गया। राजमाता पद्मिनी देवी तथा पद्यनाभ सहित विभिन्न संगठनों के लोग इसमें शामिल हुए।


प्रकरण पर प्रतिक्रिया


01-10-2016प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट ने मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के भूमि प्रेम पर कटाक्ष करते हुए कहा कि जेडीए की कार्रवाही के पीछे छिपी मंशा का कभी न कभी तो खुलासा होगा। पूर्व मुख्य मंत्री अशोक गहलोत का कहना है कि वसुंधरा जी के पिछले कार्यकाल में भी जमीन पर कब्जा लेने के लिए प्राधिकरण ने ऐसे तौर तरीके अपनाये थे। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार तानाशाही का प्रतीक बन रही है।

01-10-2016कांग्रेस नेता और नगर निगम में पूर्व मुख्य सचेतक गिरिराज खंडेलवाल ने जयपुर के पूर्व राजपरिवार की सारी सम्पत्ति पर श्वेतपत्र जारी करने की मांग करते हुए कहा कि राज्य सरकार और पूर्व राजघराने के बीच हजारों करोड़ रूपयों की सम्पत्ति को लेकर कई तरह के विवाद है। खंडेलवाल का यह भी दावा है कि होटल व इससे जुड़ी पूरी जमीन हीं सरकारी है, सिर्फ एक हिस्से पर कब्जा लिया गया। कॉवेनेंट की सूची में राजमहल पैलेस तथा रेजीडेंसी का विवरण नहीं है। इस कारण यह सरकारी जमीन (सिवाय चक) दर्ज हो चुकी है। प्राधिकरण की कार्रवाई को आधी अधूरी01-10-2016 बताते हुए उन्होंने आशंका का जताई है कि राज्य सरकार मे बैठे प्रभावशाली लोगो तथा पूर्व राजघराने में कोई गुप्त समझौता संभव है। इसकी आड़ में हजारों करोड़ों की सम्पत्ति इधर-उधर की जा सकती है। गौरतलब है कि राजस्थान राजपत्र के विशेषांक में 14 जनवरी 1950 को रियासतों के विलय के लिए तत्कालीन शासकों एवं भारत सरकार के बीच हुए कॉवेनेंट (जमीन संबंधी करार) का प्रकाशन हुआ था। इसमें जयपुर के पूर्व राजघराने की सम्पत्तियां भी है। जेडीए का यह तर्क है कि वर्ष 1993 में ही जमीन अवाप्ति प्रक्रिया पूरी हो गई र्थी और कोर्ट में मुआवजा जमा हो चुका है। इसी तरह कॉवेनेट का मामला तथा भूमि स्वामित्व विवाद अलग प्रक्रिया है और जमीन अवाप्ति प्रक्रिया अलग मामला है।

असंतुष्ट खेमे से भाजपा के वरिष्ठ विधायक घनश्याम तिवाड़ी ने कहा है कि इस प्रकरण में सरकार को स्टेटस रिपोर्ट जारी करने के साथ ही मुख्यमंत्री को भी स्पष्टीकरण देना चाहिए। प्रदेश कांग्रेस की मीडिया चेयरपर्सन अर्चना शर्मा का आरोप है कि जयपुर के नियोजन हेतु बने प्राधिकरण ने पिछले ढाई साल में पिक एण्ड चूज के आधार पर कार्रवाई की है। उनका कहना है कि सरकार ने महल वालो की बात सुन ली है अब आम जनता की भी सुने।

01-10-2016इस प्रकरण में चीफ काजी खालिद उस्मानी ने भी बयान जारी करके कहा कि जब वर्षों से इस सम्पत्ति पर राजपरिवार काबिज है तो आज यह स्थिति कैसे पैदा हुई यह चिंता का विषय है। कारण जो भी हो, सरकार को अब ऐसा कदम उठाना चाहिए कि राजपरिवार को न्याय मिले, कानून व न्यायसंगत कार्रवाही हो।

भाजपा के पूर्व प्रदेश प्रवक्ता और पूर्व अतिरिक्त महाधिवक्ता कैलाशनाथ भट्ट ने पिछले दिनों फेसबुक पर यह राय व्यक्त की थी कि जयपुर में इन दिनों कुछ अच्छा नहीं हो रहा है। राजमहल प्रकरण के संदर्भ में उनकी टिप्पणी थी कि सरकार प्राधिकरण एवं राजपरिवार के बीच आपसी बातचीत सेइस मसले का हल निकाला जा सकता था। फिर यह तमाशा करने की क्या जरूरत थी।


अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायालय संख्या 11 के न्यायाधीश कैलाशचन्द्र मिश्रा ने 6 सितम्बर को दिए अपने फैसले में प्राधिकरण की कार्रवाई को गलत करार देने के साथ सील किए गए गेट को पुन: खोलने, आम रास्ते की सभी रूकावटे दूर करने तथा होटल परिसर स्थित कर्मचारी क्वार्टर्स का स्ट्रक्चर एक माह की अवधि में ठीक कर 24 अगस्त से पूर्व की स्थिति बहाल करने के आदेश दिए है। अदालत ने अपने विस्तृत फैसले में यह स्पष्ट माना है कि प्राधिकरण ने 24 नवम्बर 2011 को हुई डिक्री आदेश के खिलाफ कर्रवाई की। जमीन के स्वामित्व विवाद को लेकर अपर जिला न्यायधीश (फास्टट्रेक) क्रम 5 ने पूर्व राजघराने के पद्मनाभ सिंह, पद्मिनी देवी, दीया कुमारी बनाम राज्य सरकार जेडीए व अन्य के बीच चले मामले में वादीगण के पक्ष में डिक्री में उन्हें एकमात्र स्वामित्व घोषित किया और अन्य पक्ष को पाबंद किया कि वह विवादित सम्पत्ति के उपयोग-उपभोग में बाधा नहीं पहुंचाए। एडीजे कोर्ट ने 54 बीघा 7 बिस्वा जमीन की डिक्री पूर्व राजपरिवार के पक्ष में कर सभी राजस्व रिकार्ड शून्य कर दिए थे। अदालत ने स्थायी निषेधाज्ञा के साथ कहा कि जब तक डिक्री पर ऊपरी अदालत से स्थगन नहीं मिले तब तक कार्रवाई की बजाय डिक्री का सम्मान करना चाहिए था। अदालत ने डिक्री के साथ नक्शे में विवादित भूमि का उल्लेख किया है।

01-10-2016

इस फैसले से यह भी साफ हुआ है कि खसरा नम्बर 194 की कुल रकबा 8 बीघा 10 बिस्वा जमीन में से 7 बीघा 7 बिस्वा जमीन अवाप्त की थी। शेष एक बीघा 3 बिस्वा जमीन अवाप्ति से अलग रही। खसरा 194 के बारे में जेडीए के तर्क को सारहीन बताया गया। इस फैसले पर अपनी प्रतिक्रिया में प्राधिकरण आयुक्त शिखर अग्रवाल ने कहा कि हमारे पास पर्याप्त आधार है और जेडीए उच्च न्यायालय में इसके खिलाफ याचिका दायर करेगा इसके लिए सरकार की अनुमति की आवश्यकता नहीं है। दोनों पक्षों द्वारा उच्च न्यायालय में जाने की तैयारी है।

अदालत के फैसले से दो दिन पहले सरकार द्वारा गठित समिति की रिपोर्ट पर होटल राजमहल पैलेस के विवाद का बने गेट का ताला खोला जा चुका था। समिति ने इसे आवागमन की वैकल्पिक व्यवस्था होने तथा अस्थायी रूप से खोलना उचित माना। इस रिपोर्ट पर की गई कार्रवाई को लेकर सवाल उठ खड़े हुए है जिससे सरकार बैकफुट पर आ गई है। अब यह पूछा जाने लगा है कि क्या जयपुर विकास प्राधिकरण शहर में लगभग 400 सील बिल्डिंगों को भी इसी तरह की प्रक्रिया से सील मुक्त करेगा। बहरहाल पार्टी हाईकमान के हस्तक्षेप से दवाबवश ही सही गली निकालने के इस उपाय से प्राधिकरण मकडज़ाल में फंस गया है और सरकार की कार्यशैली और साख भी सवालों के घेरे में आ गई है। हालात ये है कि अदालती फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील दायर करने के संबंध में प्राधिकरण ने प्रेसनोट जारी किया। इसमें होटल राजमहल पैलेस प्रकरण का उल्लेख किए जाने की सरकार को जानकारी मिलते ही करीब पौने दो घंटे में संशोधित प्रेस नोट जारी करवाया गया। समझा जाता है कि अदालत में सुनवाई के दौरान न्यायाधीश की एक मौखिक टिप्पणी की सूचना पर सरकार ने गेट खुलवाने का मन बना लिया था।

यह भी गौरतलब है कि होटल राजमहल पैलेस के रिनोवेशन को लेकर भी विवाद बना हुआ है। जानकार सूत्रों के अनुसार 2013 में रिनोवेशन के लिए किसी फर्म से अनुबंध किया गया था। लेकिन बाद में किसी दबाववश एक प्रभावशाली राजनीतिक हस्ती के परिवारजन की फर्म से यह काम करवाया गया जिसके लिए कई गुना अधिक रकम चुकायी गई। पूर्व फर्म को भुगतान करना तो छोड़ अपना साज सामान वापस लेना भी भारी पड़ रहा है।

होटल राजमहल पैलेस विवाद चर्चित होने के साथ पूर्व राजपरिवारों की परिसम्पत्तियों को लेकर विवाद फिर से उभरने लगे है। जयपुर के अलावा जोधपुर, उदयपुर, बीकानेर, जैसलमेर इत्यादि रियासतों की परिसम्पत्तियों के प्रकरण की फिर से चर्चा होने लगी है। उल्लेखनीय है कि पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के पहले कार्यकाल (1998-2003) के दौरान पूर्व राजपरिवारों से प्राप्त 36 बड़ी इमारतों को प्राईवेट फर्मों को देने संबंधी निर्णय किया गया। इसका विरोध करते हुए करीब 18 पूर्व राजपरिवारों ने गहलोत को लिखे संयुक्त पत्र में कहा कि इन इमारतों पर राज परिवारों का पहला हक है। इस पर सरकार ने नागौर तथा एक दो किलों को छोड़कर कुछ वापस नहीं दिया। पूर्व राजपरिवार इससे नाराज है। राजस्थान उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश पानाचंद की यह टिप्पणी गौर करने लायक है कि यह विवाद कई गंभीर कानूनी बिन्दुओं और तथ्यों के जाल से घिरा हुआ है। यदि सम्पत्ति कॉवेनेंट के अनुसार निजी लिस्ट में ही नहीं है तो यह राज्य सरकार की है और यदि लिस्ट में है तो राजपरिवार की है। यदि अवाप्ति के बाद मुआवजा दिया जा चुका है तो क्या होगा कहना कठिन है। यदि सिविल कोर्ट का अधिकार क्षेत्र ही नहीं होना सामने आए तो डिक्री निरस्त की जा सकती है। इस प्रकार अंतहीन विवाद दिखाई दे रहा है।

लब्बो-लुबाब यह है कि सरकार और प्राधिकरण 23 वर्षों बाद अवाप्त जमीन पर भौतिक कब्जा लेने की नीयत से की गई कार्रवाई को लेकर पूर्व राजपरिवार को परिसम्पत्तियों के विवाद में नई मुकदमेबाजी का अवसर दे दिया है। अब इसके पीछे किसकी क्या मंशा रही इसका खुलासा कभी होगा या नहीं कुछ कहा नहीं जा सकता। मामला अदालत में है, यह ब्रह्यवाक्य गूंजेगा।

 जयपुर से गुलाब बत्रा

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